इस अंक के रचनाकार

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सोमवार, 3 जून 2013

जाड़ के कविता


  • आनंद तिवारी पौराणिक
(1)

सुरूर - सुरूर जुड़ हवा,
तापले अंगेठा एकेच दवा
खूंटी म कुरता, मुहाटी म जूता
खटिया दसा के सुते के बूता
असनाने हे सल्हई चिरई
नदिया म फजर ले
पांखी झर्रावत बइठे हे
काँपत हे जर ले
चलत हे दौंरी
होवत हे धान - मिंजई
अनधन सकबाही
जिनगी के कमई
टुरा ल जगाय बर
कमेलिन टुरी जोजियावय
बूता म जाय बर
घेरी - बेरी समझावय
डँगचगहा ह बिहनिया ले
दाँत कटकटावय
जूड़ म काँपत
अलहन ल देखावय
एक ठोम्हा चाँऊर
पेट दु बिता
जमों दुनिया बाँचत हे
जाड़ के कविता
(2) सुरता बीर नरायन के
सुरता बीर नरायन के
क्रान्ति के गीता - रमाएन के।
सुरता बीर नरायन के॥
सोनाखान के लाल रतन।
छत्तीसगढ़ के जीवन - धन॥
लड़े आजादी बर तैं लड़ई।
तोर करन का हमन बड़ई॥
होय अमर बलिदानी बनके।
सुरता बीर नरायन के॥
अंगरेजवा के अतियाचार।
दुकाल - अकाल म हाहाकार॥
भूखन लाँघन मरिन जनता।
जिये के बंद होगे रस्दा॥
लूटे गुदाम सरकारी अन के।
सुरता बीर नरायन के॥
भुइंया बर तैं त्याग करे।
क्रांति के अमर सहीद बने॥
चन्दा - सुरूज करिन प्रनाम।
अम्मर होगे तोरे नाम॥
महिमा माटी अऊ कन - कन के।
सुरता बीर नरायन के॥
  • गौरी कुंज, श्रीराम टाकीज मार्ग, महासमुंद (छग.)

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