इस अंक के रचनाकार

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मंगलवार, 20 नवंबर 2018

हथेलियों में सूरज उगाती कवयित्री :मंजु महिमा फेवरिट

प्रणव भारती

हथेलियों में सूरज यूँ  ही नहीं उग जाता। हथेलियों को इस काबिल बनाना पड़ता है कि वे सूरज की गर्माहट, ऊर्जा तथा रौशनी को अपने भीतर समेट सकें!
मंजु महिमा एक संवेदनशील कवयित्री है। नारी - सुलभ संकोच, सहनशीलता, भद्रता, गंभीरता, करुणा उनके व्यक्तित्व के अंग हैं और उनका यही व्यक्तित्व उनकी ठहरी हुई सोच को जन्म देकर अनायास मन के भीतर के कपाट खोलकर पाठक को उनसे बाबस्ता करता है। पाठक कविता के साथ - साथ चलते हुए निरंतर उनका सानिध्य महसूस करता है।
हथेलियों में उतरे हुए सूरज का बिंब उनके भीतर की रौशनी और ऊर्जा है जिसे उन्होंने न जाने कितने - कितने अंधेरों से जूझकर अपने भीतर समोया है। कवयित्री अपनी भाषा हिन्दी की जबरदस्त पक्षधर हैं। हिन्दी को बिंबित करना उनकी अपनी भाषा के प्रति आत्मीयता का स्पंदन है जो उनकी रगों में बह रहा है।
नारी की स्वाभाविक संवेदनशीलता तथा करुणा से ओत - प्रोत मंजु महिमा की कविता चाहे च् मुझे पतंग न बनाओज् हो चाहे च् चिड़िया न बनना ज् हो या फिर च् माँ आ अब लौट चलें ज्सबमें नारी के स्वतन्त्र परन्तु एक ऐसे बंधन की स्पष्ट छाप प्रदर्शित होती है जो मर्यादित  स्वतंत्रता की चाह में भी एक कोमल बंधन की आशा रखता है।
खूब छूट दो उड़ने की
पर डोर से बांधे रखो अपनी
तुम्हारे प्यार की डोर से बंधी
मैं तुम्हारी हथेलियों पर
चुग्गा चुगने चली आऊँगी ।
यह उड़ने की चाह और साथ ही एक ही हथेली पर चुग्गा चुगना उनके भीतर की कोमल संवेदना को  पाठक के समक्ष अनायास ही एक ऐसी चिड़िया के समीप ला खड़ा करता है जो पिंजरे से निकलकर अनंत अवकाश में अपने पर फैलाती तो है पर विश्राम करने अपने पिंजरे में स्वेच्छा से अपनेपन के अहसास में लिपटी लौट आती है। यह च् मुक्त बंधन ज्की चाह तथा अपनेपन का गहरा अहसास उनकी नारी - संवेदना को प्रखर करता है।
नारी - जीवन के विभिन्न आयामों को उद्घाटित करती हुई उनकी कविताएं नारी - हृदय के कितने समीप हैं, यह उनकी कविताओं में बहुत स्पष्ट है। ये अंतर को एक पावस अहसास से भर देती हैं। नारी के स्वतन्त्र व्यक्तित्व की पक्षधर मंजु महिमा अपनी सीमाओं में रहकर अपने अधिकार के लिए चुनौती  देती दृष्टव्य होती है, कहती हैं ....
मुझे उड़ना ही होगा,
मैं बिना उड़े नहीं रह सकती
मुझे देखना ही होगा
मैं अनदेखा नहीं कर सकती।
शिद्द्त के साथ अपनी इस भावना को सरेआम न केवल रखना वरन उस पर जमकर च् हथेलियों में सूरजज् के बारे में पाँव रखना तथा दृढ़ता से चलना उनकी श्रेष्ठ कविता से पूर्व उनकी एक संवेदनशील श्रेष्ठ नारी के सम्मान को गौरवान्वित करते हैं।
मंजु महिमा की यह कोमल स्त्रीयोचित  करुणा उनकी रचना च् माँ अब लौट चलेंज् में स्त्री की करुणा, आज के युग में भी बेचारगी की साक्षी बनकर पाठक के समक्ष आ उपस्थित होती है।
च् माँ अब लौट चले ज्में उनके मन  की गहराई में उतरी पीड़ा कितने स्प्ष्ट शब्दों में मुखरित हुई है ....
जहाँ तुम्हें सदैव
औरत होने का कर्ज चुकाना पड़ता है ।
और  इससे भी अधिक ..................
तुम एक भोग्या हो,
खर्चे की पुड़िया
जब तुम पैदा हुईं थीं,
तब थाली नहीं बजी थी ......
कितनी गहन पीड़ा !!
तुम्हारे होने की ख़बर
शोक -सभा में तब्दील हो गई थी
सदियों से चला आ रहा शाश्वत सत्य
भीतर से पीड़ित, स्त्री के नैसर्गिक अहसास के सम्मान को महसूसते हुए मंजु कभी भी कमजोर अथवा बेचारगी का जामा पहनकर करुणा तथा दया की याचना नहीं करती दिखाई देती। वे अपने व्यक्तित्व के लिए हर पल एक खामोश युद्ध के लिए तत्पर रही हैं इसीलिए वे अपने बच्चों की ढाल बनकर उनके व्यक्तित्व को पुचकारती हुई उन्हें विमर्श देती हैं ....
चिड़िया बनना मेरी नियति थी
पर, मेरे बच्चों!
तुम कभी चिड़िया न बनना!
साथ ही वे माँ को कितनी शिद्द्त से, साहस से भरोसा देती हुई दिखाई देती हैं ...
माँ! डरो नहीं, मैं उतनी कमजोर नहीं।
जो दुनिया का सामना नहीं कर पाऊँगी।
मंजु जी की रचनाओं में मुझे वे सदैव एक कैनवास पर लिखे गए एक चित्र की भांति प्रतीत हुई हैं जिनमें उनके प्रतिबिंबित होने का अहसास हर पल बना रहता है ।
प्रकृति के सानिध्य में नैनीताल के चार प्रहरों को उन्होंने जिस प्रकार समय के विभिन्न कालों में विभाजित किया है, वह उनकी स्त्री के प्रति एक गहरी तथा कोमल अनुभूति का प्रतीक लगता है ...
नैनीताल की झील उन्हें
प्रातःकाल में .....अल्हड़ कन्या
मध्यान्ह में .....सुघड़ गृहिणी
संध्या में ....भाल पर सिंदूरी टीका लगाए
आतिथ्य करती प्रसन्नवदन सधवा
रात्रि में .....दुल्हन - सी संवरी
स्वयं पर मोहित समर्पण की आतुरता लिए
कोमलांगी प्रतीत होती है।
जीवन के विभिन्न आयामों को सहेजे उनकी कविताएं चाहे इस संग्रह में हों या न हों मुझे सदा उनकी पारदर्शिता एक झीना अहसास दिलाती हैं। यही पारदर्शिता मैंने मंजु के व्यक्तित्व में सदा से पाई है जो उन्हें एक अच्छी कवयित्री से भी पूर्व एक अच्छे संस्कारी इंसान के रूप में उद्घाटित करती है। मेरे च् हथेलियों में सूरज ज् के बारे में मन में, जीवन में कुछ भी अच्छा बनने से पूर्व एक अच्छे इंसान होने का मोल बहुत ऊँचा है।
मंजु च्महिमाज् की पुस्तक लोकार्पित हो चुकी है, हम सब उनकी इस तत्पर चेष्टा में उनके साथ हैं। मन के भीतर अपने शब्दों के माध्यम से उतर जाने वाली यह कवयित्री अपने पारदर्शी स्नेहिल व्यक्तित्व से भी सबको सदा जीतती आई है।
हमारे हजारों सलाम
हैं उनके नाम
जो चलते नहीं ....किसी के बनाए रास्तों पर
बनाते हैं स्वयं अपनी राह
और ....छोड़ जाते हैं एक छाप
दिलों की जमीन पर .....
स्वागत है च् हथेलियों पर उगते सूरजज् का जो हमें भी एक नयी ऊर्जा तथा दिशा देगा। मंजु महिमा के साहित्यिक गौरवपूर्ण कदम का स्वागत है। मुझे आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि  इस पुस्तक में संगृहित उनकी कविताएं पाठक को उनके अहसासों से जुड़ने के लिए बाध्य कर देंगी...!

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