इस अंक के रचनाकार

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गुरुवार, 11 जुलाई 2013

दो छत्‍तीसगढ़ी गीत :डॉ. पीसी लाल यादव



सुखबॉटे म  सुघराथे जिनगी


- पीसीलाल यादव  -

सुख बॉटे म सुघराथे जिनगी
जॉगर पेरे म उजराथे जिनगी।
काइसी, हिजगापारी इरखा म
गउँदन कस गुँगवाथे जिनगी।।

अंजोर तोरेच पोगरी नोहय,
परोसी के घलो हक ओमा।
तोर भरे के ढोली - ढाबा त
तैं बॉट दे ठोमा - ठोमा।।

मया - पिरीत तो पहाड़ा ये,
अन के दून दुहराथे जिनगी।

गर रेते गररेतिया कहाथे
अऊ मया बॉटे म मयारू।
जांगर के परसादे संगवारी
सोन उगलथे माटी - बारु।।

पसीना के ओगरे हरदम -
फुलवा कस ममहाथे जिनगी।

नंदिया - नरवा डोंगरी - टाठा
चिरई - चिरगुन मीत तोरे।
हवा - पानी ह हितु - पिरितु
रहि सब ले जिनगी जोरे।।

पुरसारथ के पलना म पल - पल
मनखे ल दुलराथे जिनगी।

मया पिरित जब पनके

मया पिरित जब पनके रे

मन - अंतस ह गमके रे।
गीत झरे होठ ले गुरतुर
पॉव म घुंघरु झनके रे।।


जांगर पेर पछीना ओगरा
जिनगी ल अपन सुघरा।
महल बरोबर सुख देथे
कांड़ी - कोरई के कुंदरा।।

तन के संवागा काम नी आवे
साज संवागा मन के रे ....।

मनखे उही मनखे आय,
जे सब ल अपनेच जानय।
पर के सुख - दुख ल जउन,
सउंहे अपनेच मानय।।

देखे मं आथे टूट जाथे ओ
रहिथे जे हा तन - तन के।

सौ बरस जिये करुवा के
तउनो तो घलो बेकार हे।
मया - पिरित के छिन भर ह
सौ - सौ जनम के सार हे।।

जिनगी के खेती म बों ले
करम के बीजहा घन के।

' साहित्य कुटीर '  गंडई-पंडरिया जिला - राजनांदगांव (छ.ग. ) 

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