इस अंक के रचनाकार

आलेख दान देने का पर्व छेरछेरा / सुशील भोले भारत में लोक साहित्य का उद्भव और विकास / डॉ.सुशील शर्मा राज धरम यहै ’सूर’ जो प्रजा न जाहिं सताए / सीताराम गुप्ता स्वामी विवेकानंद और राष्ट्रवाद / मधुकर वनमाली मड़वा महल शिव मंदिर भोरमदेव / अजय चन्द्रवंशी शोघ लेख भक्ति में लालसा का लिंग निर्धारण, पश्चिमी ज्ञान मीमांसा और मीरा / माधवा हाड़ा कहानी इक्कीस पोस्ट / डॉ. संजीत कुमार जिन्‍दगी क्‍या है / बलवीन्‍दर ' बालम ' लघुकथा स्टार्ट अप / विनोद प्रसाद सबक / श्रीमतीदुर्गेश दुबे मदद / रीतुगुलाटी ऋतंभरा बिल्ली / सुनिता मिश्रा सूत्र / सुरेश वाहने छत्तीसगढ़ी व्यंग्य झन्नाटा तुँहर द्वार / महेन्द्र बघेल गीत / गजल/ कविता खुशियों का संसार बना लें (बाल कविता) ओंकार सिंह ’ ओंकार’ बेबसी को दर्द की स्याही में / गजल/ प्रिया सिन्हा ’ संदल’ जड़ से मिटाओ/गीत/ अशोक प्रियबंधु, सहरा में जब भी ... / गजल/ स्वरुप , जब - जब हमनें दीप जलाये / गीत / कमल सक्सेना कवि एवं गीतकार आशा की उजियारी / गीत / जनार्दन द्विवेदी बगुला यदि सन्यासी हो तो समझो /गजल/ नज्¸म सुभाष कितना कुछ कह रहा है .../ गजल / पारुल चौधरी अपने - अपने ढंग से ही सब जीते हैं /नवगीत /जगदीश खेतान आदमियत यदि नहीं तो .../कविता/ राघवेन्द्र नारायण मिले थे यक - ब - यक/ गजल / किसन स्वरुप अनदेखे जख्¸म/ गजल / गोपेश दशोरा छन्द युग आएगा/ गीत/ डॉ. पवन कुमार पाण्डे प्यारी बिटिया / गीत/ नीता अवस्थी इश्क में मुमकिन तो है ...गजल/ तान्या रक्तिम अधरों के पंकज उर / गीत/ संतोष कुमार श्रीवास हे वीणा वादिनी माँ / गीत /स्वामी अरुण अरुणोदय प्रेरणा/ कविता/ नरेश अग्रवाल, बसन्त फिर से .../ नवगीत / डॉ सीमा विजयवर्गीय नवीन माथुर पंचोली की रचनाएँ तोड़ती रहती हर रोज/ कविता/ कविता चौहान कितना सूना है जीवन / कविता/ उषा राठौर उम्मीदों की झड़ी से लब दब गया किसान / कविता/ सतीश चन्द्र श्रीवास्तव परेश दबे ’साहिब’ की ग़ज़लें पाँव में छाले हैं ... / कविता/ यशपाल भल्ला बुरे हैं भले हैं ... कविता/ एल एन कोष्टी पीली पीली सरसों फूली/ नवगीत /हरेन्द्र चंचल वशिष्ट तुम/ नवगीत जिंदगी क्या थी .../ नरेन्द्र सिंह दीपक लाल देवेन्द्र कुमार श्रीवास्तव की कविताएँ केशव शरण की कविताएं मोह - गँधी गीत बन/गीत/ कृष्ण मोहन प्रसाद ’मोहन’, चाहता वो हमें इस दिल में .../ गीत/ प्रदीप कश्यप आत्ममंथन / गीत / दिनेश्वर दयाल मुस्कुराया बहुत / गीत/ किशोर छिपेश्वर ’ सागर’ इजहार / गजल /मधु’ मधुलिका’ मदारी और बंदर काका / बाल गीत / कमलेश चन्द्राकर मन का भटका कविता राजेश देशप्रेमी आया जाया करो / कविता / ऋषि कुमार पुस्तक समीक्षा संदेशो इतना कहियो जाय :कहानी संग्रह .

शुक्रवार, 24 अगस्त 2018

एक था कागा

    
कहानी   
एक था कागा
दीर्द्घ नारायण

जन्म रू १९६८

महत्वपूर्ण पत्रा.पत्रिाकाओं में कहानियां प्रकाशित।
रक्षा संपदा कार्यालयए ११६ए ताज रोडए आगरा छावनी
मोण् ०९४११११५१११
  

मध्य नवंबर का यह समयए दिल्ली में तो जैसे शाम को आसमान से गुलाब की वर्षा होती हो। ऐसे में अपने जेण्एनण्यूण् कैंपस का समां ही जुदा है। आठ महीने की शरीर थकाऊ और मन ऊबाऊ उष्ण कटिबंधीय दीर्द्घकालीन गर्मी के बाद ही तो इस निरालेपन का शुभ आगमन हुआ है। ऐसा गुलाबी मौसम छोड़कर कौन जाए चंद्रेश के गांवए वह भी बिहार के सुदूरवर्ती क्षेत्रा मेंए नेपाल और बंगाल की सीमा से लगे कहीं द्घोर देहात में। वैसे भी मुझे आगामी मार्च तक श्पर्यावरण और पक्षीश् विषय पर विभाग में थीसिस जमा करना हैए मेरी गाड़ी तो पहले से ही एक साल लेट है। कृपया यह ख्वाब.खयाली बिलकुल मत पालिए कि कैंपस की रंगीनियां मुझे चंद्रेश के गांव जाने से रोक रही हैंए तदनुरूप यह कहानी भी कैंपस आशिकी में सराबोर होने का भ्रम मत पाले। समझदार के लिए इशारा ही कापफी होता हैए श्पर्यावरण और पक्षीश् जैसे शुष्क टॉपिक पर रिसर्च करने वाले को कौन भला लिफ्रट देगी! दरअसल वह दो दिनों तक मेरे पीछे पड़ा रहाए मुझे अपने गांव ले जाने की अनवरत जिद लिए.श्तुम विश्वास करो मेरे गांव में एक अजीब बात हो गई हैए मेरे साथ तुम भी चलोए देखें तो हकीकत क्या है।श् मेरे दो बार मना करने के बाद तो वह श्बेस्ट ेंडश् की नाव पर सवार हो लिया.श्हो सके तुम्हारे टॉपिक पर एकाध पेज जोड़ दे यह अजीब सी द्घटनाण्ण्ण्श् द्घटना चाहे जो भी हो मेरे टॉपिक पर वह क्या खाक हेल्प करेगीए चंद्रेश के टॉपिक श्इक्कीसवीं सदी में सामाजिक जागरूकता की दिशाश् में भले ही कुछ एड हो जाए। गांव.समाज में द्घटी कोई द्घटनाए परिवर्तन आदि समाजशास्त्रा के आलिंगन में ही तो जाएगा!
वैसे भी चंद्रेश का श्अजीबश् शब्द पर दबाव बनाकर बोलना मेरे अंदर कौतूहल कमए गुदगुदी ज्यादा पैदा कर गयाए ग्रामीण भारत में हो रहे परिवर्तन के बारे में सुनी.कही गई बातें मेरे मन में गुदगुदी का संजाल और कर्ण व नेत्रा स्वाद की अपार संभावनाएं उछाल रही थीं कि आजकल गांव में तो पंचायतें लगती रहती हैंए खासकर छोरा.छोरी के मुद्दे परए रस ले.लेकरए कोई लड़का.लड़की अरहर के खेत में लिपटे हुए रंगे हाथ पकड़े गए होंगेए पिफर पंचायत हुई होगी और अब दोनों पक्ष आमने.सामने होंगेए एक दूसरे के खून के प्यासेण्ण्ण् या पिफर किसी युवक.युवती में महीनों.वर्षों से लुका.छिपीए गुत्थम.गुत्थी चल रही होगीए अब तो युवती कुछ श्महीने सेश् होगीए शादी को लेकर रस्साकस्सी पंचायत दर पंचायत चल रही होगीए लड़की ऊंचे द्घराने की होगी तो लड़के वाले शादी के पक्ष में गोलबंद होंगे जबकि लड़की वाले लड़के को कठोर दंड के लिए ऐड़ी.चोटी एक किए होंगे या अगर लड़का उच्च कुल का होगा तो लड़की वाले शादी के लिए अड़े होंगे जबकि लड़के वाला ले.देकर मामला रपफा.दपफा करने का तिकड़म भिड़ा रहा होगाण्ण्ण् सो पूर्णियां.अररिया के लिए सीमांचल ट्रेन में बैठते ही अपनी उत्सुकता काबू में न रख पाने के वशीभूत मैंने पूछ ही लिया.श्रे चंद्रेशए उस अजीब सी बात का थोड़ा क्लू तो बताओए मैं जान तो सकूं कि आखिर मामला क्या हैण्ण्ण्श् मुझे जरा भी शक नहीं था कि मामला छोरा.छोरी से हट कर होगा.श्देखो यारए बात ऐसी है कि मेरे गांव बकैनियां में दो टोला है.पूरब टोला और पश्चिम टोलाए दोनों टोला के बीच कापफी मतभेदए तनातनी है और हिंसक वारदात तक हो चुकी हैए पुलिसण्ण्ण्।श् श्अच्छा.अच्छाए ठीक.ठीक हैए मैं समझ गयाश्.मैं अंदर से कांप उठा थाए न जाने ये चंद्रेश मुझे भी कहीं पुलिस के लपफड़े में न द्घसीट ले। मेरे बोलने के अंदाज से वह समझ गया कि मामले की प्रकृति को जैसे मैंने समझ लिया हैए इसके बाद वह चुप लगा गया। ट्रेन अलीगढ़ पार कर चुकी थीए मैं चुपचाप अपनी बर्थ पर सांस अंदर.बाहर करने लगाण्ण्ण्।
श्बस अब आधा किलोमीटर ही रह गया हैए वह देखो सामने बांस.बिट्टीए उसी के पार तो है मेरा गांव बकैनियांश्.पांच किलोमीटर पैदल चलते.चलते थक जाने की शिकायत का सम्मान करते हुए चंद्रेश ने उंगली के इशारे से आस बंधाईए जैसे बच्चे को लड्डू देकर दौड़ा रहा हो। नजर उठाकर आंखें गोल करके मैंने पाया सामने बांसों के झुरमुट की लंबी श्रृंखला धरती के गर्भ से निकल रही हैए जैसे.जैसे नजदीक आते गए बांस के झुरमुट धरती से निकलकर थोड़ा.थोड़ा बड़े होते गए। दूर से सपाट और काली दिखने वाली झुरमुट की श्रृंखला नजदीक आने पर सद्घन और हरित पट्टी सी दिखने लगी। झुरमुट में प्रवेश करते ही मुझे संकल्प लेना पड़ाए दिल्ली वापस लौटते ही बांस के इस कदर सद्घन और दीर्द्घतम झुरमुट को गिनीज बुक ऑपफ वर्ल्ड रिकार्ड में दर्ज कराने के लिए वृत्तचित्रा बनाऊंगा। बांस.बिट्टी के बीच.बीच में सेमल के विशालकाय पेड़ आसमान से बातें करने में मशगूलए जैसे धरती से आकाश तक गांव की कड़ी पहरेदारी कर रहा हो। झुरमुट खत्म होते ही पीपल के उर्ध्वगामी और बरगद के क्षितिजगामी प्रकृति के दसियों पेड़ हवा के साथ अठखेली करने में मग्न थेए जैसे हवा में ऑक्सीजन का स्प्रे कर रहा हो। गांव की सीमा पर तैनात बलशाली पेड़ गदाधारी सदृश्य दिख रहे थे। आगे बढ़ने पर आम के कई बगीचे सड़क के किनारे.किनारे शांतचित्त पड़े हैंए जैसे इनकी तैनाती हुई हो। सड़क के एक ओर बच्चों के बालसखा जामुन और बेर के अनगिनत पेड़ अपने कोमल पत्ते लहरा रहे हैंए जैसे ग्राम.आगंतुकों का गर्मजोशी से स्वागत कर रहे होंए उसके बाद मंदिर जैसे गांव का रक्षकए मंदिर से लगे विशाल तालाब जैसे गांव का पोषकए पिफर कुछ आगे ऐतिहासिक कुआं जैसे गांव का पालक! अब मैं बीच गांव मेंण्ण्ण् झोपड़ियांए पुआल केए टीन के ऊंचे.ऊंचे द्घर और इक्के.दुक्के पक्के मकान! कुल.मिलाकर पफकीरी.गरीबी और कामचलाऊ आय वर्ग का बेजोड़ कोलाजण्ण्ण् थोड़ा आगे बढ़ने पर सामने विद्यालय भवन श्ण्ण्ण्स्वाहाण्ण्ण्श्.कानों में नारे जैसा मंत्राधारित समवेत स्वर पड़ा। श्स्कूल में कुछ हो रहा है क्याश् .मेरी कौतूहल की पोटली खुलने लगी। यगांव की सीमा में प्रवेश करते ही वातावरण की पिफजा ने गुदगुदी की हर संभावना मिटा डाली थीद्ध चंद्रेश ने गर्व से कहा.श्अजीब बात का परिणाम दिख रहा है।श् सामने से आती हुई दो बुजुर्ग महिला के मुंह से चंद्रेश के लिए आशीर्वाद झरने लगा. श्जुग.जुग जियो बेटाए अच्छा हुआ तुम आ गए बेटाए दुनिया की भलाई में भागीदार बनो।श् पिफर तो चौराहे से मेरे कदम तेजी से स्कूल प्रांगण की तरपफ बढ़ने लगेए मानो द्घटना स्थल पर तरंग गति से पहुंच चुका मेरा मन अदृश्य डोरी से मुझे खींच रहा हो। लेकिन उसने मुझे पीछे से खींच लिया.श्अरे बु;ूए पहले द्घर चलो नहा.धोकर शु; होकर ही वहां चलना ठीक रहेगा।श् तब कहीं मन की डोर छूटी.श्लगता है मामला धर्म.प्रकृति से जुड़ा है।श्
आधा.पौने द्घंटे बाद हम दोनों स्कूल प्रांगण में भारी भीड़ के भाग थे। एक खास केंद्र की ओर मुंह किए हजारों लोगों की वृत्ताकार भीड़ जोश से लबालब थी या गुस्से से सराबोर थीए यह निश्चय कर पाना दुविधापूर्ण था। उस खास केंद्र से आकाश की ओर धुएं के साथ मंत्राोच्चारण का अविरल प्रवाह न जाने कब से जारी था. ण्ण्ण्एण्सीण् वाले स्वाहाण्ण्ण् वाशिंग मशीन वाले स्वाहाण्ण्ण् सीण्एपफण्सीण् पर जिंदा रहने वाले स्वाहाण्ण्ण् ओजोन परत खाने वाले स्वाहाण्ण्ण् कार्बन बढ़ाने वाले स्वाहाण्ण्ण् तापमान बढ़ाने वाले स्वाहाण्ण्ण् प्रदूषण पफैलाने वाले स्वाहाण्ण्ण् धरती मां का भक्षण करने वाले स्वाहाण्ण्ण् मैंने गौर कियाए मंत्राोच्चारण सुनकर चंद्रेश के रोंगटे खड़े होने लगे थे। वह न उछलते हुए भी मुझे उछलता हुआ दिखने लगाए वृत्ताकार भीड़ के वलय में वह तेजी से द्घूमने लगाए मुझे शक होने लगा क्या वह जेण्एनण्यूण् में शोध करने वाला वही चंद्रेश हैए मुझसे रहा न गया.श्अरे चंद्रेश यह क्या ड्रामा चल रहा हैए श्सीण्एपफण्सीण् स्वाहाश् ये सब क्या है।श् वह खुद आश्चर्यचकित था.श्मुझे भी पूरी बात नहीं पताए सिपर्फ इतना पता था कि गांव के दोनों टोलों के बीच उसी कागा को लेकर संद्घर्षपूर्ण स्थिति आ गई थीण्ण्ण्श् मेरे मुंह से आश्चर्यपूरित शब्द निकल पड़ा.श्काअ गाआण्ण्ण् कैसा कागाण्ण्ण्श् इतने में चंद्रेश भीड़ में एक सुराग पाकर अंदर समाने लगाए भीड़ में खोने से पहले वह बोलता गया.श्तुम बाहर ही रुकोए मैं अंदर जाकर देखता हूं क्या बात है।श् उस भीड़ के बाहर मैं अकेला व्यक्ति था जो न तो खास केंद्र की ओर उन्मुख था और न ही मंत्राोच्चारण में शामिल था। लेकिन इस वातावरण ने शीद्घ्र ही मुझे भी अपने आवरण में ले लियाए मैंने पाया मेरे शरीर के रोंगटे भी अपनी पोजीशन छोड़ने लगे हैंण्ण्ण् अब मैं उस वातावरण में सम्मिलित हो चुका थाए मैंने अपने.आपको अभागा पाया जो भीड़ में एक सुराग तक नहीं खोज पा रहा था। हारा हुआ सा चारों ओर नजरें दौड़ाने लगाए कोई दयावान तो मिले जो मुझे श्स्वाहाश् केंद्र तक ले जाकर मुझे अधोगति से उबारेण्ण्ण् श्रे उस टीले में पिरामिड सा क्या बन रहा हैश्.मैंने देखाए उत्तर की ओर कोई डेढ़.दो सौ मीटर की दूरी पर बरगद पेड़ से सटी कोई आकृति खड़ी हो रही हैए निर्माण कार्य में लगे सैकड़ों लोग कोई नारा भी बुदबुदाए जा रहे हैं। मैंने पायाए मैं तेज कदमों से उधर ही जा रहा हूंए नजदीक आते जाने पर नारा बिलकुल स्पष्ट होता गयाण्ण्ण् कागा अमर रहेण्ण्ण् कागा विलुप्त कराने वाले जागोण्ण्ण् पक्षियों को नष्ट करने वाले मुर्दाबादण्ण्ण् कागा अमर रहेण्ण्ण् जब तक सूरज चांद रहेगाए कागा तेरा नाम रहेगाण्ण्ण् नजदीक आकर मैंने पायाए तीन तिरछी दीवारों को जोड़कर पिरामिड आकृति ऊपर उठ रही है। उधर सीण्एपफण्सीण् स्वाहा इधर कागा अमर रहेए मुझे लगा मैं धरती नामक ग्रह पर न होकर किसी अन्य खगोलीय ग्रह पर पहुंच गया हूं। मैं टकटकी लगाए कभी वृत्ताकार भीड़ को देखताए कभी उठते पिरामिड कोण्ण्ण्
श्ओजोन परत खाने वाले स्वाहाण्ण्ण् तापमान बढ़ाने वाले स्वाहाण्ण्ण् पक्षियों को नष्ट करने वाले मुर्दाबादण्ण्ण् कागा अमर रहेण्ण्ण् धरती मां का भक्षण करने वाले स्वाहाण्ण्ण् कागा को लुप्त करने वाले जागोण्ण्ण् कार्बन बढ़ाने वाले स्वाहाण्ण्ण् कागा अमर रहेण्ण्ण्श् जैसे मंत्राोच्चारण और नारा अब क्रम.भंग होकर मेरे कानों में पड़ने लगाण्ण्ण् इधर सभी लोग पिरामिड निर्माण में लगे थे और उधर वृत्ताकार भीड़ का हर व्यक्ति स्वाहा.केंद्र की ओर उन्मुख थाए एक भी व्यक्ति अकारण नहीं था जो मेरी जिज्ञासा यबल्कि द्घबराहटद्ध शांत कर सकेण्ण्ण् श्ओ गॉडश्.मेरी जान में जान आईए पीछे सड़क के किनारे पीपल पेड़ के नीचे बैठे एक बुजुर्ग ने मुझे दोनों हथेलियों के इशारे से बुलाया। मैं आजाद कैदी सा उधर भागा।
श्बेटाए तुम्ही चंद्रेश के साथ दिल्ली से आए होए बहुत बड़े विद्वान लग रहे होए आओ बैठोण्ण्ण्श् मुझे अवाक देखकर वह हंस पड़ा.श्अरे बेटाए यहां पर इसी खादी के गमछे पर ही बैठना होता हैए समझो धरती मां का आसन है।श् मैं उसी गमछे में उससे सटकर बैठ गयाए लेकिन मेरी नजरें स्वाहा केंद्र और बढ़ते जा रहे पिरामिड के बीच दौड़ रही थींए अजनबी को जिज्ञासु जान वह बुजुर्ग शोकजनक अंदाज में बोल उठा.श्यह तो हम गांव वालों का दुर्भाग्य हैए हमारे गांव तो क्या पूरी धरती का संकट हैए इस गांव का एकमात्रा कागा थाए उसने भी शनिवार को प्राण त्याग दिएए पता नहीं इस दुनिया में और कितने कागा बचे हैं.बचे भी हैं कि नहींए अगर हैं भी तो न जाने कहां
होंगेश्.बोलते.बोलते वह आसमान की ओर ताकने लगा। उस अजूबेपन की अबूझ पहेली मुझ पर टनों वजन डालती जा रही थीए सो मैं बीच में ही हड़बड़ाकर टपक पड़ाए बुर्जुग के बोलने के अंदाज से बिलकुल अलग.श्उधर कागाए इधर स्वाहाए आखिर माजरा क्या हैण्ण्ण्।श्
श्क्या तुम्हें चंद्रेश ने नहीं बतायाश्.वह मेरी आंखों में डूबता हुआ जान पड़ा।
श्मुझे सिपर्फ इतना भर पता है कि कोई अजीब सी बात हो गई हैश्. मैं सचमुच अबूझ और भोला सा बना हुआ था।
श्अजीब सी बात नहींए पूरी धरती में गजब होने वाला हैण्ण्ण्।श् वह उदास सा हो गयाए पिफर स्वतः लंबी सांस ली.श्इस गांव के दो टोले हैंए एक पश्चिमी बकैनियां और एक पूर्वी बकैनियां पूरे गांव में वर्षों पहले तक रंग.बिरंगे पक्षियों के साथ.साथ कई कागा भी थेण्ण्ण् पर पिछले दो.ढाई साल से सिपर्र्फ एक ही कागा पूरे गांव की मान.मर्यादाए इज्जत.प्रतिष्ठा को बचाए हुए थाण्ण्ण् विस्तार से तो नहींए संक्षिप्त में ही कागा कथा सुन लोण्ण्ण्।श्
पूर्वोत्तर बिहार का अररिया जिलाए यानी रेणु जी का श्मैला आंचलश् आज तक वैसा का वैसा हीए धरी चदरिया। इसी आंचल का एक गांव बकैनियांए दो टोलों में विभाजित.पूर्वी टोला और पश्चिमी टोलाए दोनों के बीच विभाजक रेखा.एक मृत और उथली धार जो अब धान का कटोरा हैए कहते हैं दो सौ साल पहले यहां भयावह नदी बहती थी। यूं तो इस गांव तक कोई सड़क नहींए बिजली नहींए टेलीपफोन नहींए ऊपर से नीम करेला.वृहद ग्राम पंचायत के एक किनारे होने के कारण ग्राम पंचायत में कोई प्रभाव नहींए पर प्रकृति मेहरबान रही है.उपजाऊ जमीनए जमीन के मात्रा बीस पफीट नीचे अगाध जलए जमीन के ऊपर स्वच्छ आकाशए गांव के चारों ओर बड़े.बड़े हरे.भरे पीपलए पाकड़ए सेमलए बरगदए जामुन के पेड़ए बांस की लंबी हरित पट्टीए बीच.बीच में आम.अमरूद के बगीचेए प्रकृति के गीत गाते मैनाए गौरैक्षयाए कचबचियाए तोताए कबूतरए कौवाए कोयलए कठपफोड़वाए बगुलाए नीलकंठण्ण्ण् पर्व.त्योहारए रीति.रिवाज की अटूट श्रृंखला यानी संपूर्ण सुखए भरपूर उल्लासए अनंत उमंग में डूबा गांव बकैनियां। कोई दस वर्ष पूर्व गांव की दुनिया से गरुड़ धीरे.धीरे विलुप्त हो गयाए सारे गांव में कोलाहल.शोक की अव्यक्त धाराए पर गांव वालों ने प्रकृति की माया समझ गरुड़ की विदाई को पचा लिया। पिफर गांव और गांव के लोग चलते रहे अपनी धुन में।
दो साल पहले तक गांव में असंख्य कौवों के साथ कागा की भी पर्याप्त संख्या थीए कागा यानी पौराणिक पक्षियों में से एकए गांव की आत्मा का एक अभिन्न अंग। किसी के श्रा; के दिन तालाब किनारे क्रिया.कर्म संपन्न होने के बाद पितर को लगाया हुआ दही.चूड़ा.लावा का भोग कौवा.कागा के माध्यम से ही तो मृतात्मा तक पहुंचता है। पितृ पक्ष में तो कौवा.कागा हमारे पितर के एकमात्रा दूतए संवादकए और भोज्य पदार्थ चढ़ावा वाहक होते हैं। लेकिन नमान तो कौआ से नहीं हो सकता न! वह तो सिपर्फ कागा के लिए सुरक्षित.संरक्षित हैए कौवा तो इस कार्य के लिए कतई स्वीकार्य नहीं है।
नमान पर्व से कागा मौलिक रूप से जुड़ा हैए यह इतिहास के किस काल से चली आ रही है पता करना मुमकिन नहीं। नमान पर्व या प्रथा अगहन महीने में मनाई जाती है इस क्षेत्रा में। इसे शु; रूप में लवण ही कहते हैंए धान की नई पफसल कटने के बाद नए चावल के साथ नमक मिला कोई भी व्यंजन खाना वर्जित है जब तक कि अगहन में नमान यानी लवण पर्व या अनुष्ठान संपन्न न कर लिया जाए। यह एकमात्रा ऐसा वार्षिक पर्व या अनुष्ठान है जिसकी कोई निश्चित तिथि नहीं होतीए बल्कि अगहन महीने में हर परिवार अपनी सुविधानुसार किसी भी तिथि में यह अनुष्ठान संपन्न करता है। दिन भर विभिन्न चरणों में चलने वाली मनोरंजक व उल्लासमय प्रक्रिया के बाद रात को देवी.देवता को नए चावल का प्रसाद चढ़ाते हैंए पिफर नमकयुक्त भोजन ग्रहण करते हैंए सामूहिक रूप से। सबसे महत्वपूर्ण चरण होता है प्रातःकाल वाला जब कुंवारी कन्याएं केले के पत्ते में दही.चूड़ा व प्रसाद लेकर कागा के लिए भोजन रखती हैंए द्घर के पिछवाड़े में या बगीचे में! न जाने प्रकृति में वह कौन सी अंजान शक्ति है जिसने कागा में एक अनिवार्य व्यवहार या आचरण उत्पन्न कर रखा थाए कागा उस पत्तल में रखे प्रसाद और भोजन ग्रहण करता ही करता हैए तब कहीं गृह स्वामी निश्चिंत हो पाता है कि अगले वर्ष भी धरती मां अन्न भंडार पूर्ण करेगी।
दो साल पहले तक इस इलाके के साथ.साथ इस गांव में भी सैकड़ों कागा थेए जैसे मनुष्य के साथ उसका भी पूरा हक हो गांव मेंए लेकिन धीरे.धीरे कागा की संख्या द्घटती गई। जब तक कागा की संख्या पर्याप्त थी गांव का नमान सुचारू रूप से निभता रहा। कागा की संख्या कापफी कम होते जाने से नमान की सुबह लोगों की बेचैनी बढ़ने लगी। दो साल पहले कागा की संख्या मात्रा एक रह गईए जैसे प्राणी जगत की धरती की तीर्थ यात्राा में अपनी प्रजाति की तीर्थ यात्राा निपटाकर अकेला रह गया हो। धरती मां का शुक्रिया अदा करने। भूल.चूक मापफ करना हे माते। हे मांए जब इस अंतरिक्ष में तुम्हारा दोबारा जन्म होगाए तुम्हारे पास स्वच्छ पर्यावरण होगाए तुम्हारी इजाजत होगी तो दोबारा जन्म लेंगे! कागा की संख्या मात्रा एक रह गई है इसका पता भी लोगों को महीनों बाद लगाए जिस दिन कागा दो से एक रह गया उसकी बेचैनी बढ़ती गईए वह गांव के इस किनारे से उस किनारे तक मंडराता रहाए काआंव.काआंव करते.करते। शुरू में लोगों का ध्यान आकृष्ट नहीं हुआए गांव वालों के लिए यह कागा का सामान्य व्यवहार था कि कागा जब काआंव.काआंव करे तो समझो किसी के द्घर मेहमान आने वाले हैंए और एक बड़े गांव में तो लगभग हर दिन कोई न कोई मेहमान आता ही है। लेकिन आषाढ़.सावन.भादो में तो मेहमानबाजी बिलकुल बंद ही हो जाती हैए जब सारा इलाका पटुआ काटने और धान रोंपने में मशगूल रहता है। उन महीनों में भी जब कागा बेचैनी से काआंव.काआंव करने लगा तो
लोगों को शक हुआ कि कोई बात जरूर है इस कागा के साथ। पिफर तो सुबह ही बच्चे उस कागा के पीछे पड़ गएए शाम तक आविष्कार कर डाला कि इस गांव में अब एक ही कागा बचा है और इतनी बड़ी धरती में अकेला होने के कारण वह डर खा गया है।
गांव में एकमात्रा कागा होना नमान के लिए आपफत से कम न था। सौ परिवारों के गांव में सदियों से पूरे अगहन में चार.पांच तिथियों में नमान संपन्न होता रहता था। एक दिन में यदि बीस.पचीस परिवार भी नमान संपन्न करते थे तो सुबह सभी के पत्तल में कागा मिल जाता थाए कागा की संख्या कम होती भी गई तो बगल वाले कागा से काम चलाया जाने लगाए अब एक कागा भला एक ही दिन में कितने परिवारों के पत्तल का भोज्य प्रसाद चखेगा! लेकिन बकैनियां वालों को अपने ऐतिहासिक शांतिपूर्ण ग्राम्य संस्कार पर गर्व रहा हैए सो कई दौर की आपसी बातचीतए विचार.विमर्श के बाद गांव वालों ने नायाब कागा प्रबंध पेश कियाए जैसे महान मानवशास्त्राी ेंच बोआस के सांस्कृतिक सापेक्षवाद में संस्कृतियां अपने.आप स्वतंत्रा होकर आगे बढ़ती हैंए वैसे ही अब पूरे अगहन बिना नागा किए हर दिन नमान संपन्न होगाए एक दिन में सिपर्फ तीन.चार द्घर ही नमान कराएगाए इस प्रकार एक ही कागा से पूरे अगहन भर सभी द्घर में नमान संपन्न हो सकेगा। लेकिन नमान शुरू किस द्घर से होघ् लॉटरी निकाली गई.पूर्वी टोला के उत्तर से या दक्षिण से या पिफर पश्चिम टोला के उत्तर से या दक्षिण से। लॉटरी में पर्ची निकली पश्चिम टोला के दक्षिण सेए यानी संत लाल विश्वास के द्घर से शुरू होकर अगहन के अंत में पूर्वी टोला के दक्षिण में रद्घुवर दास के द्घर समाप्त होगा। पिफर तो पहले वर्ष पूरे अगहन पूरे गांव में भोज सा माहौल रहाए जिस.जिस परिवार में नमान हो वे अपने.अपने सन्निकट को नमान भोज में शामिल करते। पूरे महीने कागा बिना किसी रोक.टोक के नमान संपन्न करता रहाए जैसे बैट्री चालित कोई खिलौना हो। उस वर्ष के नमान से उत्साहित हो गांव वाले गर्व से बोल उठे.बदलते जमाने के साथ हम भी तालमेल बिठा सकते हैं। चक्रीय नियम के तहत अगले वर्ष नमान पूर्वी टोला के रद्घुवर दास के द्घर शुरू होकर अगहन के अंत में पश्चिम टोला के संत लाल विश्वास के द्घर समाप्त होना थाण्ण्ण्।
पूरे एक साल गांव में और आस.पास के गांवों में गेहूंए पटुआए धानए दलहन की बहार रहीए हरे.हरे खेतए पूरे.पूरे खलिहानए भरे.भरे द्घर.आंगन! नमान आते.आते लोगों का हर्षित मन हंसतेए खिलखिलाते चेहरे से बाहर झांकने लगाए उमंग आंखों में तैरती दिखने लगी और पूरे गांव का जोश ढोलक.मृदंग.मंजीरे पर थाप देने लगा। नमान आते.आते कागा तैंतीस करोड़ में से अनाम.अंजान देवी.देवता के दूत की पदवी पाता गया.श्आखिर सोचो जराए सारे कागा मर.खप गएए यही एकमात्रा कैसे बचा है! जरूर किसी न किसी देवता का दूत होगा।श् मौका पाकर भक्त हंसदास ने जोड़ ही दिया.तैंतीस करोड़ में से एक है दाना देव और कागा है उसी का दूत। पिफर तो इस बार का नमान छोटा पर्व.अनुष्ठान न रहकर अन्न.
महोत्सव का रूप.रंग धरने लगा। नवयुवकों की टोली ने गांव में एक महीने तक कागा मेला आयोजित करने की भी द्घोषणा कर डाली। पिफर तो आस.पास के गांवों से भी जन.जोर हिलोर मारने लगा। देखते ही देखते गांव के पूरब धान कटान से खाली पचास एकड़ खेतों में कागा मेला उछल.कूद करने लगा। नमान की पूर्व संध्या आते.आते रद्घुवर दास का द्घर तो द्घर न रहाए इसने नमान.मठ की पदवी हासिल कर लीए रद्घुवर अचानक रद्घुनाथ कहलाने लगा.श्रद्घुकुल नंदन रद्घुनाथ धन्य होए नवयुग का नमान तुम्हारे द्घर से यात्राा आरंभ करेगा! नमान के दिन गांव में हंसता हुआ सूरज उगाए अगहन की मीठी.मीठी ठंड में पसरती धूप की उष्मा इस वर्ष शरीर में मन मेंए अनंत सुखद स्पर्श का आभास दे रही थी। दिन भर संपन्न होने वाले अनुष्ठान वृहद रूप.रंग में उतरता.सिमटता रहा। सांध्यकालीन अन्न.पूजन तो रात्रिा.विस्तार हेतु अंधकार को याचक बनाए रखा। दिन की तो बात छोड़िएए कुंवारी कन्याओं का अभिनंदन दल तो मध्य रात्रिा तक कागा पर टकटकी लगाए रहाए जैसे स्वर्ग से उतरकर सीधे इसी गांव में पधारा हो। पूर्णियां कॉलेज में जंतु विज्ञान का छात्रा नवीन व्याख्या पर उतर आया.अगर पक्षी विज्ञानी इस कागा का परीक्षण करे तो बेशक यह तथ्य मिलेगा कि इसमें कुछ विशिष्ट लक्षण या जीव द्रव्य है जो सामान्यतः पृथ्वी के पक्षियों में नहीं पाया जाता है और यदि नासा वाले इस गांव में आ सकें तो साबित हो सकता है कि किसी दूर ग्रह या तारा से उड़नतस्तरी द्वारा इस पक्षी को भारत वर्ष में उतारा गया हैए पृथ्वी लोक से मैत्राी हेतुए पिफर तो इसे बु; भूमि में ही उतरना था। वह रात गांव में सबसे लंबी रात थीए कागा के दीदार के इंतजार मेंए स्पष्टतः असंख्य कागा महायुग का अंत और एकल कागा युग की शुरुआतण्ण्ण्।
अगली सुबह धरती में सूरज की रोशनी पहुंचने से पहले ही कुंवारी कन्याओं के किशोरवय की कलकल से गांव रोशन हो उठाण्ण्ण् कागा.कागा.कागा.कागाअअ .काआगाआण्ण्ण् कहां है कागा.कहां है काआ.गाआण्ण्ण् हो कागा देवए मत करो देरण्ण्ण् पश्चिम टोला से पूरब टोला तक बालिकाओं का हुजूम हवा में तैरने लगाए पर कागाघ् न कागा और न उसका काआंव! पिफर तो औरत.मर्द. बच्चे.बूढ़े.जवान सभी की आंखें दूरबीन बन गईं कागा खोज अभियान में। उनके बीच उत्साह.उत्सुकता जवान हो उठीए जो सबसे पहले कागा देखेगा अगले साल उसके द्घर से नमान शुरू होगा। लेकिन कागा का कोई अता.पता नहींए जैसे दैवीय शक्ति से अंतर्धान हो गया होए बडे.बुजुर्ग दर्शन पर उतर आए.श्अरे! अब यह कोई साधारण कागा थोड़े न हैए देव.दूत है तो गांव वालों की परीक्षा तो लेगा ही लेगाए धीरज धारण करोए प्रसन्न होकर अपने.आप प्रकट होंगे।श् पिफर तो पल भर में ही पूरा गांव मौनी मठ लगने लगाए ण्ण्ण्जैसे कोई अवतार लेने वाला होण्ण्ण्।
श्मुन्नर काका के खेत में कागाआआ अण्ण्ण्श् हीरेन चौधरी की छोटी लड़की सुधा एकाएक चीख उठी तो जन समूह मुन्नर यादव के खेसारी खेत की तरपफ दौड़ पड़ाए जैसे भूकंप से अचानक उत्पन्न हुई बड़ी खाईं की ओर आस.पास की जलराशि प्रवाहित हो उठती हैण्ण्ण् खेसारी की पफसल के रंग का ही तो होता है कागा। भीड़ के पद.थाप से पूरे खेत की पफसल का वजूद मिटता गयाण्ण्ण् खेत के लगभग मध्य.उत्तर में कागा पड़ा थाए निस्तेज.अक्रिय। भीड़ में कोहराम मच गयाए समवेत स्वर पफूट पड़ा.पानी का छींटा मारो पिफर पंख उठाकर हवा में लहराओए पक्षी में जान ऐसे ही वापस आती है। जीतमन वैद्य भीड़ चीरकर आगे आएए कागा को टटोलाए आंख की पुतली उलटाई.चोंच पफैलाईण्ण्ण् उनका चेहरा दयामय हो उठाए आवाज करुणापूर्ण.श्इसके प्राण तो चार.पांच द्घंटे पहले ही निकल गए जान पड़ते हैं।श् पिफर तो भीड़ वृत्त के केंद्र से पफुसपफुसाहट तरल वलय भांति शोर में बदलती गईए कागा मर गयाण्ण्ण् कागा नहीं रहेण्ण्ण् कागा स्वर्ग सिधार गएण्ण्ण्।
श्यह पश्चिम टोला की साजिश हैश् भीड़ के बाहरी भाग से दो.तीन लोगों का मिश्रित उद्गार यइसलिए न पहचाना जाने वालाद्ध पफूटते ही विस्मित.करुणामय.उदास भीड़ के चेहरे पर उबालए क्रोध और द्घृणा तैरने लगीए जैसे कोई तैलीय पदार्थ अपना आवरण्ा तोड़कर पफैलने लगा हो। श्पश्चिम टोला की
साजिश क्यों होगीए पूरब टोला की क्यों नहींश्.लहटन यादव के टोकते ही पूरब टोला का साधु दास उखड़ गया.श्क्योंकि मुन्नर यादव पश्चिम टोला का हैए वैसे भी इस बार के महा नमान की शुरुआत पूरब टोला से हो रही हैए इसलिए आप लोग मन ही मन जल रहे हैंए पूरब टोला का भाग्य आप लोग पचा नहीं पाए तो कागा ही मरोड़ डालेण्ण्ण्श् इतने में तो पश्चिम टोला के दसियों लोग उबल पड़े.श्अरे पकड़ो स्साले कोए हमारे टोला पर कागा हत्या का आरोप लगा रहा हैए जबकि पूरब टोला वालों ने ही मारा हैण्ण्ण्श् इतना सुनते ही पूरब टोला के नवयुवक भीड़ से अलग होकर धोती.लुंगी कमर में लपेटते हुए यु;ातुर दिखने लगे.श्रे कागाखोर! हमारे टोला से तो नमान युग शुरू हो रहा हैए तो हम भला क्यों मारेंगे कागा कोए चुप हो जाओ नहीं तो जो आज तक नहीं हुआ है वह हो जाएगा।श् पिफर तो पश्चिम टोला के नवयुवक भी भीड़ से अलग होकर अपने टोला की तरपफ खड़े होकर कमर कसने लगेए बाजू लहराने लगे. कागा मेला और नए.नमान के चलते तुम्हारे द्घरों में मेहमानों की भीड़ बढ़ने लगी हैए तुम्हें भारी पड़ने लगा तो कागा ही खा डालाण्ण्ण्श् आग में द्घी पड़ चुका थाए पूरब टोला के बड़े.बुजुर्गों ने द्घोषणा कर डाली.श्अपने.अपने द्घरों से निकालो लाठीए आज पश्चिम टोला से निपटना ही पड़ेगाए शुरू से ही ये लोग पूरे गांव में दादागीरी करते आए हैं।श् चंद मिनटों में ही सारी भीड़ द्घरों में कैद हो गईण्ण्ण् आधे द्घंटे के अंदर ही दोनों टोला के बलिष्ठ लोग हाथों में लाठी लिए अपने.अपने टोले के आगे कतारब; खड़े हो गएए लाल.लाल आंखेंए पफड़कती भुजाएंए
क्रोधपूर्ण चेहरे पहले आक्रमण के इंतजार में उबलने लगे। जिस गांव में आज तक कोई हिंसक द्घटना नहीं हुईए जिस गांव से आज तक थाने में कोई रिपोर्ट नहीं लिखी गई यइसलिए पुलिस की नजर में सड़ा.गला गांवद्ध वहां अब खून की नदी अपना प्रवाह और दिशा तय करने लगीण्ण्ण् इस बीच भक्त अद्घोड़ी दास बदन उद्घाड़कर गेरुआ वस्त्रा लहराते हुए हौले.हौले गांव के मध्य बने ग्राम देव के स्थान तक पहुंचने लगेए उनकी मंथर गति से प्रतीत हो रहा थाए जैसे हवा में दोनों टोलों के दबाव से अवरोध की मोटी.मोटी अदृश्य बल्लियां बिछी होंए स्थान पर पहुंचकर दोनों हाथ उठाकर बारी.बारी से दोनों टोलों की तरपफ मुंह पफेरकर वह अपना पफेपफड़ा खाली करने लगाए स्वर थैली भरते हुए.श्आज तक इस गांव का भगवान रही है शांतिए गांव वालों ने आज तक एक चींटी तक नहीं मारी है तो पक्षी क्या मारेंगेए मेरी विनती है कि शाम को स्कूल प्रांगण में पंचायत बैठेण्ण्ण् बोलो मंजूर हैघ्श् दोनों टोला से पफुसपफुसाहट और बुदबुदाने का अस्पष्ट शोरगुल आने लगाण्ण्ण्
सूरज ढलान की ओर बढ़ रहा थाए पंचायत में नया सवेरा हो रहा था। तभी थानाध्यक्ष मय दलबल आ धमकाए मोबाइल युग हैए जाहिर सी बात है गांव में तनाव की खबर जिला प्रशासन तक पहुंच चुकी थी। दरोगा की अप्रिय आवाज पर सवार होकर कानूनी धाराओं के डरावने तीर छूटने लगे.श्यहां बैठे सभी लोग धारा तीन सौ सातए तीन सौ तेईसए तीन सौ
तिरेपनए पांच सौ छहण्ण्ण् में अंदर जाने के लिए तैयार रहो।श् पूरी तरह सन्नाटा छा गयाए जैसे अचानक मध्य रात्रिा टपक पड़ी होए सिपर्फ तनी ग्रीवा पर दरोगा का सिर अनियमित गति से चारों दिशाओं में द्घूर्णन कर रहा थाण्ण्ण् भीड़ से कृत्रिाम रूप से खांसने की आवाज आई शायद किसी के अंदर दरोगा से बात करने का साहस जन्म ले रहा थाए सो हल्का खांसकर साहस बटोरने की पूर्व सूचना देना चाह रहा था। राधेश्याम यादव यदोनों टोलों में सर्वाधिक धनी आदमीद्ध का दंडवत शरीर दिखने से पहले उसके दोनों हाथ जुड़े हुए ऊपर आए उसके शब्द अवर्णनीय रूप से याचनापूर्ण थेए जैसे मुंह से विनती सागर बह रहा हो.श्हुजूर हमारे गांव में ऐसी कोई बात नहीं हुई हैए एक अदना कागा को लेकर कुछ गलतपफहमी जरूर हुई थीए पर हम लोगों ने उसे भी सुलझा लियाण्ण्ण्श् उसको चुप कराते हुए दरोगा दहाड़ पड़ा.श्बिना कानून पढ़े पंचायत मत किया करोए यदि आपसी समझौता कानून की नजर में गलत हुआ तो पंचायत कराने वालों तैयार रहनाण्ण्ण् डॉक्टर साहब मृत कागा का परीक्षण कीजिएए रिपोर्ट बनाकर जिले में भेजना पड़ेगाश् साथ आए पशु चिकित्सक से बात करते हुए दरोगा जी सहज हो गए थे।
मृत कागा का परीक्षण निपटाकर पशु चिकित्सक और
दरोगा की टीम जीप में बैठने लगीए हिम्मत जुटाकर कुछ नवयुवक जीप तक प्रश्नवाचक मुद्रा लिए बढ़ेए पिफर तो दोनों टोलों के बहुतेरे युवकों और बड़े बुजुर्गों ने जीप को गोल द्घेरे में बदल डाला। लोगों की कौतूहल से भरी नजरों की प्यास बुझाने के गरज से डॉक्टर अब्दुल सलीम पर्यावरणविद नजर आए.श्देखिए मेन पफैक्टर है इन्वायरनमेंट में डिटेरियोशन! इसी का रिजल्ट है कि पिछले दो दशक में चिड़ियों की दसियों प्रजातियां विलुप्त हो चुकी हैंए यह जो चिड़िया है वह पोरस बोन वाला पफीदर्ड क्रिएचर हैए हवा में कार्बन की मात्राा बढ़ते रहने और धरती का तापमान बढ़ने से इनका वजूद खतरे में हैए वैसे भी कीड़े.मकौड़े कम होते जाने के कारण पक्षी वर्ग का बचना मुश्किल हैए पहले कागा की लाइपफ दो साल से ज्यादा होती थीए अब तो कापफी कम हो गई हैण्ण्ण्श् पीछे खड़ी दसवीं की छात्राा नीता अधैर्य हो उठी.श्मरने की बात तो समझ में आईए आदमी की जनसंख्या इतनी बढ़ रही है तो नए.नए कागा का जन्म क्यों नहीं हो रहा है।श् डॉक्टर साहब गंभीर होकर बोले.श्क्योंकि मानव जाति की पफर्टीलिटी को इन्वायरनमेंट ने अभी उतना प्रभावित नहीं किया हैए जबकि कागा वर्ग की पफर्टीलिटी कैपेसिटी कापफी कम हुई हैए साथ ही प्रजनन स्थल लगभग खत्म हो रहे हैंण्ण्ण्श् गांव वालों को अवाक.विस्मित हालत में डालते हुए जीप आगे निकल गई। वहां पर खड़े किसी के मुंह से कोई शब्द नहीं निकल रहा था जैसे सभी गूंगे हो गए हों। यह स्थिति गांव वालों के लिए बिजली गिरने से कम नहीं थीण्ण्ण् अंधेरे को अपनी आंखों में कैद करते हुए लोग स्कूल प्रांगण में हो रही शोक सभा में भाव विह्वल हुएण्ण्ण् भावनापूर्ण ढंग से निर्णय हुआ कि पक्षी वर्ग के ऊपर उत्पन्न खतरे के प्रति दुनिया को चेताने के लिए हवन किया जाए और कागा स्मारक बनाया जाए ताकि नमान का दही.चूहा.गुड़.प्रसाद का पत्तल स्मारक में ही चढ़ाकर नमान चालू रखा जा सकेण्ण्ण्।
श्ण्ण्ण्दिल्ली वाले बाबू साहब!! एक था कागा और यह थी उसकी कहानीए अब तो गांव में कोई कागा न रहाए कोई बात नहीं अब हम लोग उसके स्मारक को ही कागा मानकर नमान का अनुष्ठान पूरा करेंगे और देश.दुनिया के गैर.खेतिहर के लिए अन्न पैदा करते रहेंगे।श् मैं अभी भी अपने.आपको अधिक समझदार.बु;मिान समझता थाए सो मुझसे रहा न गया.श्माना कि कागा अब नहीं बचा हैए लेकिन आपका नमान तो कौवा से भी चल सकता है।श् बुजुर्ग निर्विकार भाव से बोल पड़ा.श्इस प्रस्ताव पर भी चर्चा हुई थीए पर लड़कियों ने शोर मचाना शुरू कर दिया कि हम लोग कौवा को पत्तल नहीं देंगेए धर्मजीत मास्टर ने समझाया कि गांव से लेकर पूर्णियां.पटना.दिल्ली हर जगह अब तो कौवा ही राजपाट चला रहाए तो नमान भी कौवा से पूरा करोए पर लड़कियों ने काट दिया.नमान तो पवित्रा होता है कौवा से कैसे चलेगा भलाए राजपाट पवित्रा है कि अपवित्रा हमें क्या पताश् ण्ण्ण्पिफर तो स्मारक बनते देर नहीं लगीए सामने देखाए कल यह स्मारक होकर दुनिया को पशु.पक्षी बचाने का संदेश देगा।श् उस बुजुर्ग से बात करते.करते मेरी पर्यावरण विशेषज्ञता जाग रही थी.श्मेरी बात का बुरा मत मानिएगा अंकलए मैं कहता हूं आज आपका कागा मर गया तो आप लोग पर्यावरण के प्रति जागरूक दिख रहे हैं और उसे क्षति पहुंचाने वाली चीजों.तत्वों को स्वाहा कर रहे हैंए अब तक तो पर्यावरण को कापफी क्षति पहुंच चुकी हैए गांवों में आबादी का बड़ा हिस्सा रहता हैए लेकिन पर्यावरण के लिए आप कभी आगे नहीं आए।श् मुझे लगा इस बुजुर्ग बेचारे के पास मेरे तर्कपूर्ण प्रश्न का कोई जवाब नहीं होगाए लेकिन वह तो सहज भाव से बोलता गया.श्देखो बेटाए तुम शहरी लोग कापफी पढ़े.लिखे हो और पर्यावरण के अच्छे जानकार होए लेकिन पर्यावरण के लिए दिल से तो कुछ करते नहीं होए सिपर्फ भाषण देते हो और पर्यावरण रक्षक होने का झंडा उठाए पिफरते होए हम देहाती लोग कम पढ़े.लिखे हैं और पर्यावरण की कोई किताबी जानकारी हमें नहीं हैए लेकिन हम लोगों से तुम लोग पर्यावरण बचाने की उम्मीद रखते हो। दिल्ली वाले बाबू साहब जरा इस बात पर गौर तो करोए भले ही हम लोगों को पर्यावरण की गहरी
जानकारी न हो पर चारों तरपफ नजर उठाकर तो देखो कितने बड़े.बडे पुराने पेड़ हैं हमारे गांव मेंए हम बरगद पूजते हैंए पीपल पूजते हैंए पाकड़ पूजते हैंए जामुन पूजते हैंए आम पूजते हैंण्ण्ण्।श् मेरे दिल के कोने से आवाज आई.श्ये सच्चे पर्यावरणवादी हैं।श् मैं उसे नमस्कार कर स्मारक स्थल की ओर बढ़ गया।
कल संध्या कटिहार जंक्शन पर नार्थ.ईस्ट एक्सप्रेस में अपनी बर्थ पर आते ही नींद ने अपने आगोश में ले लियाए यचंद्रेश गांव में ही कुछ दिनों के लिए रुक गया थाद्ध ण्ण्ण्सुबह को नींद खुली हैए ट्रेन अब यमुना ब्रिज पार कर चुकी हैए खिड़की से बाहर झांकता हूंए दिल्ली की झलक पानेए नीचे चार पहिए.दुपहिए वाहनों की अंतहीन श्रृंखलाए उस पर सवार सिपर्फ खुद के लिए जीने वाली मानव जातिए सभी के सभी


    श्अधिकतमश् नामक दुर्लभ लक्ष्य की ओर विक्षिप्त होकर भागते हुएए दिन.रात पर्यावरण से उधार लेने वालेए लेकिन कभी न चुकता करने वाले श्डिपफॉल्टरश्। मैंने खिड़की से मुंह पफेरकर आंखें बंद कर लीए सुकून के लिएए लेकिन बंद आंखों की पुतली के पीछे भयावह चलचित्रा उभरने लगे हैं.इन महामानव के द्घर में बड़ी.बड़ी थालियां सजी हुइर् हैंए पर्यावरण नामक कल्पतरू से तोड़कर झपटकर सुख.सुविधाओं के
अनेकानेक व्यंजन इन थालियों में परोसे जा रहे हैंण्ण्ण् शोर.शराबे से आंखें खुलींण्ण्ण् ट्रेन से बाहर आ गया हूंए सामने जन सैलाब बढ़ता जा रहा हैए सिर के पिछले हिस्से से मुझे वे गांव वाले दिखाई देने लगे हैंए अनजाने ही सहीए पर्यावरण पालक हैं येए सदियों से लगेए पूरी की पूरी दिल्ली तराजू पर पासंग भर भी नहीं है इन गांव वालों के सामनेण्ण्ण् जन समूह का दबाव बढ़ता ही जा रहा हैए मैंने गौर कियाए वे गांव वाले तो यहां कुली बने मेरा बैग उठाने को आतुर हैंए थोड़ा आगे बढ़ाए वही लोग प्लेटपफार्म सापफ करते दिख रहे हैंए अरे ये तो रिक्शा लिए खड़े हैं मेरे इंतजार में!ण्ण्ण् तो क्या कागा के बाद इन गांव वालों का नंबर है! मेरे अंदर से एक आवाज विपरीत दिशा तय करते हुए कानों के रास्ते बाहर आई. एक था कागाए अब बचा है एक
गांवण्ण्ण्।

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