इस अंक के रचनाकार

आलेख हिन्दी साहित्य गगन के चमकदार सितारेः डॉ. पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी : स्वराज करुण जब मनुष्य की करुणा का विस्तार होता है,तभी वे सही अर्थों में मनुष्य बनता है / सीतराम गुप्ता प्रकृति और दाम्पत्य प्रेम का बिरला अनूठा प्रेमी गायक - केदारनाथ सिंह काशीनाथ सिंह की कहानी ’ गुड़िया’ का पाठ भेद यानि भुनगे का आदमी में पुर्नजन्म -संजय सिंह कहानी दीया जलता रहने देः बलविन्दर’ बालम’ प्रेम की जीतः श्यामल बिहारी महतो शिकारः अरूण कुमार झा ’ विनोद’ व्यंग्य चलो चिंता करें : रीझे यादव लघुकथा अपराध के प्रकार : मधु शुक्ला खिलौना : रविकांत सनाड्य भिक्षा : कमलेश राणा बारिस : अंजू सेठ विजय कुमार की लघुकथाएँ फायर्ड : सविता गुप्ता समीर उपाध्याय ’ समीर’ की लघुकथाएं दो लघुकथाएं :अनूप हर्बोला पालतू कौए : शशिकांत सिंह ’ शशि’ जयति जैन ’ नूतन’ की दो लघुकथाएं संतोष का सबक : ज्ञानदेव मुकेश गीत / ग़ज़ल / कविता दो छत्तीसगढ़ी गजल : डॉ. पीसीलाल यादव मोहब्बत की अपनी (गजल) महेन्द्र राठौर हार के घलो जीत जाथे (छत्तीसगढ़ी गीत) डॉ. पीसीलाल यादव चिरई खोंदरा (छत्तीसगढ़ी कविता) शशांक यादव महर - महर ममहावत (छत्तीसगढ़ी गीत) बिहारी साहू ’ सेलोकर’ दिल लगा के आपसे (गजल) : बद्रीप्रसाद वर्मा हमीद कानपुरी : दो गजलें यह घेरे कुछ अलग से हैं (गजल) आभा कुरेशिया बोझ उठते नहीं (गजल) विष्णु खरे प्रीति वसन बुनने से पहले (नवगीत) : गिरधारी सिंह गहलोत अवरोधों से हमें न डरना है (नवगीत) लाल देवेन्द्र कुमार श्रीवास्तव पंख कहां छोड़ आई लड़की (कविता) शशिकांत पाठक सुनो (कविता ) सरोज अग्रवाल खुशी को खुशी देखकर मैंने पूछा (कविता ) शिव किशोर दीप मुझ पर हावी हो जाए (गजल ) सीमा सिकंदर निःशब्द हूं मैं (कविता ) रीना तिवारी पहचान (कविता) प्रगति रावत हक के लड़ने का (गजल) राज मंगल ’राज’ कवि (कविता) डॉ. रामप्रवेश रजक आम आदमी का न रहा (नवगीत) रमेश मनोहरा भंवरे का सफर (गीत) रणवीर सिंह बलवदा मेरा प्यार (कविता) संदीप कुमार सिंह जेठ का महीना (कविता) बृजनाथ श्रीवास्तव अगर खामोश हूं (गजल) असीम आमगांवी तेरे लब यूँ (गजल) प्रो. जयराम कुर्रे रिश्ते (कविता) नीता छिब्बर आपका ये मशवरा (गजल) प्रशांत ’ अरहत’ वह है तो हम है (कविता) तुलेश्वर कुमार सेन मेरी कहानी शिक्षा ’ मेरी जिंदगी के रंग’ : गोवर्धन दास बिन्नाणी पुस्तक समीक्षा आज का एकलव्य- मानवीयता का सहज सम्प्रेषणः अजय चंद्रवंशी .

बुधवार, 17 जुलाई 2013

परसाई की राजनीतिक स्‍िपरिट




  • - ब्रजकिशोर झा -
'' आज माया है
अभिधा या लक्षणा नहीं उसमें
व्यंग्य ही समाया है। '' 
हरिशंकर परसाई
  • बालस्वरूप राही
व्यंग्य हास्य के साथ-साथ मनुष्य की किसी विडम्बना पूर्ण स्थिति का चित्रण करना है। आधुनिक युग में व्यंग्य के दो रुप देखने को मिल रहे हैं,एक तो हास्य के स्तर पर और दूसरा अप्रत्यक्ष स्तर पर कटु आलोचना के रूप में। हरिशंकर परसाई वर्तमान व्यंग्यकारों में सर्वाधिक लोकप्रिय हैं। उनके व्यंग्य पाठक के मर्म को भेदने के साथ - साथ अपनी हास्य से उस पर मलहम लगाने का भी कार्य करते हैं। परसाई के व्यंग्य हिंदुस्तान साप्ताहिक एवं धर्मयुग के अलावा कई संग्रहों में प्रकाशित हुए हैं और वर्तमान में परसाई रचनावली के कई खण्डों में संकलित कर ली गयी हैं।
परसाई ने समसामयिक विषयों पर ही अधिकाधिक व्यंग्य लिखे हैं। वे अपने लिखने के बारे में कहते हैं, च्च् मुझे व्यंग्य लिखते 22-23 साल हो गये। अभी भी रोज ही लिखता हूँ। पीछे मुड़कर देखता हूँ कि आखिर मैंने व्यंग्य लिखना कब शुरू किया? उससे बड़ा प्रश्न है,क्यों शुरू किया? व्यक्तिगत और परिवेशगत वे कौन सी मजबूरियां थी, जिन्होंने मुझसे व्यंग्य लिखवाया? और फिर सवाल उठता है - व्यंग्य क्या है? चेखव ने कहा है - जो दुखी होता है वह हास्य और व्यंग्य लिखता है। जो सुखी होता है, वह दुख का साहित्य लिखता है। दरअसल समसामयिक जीवन की विसंगतियों, अन्याय, पाखण्ड, अवसरवाद आदि ने ही लेखक को व्यंग्यकार बनाया है। डॉ सुरेश आचार्य के अनुसार, - एक विकृत, भ्रष्ट और अन्यायपूर्ण समाज व्यवस्था के विरूद्ध साहित्य के क्षेत्र में सबसे अधिक कार्य व्यंग्य में ही हुआ है। वैसे भी इससे अच्छी कोई स्पिरिट नहीं है जो समसामयिक सामाजिक यथार्थ को रचना में रूपांतरित करते हुए ज्वलंत प्रश्नों की ओर ध्यानाकर्षण करती हो।
श्री परसाई के अनुसार सच्चे व्यंग्य में मनुष्य को सोचने के लिये बाध्य कर देने की क्षमता होती है और कहीं न कहीं वह मनुष्य को जीवन की सारी विसंगतियों से लड़ने के लिये तैयार करता है। परसाई के शब्दों में,  व्यंग्य जीवन से साक्षात्कार करता है, जीवन की आलोचना करता है, विसंगतियों, मिथ्याचारों और पाखण्डों का परदाफाश करता है। और परसाईकी व्यंग्य तो सारी सामाजिक,राजनीतिक विसंगतियों पर इतना चोट करती है कि कई बार लेखक को अपनी इस लेखकीय प्रतिबद्धता की कीमत भी चुकानी पड़ी है,प्रसिद्ध व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई को भी अपने फासिस्ट विरोधी व्यंग्य लेखन के कारण जून 1973 में जबलपुर में कतिपय फासिस्ट समर्थकों की हिंसा का शिकार होना पड़ा था।
चूंकि परसाई प्रारम्भ से ही फासिस्ट विरोधी रहे हैं और फासिस्ट संगठनों पर जब-तब लेखनी से प्रहार करते रहे हैं, व्यंग्य की चोट देते रहे हैं, अत: कहा जा सकता है कि आक्रमण प्रतिबद्ध व्यंग्य लेखक पर था, उसके लेखन पर था। परसाई का मानना है कि व्यंग्य में सीधा चोट नहीं होता, वैसे भी व्यंग्य में सीधा प्रहार नहीं होता। मैं इसे किसी आड़ के पीछे से की गयी एंबुशिंग अथवा घात लगाना मानता हूँ। अब सीधा हो अथवा टेढ़ा चोट तो चोट ही होती है और जिन पर होती है खूब होती है। श्री परसाई अपने व्यंग्य संग्रह सदाचार का तावीज में लिखते हैं, व्यंग्य में चोट होती है। जिन पर होती है वे कहते हैं - इसमें कटुता आ गयी है। शिष्ट हास्य लिखा करिये। मार्कट्वेन की वे रचनायें नये संकलनों में नहीं आती, जिनमें उसने अमरीकी शासन और मोनोपोली के बखिये उधेरे हैं। वह उसे केवल शिष्टहास्य का मनोरंजन देनेवाला लेखक बताना चाहते हैं। ही डिलाइटेड मिलियंस।
लेखक के इस कथन में शिष्ट हास्य शब्द आया है अर्थात् ऐसे बहुत से लोग हैं जो व्यंग्य को गंभीरता से नहीं लेते और उसे हास्य ही समझते हैं, परंतु हास्य और व्यंग्य में बहुत बड़ा अन्तर है। श्री परसाई ने इस संदर्भ में कहा भी है, जरुरी नहीं कि व्यंग्य में हंसी आये। यदि व्यंग्य चेतना को झकझोर देता है, विद्रुप को सामने खड़ा कर देता है, आत्म साक्षात्कार कराता है, सोचने को बाध्य करता है, व्यवस्था की सड़ांध को इंगित करता है और परिवर्तन की ओर प्रेरित करता है, तो वह सफल व्यंग्य है।
लेखक परसाई ने व्यंग्य के कच्चे माल यानी विसंगतियों को कसकर पकड़ा है, प्रमुख जिसमें राजनीति ही है और जहां भी पकड़ा है उस पर उनकी लेखनी चली है। अनुभव को इस परिप्रेक्ष्य में वह बहुत ज्यादा महत्व देते हैं, अनुभव ही लेखक का ईश्वर होता है। मैंने अनुभवों का दायरा बढ़ाया। अनुभव बेकार होता है यदि उसका अर्थ न खोजा जाय, उसका विश्लेषण न किया जाय और तार्किक निष्कर्ष न निकाला जाय। और लेखक ने अपने इस अनुभव जगत का सर्वाधिक या पूरे कौशल के साथ उपयोग किया है राजनीतिक विसंगति को दिखाने में।
परसाई जी पर अक्सर यह टिप्पणी की जाती है कि उन्होंने राजनीति को अपना विषय बना लिया है या राजनीति उनके व्यंग्य लेखन में प्रधान हो चुकी है। सुरेश आचार्य के शब्दों में, च्च्दूसरी ओर भारतीय समाज एक जटिल समाज है। समाज के भीतर जातियां, उपजातियां, बिरादरियां, धरे और गुट, भाषायें, दल, धर्म, प्रांत, क्षेत्र और सर्वोपरि स्वार्थ के चक्रों को भेदकर भारतीय राजनीति चलती है। इसीलिये व्यापार, धर्म, संस्कृति, साहित्य, विज्ञान, शिक्षा और प्रशासन कुछ भी राजनीति से परे नहीं है। हो भी नहीं सकता। छोटे छोटे स्वार्थों के लिये बड़ी से बड़ी योग्यता को नकारना दरअसल इसी राजनीति की देन है। इसी से परसाई के लेखन में राजनीति हावी नजर आती है। आज के समय में जो राजनीति से दूर रह रहने का दावा कर लेते हैं , वे सफल राजनीतिज्ञ हैं। बात शत-प्रतिशत सत्य है और स्वयं व्यंग्यकार परसाई ने भी माना है - पर मुझ पर यह आरोप लगाया जाता कि मैं अतिराजनीतिक हूँ। मैं इसे आरोप नहीं प्रशंसा ही मानता हूँ। मेरा विश्वास है कि कोई लेखक अराजनीतिक नहीं हो सकता क्योंकि राजनीति मनुष्य की नियति तय करती है। जो यह कहते हैं कि लेखक को राजनीति से क्या लेना-देना, वे खुद बड़ी गंदी राजनीति के शिकार हैं।
परसाई की राजनीतिक चेतना सीधे मार्क्स से प्रभावित रही है। वे कहते हैं, फिर मैंने देखा कि जीवन में बेहद विसंगतियां हैं। अन्याय, पाखण्ड, दल, दोमुंहापन, अवसरवाद, असामंजस्य आदि हैं। मैंने इनके विश्लेषण के लिये साहित्य, दर्शन, समाजशास्त्र, राजनीति शास्त्र का अध्ययन किया। मैंने जाना कि जीवन की सबसे सही व्याख्या कार्लमार्क्स ने की है। परसाई की इस राजनीतिक चेतना का यथार्थ जगत से मेल नहीं हो पाता है और वे निराशावादी हो जाते हैं। लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि गंभीर रचनाकारों की तुलना में वे जीवन में कम निष्ठावान हैं या कोई भी व्यंग्यकार है। वे स्वयं से कहते हैं, लेकिन वह शायद मनुष्य के बारे में आशा खो चुका होता है। निराशावादी हो जाता है। उसे मनुष्य की बुराई ही दिखती है। तुम्हारी रचनाओं में देखो,सब चरित्र बुरे ही हैं। स्वाभाविक ही है जब व्यंग्यकार अपनी कथ्य के प्रति इमानदारी बरत कर उसे क्षणों से चुनेगा तो विसंगतियां स्पष्ट हो आयेंगी। उदाहरण के तौर पर कुछ सुक्तियां दी जा रही हैं जो राजनीतिक परिप्रेक्ष्य की सशक्त व्यंग्य हैं,इस पृथ्वी पर जनता की उपयोगिता कुल इतनी है कि उसके वोट से मंत्रीमण्डल बनते हैं। ठिठुरता हुआ गणतंत्र राजनीति में बनवास भोगने वाले आधुनिक  दशरथ की आज्ञा से नहीं, जनता के खदेड़ देने से बनवास भुगत रहे हैं। वैष्णव की फिसलन अगर जनता सही रास्ते पर जा रही है, तो उसे गलत रास्ते पर ले जाना नेता का काम है। अपनी-अपनी बिमारी राजा को साहसी और लुटेरा होना चाहिये, तभी वह राज्य का विस्तार कर सकता है। जैसे उनके दिन फिरे जिनकी हैसियत है, वे एक से भी ज्यादा बाप रखते हैं,एक घर में, एक दफ्तर में, एक-दो बाजार में, एक-एक हर रजनैतिक दल में। शिकायत मुझे भी है उपर्युक्त उद्धृतियां वस्तुत: राजनीति की त्रासदी को ही उजागर करती हैं। किसी भी क्षेत्र, शिक्षा, व्यवसाय, राजनीति आदि की झूठी चमक-दमक, उसके अनैतिक आचरणों के ऊपर चढ़ी कलई-मुलम्मा को उतारना ही व्यंग्य की नैतिकता है और इसी नैतिकता का निर्वाह सर्वत्र परसाई-व्यंग्य साहित्य में हुआ है। परसाई का उद्देश्य परिवर्तन रहा है, सुधार नहीं। वैसे कोई सुधर जाये तो उन्हें कोई ऐतराज नहीं है, वैसे मैं सुधार के लिये नहीं बदलने के लिये लिखना चाहता हूँ, यानि कोशिश करता हूँ, चेतना में हलचल हो जाये, कोई विसंगति नजर के सामने आ जाये। इतना काफी है।
ऊपर से मनोरंजक और हल्की-फुल्की लगने वाली  नागफनी की कहानी को ही लें, कौन सा क्षेत्र है जिसकी विसंगतियों को पकड़ने की कोशिश लेखक ने नहीं की है? वस्तुत: फंतासी शैली का सफल प्रयोग करते हुए समाज की, व्यवस्था की कुल मिलाकर दायरे में आने वाली सारी चीजों की, घटनाओं के एक-एक प्रसंग की विसंगतियों को दिखाते हुए कहीं न कहीं ऐसी रिक्तता का एहसास दिला दिया है,जैसा प्याज के छिलके उतारते-उतारते अंत में होता है। वस्तुत: इस उपन्यास में कुंवर अस्तभान और राजकुमारी नागफनी के इर्द-गिर्द जो विसंगतियां हैं, वह व्यष्टि के धरातल पर न होकर समष्टि के धरातल पर हर समाज की विसंगति बन गयी है। इस उपन्यास की भूमिका में लेखक स्पष्ट कर देता है कि उसने फंताशी शैली का प्रयोग इस उपन्यास में क्यों किया है, लोक-कल्पना से दीर्घकालीन सम्पर्क और लोकमानस से परम्परागत संगति के कारण फैंटेसीज् की व्यंजना प्रभावकारी होती है। प्रसंगत: उल्लेखनीय है कि व्यंग्य को प्रेषित करने के लिये फंताशी एक सशक्त माध्यम है।
खैर, माध्यम जो भी हो, शैली या विधा जो भी हो, परसाई का उद्देश्य रहा है सिर्फ  विसंगतियों की खोज, जिनमें उनकी राजनीतिक चेतना का लौ सदा प्रज्ज्वलित रही है। उनका लक्ष्य साहित्य को सीधे जीवन से जोड़ना था, जिसका दम तो बहुत से तथाकथित साहित्यकार भरते आये हैं मगर...। और यही कारण है कि परसाई ने निबंध, उपन्यास, कहानी प्रभृति साहित्यिक विधाओं का प्रयोग करते हुए मूल लक्ष्य सत्य की खोज और विसंगति को दिखाना रखा है। उनके शब्दों में, संगति के कुछ मान बने हुए होते हैं ,जैसे इतने बड़े शरीर में इतनी बड़ी नाक होनी चाहिये ।उससे बड़ी होती है तो हंसी आती है। आदमी आदमी की बोली बोले, ऐसी संगति मानी हुई है। वह कुत्ते जैसी भौंके तो यह विसंगति हुइ और हंसी का कारण।
परसाई को समाज के हर क्षेत्र में विसंगती दिखी और उसकी ही सार्थक अभिव्यक्ति बड़े ही मार्मिक ढ़ंग से वे अपनी रचनाओं में करते हैं। रशियन लेखक चेखव में जिस प्रकार आक्रोश के बदले करुणा ही अधिक दिखाई पड़ती है उसी प्रकार परसाई में भी करूणा ही अधिक दृष्टिगत होती है। वे कहते हैं, चेखव मुझे बेहद पसंद हैं। जो लोग कहते हैं कि व्यंग्य सुरूर होता है, अमानवीय होता है वे चेखव पर ध्यान दें। इंस्पेक्टर मातादीन चांद पर, भोलाराम का जीव, त्रिशंकु बेचारा, हनुमान की रेलयात्रा आदि व्यंग्य इस संदर्भ में विशेष उल्लेखनीय हैं।
राजनीति-समंवित व्यंग्य लिखने पर सदाचार का तावीज में स्वयं को कैफियत देते हुए कहते हैं, इसलिए कि राजनीति बहुत बड़ी निर्णायक शक्ति हो गयी है। वह जीवन से बिलकुल मिली हुई है। वियतनाम कि जनता पर बम क्यों बरस रहे हैं? क्या उस जनता की अपनी कुछ जिम्मेदारी है? यह राजनीतिक दाँव-पेंच के बम हैं। शहर में अनाज और तेल पर मुनाफाखोरी कम नहीं हो सकती क्योंकि व्यापारियों के क्षेत्र से अमुक-अमुक को चुनकर जाना है। राजनीतिक सिद्धांत और व्यवहार की,हमारे जीवन का एक अंग है। उससे नफरत करना बेवकूफी है। राजनीति से लेखक को दूर रखने की बात वही कहते हैं, जिनके निहित स्वार्थ हैं, जो डरते हैं कि कहीं लोग हमें समझ न जायें।
मैंने पहले भी कहा है कि राजनीति को नकारना भी एक राजनीति है। उनके कथन से स्पष्ट है कि राजनीति उनके लेखन का अहम् हिस्सा तो था ही, इसे वे अपने जीवन के भी अहम् हिस्से के रूप में देखते थे। और उस परिस्थिति में जब राजनीतिक व्यंग्य लिखा जा रहा हो,तो महान् साहस की आवश्यकता होती है कारण किसी न किसी प्रकार से सत्ता ही शोषण का उत्तरदायी होता है और सत्ता का आग्रह सत्य का आग्रह तो नहीं ही होता है। इसमें खतरा होता है, ठीक मुक्तिबोध वाली अभिव्यक्ति के खतरे, जिसे परसाई ने बखूबी उठाया है, वस्तुत: परसाई अपने युग के प्रति अत्यधिक सचेत रचनाकार हैं...परसाई प्राय: सभी स्वीकृत सीमाओं को ध्वस्त करते हुए, इस राजनैतिक सर्वव्यापकता पर अपनी कलम उठाते हैं। इस राजनीति-प्रधान रचना यात्रा के पीछे मुख्य उद्देश्य समाज को सत्य से अवगत कराना ही रहा है।
वस्तुत: परसाई की अधिकांश रचनायें राजनीति की विसंगतियों को दिखाने के उद्देश्य से ही लिखी गयी हैं और अपने उद्देश्य को सफलीभूत करने के लिये लेखक ने अपने समस्त कौशल का प्रयोग कर दिया है। इनकी राजनीति का बंटवारा (संग्रह- मेरी श्रेष्ठ व्यंग्य रचनायें) शीर्षक कहानी को ही लेते हैं, इसमें परसाई ने राजनीति की त्रासदी को बड़े ही आराम से चित्रित कर एक तरफ जहां लोगों को हंसने का मौका दिया है, वहीं अकेले बैठकर देश की राजनीतिक स्थिति पर वह आठ-आठ आँसू बहाये, ये होम-वर्क भी परसाई ने उसे दिया है। अपनी बात को कहने के लिये, मजबूती से सामने रखने के लिये किसी चीज की चिंता नहीं करते परसाई, चाहे राजनीति का लाठी-डंडा हो या साहित्य का शैली-विचार! उक्त कहानी में ही परसाई ने पैरोडी शैली का प्रयोग किया है, जो हास्यास्पद भी है, और कठोर सत्य होने के कारण चोट करने वाला भी। इस कहानी के सेठ जी अर्थात् भैया जी आजादी की लड़ाई में एकाध बार जेल जाकर उसका राजनीतिक लाभ उठाना चाहते हैं। स्वयं नहीं, किसी दूसरे से ही कविता लिखवाकर अपने नाम से छपवाते हैं और भतीजे के प्रश्न के जवाब में कहते हैं,
कारागार निवास स्वयं ही काव्य है
कोई कवि बन जाये सहज सम्भाव्य है। (गुप्तजी की कविता की पैरोडी)
आज की राजनीति के विकृत पक्ष पर व्यंग्य छोड़ने के लिये चाहे पैरोडी हो या आत्म-व्यंग्य की शैली, लेखक ने किसी चीज से परहेज नहीं किया है। खुद पर हंसने का मौका देकर दूसरों में विसंगतियों की समझ पैदा करने की कोशिश में लिखी गयी रचनाओं में सम्मान और को लिया जा सकता है। दरअसल इस ललित व्यंग्य निबंध में लेखक ने अपना नाम जोड़कर सम्मान और पुरस्कार देने की राजनीति में जो पिन चुभाया है वह दूसरों के साथ व्यंग्यकार की आत्मीयता और सौहार्द को नष्ट किये बिना अपना काम कर जाता है। वस्तुत: आत्म-व्यंग्य का उद्देश्य भी तो यही होता है।
परसाई का व्यक्तिगत जीवन और साहित्यिक जीवन दोनों एक ही खोज में अभिप्रेरित है वह है सत्य, सत्य-सत्य-सत्य आखिर सत्य है क्या? बहुत पढ़ा मैंने, सुकरात भी, उपनिषद्घ् भी, टॉल्स्टॉय भी, गांधी भी। सत्य का आग्रह सबका है पर किसी ने सत्य को परिभाषित नहीं किया है। मैं नहीं जानता कि सत्य क्या है? वस्तुत: सत्य के आग्रह ने ही परसाई को सत्ता से दूर रखा था। वे कहते हैं, बीसेक साल पहले राज्य सभा की सदस्यता मेरे रास्ते में आ गयी थी। मैंने राज्य सभा की कभी कल्पना नहीं की थी। मैं मानता था और अभी भी मानता हूँ कि राज्यसभा की राष्ट्रपति द्वारा नामजदगी से सदस्यता बुढ़भस लेखकों के लिये है। यहाँ निष्क्रियता का वेतन मिलता है, मानसिक आलस्य का सम्मान होता है। कुछ भी नहीं समझना और कुछ भी नहीं बोलना संसदीय कर्त्तव्य माना जाता है। कहीं न कहीं यहां गुप्त और बच्चन की ओर ईशारा है जो राज्य सभा में पहले से ही मौजूद थे तथा जिनके मौन से परसाई बहुत आहत थे।
डॉ बरसानेलाल चतुर्वेदी ने ठीक ही कहा है, व्यंग्यकार का कार्य अत्यंत अप्रिय होता है। अपनी आलोचना किसे सुहाती है? समाज के सार्वजनिक हित से प्रेरित होकर ही व्यंग्यकार अपनी कलम चलाता है। अपनी प्रगतिशील दृष्टि के कारण ही परसाई को व्यंग्यकारों की प्रथम पंक्ति में बैठने का गौरव प्राप्त हुआ। खुद परसाई कहते हैं, मैं समझता हूँ मेरी कुल उपलब्धि मानवीय संवेदना और सरोकार है। मनुष्य के जीवन की बेहतरी की चिंता मेरी रही है। इसी से मैंने लिखा और कुछ मशहूर भी हो गया हूँ।

पता - कलकत्ता गर्ल्स कॉलेज,
कोलकाता--700013,
मोबाईल 9088585841, 9088585841

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