इस अंक के रचनाकार

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सोमवार, 9 नवंबर 2015

डॉ. पीसीलाल यादव के तीन छत्‍तीसगढ़ी गीत

सुरुज के अगोरा

नान्हे ले बड़े करिस, अपन दूध ल पिया के।
महतारी अब पछतावत हे, कपूत ल बिया के।।
    धॉय - धॉय चलत हे जंगल में गोली
    कहाँ नंदागे कोजनी मया के बोली
    मनखे ह मनखे के काबर होगे बइरी?
    रंग - गुलाल के जघा रोज लहू के होली।।
कोजनी हतियारा मन ल, कोने राखे हे जिया के।
महतारी अब पछतावत हे, कपूत ल बिया के।।
    लहू के छिंटका ले देख, भुईया हर लाल हे,
    रुख - राई मौन, खड़े बड़का हर सवाल हे।
    थर - थर कांपत हे चारों मुड़ा मनखे पन,
कइसे बॉचय कोनो खड़े आगू - पाछू काल हे।।
होत नवा - नवा जुलुम, रोज - रोज खिया के,
    महतारी अब पछतावत हे, कपूत ल बिया के।।
    आँखी पथरा के अब, सुरुज के अगोरा में,
    सपना हर राख होगे, जिनगी के जोरा में।
    बिन कसूर के कसूरवार दूनो डाहर ले भइगे,
लइका दूध बिन मरत, महतारी के कोरा में।।
    अंजोर थर - थर कांपे, बाती बुतात दिया के।
    महतारी अब पछतावत हे, कपूत ल बिया के।।
    जी कलकुत कतका ये, गोठियावन गोठल,
    दाना कुछु परय नहीं, भइगे जुच्छा फोकला।
    आर या पार हो जतिस जिनगी तब बने,
    जीयत ल मारत रंग - रंग सरकरी चोचला।
छाती म टेंकाय बँदूक, होंठ ल राखे सिया के।
महतारी अब पछतावत हे, कपूत ल बिया के।।

काँटा ल काँटा निकाले

फोहई म दे के परलोखिया, लूटत काठा - काठा।
ओखर सब कन्हार मटासी, हमर भाग म भाँठा।।
पर बुधिया होगे सियनहा,
पर के बुध म जी बोहागे।
घोलंड - घोलंड पांव परत में,
माथा हर घलो खियागे।।
लेवना - घीव पोगरी ओखर, हमला मिले न माठा।
फोहई म दे के परलोखिया, लूटत काठा - काठा।।
दाना - दाना बर लुलवावन,
लहू - पछीना ओगरा के।
बाहिर वाले मालिक बन गे,
हमरे भुईंया ल पोगराके।।
जांगर पेरत कनिहा टोरत, हमर हाथ परगे घांठा।
फोहई म दे के परलोखिया, लूटत काठा - काठा।।
काँटा ल काँटा निकाले,
फेर काँटा होगे सरहा।
मन मिला के घात करे ओ,
घाव होगे जीव परहा।।
चेतलग होवय ल परही अब, काबर करम परगे ठाठा।
फोहई म दे के परलोखिया, लूटत काठा - काठा।।
भाग भरोसा काबर रहना,
करम ल दोस का देना।
जोर - जुलुम बर जोम दे,
हक अपन बस कर लेना।।
हुॅड़रा दॅवत पइधे सरलग, कोठा ले झींकत पाठा।
फोहई म दे के परलोखिया, लूटत काठा - काठा।।
अइसे फूल बनो तुम 

महर - महर फूल करथे, जइसे फुलवारी म रे।
रिग बिग दिया बरथे, जइसे देवारी म रे।।
अइसे फूल बनो तुम, तइसे दिया बनो तुम...।
       भाग भरोसा कुछु नई मिले,
       करम करे म मिलथे बिरो।
       गिर के उठव उठ के चलव,
       चाहे रद्दा में कतको गिरो।।
जंगल - परबत दऊड़त हे, जइसे नंदी धारी ह रे।
तइसे धार बनो तुम संगी हुसियार बनो तुम।।
       रुप - रंग के पूजा नई होय,
       पूजे जाथे मनखे के गुन ह।
       दया - मया संग पर के सेवा,
       जिनगी में फलित होथे पुन ह।।
जग - जिनगी ल साँस मिले, जइसे पुरवाही म रे।
तइसे हवा बनो तुम, तइसे दवा बनो तुम।।
       मरना सब ल खचित एक दिन,
       फेर मरना अइसे मरो तुम।
       अपन जननी जनम भूमि बर,
       जीव निछावर करो तुम।।
चंदा ले निरमल हो जबे, जइसे रात कारी ह रे।
तइसे चंदा बनो तुम, तइसे सुरुज बनो तुम।।

पता
साहित्य कुटीर
गंडई
जिला - राजनांदगांव छ.ग.

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