इस अंक के रचनाकार

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बुधवार, 11 सितंबर 2013

गरीबों की सुनो

मंगत रवीन्द्र
दुकालू सूरदास हर धरती म लाठी ल ठुक - ठुक मढ़ावत घर फिरिस ता ओकर गोसाइन सुपासा हर फरिका ल उघारिस। घर के कोन्टा म दसे खटिया म बइठत सुपासा ल कथे - परसू के दाई, एक लोटा पानी तो ला ... टोंटा हर सुखावत हे। घात गरमी ए ... जी हर अकबकागे। देख न देह ले पुटी कस पसीना हर थिपत हे। फेर अंगरक्खा के ओरमे छिंच ल अलगा के मुंह ल पोंछिस। तहां सुपासा हर पनिहा के पानी ल डूम के अपन धनीतर ल धराइस। ले, मुंह कान ल धो ले ... रा ... हा.. तो मुंह कान ल पाछु धोइहौ ... टोंटा म कांटा उठगे हे। पियास के मारे कहत ढक - ढक पानी ल पीइस। हाय, जी म जी आइस ... आगी बरसत हे। तहां सुपासा हर कांध म ओरमे झोला ल हेर के आज कै पइसा पाये हे कइके टमरत हे। कइसे आज झोला के पेंदी म दूए च ठन सिक्का दिखथे ? काला बतावौ सुपासा, गाड़ी म भीड़ चलत हे। बर बिहाव के दिन। डब्बा के ए मुड़ा ले ओ मुड़ा जावत नइ बनिस। पांव मढ़ाए के ठौर नइ रहिस। सोझे फिर गेंव, जा बदले दुकान ले उधार ले आ। सुपासा कहिस - कतेक ल उधार लानौं, मइरसा म दु दाना रहिस तेला राँधे हौं। ले बइठ, खा ले। तहां फेर सूरदास हर भगवान के नाव लेके पेट के भपका ल जुड़वारा देइस।
दुकालू अंधवा के दू ठन लइका - बोर्रा अउ परसू ... परसू बड़े बेटा आय। मांग जांच के पोसत हे। सुपासा हर सहज मनखे ए आँखी कान हमी मन कस बढ़िया। जतन पेखन करत हे। कहूं आना - जाना रहिथे त अपन धनी के अंगरी ल धर के ले जाथे। खंचवा डीपरा सब ल सूरदास ताड़ दारे हे। सुपासा पतिबरता नारी ए ... सुरू बिहाव म मइके के संग संगवारी मन ओला भरमाइन। निचट अंधवा रे, बिना आंखी कान के  ल पागे। सुनके सुपासा ल थोरिक पड़ोरा छोले कस तो लागीस फेर कहिस - मोर भाग म अइसे लिखे रहिस। चाहे कनवा रहै, चाहे खोरवा, पति परमेश्वर होथे। शराबी - जुआरी तो नोहे जउन पीके दनादन, रटारट तिरिया ल पीटथे। हारे म चढ़े गहना गुजरिया ल कड़ेरी कस तिरथे। एही म मोर डोंगा पार होही।
पाव जान पनही मिले,घोड़ा जान असवार।
करम जान मइके मिले, भाग जान ससुरार ॥
गंधारी तो अपन पति कारन जिंदगी भर आंखी म तोपा बांधे रहिस। सरवन के दाई - ददा तो अंधवा - अंधरी रहिन। मोर दू ठन बेटा। चंदा अउ सुरूज कस जग ल उजियार करहीं। अइसन तरह ले सुपासा अपन धरम अउ पति परेम म मगन हे। पति हर संसार ल नइ देखत हे त का होइस, अनुभव तो करत हे। दरपन ल नइ देख सकै ता संसार ल देखाथे तो .. मोर पति अंधवा कनवा ए, संसार ल गोठ के भाखा म देखा सकत हौ। धन अउ तन ले गरीब हन, पर हमर मन गरीब नइए। भगवान म भरोसा, वोहर तारै के बोरै। तोर हमर कहय ले कुछू नइ होवय। होथय ओकरे मन के -
तोर कहे ले मोर कहे ले, ककरो भाग बदलही का।
कतको धक्का मारी गाड़ी ल, बिन चक्का के चलही का॥
अइसन ढंग ले सुपासा बड़ धूरिहा ल गुन के कहिस हे। बड़ गुड़वंतीन ए ....।
परसू अउ बोर्रा, पारा के लइका मन संग खेलै। दाई हर बढ़िया मजा ले नहाखोरा के, चकचक ले तेल फूल चुपरा के स्कूल पठोवै। फुदुक - फुदुक रेंगना, पीठ म झोला, घुंघरालू - घुंघरालू चूंदी, जोगनी बरोबर आंखी। दूनों लइका दाई - ददा के परान ए। बेचारा के कुल परिवार नइए। अकेला अपन ददा के एकलौता ए। अउ ऊपर ले आंखी के अंधरा। अगास म चँदा - सूरूज, धरती के छाती म रकम - रकम के रूख बिरीछ, पहर - परबत, खेत - डोली,नदिया - नरवा, कुँआ - बउली, तरिया - पोखर, मोटर गाड़ी अउ किसीम - किसीम के जनवर, खई -खजाना, हाट - बाजार, मेला - मड़ई सब ओकर बर देखे म बिरथा ए ... गुनै, का करम करे रहे ता आँखी ले अंधवा हौं। ता दूनों टूरा ल भीख मांग के पढ़ा दौ। दुनिया ल देखही, संसार के सुख ल पाही, मोर बर तो सारा संसार कुलुप अंधियार ए। मोर जिंदगी तो टमराउल म चलत हे, लाठी म टमर के हाथ - पांव म टमर, घर दुवार, गली - डेहरी, जीनिस - जीनिस ल टमर के जानथौं। निचट कठुवा के बइठे हे त मनखे के भाखा ल ओरख के जानथौं के ओहर फलाना ए, बस एई हर मोर जिंदगी ए , चलत हे कुंवरहा बइहर कस। धीरे - धीरे, आगू - पाछू, भगवाने हे। कथे न - अंधवा बर दाई सहाव ....।
टेशन ले दू मील धूर सूरदास के गांव, बरछमुड़ा। झुलझुलहा ले सुपासा हर उठे रहै। घर अँगना करके एक मुठा भात राँधै, दू बाल्टी पानी भरै। कहै - आवव, नहा लौ। फेर सूरदास ह नहा = खोर के एक मुठा भात ल खाके भगवान के नाव ले लाठी टेकत टेशन आवै। पछिन्दर गाड़ी के सीटी परगे, टेशन म खड़े हे। टमर के गाड़ी के मुहाटा म समा जावै। फेर सूरदास के गाड़ी के मन के रउल म भागे लगै -
साहेब, बाबू, दाता धरमी हो।
एक रूपिया, दो रूपिया अंधे को .....।
अंधे का संसार अंधेरा, दाता तू ही ईश्वर मेरा ... फेर ये गीत ल गावै
गरीबो की सुनो, वो तुम्हारा सुनेगा।
तुम एक पैसा दोगे तो दस लाख देगा॥
बदकिस्मत बीमारे बुड्ढा, कदम कदम पर गिरता है।
फिर भी उन बच्चों के खातिर हाथ पसारे फिरता है॥
गरीबों की सुनो, वो तुम्हारा सुनेगा ....।
अइसे गावत ए मुड़ा ले ओ मुड़ा मांगत जावै। कोनो ओक र कटोरा म डार देवैं ता कोनो ओकर हाथ म मढ़ा देंय। कहूं सूरदास के आही भाखा ल सुन के चेत अंते कर लेंअ ता कहु जेब म चिल्हर हे तभो ले टमर के आगे बढ़ो कह देय, कह ते झन कहौ ओला तो आगे बढ़नेच हवै। चाहे भीड़ रहै, चाहे हेल्ला। पापी पेट के सवाल ये। दुनियां म दुख नईए रे संगी, गरीब समान ...। तीन चार ठन गाड़ी मांगै तहां फेर संझा के पछिन्दर म फिर जाये घर ...। अउ अगोरत परानी के अंचरा म दिन भर के लाज ल सिक्का के रूप म उलद देवै। सुपासा कांध के झोला ल हेर के फरिका तीर केभीती के खूंटी म अरझा देय। अरझे झोला खूंटी म रात भर तहां फेर बिहना सूरदास के कांध म अर्रझ ही।
मय पन्द्रा साल पहिली ट्रेन म रायपुर कालेज पढ़े जावौं। जाती बेरा नइ तो आती बेरा सूरदास के आही भाखा ल सुनीच डारौ। एक दिन तो मोर तीर के सीट मेर खड़ा होके मोरे ती हाथ लमावत कहिस - साहेब बाबू, दानी दाता धरमी हो। एक रूपिया, दो रूपिया अंधे को दो ... फेर गरीबों की सुनो ... गीत ल गाये लगिस। तरी खिसा म दू ठो सिक्का तो रहिस पर ए जी ल दया नइ अइस। भलुक मने मन कोसे लगेव - ये भिखारी लोग धंधा बना लिए हैं, और नहीं है मांगने की जगह ...। यात्रियों को परेशान करते हैं। कोई घिसटते हुए आते हैं तो कोई कटोरा फैलाता है। शरीर से बू आती है। फेर दरशन म आ गेंव - शायद ये ईश्वर के कबाड़ी खाने के लोग हैं, वहां जगह का अभाव है इसलिए यहां कीड़े - मकोड़ों की तरह रेंगने के लिए भेज दिए हैं। दोषी तो ईश्वर ही है, इन्हें बनाया क्यों ? बनाना ही था तो साबूत ही बनाते। गलाकर कोई ठोस चीज बना लेते मुक्ति मिलती। फेर संतोष मन ले गुनेव - भारत गरीबों का देश है। यहां भीख मांगने की सनातन परम्परा है, शायद इसलिए लक्ष्मण मस्तुरिया ने गाया है -
मोर संग चलव रे,
गिरे परे हपटे मन, परे डरे मनखे मन ....।
अइसने गुनत - सोचत टेशन हबर गेंओं, उतर के अपन कालेज के रद्दा धरेव।
बरछमुड़ा गांव म मोर पहिली पोस्टिंग ग्राम सेवक म होइस। सरकार के कागद ल धर के गेंव। सबले पहिली सरपंच ले मिलेव। सरपंच बड़ा दिलदार मनखे रहिस। मंझनिया के भोजन ल उहे करै। फेर कहेंव - सरपंच साहब, मय कुल परिवारवाला मनखे आंव, मोला घर दौ। आना - जाना नइ पोसाय। सरपंच कहिस - बिहना होवन दौ, तुंहर बर घर किराया खोजबोन। तहां चार पहर रात कटिस।
ग्राम सेवक साहेब बर दू - चार घर ल दहाइन। तहां सूरदास के घर कती गइन। बबा सूरदास आंट म बइठे रहिस। सरपंच कहिस - राम राम बबा ...।
- राम - राम, कोन अ ददा?
- मंय सरपंच मंगलू औं एदे हमर गांव म नवा साहेब आये हे तेकरे बर घर सोरिहावत आये हन। जानत हौं के तोर दूनों बेटा म नौकरी पा के शहर म हे। अगरिहा खोली हे। साहेब रही जातीस।
- का होही ददा, मोर आंखी कान तो दिखय नइ, जावा तुही मन, ओ छेव के खोली ल देख लिहौं। मन पसंद आही त साहेब हर रह जाही।
मंय तो जाते साद सूरदास ल चिन डारें ओ। ए तो ओई सूरदास ए जेन पन्द्रा साल पहिली ट्रेन म मांगै। मोला भक्का ले सुरता आगे, ओ दिन ओ घड़ी। मंय एक सिक्का देहे के औकात नइ रख सकौं, आज अपन सइघो घर ल सउपत हे। मोर मन के सूक्खाठुड़गा रूख म पानी रितोए कस लागिस मोला खाये करेला कस होगे। मोर कान म ओ गीत हर घेरी - बेरी गूंजे लगिस। आज समझगेंव कि कबाड़ी खाना के एक ठन नट समे म भारी काम आथे। मंय अपन गलत सोंच ले लज्जित हौ। मोला ठोमहा भर पानी म बूढ़ के मर जाना चाही। सही कहे हे के लड़ाई म दशरथ के रथ म ककई के अंगरी हर  काम आइस।
अतका म छेंव खोली ल देख के आगेन। सूरदास कहिस - कइसे ददा, मन अइस?मंय का गोठियातेंव। सरपंच कह दीस - इंहे रहही। हमर साहेब हर। फेर सूरदास कहिस - धन हे मोर भाग मोर घर साहेब रहही। लिटिया घर मंजूर पहुना, बिदुर घर केसो के सुवागत, अह .. आ जाबे बेटा, घर खाली परे हे। घर म दीया बरत रथे त ओकर उमर बढ़ जाथे। किराया का लिहौं दुनियाँ लंग लेवत - लेवत सारी जिंदगी पहागे। कहत बट्टï - बट्टï उपर ल निहारिस। जाना मोला देखे के कोसिस करत हे पर का ओहर देख पाइस होही ... ? नहीं ....।सूरदास जी के घर म रहत अब तीन महीना होगे। देवारी लगठागे। मंय गुनेव - अभी - अभी तो आय हौं ... घर जा के का करिहौं। परवार तो इहें हे, देवारी इहे मना लेवत हौं। फेर रह गेंव।संझा बेरा, मुनंगा रूख के नान्हें - नान्हें पाना ल बइहर हर थोर - थोर डोलावत रहिस। अंगना म कुरसी ल निकाल के पेपर पढ़त रहेंव। छत्तीसगढ़ी भाखा के गोठ निचट मन ल भावत रहिस। धन हे रे हमर अमरित रस कस झरत छत्तीसगढ़ी भाखा ...।
साग जिमीकांदा अमचुरहा कढ़ी।
अब्बड़ मयारू हे भाखा छत्तीसगढ़ी॥
भीतरे - भीतर मोर मन हर गुदगुदावत रहै। तिही बेरा सूरदास के दूनों बेटा, दूनों पत्तो नाती नतुरा संग टेम्पू ले उतरिन। दाई हर बेटा पत्तो नाती - नतुरा ल देख के कुलक भरिस अउ बाल्टी म पानी निकाल दीस। दू ठन साहेब बेटा, दाई - ददा के पांव परिन। पत्तो मन सास - ससुर के चरन छुइन। दाई हर नाती नतुरा के चुम्मा लेइस ....। अतके बेरा सूरदास मोला कहत हवय - साहेब, ये मन मोर बेटा ए, शहर म रथे, नउकरी करत हे। मय मया के रास ल देख के गदगद हो गेंव। फेर कान म ट्रेन के जुन्ना गीत - गरीबों की सुनो .... गूंजे लगिस। पेपर ल कुरसी म मढ़ा के लटï्ठा म गेंव। रामजोहारी करे ...। भइया मन अंगना के मचिया म बइठिन। मोला कुरसी म बइठे के इशारा करिन। बड़े भइया कहिस - आपे मन ग्राम सेवक औ ?- हां, आप कैसे जानेव ?- मितनहा कका गये रहिस न .... सब हाल चाल ल बताइस। भई सुनके अच्छा लगिस। ददा के आंट बइठइया संगी मिलगे। मुनाचाही करत रहही। तहं थोकिन रूक के कथे - लगथे एकाध बार आप मन कहूं देखे हंव?
महुं कहेंव - हां, लगत हे महुं आपो ल कहुं देखे हौं। फेर दूनों झन सुरता के धून म बुड़ गीन। हां ... हां, थोरकिन सुरता अइस 5 - 6 साल पहिली शहर म तीन दिनिया ट्रेनिंग म भेंट होय रहिस। हां ... हां, अब सुरता आगे। फेर का पूछौ ... चिन्हार निकलगे। अब तो दूनों के मया हर लीलागर नदी कस पानी बहे लगीस ... मया के धार झन अटकै .... बहते जाए ... बहते जाए ....।
सुनता के ए तरिया म, परेम के पुराइन फुलै।
गरीबों की सुनों अभी ले, मोर आँखी म झुलै ॥
मु.पो. - कापन अकलतरा
जिला - जांजगीर चाम्पा  6छ.ग.8़

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