इस अंक के रचनाकार

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मंगलवार, 16 जुलाई 2013

परली तरफ के लोग



- मनीष कुमार सिंह  -
बरसों बाद रामश्वेर अपने इलाके में लौटा था। घरवालों और मित्रों - पड़ोसियों से मिलकर प्रसन्न हुआ। हफ्ता बीतने के बाद भी लोगबाग उसकी कंपनी के काम और वहां का हाल पूछ रहे थे। ये तो यहां की खासियत है। कितने दिनों बाद भी पहुंचों लोग पहचान लेते हैं। किशन पूछ रहा था - संगठन का क्या समाचार है ....?
लोगों में जागरुकता आयी है पहले वाला ढीलापन नहीं रहा। वह संकल्पूर्वक बोला। यहाँ के भी लोग कम नहीं है। हमने लामबन्दी की है। किशन के स्वर में उमंग था। बहुत खूब। उसने उत्साह से किशन के कंधे को दबाया। फिर जिज्ञासापूर्वक प्रश्र किया - क्या - क्या किया ?
किशन के चेहरे पर उत्साह की जगह अब गंभीरता और रहस्यमय आभा छा गयी - बस, इतना समझ लो कि अब अगर कुछ भी हमारे खिलाफ हुआ तो सभी एकजुट हो जायेंगे। मुंहतोड़ जवाब देगें। चुप नहीं बैठेगें। रामेश्वर यह सुनकर प्रसन्न हो गया। यही तो हमें चाहिए। अपने देश में दबकर रहना कहाँ तक उचित है ? उसे यह जानकर खुशी हुई कि यहाँ सबको सेंटिमेंटल कर दिया गया है।
दरअसल काफी समय बाहर रहने के कारण यहाँ से उसका संबंध पत्र और फोन तक सीमित रह गया था। इधर के वर्षों में हुए परिवर्तनों से वह नावाकिफ था। युवा और उत्साही होने के कारण कुछ करने की इच्छा उसमें बलवती थी। इधर कतिपय वर्षों की कमी को तुरंत - फुरंत पूरा करना चाहता था। शाम को अकेले ही वह माहौल का जायजा लेने निकल पड़ा। घर से कुछ दूर उसकी एक पसंदीदा सड़क थी। लम्बी - चौड़ी और छायादार। दोनों ओर हरे - भरे दरख्त लगे थे। आवागमन भी यहां कम था। वह आराम से टहलने लगा। काफी फासले पर टी. प्वाइंट पर मार्केट शुरु होता था। एक बुक स्टॉल पर मैगजीने उलटने - पलटने के बाद वह आगे बढ़ गया। सामने गलीनुमा सड़क से बेकरी की दुकान थी। वह खुशबू से आकर्षित होकर उधर बढ़ा। एक पाव बिस्कुट खरीदें बगैर उससे बढ़ा नहीं गया। वैसे तो और भी चीजें थीं लेकिन तत्काल खाने के लिए यह सर्वाधिक उपयुक्त थी। खाते हुए वह गली में अन्दर तक हो गया। गली के घूमने के साथ - साथ वह भी चलता रहा। अचानक उसे लगा कि यह जगह जानी - पहचानी नहीं है। आखिर काफी अरसे बाद आया है।  इतना कहाँ याद रहता है। बीच में न जाने कितने परिवर्तन हुए होगें। वह लौटने को हुआ। बिस्कुट लगभग खत्म हो चले थे। सड़क के दोनों ओर नालियां थीं जिनकी कई दिनों से सफाई नहीं हुई थी। आवारा कुत्ते यूँ ही टहल रहे थे। इलाका निम्न वर्ग के लोगों का लगता था। वह अनुमान से लौटने का रास्ता तलाशने लगा। गलियां ही गलियां थीं। वे भी ऐसी कि आदमी अगर छटॉक भर भी ज्यादा भारी हुआ तो फँस जाएगा। उसे लगा कि रास्ता ढॅूढने के प्रयास में वह और उलझता जा रहा है। ठीक वैसे ही जैसे धागे की उलझन सुलझाने चलो तो वह उलटे और उलझती जाती है।
एक अजीब सी गंध में व्याप्त थी। गंदगी की। उसके जेहन में यह विचार कौंधा कि यह इलाका विधर्मियों का है। जी ... उन्हीं लोगों का जो छुरेबाजी में बड़े उस्ताद होते हैं। जिनका इतिहास साक्षी है कि वे धर्म - ईमान पर यकीन नहीं रखते। भाई - भाई का खून पानी की तरह बहा सकता है। बेटा हमेशा बाप का कत्ल करके गद्दी पर बैठा है। उसके सम्पूर्ण परिवार के लोग चेताते थे कि इनसे दोस्ती न करो। भरोसा करोगे तो धोखा खाओगे। वह बेहद हिम्मती होने के बावजूद डर गया। सच है कि साहस की परीक्षा आपातकाल में ही होती है।
उसे महसूस हुआ कि शरीर में कंपकंपी सी हो रही है। अब यह सब भयवश ही हो सकता है। गली इतनी संकरी कि जरा सा ध्यान हटा तो पाँव अगल - बगल की गंदी गली में। शाम कब की रात में तब्दील हो चली थी। दोनों ओर के मकान भूत की तरह खड़े थे। आपस में ऐसे सटे थे मानों काना - फूँसी करके षड्यंत्र में लीन हो। इनके खिड़की - दरवाजे बंद थे लेकिन ऐसा लगता था कि  शत्रु घात लगाकर अन्दर बैठा है और कभी भी हमला कर देगा। वह तेजी से बढ़ता जा रहा रहा था। लेकिन कदम आगे बढ़ने के बजाय अगल - बगल ज्यादा पड़ रहे थे। संगठन में वक्ताओं द्वारा कही गयी सूक्तियाँ और प्रेरक वाक्य याद नहीं रहे थे। फिलहाल वह घृणा - द्वेष, जाति उद्धार, सनातन रीतियों और यहां तक की स्वयं को भी भूल चुका था। अचानक एक दरवाजा खुला - कौन है ? वह चीखा। उसका कलेजा मुंह को आ गया। पांव घबराहट से नाली में घुस गया। एक दस - बारह साल की लड़की निकली और उसके पीछे से किसी और मकान में चली गयी। घटना सामान्य थी लेकिन वह लगभग दौड़ने वाली गति में चल रहा था। मेन रोड की आशा में।
कोई बड़ी सड़क तो नहीं मिली लेकिन गलियों के गलियारे से गुजरता हुआ वह एक चौक पर आ गया। दो गली एक दूसरे को समकोण पर काटती थी। एक चबूतरे पर कोई आदमी बैठा उसी ओर घूर रहा था। रामेश्वर संशकित हो उठा। क्या इरादा हो सकता है उसका। वह तेजी से उसके पास से गुजर जाना चाहता था। सूनो बाबूजी। उस व्यक्ति ने जरा जोर से उसे उसे टोका।
- क .. क .. क्या बात है? वह हड़बड़ा गया। उस व्यक्ति ने उसे इशारे से पास बुलाया। वह ना न कर सका। पास आने पर उसने ध्यान दिया कि वह एक बूढ़ा आदमी था। बढ़ी सी दाढ़ी और झुर्रियों की तरफ  बढ़ते चेहरे वाला इंसान उसे रुचिपूर्वक देख रहा था। आप शायद रास्ता भटक गए हैं। वह बोला। उसे लगा कि आवाज कहीं दूर से आ रही है। जी .. जी, हाँ। वह अटकता हुआ बोला।
- किधर के हैं? क्या करते हैं? वृद्ध ने वह प्रश्र किया जिसके लिए संभवत: उसने उसे रोका था। रामेश्वर की दशा सांप - छछूदंर की थी। न तो ना कहते बनता था न ही छिपाने की अवस्था में था। सर ... चाचाजान मैं इधर ही पास में रहता हूं। उसे संबोधन का ढंग नहीं सूझ रहा था। लेकिन जवाब गोलमोल और संक्षिप्त रखा जाए इसका उसने पूरा ध्यान रखा। परली टोले के  हो ना? एक्सरे की तरह तीक्ष्ण
हां तो यह बोलो न। वृद्ध सहज भाव से मुस्कराया। ऐसा करो, पहले सीधा जाओ। दो - एक फर्लांग पर एक और चौक आएगा। ऐसा ही। बस इस चौक के समान बताने के लिए तर्जनी से जमीन की ओर संकेत करने लगा। वहां से दाहिने मुड़ना। ज्यादा दूर नहीं है। मेन रोड आएगी। आपको वहाँ कोई भी आगे का रास्ता बता देगा। रामेश्वर विश्वास और अविश्वास के मिश्रित भावों में डूबता - उतरता उसे देखता रहा। वृद्ध ने ताड़ लिया। आप काफी घबराए हुए लगते हो बाबूजी। उससे न इंकार करते बना और न खण्डन। चेहरे पर जो पूता था वह कैसे छिपाता। थोड़ा बैठ जाओ, फिर चले जाना। वृद्ध ने उसे अपने बगल में बैठने का संकेत किया। वह चुपचाप बैठ गया।
वृद्ध सहज था। मुलायम स्वर में कहने लगा - आपकी कोई गलती नहीं है। माहौल बिगड़ जाने पर यही सब होता है। इंसान दूसरे इंसान से घबराता है। हो सकता है कि उधर की तरफ जाने पर हमारा भी यही हाल हो। वह खामोश रहा। वृद्ध की बातों से उसे राहत मिल रही थी। पानी - वानी पिओगे। उसने पूछा। नहीं, बस शुक्रिया। वह अभी भी पूरा उबरा नहीं था। वृद्ध धीरे से हंसा। रामेश्वर को लगा कि उसकी हँसी में व्यंग छिपा है। डर रहे हो। पास के मकान से एक लड़का निकला। वह जग में पानी और तश्तरी में कुछ लिए हुए था। बूढ़े के पास आ कर रख दिया। लो बाबूजी, वृद्ध ने तश्तरी मे रखी चीज को दो हिस्से में तोड़ कर एक उसकी ओर बढ़ायी। मिठाई थी। वह खाने लगा। पानी भी पीया। वृद्ध आराम से हाथ पोंछता हुआ बोला - देखो यही होता है। दिल से दिल मिलने की बात है। तुलसी दास ने भी कहा है जहाँ सुमति तहां सम्पत्ति नाना। उसे लगा कि बूढ़ा पढ़ा लिखा था।
उसने ज्यादा भाषाण नहीं दिया। रामेश्वर उसे पुन: धन्यवाद देता हुआ आगे को चल दिया।
चुनाव का मौसम चल रहा था। उम्मीदवार अपने पक्ष में न केवल धुंआधार प्रचार कर रहे थे बल्कि प्रतिद्वन्द्वियों पर भीषण प्रहार भी कर रहे थे। यह क्षेत्र वैसे भी बेहद संवेदनशील था। मात्र कुछ अंतर से परिणाम निकलने की संभावना थी। इस तरफ वाले जीत के प्रति आश्वस्त थे। पिछली बार बस कुछ वोटों से हारे थे। इस बार इसे रोकने के लिए सारे प्रयास किए गए थे। लोगों को समझाया गया कि छोटे - छोटे समुदायों की बात को भुलाकर व्यापक हितों को ध्यान में रखा जाए। लेकिन किसी भी कसर को बाकी न रखने के लिए नेतागण कुछ अतिरिक्त करने की योजना बना रहे थे। बहुत कुछ ऐसा ही विचार दूसरे दल का था। वे भी इस अतिरिक्त के लिए मौका ताक रहे थे। भड़काऊ भाषणों ने पहले ही माहौल तनावपूर्ण कर दिया था।
एक दिन जंगल की आग की तरह खबर फैल गयी थी कि शिव मंदिर के अन्दर एक जिन्दा बम मिला है। लोग आग बबूला हो उठे। दूसरी ओर परली तरफ के औलिया मस्जिद के पास एक देशी बम फटने से दो लोगों के घायल होने का समाचार भी लगभग उसी समय फैला। फिर क्या था, दोनों तरफ के सामान्य जन पल भर के योद्धा की तरह सुसज्जित हो गए और धर्म की रक्षा के लिए शहीद होने और कत्ल करने को कसमसा उठे। रामेश्वर को लगा कि ऐसे अवसर पर ही उसे कुछ करने की जरुरत है। वह फौरन अपनी तरफ के प्रमुख कार्यकर्ताओं से मिला और कहने लगा कि यह सब परली तरफ वालों का काम नहीं बल्कि वोट - बैंक की राजनीति  करने वालों की कारगुजारी है। लोग उसकी बात ध्यान से सुन रहे थे। इससे उसका उत्साह बढ़ा। देखिए, दूसरी कम्यूनिटी के किसी इंसान की क्या मजाल की इधर आकर ऐसी हरकत करें। पकड़ा गया तो कुत्ते की मौत मरेगा। यह सब पैसे देकर कुछ गुर्गों के हाथ करवाया गया है। बात के वजन को बड़े बुजुर्गों ने खासकर महसूस किया। वे युवकों को भी समझाने लगे।
रामेश्वर दृढ़सकल्प का प्रतीक बना हुआ था। वह दूसरी ओर भी चला गया। लोग उसके दुस्साहस पर चकित थे। इस तरफ का कोई उस साइड चुनाव प्रचार को भी नहीं गया था। जो थोड़े से हैरान लोग उसके पास इकठ्ठा हो गए थे उन्हें संबोधित करके बोला - मैं एक दिन अनजाने में इधर आकर रास्ता भूल गया था तब एक बुर्जुग ने मेरी मदद की। मुझे बाहर का रास्ता बतलाया। इससे आप लोगों के बारे में मेरी धारणाएं दूर हुई। उस दिन मैं डरा हुआ था। आज निडर होकर आया हूं। सांस लेने के लिए वह रुका। लोगों के चेहरे के भावों को पढ़ने की कोशिश करता हुआ वह आगे बोला - यह मन्दिर - मस्जिद में बम बगैरह की साजिश कुछ लोगों ने चुनाव के समय वोट बटोरने के लिए की है। इसका आम जनता से कोई मतलब नहीं है। आप लोग इस चाल से होशियार रहे।
मजमे में खुसर - पुसर होने लगी। एक आवाज आयी - बात तो सही है। आम आदमी वैसे भी रोजमर्रा की नून - तेल - लकड़ी में फिक्रमंद है। उसे क्या पड़ी है यह सब करने की। चंद आवाजें सहमति की और भी सुनायी दी। तभी एक ने जरा जोर से कहा - आप यह सब अच्छी बातें उस तरफ के लोगों को क्यों नहीं बताते? वह शांत स्वर में बोला - मैं सभी कह रहा हूं। अब से मेरा उद्देश्य इसी चालबाजी से सबको आगाह करना है।
चुनाव का दिन अभी भी कुछ दूर था। रामेश्वर ने किशन और अपने कुछेक पुराने साथियों के साथ मुहिम तेज कर दी। वह लोगों से शांति बनाए रखने की अपील करता और जाति - धर्म से ऊपर उठकर मतदान करने का आहवान करता। वह न तो चुनाव लड़ रहा था और न ही किसी भी दल की ओर था। लेकिन जोश खरोस में लड़ रहे उम्मीदवारों पर भारी पड़ रहा था। प्रमुख पार्टियों के आकांओं की बैठके होने लगी। ये रामेश्वर तो सारा खेल बिगाड़ रहा है। और इतनी मुश्किल से माहौल बनाया था। इस बार लहर की उम्मीद थी। कुछ कीजिए श्रीमान। करना ही पड़ेगा जनाब। एक दूसरे के खिलाफ लड़ रहे लोग इस विषय पर एकमत थे।
एक दिन किशन साथियों के साथ सद्भावना जुलूस निकालने जा रहा था। इसके लिए उन सबने काफी मेहनत की थी। दोनों समुदायों के लोग शामिल थे। ऐसे लोग भी थे जो कुछ समय पूर्व तक रक्तपात की भाषा बोल रहे थे। तभी ध्यान आया कि रामेश्वर अनुपस्थित है। लोग इसकी खोज करने लगे। घर में नहीं था। घरवालों ने बताया कि कल रात भी नहीं लौटा था। कहाँ जा सकता है। चिन्ता हुई। खोजबीन तेज हुई। मेन रोड पर सड़क के किनारे एक गढ्ढे में रामेश्वर की लाश पाई गई। उसके शरीर पर कई चोटों के निशान थे। कपड़े खून से रंगे थे। शायद हत्या कहीं और की गई होगी और लाश यहां डाल गए होगें। यह सड़क दोनों पक्षों को एक तरह से विभाजित करती है। लाश यही पड़ी मिली। पता नहीं कत्ल कहां किया गया होगा।
किशन और उसके साथियों का मुँह हैरानी और दुख से खुला रह गया। चलो, पुलिस को खबर करें। एक ने कहा। करेंगे। किशन बोला - लेकिन यह जुलूस भी निकलेगा। इसमें रामेश्वर भी शामिल होगा। उसके चेहरे पर वही दृढ़ता थी जो परली तरफ के लोगों से बात करते समय उसके दिवगंत मित्र रामेश्वर में दिख रही थी।
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