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बुधवार, 26 जून 2013

धनबहार के छॉव म




  • सुधा वर्मा

मैं ह अपन नवा घर बना के जब उहां रहेबर आयेंव त ओ घर पेड़ पौधा ले सजाय के अपन सऊख ल छोड़ नई सकेंव। ननपन के वो सात एकड़ के बंगला ल कभू भुला नई पायेंंव जिंहा रंग - रंग के पेड़ पौधा लगे रहिस हे। करंज नीम ले लेके  गुलाब तक काजू करौंदा ले भांटा मिरची तक, मोंगरा, जूही, चमेली अउ गेंदा तक के पौधा रहिस हे। सब फल - फूल अपन मौसम म अपन रंग रुप अउ गंध ल देखावंय। उही रंग रुप गंध म रचे बसे मन ह अपन घर के नानुकन अंगना के तीरे - तीर क्यारी म रंग - रंग के फूल  लगाये ले लग गे। मन नई भरीस त डेढ़ सौ गमला म अउ पौधा सज गे। जाड़ के दिन म छत के गमला अउ अंगना के क्यारी के रंग ह देखे के लइक राहय, सेंवती गुलाब डेहलिया, जूही चमेली अउ हरसिंगार के खूसबू ह पारा भर म महकय। जिनगी के सूनापन ह इही फूल के साज सवार म बीते ले लगगे।
एक दिन विचार अइस के घर के बाहिर म पांच ठक पेड़ लगा देथंव। जंगल विभाग पेड़ के थरहा ल फोकट म देथे। बहुत विचार करेंव के कोन से पौधा लगा दव। आँखी मूंदेव त धनबहार के पीला पीला अंगूर के गुच्छा दिखय। घेरी बेरी उही पेड़ अउ ओमा लटकत फूल ह दिखय। भइगे अब तय होगे के धनबहार ही लगाना हे। जंगल विभाग ले पांच ठन धनबहार के पौधा लाके लगा देंव। धीरे - धीरे क्यारी बना के चारों डाहर ईंटा के गोल घेरा बना देंव। धीरे - धीरे धनबहार के एक - एक पत्ता ल गिनव। रोज गिनव, कब बाड़ही अउ कब फूलही रोज ओ पेड़ ल तीर म जाके देखंव, अंगना ले देखंव, सांझ कन छत ले देखंव। आंधी पानी के बेरा पौधा ल कपड़ा म बांध देवंव।
मौसम के मार म चार पेड़ ह मर के, एक पेड़ बांच गे। मौसम के थपेड़ा ह ओला अउ मजबूत बना दीस। पांच साल म तीन डारा म बंटा के सुघ्घर झाड़ी के रुप ले लीस। मन म सोचेवं पांच साल म तो येमा फूल आ जथे ये धनबहार ह कब फूलही। मन म संका होवय। आज मोर अंगना सूना हावय त कहूँ मोर धनबहार के डारा तो सून्ना नई रहि जही। फेर मन म विचार आवय अरे नहीं मोर घर के पेड़, पौधा, फूल ल तो दूरिहा - दूरिहा ले सब देखे बर आथें। अतेक फूल मोर अंगना के सोभा बने हावय, तब मोर धनबहार तो फूलबे करही।
चइत के महिना, बसंत के सुन्दर हवा ह सब के मन ल चंचल करत राहय। एक दिन मन अनमन रहिस हे। डाक्टर करा गैंव त डाक्टर कहि देथे के अब तोर घर म एक फूल महकने वाला हे, ओखर खिले के इंतजार करव। पता नहीं मन म सुखी नई होईस। दूसर दिन बिहिनिया ले धनबहार के पेड़ ल छू - छू के मया करेंव अउ अपन घर भितरी चल देवं। सनिचर के दिन रहिस हे, हमन दूनों झन अंगना म कुर्सी लगा के बईठ गेन अउ ठूंठ होय धनबहार ल देखत रहेन। बसंत ऋतु म धनबहार के जम्मों पाना झर जथे। सोचत रहेन के अब ऐमा नवा पाना आही, फेर ये रुख ह अउ ऊंच होही। अचानक मोर कान म आवाज सुनई दिस - देख - देख, ऐमा फूल निकलत हावय। मोला तो विस्वास नई होईस मैं ह बहुत धियान से देखेव घर के बाहिर जाके देखेंव, सही म करीब जमीन ले पांच फीट ऊंचाई ले एक छोटे से अंगूर के गुच्छा असन निकलत राहय ओमा पंाच ठन गोल - गोल कली रहिस हे।
फूल के वो डारा बाढ़ते गीस, मोर मन के उत्साह घलो बढ़ते गीस। मन म संतोस आगे। मोर अंगना म बेटा आगे ओला रोज धनबहार के रुख ल देखाववं के येमा सुघ्घर फूल आही। अवइया साल चइत म धनबहार बने मन लगा के खिलगे अउ ओखर रुख तरी बेटा ह खेले ले लगगे। ओखर फूल ल देख देख के फू - फू कहिके बोलय। तैं ह मोर घर खुसी ले के आयेस, आज बारह साल के बाद मोर घर के अंगना म एक लइका खेलत हावय। अउ तैंह अपन पीऊरा पीऊरा फूल के डारा ल हला हला के ओला मोहित करत हस। सावन के महिना म धनबहार के डारा म रस्सी बांध के बेटा अउ मैं बहुत झुला झुलेन। अवइया साल म तो साल भर झुला बंधाय रहिस अउ दूरिहा दूरिहा के लइका मन आ के ओमा झुला झुलय। मैं हर अपन दुवारी म बइठे देखत राहंव, अइसे लागय के धनबहार ह काहत हावय देख मैं तैं दिन रात सुन्ना आंगन कहिके सोचस, आज देख मोर कांध ह के झन लइका के भार ल उठाय हावय। अब तो हल्ला के मारे कान ल तोपत रहिथस। अब ओखर नीचे म एक चबूतरा बनगे। बकरी चरवाहा गाय चरवाहा मन आ के बइठ के गीत गावत राहंय। धीरे - धीरे पेड़ के अकार ह बाढ़ते गीस। बेटा घलो बाढ़ते गीस। दूनों झन एक दूसर ल छू - छू के बहुत खुस होवंय। जब बेटा ओखर कांध म रस्सी बांध के झूलय त धनबहार के एक - एक पाना खुसी म झूमे लग जाय।
गर्मी भर ओखर फूल मन झूम - झूम के गावत हावय अइसे लागय। एक बेर मैं हर अपन घर हास्य कवि रखेंव। मैं ह दुविधा म रहेंव के सबला काय भेंट करंव। इही सोचत सोचत एक बज गे। दू बजे के कार्यकरम रहिस हे मैं इसारा ल समझ गेंव अउ बहुत अकन गुच्छा संग म पीछू साल के लम्बा - लम्बा फर ल टोरेवं अउ एक - एक ठन टोरेवं अउ एक एक ठन गुच्छा बनायेंव। इही मोर देसी गुलदस्ता के संग सबके सुवागत करेंव। सब के मन खुसी म नाचे ले लगगें। मोला बिदा के बेरा म अइसे लगीस के धनबहार घलो खुसी म झूमत हावय।
मोर अउ धनबहार के मन एक होगे रहिस हे। हमन एक दूसर ल देखे बिगन रहे नई सकन। बेटा बर तो ओखर छांव ह ओखर खेल के मैदान होगे रहिस हे। खेलय नहीं तभो ले ओखर छांव म बने चबूतरा म जा के बइठ जाय। रिसाय तभो बइठय अउ खुस होवय तभो बइठय। दस साल म धनबहार के रुप विराट होगे। रददा के ओ पार के बिजली के तार ऊपर माड़गे राहय। ट्रक वाला मन आत - जात ओखर डारा मन ल टोर देवंय। ओखर छांव म कुछ खराब मनखे मन आ के बइठे ले लगगे। मैं ह रददा डाहर के डारा ल कटवा देंव अउ लइका मन ओला घर के आगू के खाली प्लाट म होली म जलाया बर लेगे। मोला धनबहार के दुख नई देखे गीस, जब कोनो दूसर ओखर डारा ल छुवय त अइसे लगय के वो ह मोर डाहर ल देख के कहत हावय मोला बचा ले। मैं ह ओला दूसर के मार ले बचाय बर कटवाये रहेंव।
होली के दिन मैं ह ओला जलत देखेंव त मोर अंतस ह रोय ले लगगे। मैं ह घर के भितरी आगेंव अउ चुपचाप सुत गेंव। बिहिनिया सुत उठ के ओखर राख ल देखेव अउ धनबहार रुख डाहर देखेंव। दूनों झन कुछु काहत मुस्कात रहिन हे। राख ह काहत हे इही ह तो जीवन आय, देख मोर बीज ह अभी बांचे हावय, मैं राख हो गेंव त का होगे, ये मोर बीज ल मैं जीवन देहूं ओला बाढ़े म मदद करहूं मैं ह जले नइ अंव मोर रुप बदलगे हावय। मैं ह रुख डाहर ल देखेंव मोला लगीस वो ह काहत हावय - तैं ह अतेक दुखी काबर होवत हस। देंह के जेन अंग ह कस्ट देथे ओला कटना ही हे। प्रकृति के नियम आय तैं सोच मोर डारा मन बिजली के नुकसान करत रहिस हे गाड़ी मोटर ल निकले म परेसानी होवत रहिस हे, त ओला रददा ले हटा दे गीस। मैं तो अभी खड़े हावंव, मैं तोर संग हवं।
ये बात ल मैं ह पचा लेंव। धनबहार मोर साथी गलत थोरे कहिही। सच म मैं काबर दुखी हवं। सब कुछ तो वइसने हावय। ओखर चबूतरा ह असमाजिक मनखे मन के बिसराम इसथल बने ले धर लीस गाली गलौज अउ जुआ चलत राहय। बाढ़त बेटा के संस्कार के चिंता होय ले धर लीस एक दिन मैं ह गुस्सा म सौ रुपिया दे के पेड़ ल कटवा देंव। अब दुख नई होईस ओखर बीज ल सकेल के रखे हावंव न। सांझ  तक रददा खाली होगे। पारा भर म ये बात बगरगे। सब देखे बर आवंय। हमर साथ अउ परेम पारा म एक चर्चा के बिसय रहिस हे। वो रुख के कटना सब बर अचरज होगे। सांझ कन आफिस ले आय के बाद मोर पति ह मोला कहिस - तैं असना कर सकथस मैं सोचे नई रहेंव। मैं कुछु नई कहेंव। बेटा बीमार परगे, साथी जेन छुटगे। मन दुखी तो रहिस हे फेर बीजा ल देख के संतुस्ट हो जावं। एक दिन अइसे लगीस के धनबहार के ठूंठ म कुछु हरियाली आवत हावय। देखेंव त बहुत अकन पीका रहिस हे। ओला बाढ़न नई देंव। अपन हाथ ले तोड़ देंव। बार - बार लगय ये धनबहार बढ़ना चाहत हावय। ओखर निकले एक दू पाना ह घलो मोर डाहर निरिहता ले देखत, फेर मैं ह ओला टोर देंव। नहीं अब मोला तोर दुख नईं देखना हे। तैं रहिबे नहीं त तोला मारही कोन ? तोर छांव के सेती बेटा म गलत संस्कार पड़ सकत हे। मोर दिल के बात धनबहार सुन डारिस। अब ओखर पीका निकलबे नई करीस। बेटा के मन के छटपटाहट ह दिखय। फेर चार पांच महिना म ओखरो मन शांत होगे। अवइया बसंत के पहिली पति साथ छुटगे।
दू महिना के बाद एक थैली म रखे बीज मोर हाथ म आ गे। सबो घटना आँखी के आगू म आ गे। मोर अकेलापन के साथी धनबहार अपन निसानी छोड़ गेय हावय येखर ले मैं एक नवा रुख तैयार करहूं अइसे लगीस के धनबहार ह अकेल्ला होगे रहिस हे एखरे सेती मोर पति ल वो ह अपन करा बला लीस। ओखरो बीज आज मोर अंगना म खेलत हावय आज एक नवा पीढ़ी के संग होही अउ एक बेर फेर मोर अंना म धनबहार। वो धनबहार के ठूंठ ले फेर एक बेर मया जाग गे। ये मया घलो कांक्रीटीकरण के भेंट चढ़गे। नवा रददा बनीस त ओखर ठूंठ ह सीमेंट के नीचे म दबगे। आज वो ह धरती म चपकाय के बाद के बाद भी हमर बर सोचथे। मोर बेटा ल आसिस देथे अइसे मोला लागथे।
हर साल बसंत म ओखर अब्बड़ सुरता आथे। अंगूर के गुच्छा कस लटके पीऊंरा फूल ह आजो मोर आँखी म समाय हावय फूल म मंडरावत भौरा, कोयली के कूक चमगेदरी के फड़फड़ाहट अब चमगेदरी सुनावय नहीं अइसे लगथे के फूल के गुच्छा मन झूम झूम के नाचत हंवय अउ गुनगुनावत हावय बेटा ह आज भी पूछथे - ये पेड़ ल तैं काबर कटवा देस ओखर फूल ह गर्मी म कतेक सुघ्घर लागय। मोर करा ओला देय बर उत्तर नईये। मैं ह कहेंव बेटा अब ये धनबहार ल तोर घर के अंगना म लगाबो। पीऊंरा - पीऊंरा सुघ्घर फूल के गुनगुनाहट ल अब तोर लइका मन सुनहीं। वो धनबहार सदा दिन तोर अंगना म झूमही। कोयली के कूक होही, भौरा गुनगुनाही, जुगनू के डेरा होही, बया के घोसला होही। हर दिन नवा जीवन होही।
  • पता - प्लाट नं. 69, सुमन, सेक्टर - 1, गीतांजली नगर, रायपुर [ छत्तीसगढ़ ]

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