इस अंक के रचनाकार

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सोमवार, 1 जुलाई 2013

भोमरा

 सुधा वर्मा  -
भोमरा ह अपन तीन झन लइका मन ल धरे अमली के छाँव म बइठे बिचारत हावय। ओखर घर के पाछू म गोररा हावय अउ ओखर बाद रददा गे हावय खेत डहर। रददा ल नाहंक के मोंगरा के घर बारी हावय। गर्मी के दिन म ओखर सास ह अम्मारी पटवा भाजी, चेंचभाजी अउ जरी लगाय रहिथे अपन घर के पानी ल लेग लेग के पलोवय फेर पहाटिया ल पलोय बर कहि दे हावय। मोंगरा के सास ह अब्बड़ भाजी बेचथे। उही रददा ह अमली के बड़ेजन रुख मेर जाथे। वो रुख ल गाँव के एक झन रमायनिक ठाकुर ह लगाय रहिस हे सौ बच्छर ले जादा होगे हावय। अब्बड़ दूर के सोचे रहिस हे। सब खेत म काम करंय बियारा म धान ओसावंय त पत्थरा गाँव म एकोठन रुख नइ रहिस हे खेत म बम्हरी के रुख राहय त कांटा के मारे बइठे नई सकंय।
बनिहार मन ह ओन्हारी के मिंजई अउ बैसाख के महिना म खातू पलावयं तभो बासी खा के थिराये के जगह नइ रहिस हे। पत्थरा गाँव अइसने जादा जपत फे र पानी के साधन नहीं, कुआँ म पानी नइ निकलय। वइसने समय म दूर के सोच के ठाकुर बबा ह घुरुवा तीर दू ठक अमली के रुख लगा दीस। ओ रुख ह जइसे जइसे बाढ़त जात गीस, ओखर छाँव म मनखे जुरते गीन। गाँव म बर बिहाव होतीस त इही रुख तरी बइला गाड़ी ढिलाय राहय। अमली के ओ रुख ह गाँव के पहिचान होगे।। दिनोदिन गरमी ह सुरसा के मुँह असन बाढ़ते जात हावय। गरमी ल बिजरावत ये अमली के  रुख के डारा कांधा बाढ़त जात हावय। जतका धान बाढ़य उही अनुपात म वोखर छइहां ह घलो बाढ़त हावय।
इही अमली के छाँव ह मोंगरा के आसरा आय। ओखर तीन झन लइका मन भरे मंझनियाँ म इहें खेलत रहिथे। मोंगरा ह अपन घुरुवा के खातू ल गाड़ा म खन खन के भरथे अउ लइका मन संग थोरिक गोठिया के गाड़ा ल अपन खेत म लेग के खातू ल उलदथे। मोंगरा के घर वाला ह तीन बछर होगे अब नइये। ससूर ह बिमार रहिथे सास ह साग भाजी तोड़े बेचे म भिड़े रहिथे। गाय भइस रखे हावंय, दूध दही घलो बेचत रहिथें। सास ह घर ल सम्हालथें। मोंगरा अपन खेत के जतन म लगे रहिथे।
मोंगरा ह सुरता करथे जब ओखर घर वाला मंगल रहिस हे त मोंगरा ल संग म लेगय अउ खातू ल गाड़ा म भरे के बाद अमली के छाँव म बइठार के गोठियाय। मोंगरा घलों रेंगत खेत चल दय त भोंमरा म तीपे पथरा म गोड़ ल मढ़ा नइ सकय। मंगल ह अपन पीये के पानी ल मोंगरा के गोड़ म छिंचय। मोंगरा ह अपन बड़े बेटी ल पेट म रहिस हे त मंगल ह ओला अपन गाड़ा म बइठारे राहय, खातू ल कोड़ दय अउ अमली के रुख के नीचे म बइठार देवय। ये अमली छाँव ह दउड़त पाँव ल अराम देय के काम करथे। तीन पीढ़ी होगे, ये छाँव म कई झन के पांव के छाप बने हावय। आज मोंगरा के लइका मन इहां खेतल हवय। आज के भोमरा ह सही नई जाय। पेड़ लगाय के सुध कोनो ल नइये। एक बेर मोंगरा ह मंगल ल कहिथे चल न हमूमन कोनो मेर अइसने रुख लगा देथन। सरकार ह पांच ठक पउधा फोकट म देथे। पेड़ के रक्छा बर जाली घलोक देही। अवइया साल म मंगलू ह लू के चारा बनगे।
अमली के छईहाँ  म बइठे मोंगरा ह मन म ठान लेथे के काय होगे मंगलू नइये। ओखरे सोचे बात मैं पूरा करहूँ। ये भोमरा ह मोला कतको तिपोवय फेर मैं ह पांच ठक पेड़ लगाहूं अउ ओकर जतन घलौ करहूं। घुरवा तीर म बर पीपर अउ जामुन के पेड़ मिल जथे। संझौती बेरा म अपन तीनों लइका ल धर के पउधा ल संग में ले के गाँव ले बाहिर निकल जथे। एक पेड़ स्कूल तीर लगाथे जामुन के, ओखर बाद बर, पीपर अउ बर के पेड़ लगा के हंऊला के पानी ल डार देथे। कुदाल अउ एक हऊंला पानी संग म धर के लेगे रहिस हे। ओकर लइका मन खुश हो जथे। बेटी ह कहिथे - दाई, रसायनिक बबा के लगाये रुख असन हमरो लगाय रुख ह छाया दिही न ?
- हां बेटी ओखर ले जादा दिही।
- हमन तीन झन मिलके लगावत हन न त तीन गुना छईहाँ दिही।
- दाई अब भोमरा म गोड़ ह जरही का ओ।
मोंगरा ह बेटी ल अपन छाती म चिपका लेथे अउ कहिथे - नहीं बेटी, अब भोमरा ह हमर ताकत ल देख के डर्राही।
- हमन भोमरा संग लड़बो।
- नहीं, हाथ गोड़ ले नई लड़न फेर यहू एक लड़ई आय पर्यावरन ल बचाय बर लड़बो। सब पेड़ ल काटत हांवय त गर्मी ह दुनिया म बाढ़त हावय। पेड़ ल लगा के ये गर्मी ल कम करबो। गर्मी कमती परही त भोंमरा घलो कमती होही।
- हां दाई, चल महूँ लड़हू, भाई घलो लड़ही, ये भोमरा ल भगाय बर हम सब लड़बो। पर्यावरन ल बचाय बर हम सब लड़बो।
भोमरा ल लगथे के मंगल ह ओखर हाथ ल धर के रेंगत हावय। ओखर लड़ई म संग देवत हावय।
  • पता - प्लाट नं. - 69, सुमन, सेक्टर - 1, गीतांजली नगर, रायपुर ( छ.ग.)

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