इस अंक के रचनाकार

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गुरुवार, 27 जून 2013

संपत अउ मुसवा


- कुबेर  -
उतेरा एसो गजब घटके रहय। माड़ी - माड़ी भर लाखड़ी, घमघम ले फूले रहय। मेड़ मन म राहेर ह घला सन्नाय रहय। फर मन अभी पोखाय नइ रहय। फेर बेंदरा मन के मारे बांचय तब।
फुलबासन ह सुक्सा खातिर लाखड़ी भाजी लुए बर खार कोती जावत रहय। मेड़ के घटके राहेर के बीच चिन्हारी नइ आवत रहय। हरियर लुगरा, हरियरेच पोलखा, राहेर के रंग म रंग गे रहय।
राहेरेच जइसे वोकर जवानी ह घला सन्नाय रहय।
फुलबासन, जथा नाम, तथा गुन। फुल कस सुंदर चेहरा। पातर दुब्बर सरीर। कनिहा के आवत ले बेनी झूलत हे जउन म लाल फीता गुंथाय हे। महमहाती तेल, क्रीम अउ पावडर लगा के जब गली खोर म निकलथे, चारों मुड़ा ह आमा बगीचा कस महमहाय लगथे। करिया - करिया आंखी, कुंदरू चानी कस पातर - पातर ओंठ, भरे पूरे छाती, देखइया के लार चुचवा जाथे। सात - आठ बछर होगे हे ये गांव म बिहा के आय फेर लोग लइका एको झन नइ होय हे। वोकर घर वाला सुंदरू वोला अघातेच मया करथे। अपन आप ल भागमानी समझथे कि गांव भर ले जादा सुंदर बाई हे वोकर।
सुंदरू बारो महिना सहर म हमाली करे बर जाथे। भिनसरहच सायकिल धर के निकल जाथे। दिन भर खटथे। आठ - नौ बजे रात के लहुटथे। घाम पानी म दिनभर कमाथे। पाइ - पाइ जोड़थे। एक कप चहा भले नइ पीही फेर फुलबासन के फरमाइस ल जरुर पूरा करथे।
फुलबासान जतका सुंदर हे, वोतकेच मटमटही अउ फूलकझेलक घला हे। फैसन म रत्ती भर के कमी नइ होना चाही। मुंहबाड़िन अतेक कि गांव के कोनों वोकर संग नइ पूर सकय। फेर वाह जी सुंदरू, बाई के कोनों किसम के तकलीफ ल देख नइ सकय।
फुलबासन के मोहनी म सुंदरू ह तो मोहाएच हे, गांव भर के बुढ़वा - जवान मन घला मोहाय हें। फुलबासन के सुभाव घला फूलेच सरीख हे। फूल ह भला कते भंवरा ल मना करथे ? सब बर रस छलकत रहिथे।
मुड़ी म खाली टुकनी बोहे, राहेर मेड़ म मठरत - मठरत ददरिया झोरत, एती लेफुलबासन जावत रहय। ओती ले मुसमुसात मुसवाराम आवत रहय। बीच मेड़ म ओरभेटठा हो गे।
मुसवा राम बढ़ावल नाम आय। वोकर असली नाम हबे भुलवा राम। आदत सुभाव हे मुसवा सरीख। जेकर नहीं तेकर कोठी म बिला कर करके धान फोले  म माहिर। ताकइया मन ताकते रहि जाथें। गुल्लूकोस, पदीना अउ दराक्छस म सब किसम के बीमारी ल ठीक कर डारथे। लाख मर्ज के एके दवा। जउन बीमारी ह ये दवा मन म बने नइ होवय,तउन ह पक्का बाहरी हवा होथे। कोनो सोधे बरे के कारू - नारू। तब ? झाड़ - फूंक, तेला - बाती बर घला उस्ताद हे। दारू - कुकरी के जुगाड़ होनच हे।
मुसवा राम म अतकेच खूबी होतिस तब तो। वो आय पक्का गम्मतिहा। नाचा - पेखा म जोक्कड़ बन के परी मन संग जब बेलबेलाथे, देखइया मन म चिहुर उड़ जाथे। पेट रमंज - रमंज के हांसथे। समझ लेव हीरो नं. वन। असल जिंदगी म घला वो ह वइसनेच हे। वोकर बात सुन - सुन के कतरो जती - सती रहंय, मोहा जाथें।
फुलबासन ददरिया झोरे म मस्त रहय। मुसवा राम के गम ल नइ पाइस। फेर मुसवा राम मुसवच आय। दुरिहाच ले वो ह फुलबासन ल ओरख डारे रहय। जान सुन के गउखन बने रहय। ओरभेट्ठा करे के ताक म तो सबर दिन के रहय। गांव नता म फुलबासन ह मुसवा ल कुरा ससुर मानथे। कट खाय रहिगे। आसते ले खखार के मुसवा राम ह आगू म खड़े हो गे। रद्दा बंद। फुलबासन हड़बड़ा गे। एती मुंड के गिरत चरिहा ल संभाले के उदिम करिस, त ओती छाती के अंचरा ह कनिहा म झुल गे। सरम के मारे वोकर मुंहू - कान ह ललिया गे।
बारा घठौंदा के पानी पियइया मुसवा राम, फेर लहर - लहर लहरा मारत, अथाह गहिरी, अइसन घाट वो ह कभू नइ देखे रिहिस। देखिस त देखते रहि गे। जनम के बेलबेलहा, फेर चेत सुरता अइसे हराइस के सब भुला गे।
फुलबासन ह वोकर ले का कम हे ? भांप गे कि मुसवा राम ह बिला ले बाहिर निकले बर अकबकावत हे फेर रद्दा नइ पावत हे। थोरिक देर अउ अकबकावन दिस तब अपन अंचरा ल सोझियावत किहिस - टार हो बड़का, खांसो खखारो घला नहीं।
मुसवा राम अब अपन होस म आ गे रहय। कहिथे - ये ले, छोटकी के बात। काला टेंकाय हाबन भइ, तेला टारबोन। तुम्हीं बताव।
फुलबासन ह मुच ले हांस के कहिथे - मोर मुंह ल झन खोलवाव। काला टेंकाय के तुंहर नीयत हे, हम वहू ल जानथन।
- बने कहिथो। तुंहर जइसे सुंदर अउ समझदार नारी हमर गांव म अउ कोन हे।
मुसवा ह हांसत - हांसत कहिथे।
फुलबासन ह कहिथे - लुगरा ल छुवे हव। डांड़ लगही। एक ठन म नइ बनय, दू ठन नरियर लगही।
मुसवा ह कहिथे - हमर देवता ह नइ रुसाय। तुंहरे ह रुसाय होही। कहू त मनाय बर नरियर धर के संझा बेरा आ जाहूं।
फुलबासन कुछू नइ बोलिस। मुच ले हांस दिस। कनखही देखत, कनिहा ल मटकावत, मुसवा राम ल रगड़त आगू बढ़ गे। मुसवा राम ह पथरा कस मुरती जिहां के तिहां ठाढ़े रहिगे।
तीन - चार खेत के दुरिहा म संपत महराज के खेत हे। वहू ह चरवाहा - बनिहार मन संग ढेंखरा कंटवाय बर आय रहय। फुलबासन अउ मुसवा राम ल राहेर झुंझकुर ले निकलत देख डारथे। का गुलाझंाझरी होइस होही, समझे म वोला देरी नइ लगिस। मने मन कहिथे - आज तोला देखहूं रे मुसवा, कइसे बोचकबे ते।
संपत महराज के चरित्तर के का बखान करंव। पुरखा मन गांव के जमींदार रिहिन। ये गांव म उंखरे राज चलय। परिवार बाढ़त गिस, जमीन खिरत गिस। कका - बबा, भाई - भतीजा मन पढ़ लिख के डाक्टर इंजीनियर बन गे हें। नेतागिरी म तो इंखर मन के खंबा गड़ेच हे। सब झन सहर म जा के बस गे हावंय।
संपत महराज गांवेच म अटके पड़े  हे। पढ़इ - लिखइ म चेत नइ करिस। छोट - मोट नौकरी करे म इज्जत जातिस। सहर म दाल नइ गलिस तब इहां अपन रौब झाड़त रहिथे। जनम के अंखफुट्टा। ऊपर छांवा तो गांव भर ल नाता गोता मानथे, फेर मतलब के सधत ले।
मुसवा राम ह नांगनाथ आय त संपत ह सांपनाथ हरे।
फुलबासन के न तो सास - ससुर संग बनिस, न देरानी - जेठानी संग। पठोनी आय छै महिना घला नइ पूरिस, सुंदरू ल अइसे पाठ पढ़ाइस कि चुल्हा चक्की सब अलग हो गे। घर दुवार घला अलग हो गे।
सुंदरू ह गजब रात के लहुटथे। नरियर चढ़इया मन इही बेरा के अगोरा करत रहिथें।
बियारी के बेरा रिहिस। निझमहा देख के मुसवा राम ह फुलबासन देबी के मंदिर म नरियर चढ़ाय बर पहुंच गे। मुहाटी बंद रहय। जइसने खोले के उदिम करिस, अपने अपन खुल गे। संपत महराज ह तोलगी भीरत सुटुर - सुटुर निकलत रहय। दुनों के दुनों हड़बड़ा गें। संपत महराज ह कहिथे - अरे मुसवा, तहूं आय हस ? हाथ - गोड़  के पीरा म बिचारी ह गजब कांखत हे। फूंके बर बलाय रिहिस। फूंकत ले गजब जम्हाय हंव। बैरासू  धरे होही। तोरे ह काट करे त करे। जा तहूं फूंक देबे। अबड़ तकलीफ म हे बिचारी ह।
मुसवा राम सुट ले बिला म खुसर गे।
  • व्याख्याता, शा.उ.मा.विद्या, कन्हारपुरी, राजनांदगांव (छ.ग.) मो. 98279 -83896
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