इस अंक के रचनाकार

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सोमवार, 30 मई 2022

समीर उपाध्याय 'ललित' की लघुकथाएं

 

कहीं तुम्हें मेरी नज़र न लग जाए...
मिलन और मेघना की आज़ शादी की पांचवीं सालगिरह है। घर पर शाम को एक बहुत बड़ी पार्टी का आयोजन किया है। बड़ी धूमधाम के साथ मेहमान नवाजी होने वाली है।
मिलन- "मेघना, आज़ मन करता है कि तुम्हारी इन लंबी काली-काली जुल्फों में उलझ जाऊं और लाल रंग के फूलों का यह ब्रोच लगाऊं।"
मेघना- "बहुत खूब! आज़ बड़े रोमांटिक मिज़ाज में लग रहे हैं!"
मिलन- "मैं चाहता हूं कि आज़ शाम पार्टी में तुम अपने लंबे काले बालों में लाल फूलों का ब्रोच लगाओ। बड़े प्यार से इसे बाज़ार से खरीद कर लाया हूं। यह ब्रोच मेरी ओर से तुम्हें प्यार का तोहफ़ा समझो।"
मेघना- "आप कमरे की सजावट कीजिए। समय बहुत कम है। अभी मेहमान आ जाएंगे। मैं अपने कमरे में तैयार होने के लिए जा रही हूं।"
मिलन ने अकेले रंग-बिरंगे पताकों, गुब्बारों और फूलों से पूरे कमरे को सजाया। कमरे की सजावट में उसे पूरे दो घंटे लग गएं। मेघना ने अपने कमरे से आवाज़ लगाई- "सुनते हो जी! अब मैं तैयार हो गई हूं। ज़रा मेरी साड़ी में पीन लगा दीजिए।"
मिलन तुरंत मेघना के कमरे में पहुंचा और देखा कि मेघना सज-धज कर तैयार हो गई है। मेघना के कहने के मुताबिक मिलन में उसकी साड़ी में पीन लगा दी।
मेघना- "मेहमानों का आने का वक्त हो गया है। आप पांच मिनट में फटाफट तैयार हो जाइए।"
मिलन- "मुझे कपड़े बदलने में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा।"
मेघना- "मिलन, देखो यह काले रंग की गोल्डन बॉर्डर वाली साड़ी मुझे कितनी जच रही है! यह साड़ी मेरी मां ने भेजी है। यह पेंडल सेट देखो जो मेरी दीदी ने अहमदाबाद से भेजा है। मुझे बेहद पसंद आया। ये चूड़ियां देखो जो मेरी मौसी ने भेजी है। मैं कितनी सुंदर लग रही हूं!"
मिलन- "बहुत सुंदर लग रही हो! तुम्हारी सुंदरता को चार चांद लग जाते यदि तुमने......"
मेघना- "मतलब?"
मिलन- "कुछ भी नहीं। बहुत सुंदर लग रही हो। तुम्हें देखकर ऐसा लगता है कि जैसे पूरी कायनात ज़मीन पर उतर आई हो!"
मेघना- "अरे! आप पीछे क्यों मुड़ गएं?"
अपनी व्यथा को दिल में दबा कर मिलन बोला- "बस, इसलिए कि कहीं तुम्हें मेरी नज़र न लग जाए।"

सच्चा अभिषेक
शिवांश और उमा की शादी हुए पांच साल हो गएं थे। लेकिन आंगन बच्चे की किलकारी के बिना सूना था।
उमा ने अब भक्ति में मन लगा दिया था। शिवांश ऑफिस चला जाता और उमा अपना अधिकांश समय पूजा, पाठ, व्रत, जप और तप में व्यतित करती।
श्रावण मास चल रहा था। उनकी सोसायटी के शिव मंदिर में लोगों ने १०८ लीटर दूध से शिवाभिषेक का आयोजन किया था। उमा को अभिषेक करने की बड़ी इच्छा थी। उसने शिवांश से कहा- "सुनिए जी, जल्दी तैयार हो जाइए। आज़ हमें शिवाभिषेक करना है।"
इतने में उनके द्वार पर आवाज़ सुनाई दी- "मां, दो दिन से कुछ खाया नहीं। कुछ दे दो।" शिवांश ने बाहर निकलकर देखा तो आठ-दस साल का एक अधनंगा मासूम बच्चा लाचार मुंह किए खड़ा था।
शिवांश ने पूछा- "बेटे, कहां रहते हो?"
बच्चा- "यहीं पास वाले मैदान में एक कोठरी में।"
शिवांश- "घर में और कौन-कौन है?"
बच्चा- "बाप था, लेकिन शराब पीकर मर गया। मां है और दादी अम्मा।"
शिवांश ने उमा से कहा- "उमा, पहले मेरे साथ चलो इस बच्चे के घर।"
उमा- "लेकिन हमें तो अभिषेक के लिए....।"
शिवांश- "नहीं, पहले मेरे साथ चलो। आज़ का अभिषेक वहीं होगा।"
शिवांश और उमा उस बच्चे को लेकर उसकी कोठरी पर पहुंचे। जाकर देखा तो बच्चे की मां एक मैली-सी चादर से अपने बदन को ढंककर मायूस चेहरा लेकर बैठी थी। कोठरी बिल्कुल खाली थी। एक मटमैली खटिया पर बूढ़ी दादी अम्मा पड़ी-पड़ी कराह रही थी। यह देखकर शिवांश का दिल द्रवित हो गया। उसने उमा से कहा- "तुम यहीं ठहरो। मैं बाज़ार से कुछ सामान लेकर आता हूं।"
थोड़ी देर में शिवांश बाज़ार से दो-तीन साड़ियां, बच्चे के लिए कपड़े और खाने-पीने की बहुत सारी चीज़ें लेकर वापस आया। बच्चे की मां और दादी अम्मा में जैसे शक्ति का संचार हो गया। दादी अम्मा खटिया से खड़ी हो गई और बोली- "बेटे, भगवान तुम्हारी झोली खुशियों से भर दें। दूधो नहाओ और पूतों फलों।"
शिवांश एक आत्मसंतोष की भावना के साथ उमा को लेकर घर वापस आया। शाम को उमा की तबीयत कुछ बिगड़ गई। शिवांश उमा को लेकर अपने डॉक्टर मित्र के पास गया। डॉक्टर ने जांचकर कहा- "गजानन के आगमन की तैयारी कीजिए। उमा के उदर में गर्भ पल रहा है।"
शिवांश और उमा के चहरे ख़ुशी से खिल उठे। शिवांश- "उमा, यह हमने कल किए हुए अभिषेक और दादी अम्मा के दिल से निकली हुई दुआओं की फलश्रुति है। यही है सच्चा अभिषेक।"
आज़ उमा ने शिवांश से सच्चे अभिषेक के मर्म को जाना। मातृत्व के एहसास की ख़ुशी में उसकी आंखों से अश्रु छलक आएं।
आत्म चिंतन
श्रवण- "बड़े भैया, मां की तबीयत बहुत ख़राब है। बेहोश-सी हो गई है। दस्त और पेशाब भी बिस्तर में हो गया है। सांस जैसे बंद हो गई है। लगता है मां अब....।"
 "अरे! उसकी दिमागी हालत ठीक नहीं है। बच्चों जैसी हरकतें करती है। मेरे घर आई थी तब मैं तो दो दिन में ही तंग आ गया था। बचपने की भी कोई हद होती है। सारा दिन अनाप-शनाप बकती रहती है।"
श्रवण- "लेकिन भैया, आस-पड़ोस के लोग इकट्ठे हो गएं हैं। आप और भाभी जल्दी आ जाइए।"
भावेश- "मैंने कहा न कि किसी मानसिक रोग के डॉक्टर को बताओ।"
क्रोध भरे शब्दों में इतना कहकर भावेश ने फोन रख दिया। इतने में उसका बेटा संकल्प आया और बोला- "पापा, आप कॉलेज में तो हर रोज़ लेक्चर देते हैं। आज़ मुझे भी थोड़ा मार्गदर्शन दीजिए, क्योंकि मैंने कॉलेज में होने वाली परिचर्चा में हिस्सा लिया है। समझ में नहीं आ रहा कि क्या बोलूं?"
भावेश- "बेटा, परिचर्चा का विषय क्या है?"
संकल्प- "विषय है 'संतान माता-पिता को दे सकती हैं- सिर्फ़ समय'।"
संकल्प की परिचर्चा के विषय को सुनकर भावेश गहरी सोच में पड़ गया और आत्म चिंतन करने के लिए विवश हो गया।
 प्रेम की परिभाषा
प्रिया, आशा और निशा आज़ अपनी सहेली राधा के घर पर उसे मिलने आई हैं। तीनों अपने-अपने पति के साथ प्रेम-संबंधों की बातें शुरू करती हैं।
प्रिया- "मेरे पति मेरी कोई बात टालते नहीं। इस बार तो वैकेशन की छुट्टियों में मुझे मनाली जाने की इच्छा है। मैं अपनी ज़िद पूरी करके रही। कल ही वे टिकट बुक कराके आये है। कितना प्रेम करते है मुझे!"
आशा- "मेरे पतिदेव भी किसी से कम नहीं है। मुझे गहनों का बेहद शौक है। इस बार तो मेरे जन्मदिन पर बैंक से लोन लेकर मेरे लिए तीस ग्राम का सोने का पैंडल सैट लेकर आये। ये प्रेम नहीं तो और क्या है?"
निशा- "मुझे तो हौटलों में खाना खाने का एक ही शौक है। वे कभी मना नहीं करते। रविवार की शाम घर पर रसोई बनाती ही नहीं।"
राधा- "आप तीनों बातें कीजिए मैं चाय और नाश्ता लेकर आती हूं।"
प्रिया, आशा और निशा राधा की ज़िंदगी के बारे में बातें शुरू करती है। बेचारी, राधा की ज़िंदगी कितनी नीरस है! न कहीं आना और न कहीं जाना। गृहस्थी के बोझ को झेल रही है। उसके पति बिल्कुल रोमांटिक नहीं है। लेकिन दोनों चेहरे पर हंसी की रेखाएं हमेशा बनी रहती हैं। आख़िर इसका कारण क्या है? हमारी तो बार-बार पति के साथ अनबन हो जाती है! इतने में राधा चाय और नाश्ते की डिशें लेकर आती है।
प्रिया- "राधा, तूं भी अपने पति के प्रेम के बारे में कुछ बता। हमें बड़ी जिज्ञासा है।"
आशा और निशा- "हां.हां...कुछ तो बता अपने प्रेम के बारे में।"
राधा- "हम दोनों ने मन से व्यापार को हटा दिया है। हम सिर्फ़ एक दूसरे के लिए जीते हैं। बिना बोले ही मन के भावों और विचारों को समझ लेते हैं। एक दूसरे के चेहरे को आसानी से पढ़ लेते हैं। हम सिर्फ़ देना जानते हैं। बदले में कुछ पाने की अपेक्षा नहीं रखते। एक दूसरे की ख़ुशी में ही संतोष मिलता है। हम एक दूसरे के भक्त हैं और भगवान भी। हमें कहीं जाने की इच्छा ही नहीं होती। इस छोटे-से घरौदे में ही जीवन की सारी सकारात्मक ऊर्जा मिल जाती है, क्योंकि हमारा प्रेम निरपेक्ष है।"
राधा के मुंह से प्रेम की परिभाषा सुनकर प्रिया, आशा और निशा लज्जित और चुप हो गई। तीनों में से किसी की आगे एक भी सवाल पूछने की हिम्मत नहीं हुई।
कैमरा
आचार्य जब तक शिक्षक के पद पर थे तब तक हमेशा कर्मच्युत ही रहे, लेकिन आचार्य की व्हीलचेयर पर बैठने के बाद धर्म, न्याय, नीति, कर्तव्य और निष्ठा पर घंटों तक भाषण देने लगे। सभी शिक्षकों के काम पर कड़ी नज़र रखने लगे।
आज़ आचार्य ने शिक्षकों को कर्मनिष्ठ बनाने के लिए एक चिंतन शिविर का आयोजन किया है। शिविर शुरु होने से पहले शर्मा जी बोले- "आज़ बीमार मां की ख़बर पूछने के लिए मुझे मजबूरन वर्गखंड में मोबाइल का उपयोग करना पड़ा। लगता है आज़ बड़े साहब की डांट सुननी पड़ेगी।"
चावड़ा जी- "धीरे बोलो! यहां दीवारों के भी कान होते हैं। हो सकता है बड़े साहब का कोई भेदिया यहां पर बैठा हो! अब पढ़ाते समय पूरा ख्याल रखना, क्योंकि सभी वर्गखंडों में सीसीटीवी कैमरे लगा दिएं हैं।"
त्रिवेदी जी- "अधिकारी से एक क़दम आगे नहीं चलना चाहिए और गधे के एक क़दम पीछे।"
जाडेजा जी- "मज़ा तो है मौन रहने में। जो हो रहा है होने दो, जो चल रहा है चलने दो। बस चुपचाप देखते जाओ।"
राणा जी- "अधिकारी की जी-हजूरी करना सीख जाओ, जीवन में कोई मुश्किलें नहीं आएगी।"
रावल जी- "साहब, इसके लिए ईमान को बेच देना पड़ता है।"
पवन कुमार- "नौकरी को छोड़ सकता हूं, लेकिन अपने ईमान को नहीं बेच सकता।"
इतने में आचार्य आ गये और आते ही कर्त्तव्यनिष्ठ पवन कुमार को झपट में ले लिया- "आज़ आप पहला पीरियड शुरू होने के पांच मिनट बाद वर्गखंड में गएं हैं। यदि आपको मेरी बात पर विश्वास न हो तो सीसीटीवी कैमरे में देख लीजिए।"
पवन कुमार को अपने अस्तित्व पर जैसे कुठाराघात लगा और बेधड़क होकर बोले- "साहब जी, कैमरे लगाकर अपने कर्मचारियों पर नज़र रखते हो और अपनी गुप्तचर एजेंसी के द्वारा उनकी सूक्ष्मातिसूक्ष्म जानकारी प्राप्त करते हो, लेकिन क्या कभी आईने के सामने खड़े होकर आत्ममंथन किया है कि आज़ तक मैंने किया क्या है? साहब जी, कैमरा लगाना ही है तो ख़ुद पर लगाइए, ताकि आपको भी अपना असली चेहरा दिख सके।"
चिंतन शिविर में बैठे हुएं सभी शिक्षकगण एक दूसरे को देखने लगे और मन ही मन पवन कुमार की वाहवाही करने लगे। आचार्य मुंह से एक शब्द भी नहीं बोल पाए और आत्म-चिंतन करने के लिए विवश हो गए।

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