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गुरुवार, 22 मई 2014

चरित्र का जामुन

मिलिन्‍द साव
- '' देखो भाई, मगर! तुम तो जानते ही हो, इस समय मैं जनता के सामने भाषण देने जा रहा हूं। इसलिए, ऐसी जगहों में भला चरित्र का क्या काम ?''
बन्दर और मगरमच्छ की वह पुरानी कहानी तो आप सबने सुनी ही हो होगी। जिसमें नदी किनारे पेड़ पर रहने वाला बन्दर नदी के एक मगर को नित्य पेड़ के मीठे जामुन खिलाया करता था और जब एक  दिन मगर को बंदर के मीठे दिल को खाने की इच्छा हुई ,तो वह उसे नदी के बीच ले गया और बंदर से उसके दिल को खाने की इच्छा प्रकट की। तब फिर बन्दर ने चतुराई से यह कह कर कि उसने तो अपना दिल नदी किनारे पेड़ पर रख छोड़ा है , मगर से अपनी जान बचाई थी।
यह कहानी भी ,जो हम आपको सुनाने जा रहे हैं  उसी बन्दर और मगरमच्छ के वंशजों की है। अब उनमें फिर से मित्रता कायम हो चुकी थी। बन्दर जंगल के लोकतंत्रीय शासन में जनता का निर्वाचित प्रतिनिधि यानी नेता था। वह मगर रुपी जनता को नित्य प्रति अपने आश्वासनों के मीठे जामुन खिलाया करता था। इससे मगर भी बड़ा प्रसन्न था। तभी,एक दिन मगर के मन में विचार आया कि जिस बन्दर के आश्वासनों के जामुन इतने मीठे हैं , उसके चरित्र का जामुन कितना मीठा होगा! उसने तय किया कि बंदर के चरित्र का स्वाद जरुर चखा जाए। वह मौके की तलाश में लग गया।
एक दिन बन्दर बोला - ‘‘मित्र ! मुझे नदी-पार एक जनसभा को सम्बोधित करने जाना है और मेरा हेलीकाप्टर खराब है। क्या तुम मुझे वहॉं ले चलोगे ? ‘‘ मगरमच्छ तो अवसर की तलाश में ही था। अत: वह झट तैयार हो गया।
बन्दर उसकी पीठ पर सवार हो गया और दोनों नदी पर चल पड़े। बीच नदी पर पहुँचने पर मगर ने अपने दिल की इच्छा बन्दर को सुनाई कि वह उसके चरित्र का स्वाद चखना चाहता है। यदि बन्दर ने उसे अपने चरित्र का जामुन खाने नहीं दिया तो वह उसे नदी में डुबा देगा। अब बंदर ने फिर वही पुरानी ट्रिक आजमानी चाही कि वह तो अपना चरित्र नदी के किनारे पेड़ पर छोड़ आया है! पर ,इस बार मगर ने साफ कह दिया कि वह उस पहले वाले मगर जैसा मूर्ख नहीं जो उसके झांसे में आ जाए। अब तो बंदर कुछ घबराया , फिर शीघ्र ही संयत स्वरों में कहने लगा-‘‘ देखो भाई, मगर! तुम तो जानते ही हो, इस समय मैं जनता के सामने भाषण देने जा रहा हूं। इसलिए, ऐसी जगहों में भला चरित्र का क्या काम ? अत: तुम विश्वास करो, मैंने वास्तव में अपने चरित्र को जामुन के उस पेड़ पर टांग रखा है। किनारे पहुँचते ही मैं उसे तुम्हे अवश्य ही दे दूंगा। और फिर राजनीति की इस लाइन में मुझे चरित्र जैसी फालतू चीज की जरुरत भी नहीं पड़ती।
आखिर मगर, बन्दर की बातों में आ ही गया। दोनों वापस लौटे। किनारे पहुंचते ही बन्दर कूद कर पेड़ पर चढ़ गया और मगर से कहने लगा -‘‘ अरे मगरमच्छ! तू सदा मूर्ख ही रहेगा। बेवकूफ ! मैंने तो अपना चरित्र उसी दिन बेच दिया था,जिस दिन मैंने राजनीति में अपने कदम रखे। ‘‘ निराश मगर मुंह लटका कर नदी में वापस लौट आया।
पता 
विवेकानंद नगर, राजनांदगांव ( छ. ग.)

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