इस अंक के रचनाकार

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सोमवार, 1 जुलाई 2013

श्रम और सौन्दर्यशास्त्र

-  डॉ. गोरेलाल चंदेल   -

       लोक की चर्चा करते हुये मेहनतकश आवाम का चित्र उभरने लगता है। धूप में संवलाये गठीले बदन, मिट्टी और धूल से सने हुये गमछे और सलूखे, माथे से टपकती हुई पसीने की बूंदें, हाथ में कुदाल, फावड़ा, हँसिया, टोकरी अथवा हल की मूंठे और चेहरे पर चमकती झक्क सफेद दंत - पंक्तियों से युक्त मुस्कान। इस तरह बनती है लोक की तस्वीर। आदिकाल से लोक की चर्चा इसी रूप में होती रही है। इतना ही नहीं लोकगीतों, लोक - कथाओं, लोक - कहावतों एवं लोक मुहावरों में भी श्रमसिक्त लोकजीवन की झाँकी देखी जा सकती है। श्रम की इसी अविरल धारा से लोक - संस्कृति का जन्म भी होता है और विकास भी। लोक का हर्ष और उल्लास, हँसी और खुशी रस और विरस पैरों की थिरकन और हाथों की विभिन्न मुद्रायें तथा सुरों का आरोह - अवरोह इसी धारा से सराबोर होकर निकलते है। यहां न तो धारा के बीच अपनी अलग पहचान बनाने वाले द्वीप होते हैं और न ही रेतीले टीले। सब कुछ इसी धारा में समाहित होकर, धारा का अभिन्न हिस्सा बनकर, धारा में खोकर, धारामय होकर, विकासशील संस्कृति में रूपांतरित हो जाता है। लोक संस्कृति इसी से जीवनदायी रस लेकर विकसित होती रहती है। लोक और लोक की संस्कृति का यही इतिहास भी है और समाज शास्त्र भी। यही दर्शन भी है और  यही विज्ञान भी। इसीलिये लोक संस्कृति को श्रम की धारा से काट कर देखने की कल्पना भी बेमानी होगी।
          लोकगीत, गाथा एवं कथाएँ लोक संस्कृति की अविस्मरणीय विरासत होते हैं। इतिहास के लंबे दौर में लोकजीवन इसी से उर्जा विकसित कर इतिहास की रचना करता रहा है। लोकजीवन की ऐतिहासिक एवं सामाजिक पृष्ठभूमि को देखा जाए तो इन गीतों एवं गाथाओं को मेहनत की कोख से जन्म लेते, उसकी गोद में खेलते और उँगली पकड़कर चलते देखा जा सकता है। आज से कुछ वर्ष पहले और कहीं- कहीं आज भी कर्मरत कृषक बालाओं और युवाओं को लोकगीतों के साथ सुर में सुर मिलाते हुये देखा जा सकता है। बनिहारों मजदूरों को गैंती से मिट्टी खोदते एवं बनिहारिनों मजदूर स्त्रियों को झऊहां उठाते गीतों की लय के साथ श्रम को हलका करते हुये देखा जा सकता है। यह सही है कि कई लोकगीतों के शब्द भाषा विज्ञान के अर्थ विस्तार के दायरे से दूर रहता है किन्तु गीतों के लय एवं सुर, उसकी व्यंजना को दूर तक ले जाता है तथा उनको अर्थवान बना देता है। गाने - वालों के चेहरे का भाव उन शब्दों में भाषिक अर्थ का सृजन कर देता है। यही वजह है कि लोकगीतों में शब्द, श्रम और लय के एकाकार का दर्शन होने लगता है। कार्य जितना अधिक श्रमसाध्य होता है गीतों के साथ उसे हलका करने की प्रवृत्ति उतनी ही अधिक दिखायी देती है। श्रम से अलग कर देने पर ये गीत एवं गाथाएं बेजान हो जाते हैं। लोक की यही चेतना उनकी सांस्कृतिक विरासत के रूप में राष्ट्रीय धरोहर बन कर सामने आती है। इस संदर्भ में अरूण कमल की कविता याद आती है - सारा लोहा उन लोगों की, अपनी केवल धार। यहाँ अर्थ चाहे जो हो, कविता का सारा लोहा तो लोकश्रम ने पैदा किया है। स्व. केदार नाथ अग्रवाल मजदूर के घर पुत्र - जन्म से यह नहीं कहते कि जन्म लेने वाला आई . ए. एस . या आई . पी. एस. बनेगा। उस परिवार में खुशी इस तरह मनायी जाती है - एक हथौड़ा वाला घर में और हुआ। गाँव में भी जब लड़का पैदा होता है तो कोई यह नहीं कहता कि लड़का हुआ है वरन यह कहता है कि नगरिहा हुआ है और लड़की पैदा होने पर - निंदईया पैदा होने की अवधारणा उस बच्चे को जन्म से ही श्रम से जोड़ देती है। मजदूर के घर लड़का या लड़की पैदा हो तो कमैया या कमैलिन पैदा होने की लोक अभिव्यक्ति बच्चों के जीवन को मिहनत के शीशे में देखने की अनुभवजन्य परिकल्पना करती है। बच्चे के रूप में उन्हें परजीवी उत्तराधिकारी नहीं श्रम की परंपरा को आगे बढ़ाने वाले उत्तराधिकारी ही चाहिये। यही लोकजीवन में श्रम की परंपरा है और यही लोक की विरासत का हस्तांतरण है।
       दसमत कैना लोक में प्रचलित गाथा - गीत है जो अब लगभग लुप्त होता जा रहा है। अब केवल कुछ बुजुर्गों में ही उसका ज्ञान रह गया है। उस गाथा को देवार जाति के लोग ही गाते रहे हैं। कुछ लोगों ने इसे राउत जाति के गीत के रूप में भी समेटने की कोशिश की है किन्तु यह खींच - तान कर की जाने वाली कल्पना मात्र है। घुमन्तू देवार जाति के लोग रूँझू बजा कर दसमत कैना की गाथा गाते हुए माँगा करते थे। रूँझू को कई क्षेत्रों में सारंगी या चटुआ भी कहा जाता रहा है। अन्य लोकगाथाओं की तरह इस गाथा में भी श्रम की प्रधानता है। चाहे राजा हो या रानी, मजदूर हो या मजदूरनी, किसान हो या किसानिन सभी लोक गाथाओं में श्रम से जुड़े हुए दिखायी देते हैं। यही वजह है कि गाथागीतों में चरित्र तो राजा - रानी का आता है किन्तु लोकजीवन उसे श्रम की संस्कृति से बाहर देख ही नहीं पाता, क्योंकि लोकजीवन ने अपने जीवनाभुव को ही इन गाथाओं में अभिव्यक्ति दी है। उनके जीवनाभुव के जखीरे में सामंती संस्कृति अथवा परजीवी संस्कृति से ही लबालब भरा होता है। यही वजह है कि अहिमन रानी चक्की पीसती हुई दिखायी देती है, अथवा जब गाँव जाती है तो सिर पर मोटरी लेकर जाती हुई दिखायी देती है। बीरसिंह गाथा कंवल रानी, रानी तो है किन्तु स्थान - स्थान पर श्रम की संस्कृति से सराबोर दिखायी देती है। रम्हुला तो आँगन में झाड़ू बुहारी की सांस्कृतिक यात्रा करती हुई दिखायी देती है। दसमत कैना भी कहती है-
अरे घामे म लेहव अनमन - जनमन
घामे म लेहंव अवतार
अउ चिटको छइहां बइठ परहुं राजा
बदन जाही करियाय
       इसी संस्कृति में दसमत कैना पली बढ़ी है और इस संस्कृति में जीते हुये सुख की अनुभूति करती है। मिहनत कश आवाम के लिए तपती धूप में कार्यरत रहना ही सुखकर होता है। छाया में बैठने से तो उनका बदन काला पड़ जाता है। तब भला छाया उन्हें कैसे स्वीकार्य हो सकती है।
       लोकसंस्कृति समूहवादी संस्कृति है। व्यक्तिवादी सोच और व्यक्तिवादी विशेषज्ञता के लिये इस संस्कृति में कोई स्थान नहीं होता। निंदाई - गुड़ाई से लेकर खान - पान तक में समूहवादी संस्कृति को देखा जा सकता है। यही वजह है कि इनके गीतों में भी समूहवाद की चेतना को देखा जा सकता है। गीत चाहे एकल हो अथवा सामूहिक। उन गीतों की अर्थ व्यंजना समूहवाद की चेतना से ही जाकर जुड़ती है। श्रम की यही संस्कृति उनके जीवन में भी सामूहिकता का जज्बा पैदा करती है। खेतों की निंदाई करते समय महिलायें सामूहिक स्वर में ददरिया गाती हंै और नांगर जोतने वाले कृषक उसका जवाब देते हैं। संस्कारगीतों में तो समवेत स्वर की ही प्रधानता रहती है। तीज - त्यौहारों के गीतों में भी इसी सामूहिकता का दर्शन होता है।
       दसमत कैना एकल गीत है। जिसे देवार जाति का पुरूष अकेला गाता है। किन्तु जहाँ - जहाँ गीत में श्रम को अभिव्यक्ति दी जाती है, वहाँ - वहाँ सामूहिक श्रम की ही चर्चा होती है -
नौ लाख ओड़निन ग नौच लाख रे ओड़िया
डेरा पारिन रे नौलखिया
भला गा री भोजरी
डेरा पारिन नौलखिया
       यहाँ व्यक्ति का वजूद नौ लाख के समूह में समाहित है। मिहनतकश नौ लाख ओड़िया एवं नौ लाख ओड़निन एक साथ काम करते हैं।
नौ लाख ओड़िया मन बाँधन कोड़े लागे
ओड़निन माटी ला डोहार
दस लाख ओड़िया के दस लाख कुदारी
बिजली असन चमके ला लागिस
दस लाख ओड़िया के दस कुदारी
जब वरसिस
तब धरती हा थर - थर काँपे लागिस
ओड़निन मन सब माटी डोहारिस
राजा दाँव लगाइस जी।
       श्रम की शक्ति को इतिहास में परिवर्तनकारी शक्ति माना गया है। यही परिवर्तन कारी शक्ति जब धरती के साथ जुड़ती है तो धरती का कोई कोना बाँध में तब्दील हो जाता है तो कोई कोना ताल - तलैया में। जब यह शक्ति समाज के साथ जुड़ती है तो सामाजिक क्रांति के माध्यम से समाज में परिवर्तन होता है। नौ लाख अथवा दस लाख ओड़िया एवं ओड़निन की परिकल्पना उस श्रमशक्ति की परिकल्पना है। इस श्रमशक्ति ने सुरगी डीह से सुरगी राजा से ओडार बाँध तक रातों रात सुरंग खोदने में सफलता प्राप्त की। इतना ही नहीं एक दिन में बारा बैल के मौना पानी धरती के गर्भ से अपनी मिहनत के बल पर निकाल लेती है।
नौ लाख ओड़िया डेरा ले रेंगिन
सुरगी डीह चले जाए
वहां सुरूंग ला खोदे सब्बोझन
ओडार बाँध पहुँचाय
       इस तरह की जनश्रुतियाँ न जाने किन - किन क्षेत्रों में और कहाँ - कहाँ प्रचलित है। कई तालाबों के संबंध में जनश्रुति प्रचलित है कि नौ लाख ओड़निन ने झऊहां झर्राया जिससे तालाब का विशाल पार बन गया। कुल मिलाकर इन मिहनतकश लोगों की मिहनत का निशान चप्पे - चप्पे पर दिखायी देता है। बड़े - बड़े तालाबों और बाँधों का अस्तित्व उनकी मिहनत का ही परिणाम है। बारा बैला का मौना, पानी निकालना, पानी की अंजस्त्र धारा, की न सूखने वाली धारा आज भी बहती हुई दिखायी दे रही है -
एक दिन अउ एक रात म
ओड़िया दीन कुदारी बरसाय
बारा बैला, मौना पानी
तरिया में छबाय।
       लोक का सौन्दर्यशास्त्र वस्तुत: श्रम का सौंदर्यशास्त्र होता है। लोक का सौंदर्य तो पसीने से निरंतर स्नान करने वाला सौंदर्य होता है। धूल और मिट्टी की प्रसाधन सामग्री से इस सौन्दर्य का श्रृंगार होता है और धरती की हरियाली उनके अंग प्रत्यंग में क्रीड़ा करती रहती है। इसीलिए तो प्रेमचंद ने कहा है कि - सौंदर्य केवल आधुनिक प्रसाधनों से रंगी - पुती नारियों में ही नहीं होता वरन खेत मेड़ पर बैठी, उलझे बालों वाली, बच्चों को दूध पिलाती नारी में भी होता है। प्रेमचंद ने श्रम के इस सौंदर्य को पहली बार पहचाना। निराला को इलाहाबाद की सड़कों पर तपती धूप में गुरू हथौड़ा हाथ ले, भर यौवन पत्थर तोड़ती महिला में सौंदर्य दिखायी देता है। इस सौंदर्य के सामने विश्व सुंदरी एवं ब्रम्हाण्ड सुंदरी का सौंदर्य कहीं टिक ही नहीं पाता है। श्रम से गठे हुए बदन के सामने एशियन स्काई शाप की मशीनी शारीरिक संरचना की कोई बिसात ही नहीं होता है।
       दसमत कैना का सौंदर्य श्रम की कोख से पैदा होने वाला सौंदर्य है। ज्यों - ज्यों दसमत कैना अधिक मिहनत करती है त्यों - त्यों उसका सौंदर्य निखरने लगता है। वर्षा, गर्मी अथवा ठण्ड का प्रभाव दसमत कैना के सौंदर्य पर नहीं पड़ता। उसे अपना सौंदर्य निखारने के लिये कभी लक्मे के सौंदर्य प्रसाधनों की जरूरत नहीं पड़ती। प्रकृति के तत्व ही उसके सौंदर्य की रक्षा करते है और प्रकृति के अवयव ही उसका श्रृंगार करते है। जिस सौंदर्य से जगत के मोहित होने की बात कही जाती है, परजीवी संस्कृति में जीने वाले व्यक्ति को सौंदर्यशास्त्र का ज्ञान ही नहीं होता। उसके दिलों दिमाग पर विज्ञापनी बाजारू सौंदर्य का माडल ही बना होता है। आधुनिकतावादी और उत्तर आधुनिक व्यक्तिवादी सौंदर्य ही उनके सौंदर्य का मानदण्ड होता है। व्यक्तिवादी सौंदर्य को भी वे विखण्डित कर अलग - अलग अंगों में देखने के आदी होते हैं। उनके लिये सम्पूर्णता में सामाजिकता सौंदर्य को देखने की दृष्टि नहीं होती।
       श्रम का सौंदर्य सामाजिक सौंदर्य होता है न कि आंगिक सौंदर्य। ऐसा सौंदर्य व्यक्ति को नहीं, समाज को प्रभावित करता है। बाम्हन राजा महान देव के सौंदर्य की अवधारणा व्यक्तिवादी होने के कारण ही उसे धूप में दसमत कैना के सौंदर्य के काला पड़ने की आशंका होती है। इसीलिए वह बार - बार दसमत कैना से कदम्ब की छाया में आ जाने का आग्रह करता है -
अा बईठ - बईठ ओ
कदम के छईहा में
बदन जाही कुम्हलाय
माटी ल फेंकथस
त दिल जाही जुड़वाय न।
       किन्तु दसमत कैना का सौंदर्य मिट्टी और धूप में पककर निकला हुआ सौंदर्य है। धूप और धूप में किये जाने वाले श्रम से उनका सौंदर्य और अधिक निखरता है। इसीलिये दसमत कैना की दृष्टि में श्रम से ही सौंदर्य को जीवित रखा जा सकता है।
अरे चिटको बइठ जइहाँ बाहमन राजा रे
मोर बदन जाही करियाय
अरे चिटको बईठहूं छईहां म राजा
दिल ह जाही करियाय
अरे घामे म लेहंव अनमन - जनमन
घामे म लेहंव अवतार
अऊ चिटको छइहां बईठ परहूँ राजा
बदन जाही करियाय
       ऐसा सौंदर्य तो लोकजीवन में मिहनतकश लोगों के जीवन में ही दिखाई दे सकता है। सारे विश्व को सम्मोहित करने वाला यही सौंदर्य अपने व्यापक अर्थों में सामाजिक सौंदर्य में रूपान्तरित होता रहता है। यह सौंदर्य तो श्रम के भीतर से अनायास पैदा होने वाला सौंदर्य है, भूमण्डलीकरण और बाजारी करण के सायासी सौंदर्य से बिलकुल अलग, धरती के किसी कोने के किसी खेत खार, बाँध अथवा तालाब के निर्माण की प्रक्रिया से उत्पन्न होकर समूचे विश्व को सौंदर्य गंध से समुचित कर देने वाला सौंदर्य। तभी तो दसमत कैना के सौंदर्य का वर्णन करते हुये लोक गायक कह उठता है -
चिरई में सुंदर तोर वाह पतरेगवा
सांप में सुन्दर मनिहार या
भला गा रे भोजरी
सरप में सुंदर मनिहार या
मनखे में सुंदर तोर दसमत ओड़निन
जग ल मोहे गा सवासार या
       व्यक्तिवादी, उपभोक्तावादी, सौंदर्य दृष्टिवाले, परजीवी व्यक्ति सामाजिक सौंदर्य को भोगवादी सौंदर्य में रूपान्तरित करने की निरंतर कोशिश करते हैं। इसके लिये उनकी संस्कृति के अनुरूप अपने आपको ढालने की कोशिश भी की जाती है। जब - जब इस प्रकार का प्रयास तेज होता है, तब - तब श्रमजनित सामाजिक सौंदर्य खतरे में पड़ता हुआ दिखाई देता है। किन्तु सामाजिक सौंदर्य में बड़ी ताकत होती है। उनके श्रम - संस्कृति से जन्मे सौंदर्य को भोगवादी बनाने का सपना बिखर जाता है। सामाजिक विकास की प्रक्रिया में इस तरह की घटनायें निरंतर होती रहती है। दसमत कैना के रूप पर ब्राम्हन राजा महानदेव का आसक्त होना दसमत कैना को पाने के लिये सिर पर टोकरी रख कर राजा का मिट्टी ढोना अथवा सुअर का मांस खाना, शराब पीना आदि दसमत कैना के सामाजिक सौंदर्य को भोगवादी बनाने का प्रयास ही कहा जा सकता है -
अऊ झऊहा टुकनी ला धर के गा राजा
माटी डोहारे ला जाय
एक खेप ले दुई खेप राजा
दुई ले भईगे तीन
अऊ साते खेप के माटी डोहारे
ले गरदन बईठग
राजा के चेथी पिरावन लागे ना।
       परजीवी संस्कृति में जीने वाीले लोगों की स्थिति इसी तरह हास्यास्पद हो जाती है और वे श्रम से भागने लगते हैं। उपभोगवादी वर्ग में दुनिया की अच्छी और सुंदर वस्तुओं पर एकाधिकार की प्रवृत्ति बलवती होती है।
अबो धरती में जाबे ओ ओड़निन रानी
खन कोड़ लेहूँ निकाल
अरे अधर झन जाबे दसमत कैना
जाल भंवा देहूँ जाय
       एकाधिकार दिखाने की ऐसी प्रवृत्ति या तो सामंत वर्ग में होती है या फिर पूंजीपति वर्ग में होती है। किसी भी स्थिति में अपनी पसंदीदा वस्तु पाने का वह अपने आप को अधिकारी समझता है। अपना स्वार्थ पूरा करने के लिये हिंसा का सहारा लेना, भय उत्पन्न करना तथा निर्दोष लोगों की हत्या करना इस वर्ग में आमतौर पर देखा जा सकता है। सेना और लाव - लश्कर लेकर निर्दोष ओड़ियों पर आक्रमण तथा ओड़ियों की हत्या इसका प्रमाण है।
       श्रमजीवी वर्ग और परजीवी वर्ग का यह संघर्ष निरंतर चलता रहता है। सामाजिक सौंदर्य को वैयक्तिक सौंदर्य में बदलने तथा उसका विरोध करने का सौंदर्य सामाजिक संघर्ष के रूप में निरंतर इतिहास के दौर में चलता रहा है। इस संघर्ष में कभी व्यक्तिवादी शक्तियाँ विजयी होती है तो कभी श्रम की शक्तियाँ। अंतिम सांसों तक संघर्ष करते हुये हारने के बजाय अपने आप को मिटा देने का जज्बा श्रम की संस्कृति में ही हो सकती है। दसमत कैना गाथा गीत में यह संघर्ष अंत:धारा की तरह निरंतर चलता हुआ दिखायी देता है। राजा को गदही की पूँछ से बाँधकर घसीटने तथा उसे घायल करने की कोशिशों में लोक का यही संघर्ष उभर कर सामने आता है और दसमत कैना का सती होना इस कहानी में संघर्ष की अविरल धारा की ओर इशारे के रूप में देखी जा सकती है :-
अवो खटिया के पाटी राजा के छाती ल
रानी तन के देवय बाँध
गदही के पूछी राजा के चूंदी ल
झींक के देवय बाँध
दूइ कोड़ा गदही ल पीटे गा
चार कोड़ा राजा ल
ढेलवानी म दिये कुदाय
गली - गली में राजा महम देव ला
गदही घिरलावत हे गा
       लोकगाथाकार ने दसमत कैना के सौंदर्य को अधिक उदीप्त करने के लिए जिन उपमेय एवं उपमानों का उपयोग किया है वह भी लोक जीवन के श्रम के भीतर से ही आता है।
अऊ का तोला कुंदे कुंटुरवा
साँचा में ढारे सोनार
       किसी बढ़ई द्वारा सौंदर्य को कुंदना अथवा सोनार द्वारा सौंदर्य को साँचे में ढालने की बात लोक जीवन मे ही हो सकती है। इस सौंदर्य को केवल महसूस किया जा सकता है। उसका वर्णन शब्दों में संभव नहीं है। उपभोक्तावादी सौंदर्य की वासनात्मकता और विलासता से दूर एक व्यापक सामाजिक सौंदर्य।
       दसमत कैना गाथागीत में श्रम की सृजनशील भूमिका को ही रेखांकित किया गया है। भले ही वह ऊपर से देखने पर प्रेमकथा दिखायी देती हो किन्तु इस प्रेमकथा में भी श्रमजीवी वर्ग के शारीरिक शोषण की प्रवृत्तियाँ ही उभर कर सामने आती है, बावजूद इसके श्रम की धारा अनवरत रूप से बहती हुई दिखायी देती है। आज भी इस गाथा की धारा में बहते हुये जनमानस शीतलता की अनुभूति में डूब कर श्रम के लिये फिर से ऊर्जा ग्रहण करने में सक्षम होता है। दसमत कैना का साहस और वीरता, सामाजिक सौंदर्य के रूप में अपने भौतिक सौंदर्य को स्थापित करने का प्रयास लोकजीवन की बहुमूल्य धरोहर है। खास कर आज के फैशन शो के युग में सौंदर्य के नाम पर स्त्री शरीर के नाप जोख के युग में सौंदर्य को भोग की वस्तु के रूप में स्थापित करने के युग में दसमत कैना के श्रमप्रसूत सौंदर्य को पुन: - पुन: स्थापित करते हुए श्रम की सत्ता को सामाजिक व्यवस्था का आधार बनाने की आवश्यकता है।
पता - '' गीतिका '' 
 दाउ चौरा, ख्‍ौरागढ़, 
जिला - राजनांदगांव (छ.ग.)

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