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बुधवार, 26 फ़रवरी 2014

बिछुड़े प्रियतम की प्रीति पुरानी है

विद्याभूषण मिश्र 

नई फसल की पूजा होती आई है, मत भूलो पर धरती वही पुरानी है।
साँसों की चुनरी दुलहन ने बदली है, उस बिछुड़े प्रियतम की प्रीति पुरानी है।
टूट चुके दीपक , कितनी बातियाँ बुझीं
किन्तु पुरातन पीड़ा की आरती वही
रथ ने हैं श्रृंगार बदल डाले कितने
किन्तु पुरातन अब तक है सारथी वही
पथिक बदलते रहे और पथ भी बदले, किन्तु कहानी की गति वही पुरानी है।
साँसों की चुनरी दुलहन ने बदली है, उस बिछुड़े प्रियतम की प्रीति पुरानी है।
उस प्रियतम की प्रीति पुरानी है।
है व्याघ्र ने बार - बार पिंजड़े बदले
किन्तु वही स्वर भरता वीर पुरातन है
बिंधे अश्रु - मोती पीड़ा की माला में
पर सुधियों की डोरी वही पुरातन है।
छंद बदल डाले नव - नव नित कविता ने, किन्तु अर्चना प्यासी वही पुरानी है।
साँसों की चुनरी दुलहन ने बदली है, उस बिछुड़े प्रियतम की प्रीति पुरानी है।
उस प्रियतम की प्रीति पुरानी है।
फूलों की डोली बहार ने बदली
रंग बिरंगे आँचल बगिया ने बदले
बार - बार आशा के किसलय लहराये
द्वार हजारों भ्रमरों ने भी हैं बदले
श्रृंगार बदल डाले ऋतुओं ने आ आ के, किन्तु सदा फूलों की गंध पुरानी है।
साँसों की चुनरी दुलहन ने बदली है, उस बिछुड़े प्रियतम की प्रीति पुरानी है।
उस प्रियतम की प्रीति पुरानी है।
पतवारें बदलीं नौकाएं भी बदलीं
अरु धारा की उमर बदलती जाती है।
बार - बार चंचल मन ने निर्णय बदले
और चाल की दिशा बदलती जाती है।
है आशा की घटा सदा बढ़ती घटती, पर पीड़ा की बिजली वही पुरानी है।
साँसों की चुनरी दुलहन ने बदली है, उस बिछुड़े प्रियतम की प्रीति पुरानी है।
पता - 
पुरानी बस्ती, ब्राम्‍हा्रणपारा
मु.पो. - जाँजगीर - 495668 [छ.ग.]

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