इस अंक के रचनाकार

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बुधवार, 26 जून 2013

अश्वत्थामा के घुघवा - करनी


 
[ '' अंधा युग ''  के तीसरैया अंक के एक दृश्य के कविता में उल्था ]

  • डॉ. जीवन यदु
जंगल - झाड़ी लगे कटाकट, चारों खुँट छाये अंधियार।
बघवा अउ चितवा मन गरजें, खाँव - खाँव के परे गोहार।
रोयँ कोल्हिया हुआँ - हुआँ ले, अभियावन घुघुवा चिचियाय।
तेला सुनके मनखे के जिव, छाती भीतर घलो सुखाय।
कृपाचार्य अउ कृतवर्मा हा, गहुर नींद मं परे उतान।
अश्वत्थामा पहरा देवय, हाथ धनुस, तरकस मं बान।
पांडो मन ले बदला ले बर, ओकर लहू हा डबके जाय।
तन मं भुर्री बरे लपालप, अंतस बरे अंगेठा आय।
बान - लबारी मार ददा ल, करिन हे जेमन अतियाचार।
सत्ती कुदें असत्ती मन ह, मन कहिथे - ओमन ल मार।
अश्वत्थामा परे सोच मं, कइसे मारवं पांडो पांच।
किसन - कन्हैया के छैंया मं, नइ आवय ओमन ल आँच।
                     तभे ओ कउँवा पिलवा देखिस, कूदत रहय बिरिछ के छाँव।
                     अधरतिहा अभियावन बेरा, काँव - काँव चिल्लावय काँव।
                     अउ तब देखिस पेंड़ के पाछू, घुघुवा जबर सिकारी रात।
                     पंजा टें के करय वो धरहा, कउँवा तिर पहुंचिस बइमान।
                     सावचेत कउंवा नइ होइस, बइठे रहय वो पाँखी तान।
                     कभू नींद मं आँखी मूंदय, देखे आँखी कभू निटोर।
                     काल बरोबर घात लगाये, घुघुवा मउका रहे अगोर।
तभे झपट्टा मारिस घुघुवा, अउ कउँवा ल धरिस दबाय।
टोरिस डेना, नरी ल टोरिस, आँखी - पाँखी दीस उड़ाय।
कॉव - कॉव मं जागिस जंगल, लहू ले होगे भुइँया लाल।
दिन म जेला मारन मुसकिल, रात मं ओकर बारा - हाल।
बइरी हवे अंजोरी जेकर, अँधियारी ह हवे मितान।
दिन मं जे अँधवा कस सपटे, उही रात मं जबर सियान।
                    
                     सोचिस - बइरी ल मारे बर, बनना परही घुघुवा जात।
                     बादर गरजे कस वो हॉसिस, कन्हिया मं बाँधिस तलवार।
                     रतिहा मं अब करना चाही, पांडो मन के आज सिकार।
                    घुघुवा के अइसन करनी ल, देखिस अश्वत्थामा रात।

पता - '' गीतिका '' दाऊ चौरा, खैरागढ़, जिला - राजनांदगांव [ छत्तीसगढ़ ]

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