इस अंक के रचनाकार

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बुधवार, 27 नवंबर 2013

जीत

शंकर पाटिल की मराठी कहानी - जीत
अनुवादक - डॉ. विजय शिंदे


मैदान में चारों ओर भीड़ उमड़ पड़ी थी। चारों तरफ  लोग ही लोग दिखाई दे रहे थे। पास - पड़ोस के गांवों के सारे लोग मुकाबला देखने के लिए मैदान में इकठ्ठा हो रहे थे।
जैसे ही समय नजदीक आने लगा। एक - एक बैलगाड़ी मुकाबले के स्थान पर आकर खड़ी होने लगी। गांव के तुका पाटिल की भी गाड़ी वहां आकर खड़ी हो गई। जैसे ही उसकी गाड़ी आ गई लोगों का हुजूम उसकी ओर उमड़ पड़ा। गाड़ी के चारों तरफ घेरा करके खड़े हो गए। उसकी ओर दर्शक पागलों की तरह देखने लगे।
तुका पाटिल ने गाड़ी को अपना बूढा हर्ण्‍या बैल जुतवाया था। हर्ण्‍या अपने साथी जवान खिलारी गाय और बैलों की  एक अच्छी नस्ल जो केवल पश्चिम महाराष्ट्र में पाई जाती है। सांड़ के साथ खड़ा था और लोग उसकी ओर आश्चर्य से बिना पलक झपकाएं देख रहे थे। असल में लोगों को मालूम भी था कि जवानी में हर्ण्‍या  ने कई मुकाबले जीते थे। उसकी दौड़ ताकत और खासियतें किसी से छिपी नहीं थी। यह सच था कि सारे इलाके में नाम कमाने वाला वह अकेला बैल था। लेकिन अब वह बूढा हो चुका था। उसकी पसलियां निकली थी। वह पूरी तरह थक चुका  था। चेहरे और शरीर पर अब तेज नहीं था। अपने साथी खिलारी जवान बैल के साथ कैसे दौड़ सकगा लोग चकित थे चिंतित भी हो रहे थे और तुका पाटिल को मन ही मन कोस रहे थे। वे समझ नहीं पा रहे थे कि इस पागल ने बूढे बैल को क्यों जोता है ?
धीरे - धीरे गाडिय़ों की संख्या बढऩे लगी और मुकाबले की  कतार में खड़ी होने लगी। कुछ बैल फूर - फूराने लगे। किसी के जवान सांड़ जैसे बैल डरकने लगे। कोई गर्दन झुका कर सींग हिला रहा था, और कोई खुरों से जमीन खुरच रहा था। हर्ण्‍या का साथी भी मचल रहा था। सारे लोगों की नजरें हर्ण्‍या पर टिकी थी। वे उसे टकटकी लगा देख रहे थे। हर्ण्‍या  की गति और दौडऩा उन्हें मालूम था। उसकी तेज रफ्तार से सभी परिचित थे। एक जगह पर ठहरी हुई बैलगाड़ी के साथ वह कभी भी शरारतें नहीं करता था। डरकता नहीं। सींग हिलाता नहीं। लेकिन एक बार दौडऩा शुरू हुआ और पहियों की खडख़ड़ाहट कानों पर पड़ी कि उसके पांव हवा से बातें करने लगते थे। पहियों की आवाज के साथ वह छलांगे भरने लगता था। उसे कभी भी हांकने की जरूरत नहीं पड़ती थी। समय आ भी गया तो वह अपने साथी बैल को भी खिंचते हुए दौडऩे लगता था!
हर्ण्‍या की दौड़ के बारे में किसी को शक नहीं था,  लेकिन अब उसकी उम्र हो गई थी। बाजार या मेले जाते वक्त एकाध झलक दिखाना अलग बात होती है और मैदान में उतर कर दौडऩा अलग। यह जिम्मेदारी वह कैसे निभाएगा,  इसकी चिंता दर्शकों को सता रही थी। और इधर तुका बेफिक्र था। हर्ण्‍या  भले ही बूढा हो पर उसका उस पर भरोसा था। लोग चिंतातुर होकर उसकी गाड़ी की ओर देख रहे थे और तुका बेफिक्री से चेहरे पर हंसी बिखराते उनकी ओर देख रहा था।
इशारा हो गया। बैलगाडिय़ां दौडऩे लगी,  पहियों की खडख़ड़ाहट शुरू हो गई। हर्ण्‍या के अंग - अंग में फूर्ति आने लगी। सभी को चिंतित करने वाला बूढा बैल जवान घोड़े के समान लंबी - लंबी छंलागे भरने लगा। उसके पांव जमीन पर ठहरने का नाम नहीं ले रहे थे। साथ वाले दूसरे खिलारी जवान बैल की बाजू पीछे पडऩे लगी। देखते ही देखते बाकी बैलगाडिय़ों को पीछे छोड़ते हुए बूढे बैल की गाड़ी आगे निकलने लगी। तूफानी रफ्तार से हर्ण्‍या अंतर कम करने लगा। दूसरे गाड़ीवान औंधे हो - होकर बैलों पर कोड़े बरसाने लगे। सभी लोग पागलों की तरह आंखें फाड़ कर देख रहे थे।
बैलगाडिय़ां दूर - दूर गई, आंखों से ओंझल हो गई। इधर लोगों की जबान पर हर्ण्‍या की बातचीत शुरू हो गई। जैसे - जैसे बैलगाडिय़ां वापस लौटने का समय हो गया वैसे - वैसे दर्शक गर्दन उठा - उठा कर देखने लगे। आस पास के सारे पेड़ दर्शकों से लदा - लद भर गए। दूर से ही गाड़ीवानों का शोर और पहियों की आवाज कानों पर पड़ रही थी। वैसे ही दर्शकों का मन मचलने लगा यह जानने  के लिए कि किसकी गाड़ी आगे है ? लोग टीलों पर, पेड़ों पर चढ़ - चढ़कर देखने लगे। उसी समय एक पेड़ से कोई जोर से चिल्लाया - बैलगाड़ी आ गई, बैलगाड़ी आ गई। बूढे बैल की ही!
दर्शकों की उत्सुकता चरम पर थी। वे मैदान में इधर - उधर दौड़ कर अपनी जगह पक्की करने लगे ताकि बैलगाडिय़ों को साफ  देख सके। मानो उनकी आंखों मे जान आ गई थी। हर्ण्‍या  को देखने के लिए लोग रास्ते पर दोतरफा खड़े हो गए थे। इतने में तुका पाटिल की बैलगाड़ी नजदीक आ गई। दो - तीन बैलगाडिय़ां उसके पीछे से आगे निकलने की कोशिश कर रही थी। कांटे का मुकाबला शुरू था। बैलों के नथुनों और मुंह से झाग टपकने लगा था। पहियों की खडख़ड़ाहट कानों में गुंजने लगी थी और हर्ण्‍या का ताकत लगा कर दौडऩा जारी था। पीछे से आ रही किसी भी बैलगाड़ी को वह आगे निकलने नहीं दे रहा था। मुकाबले का अंतिम लक्ष्य नजदीक आने लगा था। हर्ण्‍या के मुंह से निकलने वाली झाग सामने वाले दोनों पैरों पर गिरने लगी थी। उसे अपनी जान की भी परवाह नहीं थी। लक्ष्य था केवल जीत हासिल करना। पीछे से आने वाली बैलगाड़ी के पहियों की जैसे ही आवाज आती वैसे ही वह और अधिक छलांगे भरने लगता था। इसी जोश में तुका पटिल की गाड़ी लक्ष्य को लांघकर थोड़ा आगे जाकर रूक गई। वैसे ही लोगों के हुजूम ने हर्ण्‍या को घेर लिया। दर्शक गर्दन उठा - उठा कर हर्ण्‍या को देख रहे थे।
लेकिन हर्ण्‍या  अपनी ओर उमड़ी भीड़ से मोहित नहीं था, शांत था। उसने प्रतिक्रिया स्वरूप कान नहीं उठा। सींग नहीं हिलाए। गर्दन से जुआ हटाते ही वह धम से नीचे बैठ गया और एकाएक उसकी गुदा से खून की धार बहने लगी। हर्ण्‍या ने गर्दन लुढ़काई और अपने चारों पांवों को फैला कर करवट बदली। उसके  पिछले दोनों पैरों की  एडि़य़ा जमीन पर घिसने लगी। मिट्टी उछल कर ऊपर उठने लगी और गढ्ढा पडऩे लगा।

पता
देवगिरी महाविद्यालय, 
औरंगाबाद

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