इस अंक के रचनाकार

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मंगलवार, 25 जून 2013

कारागार जाएं, मेहमानबाजी का लुफ्त उठाए



डॉ. तारिक असलम '' तस्नीम ''

कारागार जाएं मेहमानबाजी का लुत्फ उठाएं यदि मैं आपसे कहूं कि हमारे देश की जेलें एक सफल औद्योगिक ईकाई के समान कार्य कर रहीं हैं तो आप निश्चित रूप से मुझे पागल ही कहेंगे। संभव है कि आप घोर आश्चर्य में पड़ जाएं और इस बारे में कुछ सोचें तथा किसी निष्कर्ष पर पहुंचने का प्रयास करें लेकिन फिर भी नतीजा कुछ न निकले क्योंकि जेल में किसी वस्तु का उत्पादन नहीं होता, विशेषकर इलैक्ट्रानिक उत्पादों का लेकिन इतना तो तय मानिए कि जेल वह आदर्श स्थान है, जहां जाकर कोई व्यक्ति हरफनमौला बने बगैर नहीं लौट सकता। वह एक सिद्धहस्त हुनरमंद के रुप में ख्याति अर्जित कर सकता है। वहीं मीडिया के माध्यम से सुर्खियों में होगा। उसकी जय - जयकार होगी और लोग उसकी पूजा करेंगे। चूंकि कारागार वह प्रशिक्षण केन्द्र है जहां भी कोई अयोग्य अभियुक्त या अपराधी ठहर नही नहीं सकेगा। उसे उच्चस्तरीय ज्ञान अर्जन के लिए कर्मठ, योग्य, विद्वान और कल्पनाशील अंग्रेजों के सारे पाठों का अध्ययन और मनन प्रणालियों को ग्रहण करना होगा।
आप यह सब जानबूझकर थोड़े ही करेंगे बल्कि इसे माहौल की देन कहेंगे। ऐसा स्वच्छ व प्रदूषणमुक्त वातावरण देश के किसी कोने में तो क्या, हिमालय की घाटियों और तराइयों में भी नहीं है। अब तो पर्यटकों ने उन समस्त जगहों को भी रैपर और पॉलिथिन निर्मित कचरे से पाटने में कोई असर नहीं छोड़ी है। अब ले देकर जेल ही बची है। इन्हें भी लोग जलती हुई वक्रदृष्टिï का कोपभाजन बनाने पर तुले हैं। जेल में मैनुअल और कानून के विपरीत कुछ होता है तो इसमें बेचारे जेल अधीक्षक, कर्मचारियों और अदद मंत्री जी का क्या कसूर है कि राज्य की आदर्श जेल के रुप में प्रचारित कारागार पर एक दिनी छापे में ही 80 रंगीन टी.वी. सेट, करीब 2.25 लाख रुपये नकद, 17 मोबाइल फोन, 150 सी डी समेत अय्याशी का हर सामान बरामद हुआ।
वैसे इस देश में असंभव नाम की कोई चिड़िया वास ही नहीं करती। यहां पर सब कुछ चलता है। विदेशी अपराधी और हत्यारे तक भारतीय जेलों की तारीफ में खूब कसीदे पढ़ते हैं क्योंकि वे जब चाहें, यहां से भाग निकलते हैं। उन्हें रोककर कौन अपनी आमदनी गंवाना चाहेगा ?ï आखिर इतनी सारी सुविधाएं मुहैया कराने का आदेश किसी तांत्रिक ने न सही अदृश्य शक्ति ने तो अवश्य प्रदान किया होगा। इससे भला किसे इंकार हो सकता है ? उस महान शक्ति को स्वीकारते हुए उनके चेले, चपाटों और अनुयायियों को विशेष सुविधा दी जाती है। इसके बदले में मेहमानबाजी का लुत्फ उठाने वाले भी तो अपने हाकिमों हुक्मरानों के नाम कुछ पुण्य खाते में डालते ही होंगे। मसलन, लाखों रुपये की प्राप्ति से जाहिर है कि मोबाइल सेवा से देश की राष्टï्रीय आय बढ़ती है तो उपभोक्ता अपने शूरमाओं को आदेश - निर्देश जारी करेंगे ही, उनके मेहनताना के बतौर रंगदारी, अपहरण, हत्या, बलात्कार भी होंगे। अपनी सिकी क्षति को बचाने के लिए सलामी देने मुलाकाती आएंगे नहीं तो फिर रुपए बरसेंगे कहां से ? यानि की आम के आम गुठलियों के दाम भी मिल जाएंगे। ससुरी कानून व्यवस्था और न्यायालय हाहाकार मचाएं, कुछ होने से रहा। जब अपराधी ही जेल में है तो उसके नाम को उछालकर उसे सफेदपोश का प्रमाण पत्र एक न एक दिन न्यायालय जारी कर ही देगा, जिसकी आँखों पर सदियों से पट्टी बंधी है। न्यायालय की बंद आँखों पर से पट्टी खोलने को कोई तैयार नहीं है। यदि ऐसा हुआ तो वह कहीं अधिक खूंखार निकल सकता है। फिर तो पट्टी बंधी रहने में ही भलाई है न।
अपने प्रशिक्षणार्थियों के बहाने नौकरशाह और नेता दोनों ही मालामाल हो रहे हैं और दुनिया की रंगीनियों का मजा भी लूट रहे हैं। किसी को एक - दूसरे से कोई खतरा नहीं अगर ऐसा महसूस होता है तो स्पष्ट है कि वह आम आदमी ही होगा, जिसे सैकड़ों बरस की गुलामी से मुक्ति तो मिल गई मगर यह मुक्ति कुछ प्रतिशत लोगों के हिस्से में आई है। बस, भूख, गरीबी, बेकारी, लाचारी, महंगाई, मंदिर, मस्जिद, दंगा फसाद आतंकवाद और धार्मिक उन्माद। इतने सारे तरीके अंग्रेज जान गये होते तो आज भी हुकूमत कर रहे होते मगर जरा जल्दी में चल दिए। उनके बाकी सारे कामों को देश के तथाकथित रहनुमा अंजाम देकर आम जनता की गलतफहमियों को दूर करने में जुटे हैं। उनके ही वोटों के नाम पर सरकारें बनाते हैं और गिरगिट की तरह रंग बदल लेते हैं। अब आपको जो कहना है, कहिए किन्तु आगामी चुनाव तक तो इसके तमाशे देखिए। जेल इनके लिए आरामगाह है तो चेलों के लिए ऐशगाह। दोनों ही मजे में हैं। बस दुखती रगों के साथ तड़फती है तो देश की जनता। इसे ही कहते हैं कारागार की आदर्श व्यवस्था।
मैं जानता हूं कि आप विश्वास नहीं करेंगे कि जो कुछ घटित होता है, उसकी जानकारी नौकरशाहों को नहीं होती। अजी सबको बखूबी होती है मगर एक - आध उदाहरण भी सामने होते हैं, जैसे कि जेलर ने किसी अपराधी की बात नहीं सुनी या उसकी मनमानी नहीं चलने दी तो बाहर रह गए छुटभैयों ने घर लौटते समय उसका ही काम तमाम कर दिया। सो उनकी भी मजबूरी है, जो कहें, सो मान कर चलें। स्वयं को उनके एकछत्र साम्राज्य का एक सुरक्षित अंग बनाए रखें। वो जो कहे सो करें। कुछ तो हिस्सा मिलेगा ही। फिर जान की बख्शाईश होगी सो अलग। अब वह किसी के लिए सुपारी लें या किसी को दें, इससे उनका क्या लेना - देना ? सो भईया, माफियाओं को कानून के दायरे में सुरक्षित पनाहगाह उपलब्ध कराते हुए गैंग संचालन की सुविधा कहीं और भी मिल सकती है क्या इस देश के कारागारों के अलावा ? यह आपको सोचना है।
आपको यह अहसास होना चाहिए कि आप मुगालते में है कि ये लोग वोटों से जीतकर सरकार बनाने में सफल होते हैं। आपके वोटो से अधिक इनको जातीय समीकरण का गणित लुभाता है। इसे तोड़ो, उसे जोड़ो का गणितीय फार्मूला चुनाव में इन्हें विजयी बनाता है, फिर भला चुनाव जीतने पर आपकी पूछ क्यों हो ? असली मददगार कभी आगे तो कभी पीछे लगे होते हैं।
अब तो बाप - दादा के मुंह से यह सुनकर स्वयं शर्म महसूस होती है कि देश की ऐसी दुर्गति तो अंग्रेजों के जमाने में भी नहीं थी। उन्होंने कुछ गलतियां की, उनको जनता ने सजाएं दी। वे वापस लौट गए किंतु ये लोग तो अपने को किसी जुर्म के लिए दोषी स्वीकारते ही नहीं। सबके सब एक - दूसरे के और दलों की नीति के आलोचक हैं किंतु आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि जिस दल की ये आलोचना करते हैं, जिसकी नीतियों की बखिया उधेड़ते हैं एक दिन दल - बल के साथ विरोधियों से गले मिलते हैं या फिर उनके गठबंधन में शामिल होकर सच्चाई पर मुहर लगाते हैं।
ऐसी स्थिति में जनता स्वयं को ठगा सा अनुभव करती है कि जिसे उसने कुर्सी तक पहुंचाया, वह ईमानदारी की राह छोड़कर बेईमानी के समुद्र में गोते लगा बैठा। वे इसे वाजिब निर्णय कहेंगे क्योंकि उनको तुरंत मंत्री पद चाहिए, जिसके लिए वे संघर्ष नहीं कर सकते और न ही आगामी चुनाव की प्रतीक्षा। फलत: अपने दानपात्र के साथ गठबंधन की सरकार के गले लग जाते हैं, इसमें अब उनका क्या कसूर ? आपने ही उनके चाल - चलन पर गौर नहीं किया तो पछताईगा नहीं तो क्या कीजिएगा ? एक बार फिर आँखें बंद रखिएगा।
उनकी कुछ मजबूरियां थी, सो ऐसा कर बैठे। इसलिए मेरी मानिए तो मातम मनाना बंद कीजिए। अपने बच्चों को शिक्षित बनाने के बजाय नेतागिरी, चमचागिरी व रंगदारी के प्रशिक्षण के लिए कारागार भेजिए और उसके प्रशिक्षित होकर बाहर आने की प्रतीक्षा कीजिए। ऐसा इसलिए कि देश के कर्णधार यही लोग है और आगे भी होंगे। आम आदमी के नाते आप और कितनी क्षति उठाएंगे ?

  • संपादक कथासागर, 6 - 2, हारून नगर,  फुलवारी शरीफ, पटना - 801505

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