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मंगलवार, 14 मई 2019

सफर

सोमेश शेखर चन्द्र

बस रूकती,इसके पहले ही वह उससे कूद, रेलवे स्टेशन के टिकट घर की तरफ  लपक लिया था। उसकी ट्रेन के छूटने का समय हो चुका था इसलिए वह काफी जल्दी में था। टिकट घर के भीतर पहुँचकरए यह जानने के लिए किए किस खिड़की पर उसके स्टेशन का टिकट मिलेगा, जल्दी - जल्दी, खिड़कियों के ऊपर टंगे बोर्ड पढ़ा था। यहाँ सभी जगहों के टिकट मिलते हैं। वाली खिड़की पर नजर पड़ते ही उसकी आँखे चमक उठी थी और वह उसी तरफ  लपक लिया था।
टिकट घर की खिड़की के ऊपर टंगी घड़ी के मुताबिक, उसकी ट्रेन छूटने में, अब सिर्फ तीन मिनट ही बाकी रह गए थे और इतने कम समय में टिकट कटवाना और दौड़कर ट्रेन पकड़ना, उसे बड़ा नामुमकिन सा लग रहा था जिसके चलते वह घबराया हुआ था और जल्दी से जल्दी टिकट कटवाकर, ट्रेन छूटने के पहले, उसे पकड़ लेने की उतावली में था। वैसे उसकी इस उतावली की एक वजह और भी थी वह यह किए उसके घर की तरफ दिन भर में सिर्फ  यही एक ट्रेन जाती थी और इसके छूट जाने का मतलब था अगले चौबीस घंटे तक, बिना खाए पिए, खून जमा देने वाली ठंड में,स्टेशन पर ठिठुर - ठिठुर कर अपनी जान देना। हालांकि ठंड से बचने के लिए वह, सभी मुमकिन उपाय कर रखा था लेकिन जैसे जैसे शाम नजदीक आती जा रही थी। कोहरा और भी घना होता जा रहा था और इसी के साथ ठंड भी बढ़ती जा रही थी। अभी दिन के चार ही बजे थे और वह सिर से लेकर पांव तक जरूरत भरके गरम कपड़े भी पहन रखा था, बावजूद इसके उसे लगता था ठंड उसकी हड्डियों में घुसड़ती जा रही है। चिंता उसे इसी बात की हो रही थी कि जब दिन के चार बजे, ठंड के चलते उसकी यह हाल है तो, रात में यह कैसी होगी इसी को सोचकर, वह बुरी तरह परेशान था।
खिड़की पर पहुँचकर, बड़ी बेसब्री से वह अंदर की तरफ  झाँका था। यह देखकर कि बाबू अपनी सीट पर बैठा हुआ है। उसे बड़ी राहत मिली थी। बाबू जी एक टिकट खंजनपुर, अपने स्टेशन का नाम बता, टिकट के पैसे निकालने के लिए, हाथ अपनी पैंट की जेब में डाला था तो एक दम से धक्क रह गया था। पैसे, उसकी पैंट की जेब में थे ही नहीं। कहीं मेरी जेब पर किसी पाकिट मारने, अपने हाथ तो साफ नहीं कर दिए या इस हबड़ दबड़ में, मैं उन्हे रास्ते में ही तो नहीं गिरा आया। दरअसल जब वह बस में था, उसी समय, टिकट के पैसे गिनकर, कमीज की ऊपरी जेब में सहेज लिया था जिससे कि पैसा निकालने और गिनने में, वेवजह की देरी न हो। लेकिन यह बात, इस समय उसके दिमाग से पूरी तरह उतर चुकी थी। खिड़की के पीछे बैठे बाबू को, उसने अपने गंतव्य स्टेशन का नाम, पैसा देने के पेश्तर, इसलिए बता दिया था कि इस बीच, जितनी देर में वह अपनी जेब से पैसे निकालेगा,उतनी देर में, बाबू टिकट काटकर तैयार बैठा होगा। वह उसे पैसा पकड़ाएगा और उससे टिकट लेकर, गाड़ी पकड़ने के लिए दौड़ पड़ेगा।
कमीज की जेब में पैसा महफूज पाकर, उसकी जान में जान आ गई थी। चिल्लर सहित, टिकट के जितने पैसे बनते थे पाकिट से निकालकर, अपनी मुठ्ठी में लिया था और पूरा हाथ, खिड़की में घुसेड़, टिकट बाबू के सामने कर दिया था। बाबू जी एक टिकट खंजनपुर।
उसके हाथ से टिकट के पैसे थाम, बाबू बड़ी सुस्ती से आगे की तरफ  झुक आया था और अपनी गर्दन, खिड़की के करीब तक खींच, उसे सूचित किया था गाड़ी अठारह घंटे लेट है।
अठारह घंटे ... लेट ...।
जी ई .....।
टिकट काट दूँ ऊँ ...।
गाड़ी के, अठारह घंटें लेट होने की बात सुनकर, वह एकदम से बेजान सा हो गया था। बाबू को टिकट काटने के लिए, हाँ कहे या नहीं, उसकी कुछ समझ में नहीं आ रहा था। थोड़ी देर तक बाबू, अपनी गर्दन आगे की तरफ खींच, उसके जबाब का इंतजार करता बैठा रहा था लेकिन जब उसे, उसकी तरफ  से कोई जबाब नहीं मिला था तो वह, झुंझलाकर टिकट का पैसा, वापस उसकी हथेली में ठूंस, उठ खड़ा हुआ था और टिकट घर की खिड़की दड़ाम से बंद करके, कमरे से बाहर निकल लिया था।
रामजनम से उसकी मुलाकात, अर्सा पहले, एक दिन ट्रेन में सफर के दौरान हुई थी। हुआ यह था कि उस दिन,रिजर्वेशन उसके पास था नहीं। ट्रेन के जिस जनरल डिब्बे में वह चढ़ा था उसमें इतनी भीड़ थी कि कहीं खड़ा होने तक की जगह नहीं थी। लोगों के साथ,काफी धक्का - मुक्की और गाली गलौज के बाद, उसे एक कोने में, थोड़ी सी जगह मिल गई थी और वह वहीं पर अपने पॉव टिकाकर खड़ा हो गया था। पहले तो वह सोचा था कि आगे चलकर, उसे कहीं न कहीं बैठने की जगह मिल जाएगी लेकिन जैसे जैसे ट्रेन बढ़ती गई थी, डिब्बे में और ज्यादा लोग ठुंसते चले गए थे इसलिए घंटो गुजर जाने के बाद भी, उसे बैठने की कोई जगह नहीं मिली थी और वह खड़े खड़े ही सफर करता रहा था। लेकिन घंटो गुजर जाने के बाद भी जब उसे बैठने की कोई जगह नहीं मिली थी तो उसका सिर चकराने लग गया था और टांगे खड़ा रहने से जबाब दे गई थी और वह जहां खड़ा था वहीं, लोगों की टांगों के बीच धम्म से बैठ गया था।
क्या हुआ मेरे भाई, लगता है तुम्हें गश आ गया है तुम तो एकदम पसीने - पसीने हो रहे हो। वह जहाँ बैठा था, रामजनम वहीं बगल की सीट पर बैठा हुआ था। उस समय उसकी जैसी हाल थी उसे देखकर उसे उस पर तरस आ गया था। उसे जमीन से उठाकर, वह, अपनी सीट पर बैठाया था। अपनी बैग से बोतल निकालकर, उसके पानी से, उसका मुंह धुलवाया था और अपनी रूमाल से, तब तक हवा करता रहा था जब तक वह पूरी तरह ठीक नहीं हो गया था। इस तरह रामजनम उसे अपनी सीट पर बैठाकर खुद खड़े - खड़े सफर करता रहा था। काफी देर के बाद, सीट पर बैठे एक सज्जन का स्टेशन आने पर वे, उतरने के पहले, अपनी सीट, उसे दे दिए थे इसके बाद उनकी आगे की यात्रा काफी आसान हो गई थी।
राम जनम उस दिन, अपने साथ, दारू की एक बोतल लिए हुए था। रात हुई थी तो वह स्टेशन के प्लेटफार्म से दो पैकेट खाना खरीद लाया था और दोनों उस दिन साथ - साथ खाना खाये थे और छक कर दारू पिए थे। हॅसी ठठ्ठे के साथ, दोनों मे ऐसी - ऐसी बातें हुई थी उस दिन, जैसे वे दोनो बचपन के लंगोटिया और हमराज हों। सफर खत्म होने के पहले दोनों एक दूसरे को, अपना - अपना पता दिये थे। राम जनम अपने घर का पता लिखने के साथ,उसकी डायरी में, स्टेशन से निकलकर, उसके घर कैसे पहुँचना है उस तक का एक नक्शा बना दिया था। मेरे घर की तरफ  तुम्हारी रिश्तेदारी है इसलिए तुम सिर्फ  मेरे दोस्त ही नहीं, रिश्तेदार भी हुये। भविष्य में, जब भी तुम अपनी रिश्तेदारी आओ, तो मेरे घर आना मत भूलना, मेरे दोस्त, सच कहता हूँ बड़ी मजा आएगी। बोलो आओगे ना।
- आऊँगा मेरे दोस्त, जरूर आऊँगा। बिछुड़ने के पहले दोनों इस तरह एक दूसरे से गले मिले थे जैसे दोनों का जन्मों का साथ रहा हो।
ऐसा नहीं था कि राम जनम उसकी याददाश्त से उतर चुका था। उसके साथ का उस दिन, का वह सफर, उसे अच्छी तरह याद था और जब कभी वह अपनी रिश्तेदारी जाने के लिए इस स्टेशन पर उतरा था या वापसी में ट्रेन पकड़ने के लिए स्टेशन पहुँचा था तो राम जनम उसे जरूर याद आया था। लेकिन उसकी याद, महज यादों तक ही सीमित रही थी। रामजनम के लिए उसके भीतर ऐसा कोई आकर्षण या खिंचाव कभी नहीं महसूस हुआ था कि वह उससे मिलने के लिए उसके घर तक खिंचा चला जाता। सफर के दौरान, कभी - कभी ऐसे हमसफर मिल जाते है जिनसे ऐसी घनिष्ठता हो जाती है कि लगता है कि उनसे अपना जन्मों का साथ हो। लेकिन सफर के दौरान की घनिष्ठता, श्मशान वैराग्य की तरह, सिर्फ  उस सफर तक या थोड़े समय बाद तक ही मौजूद रहती है। सफर खत्म होने के बाद, जब लोग अपने - अपने परिवेश में रम जाते है तो वह सफर, किसी सुखद सपने की तरह याद तो आता है लेकिन, उसकी बुनियाद पर, हम सफर के घर पहुँच कर उससे मिलने कि बात सोचना ही बेमानी सा लगता है। राम जनम को लेकर, इतने अर्से तक ठीक ऐसा ही कुछ, उसके साथ भी होता रहा था और वह राम जनम के यहाँ जाने की कभी सोचा तक नहीं था।
समूचे मुसाफिरखाने में, उसके सिवा दूसरा एक भी मुसाफिर नहीं था। स्टेशन का भी वह एक चक्कर लगा आया था लेकिन वहाँ भी उसे कोई मुसाफिर नहीं दिखा था और न ही कोई ऐसी जगह दिखी थी जहाँ वह सुकून से हाड़ कॅपाती इस ठंड में अपनी रात काटता। ऐसे में रामजनम के घर जाने के सिवा, उसके पास दूसरा कोई विकल्प ही नहीं बचा था।
रामजनम का घर, स्टेशन से ज्यादा दूर नहीं था, और उसने उसकी डायरी में जिस तरह, अपने घर पहुँचने का पूरा नक्शा बना रखा था, उससे वह उसके पते तक बड़ी आसानी से पहुँच भी लिया था। लेकिन उसके पते पर पहुँचने पर जो दृश्य उसकी आँखो के सामने पेश आया था, उसे देखकर वह विचलित हो उठा था। रामजनम ने उसे बताया था कि वह बैंक में बाबू है और उसका अपना खुद का बड़ा मकान है। लेकिन जिस जगह वह, अपने मकान होने की बात बताया था वहाँ दूर दूर तक मकान जैसा कुछ भी नहीं था। वहाँ थी तो, कोलियरी के काफी पुराने और जर्जर धौरों ( छोटे - छोटे घरों ) वाली एक बस्ती।
जिस जगह वह खड़ा था वहाँ से थोड़ी दूर पर, एक पुराना नीम का पेड़ था। जिसके चारों तरफ बड़ा चबूतरा बना हुआ था और उस चबूतरे पर मर्दो की दो गोल, गोलियां कर बैठी हुई थी और हर गोल के बीच, दो तीन दारू की बोतलें और एक बड़े पत्तल पर चिखना रखा हुआ था। सबके हाथ में काँच की छोटी गिलासें थी और वे बोतल से उड़ेल -  उड़ेल कर, चखने के साथ दारू पीने में जुटे हुए थे। चबूतरे से सँटकर कोयले का एक बड़ा ढेर जल रहा था। जिस तरह नीम के पेड़ के चबूतरे पर शाराबियों की दो गोल, दारू पीने में मशगूल थी उसी तरह, जलते कोयले की ढेर को घेरकर, दो और गोल दारू की बोतलों के साथ जमी बैठी थी। उनसे थोड़ा हटकर कम उम्र के बच्चे कंचे खेल रहे थे। नीम के चबूतरे से थोड़ा हटकर राख के तीन बड़े ढूहे थे। धौरों की तरफ  से एक नाली इधर को ही आई हुई थी और कूड़े कताउर और राख के ढूहों के चलते उसका आगे का रास्ता बंद हो चुका था, जिसके चलते धौंरो का सारा पानी, एक जगह जमा होकर, कीचड़ से बजबजाती,छोटी गड़ही सरीखी बन गई थीऔर उसमें सुअरो का एक झुंड लोट - पोट करने के साथ, आपस में लड़ भी रहे थे। जलते कोयले से अलकतरे की गंध का धुंआ, बजबजाते कीचड़ की सड़ांध और वैसे ही गंदे और दारू के नशे में चूर लोगों को देख उसका मन गिजगिजा उठा था।
राम जनम बैंक में बाबू हैं। वह इतनी गंदी जगह और इन सुवरों और शराबियों की बस्ती में रह कैसे सकता है? उसने मुझे यह भी बताया था कि उसका अपना खुद का एक बड़ा मकान है, लेकिन यहाँ, इन धौरों के अलावा, दूर - दूर तक कोई मकान भी कहीं नहीं दिख रहा है? कही मैं गलत जगह तो नहीं आ गया हूँ?
राम जनम के बारे में, लोगों से दरयाफ्त करके, पता करे या नहीं, वह अभी सोच ही रहा था कि इसी बीच शराबियों की गोल से एक आदमी उठकर उसके पास आया था और लड़खड़ाती जुबान में उससे पूछा था - आप किसे खोज रहे है बाबू ऊ ऊ।
- यहाँ कोई रामजनम नाम का आदमी रहता है।
- राम जनम, कौन रामजनम, दारू के नसे से झखियाया अपने दिमाग पर जोर लगाकर वह रामजनम के बारे में सोचा था।
- रामजनम जो बैक में बाबू है।
- बैक में बाबू ऊ हुँ । थोड़ी देर सोचने के बाद भी रामजनम, जब उसके ध्यान में नहीं आया था तो वह नीम के चबूतरे पर गोलिया कर बैठे लोगो से दरयाफ्त किया था - यहाँ बैक का बाबू  रामजनम कौन है रे भाई।
- अरे बाकल बाबू अपने रामजन्मा के बारे में पूछ रहा होगा। जवाब में चबूतरे पर बैठा एक आदमी उसे जोर से डांटा था।
- ओ ओ ऽ ऽ ऽ तभी तो हम कहे ...  जनम यहाँ कवन है रे भाई। इतनी देर में, जो आदमी चबूतरे से उसे डांटा था वह वहाँ से उठ कर उसके पास आ कर खड़ा हो गया था। हालाँकि वह भी काफी पिया हुआ था लेकिन पहले वाले की तरह न तो उसकी जुबान बेकाबू थी और न ही शरीर ही।
- रामजनम जो बैक में काम करता है आप उसी को खोज रहे है न बाबू।

- हाँ ... हाँ ... मै उसे ही खोज रहा हूँ।
-बाबू ऊ इस धौरे के पीछे जो धौरा है न, उसी लाइन में रामजन्मा का डेरा हैं इधिर से आप चले जाओं, उसके डेरे के सामने नीम का बड़ा पेड़ है।
- राम जनम ने मुझे बताया था कि वह बैंक में बाबू है।
- यह तो हम बता नहीं सकता बाबू, लेकिन वह बैंक में काम जरूर करता है।
- क्या तुम मुझे, उसके डेरे तक नहीं पहुँचा दोगे?
उसके आग्रह पर वह उसे बड़ा खुशी मन से रामजनम के डेरे पर पहुँचा आने के लिए राजी हो गया था।
रामजन्मा गे ए ऽ ऽ गे ए रामजन्मा आ ऽ ऽ। रामजनम के दरवाजे पर पहुँचकर वह उसे, जोर - जोर से आवाज लगाने के साथ, उसके किवाड़ का सांकल भी खटखटाया था। दो तीन आवाज के बाद, राम जनम घर का दरवाजा खोल, अपने दोनों हाथों से दरवाजे की दोनों तरफ  की कवही थाम, सवालिया नजरों से आंगतुक को ताकता खड़ा था।
- देख ई बाबू, तोहे खोजि रहलो छिए!
- कौन? उसके चेहरे पर गहरे से ताक रामजनम उसे पहचानने की कोशिश किया था लेकिन वह उसे नहीं पहचान सका था।
- मुझे नहीं पहचाने न मेरे दोस्त।
- नहीं। इनकार में अपना सिर हिला, रामजनम दरवाजे की कवही छोड़ उसके एकदम करीब आकर, उसे पहचानने की कोशिश किया था लेकिन फिर भी वह उसे नहीं पहचान सका था। सचमुच, मैं आपको नहीं पहचाना।
- काफी अर्सा पहले हम दोनों ट्रेन में मिले थे। तुमने मेरी डायरी में अपना पता लिखकर मुझे दिया था यह देखो, और वह अपनी जेब से छोटी डायरी निकाल, जिस पन्ने पर रामजनम अपने घर का पता लिखा था, उसे खोलकर उसके सामने कर दिया था।
- ओ ओ ऽ ऽ ऽ ओ ऽ ऽ तो आप हैं? डायरी में खुद के हाथ की लिखावट देख रामजनम को ट्रेन के सफर के दौरान, उसके साथ की मुलाकात, याद पड़ गई थी और वह उसे बड़ा धधाकर अपनी बाहों में भर लिया था। आओ, मेरे दोस्त, आओ, रामजनम के इस गरीब खाने में तुम्हारा स्वागत है। रामजनम उसे पाकर एकदम से निहाल हो उठा था। आओ मेरे दोस्त आओ। दरअसल तुमने अपना चेहरा पूरी तरह चद्दर से तोप रखा है न इसीलिए मैं तुम्हें नहीं पहचान सका।
गुफानुमा रामजनम के एक कमरे वाले धौरे में, छोटा सा एक आँगन था। आगे करीब पाँच बाई दस फुट का एक बरामदा था जिसे राम जनम अपनी रसोई की मसरफ  में लिया हुआ था। उसकी औरत उस समय, कोयले की अंगीठी पर रोटियाँ सेक रही थी। सुरंग नुमा उसकी कोठरी, पूरी तरह खुली हुई थी। भीतर उसके, ताखे पर एक ढिबरी जल रही थी। उसके पहुँचने के पहले, उसके चार बच्चे कोठरी में धमाचौकड़ी मचा रखे थे लेकिन उसे आया देख, सब अपनी धमाचौकड़ी बंद करके, किवाड़ की ओंट से उसे बड़े कुतूहल से निहारते खड़े थे। उसकी पत्नी उसे देख, जमीन से पल्लू उठाकर अपने सिर पर डाल ली थी।
उसे बैठाने के लिए रामजनम, कोठरी के भीतर से दो प्लास्टिक की कुर्सियाँ निकाल बरामदे में डाल दिया था। कंधे से टंगा बैग नीचे उतार कर वह जमीन पर रखा था और कुर्सी पर बैठ रामजनम के समूचे घर का सरसरी नजरों से फिर से मुआयना किया था। रामजनम के घर में इन दो कुर्सियों के अलावे कोई खटिया या पलंग नहीं थी। हालांकि रामजनम के कपड़े गंदे नहीं थे और न ही वही वैसा गंदा था जितना गंदा उसका घर, घर के सामान, बच्चे और उसकी औरत थी। इतने गंदे माहौल में और एक कोठरी वाले इस घर में, वह अपने रहने की जगह तलाशने के साथ - साथ, वहाँ दस पन्द्रह घंटे कैसे गुजारेगा, इसके लिए खुद को तैयार करने लगा था।
रामजनम अपनी पत्नी को चाय बनाने को कहकर दूसरी कुर्सी उसके एकदम करीब खींचकर बैठ गया था और उसका हाथ अपनी दोनों हथेलियों में दबाकर चहका था। दोस्त आज सुबह से ही रह रहकर मेरा मन प्रफुल्लित हो उठता था, लगता था आज मेरे घर जरूर मेरा कोई अजीज पहुँचने वाला है। और मेरी खुशनसीबी देखो कि तुम जैसा दोस्त मेरे घर पहुँचा गया।
दरअसल मेरे एक रिश्तेदार की मृत्यु हो गई थी। उसी की तेरहवीं में मैं पेटरवार आया हुआ था। वापस लौटने के लिए स्टेशन पहुँचा तो पता चला गाड़ी अठारह घंटे लेट है। मेरे पास प्रचुर समय था सोचा चलकर तुमसे मिल आते है।
रामजनम अपने बारे में जितना उसे बताया था उसकी बुनियाद पर वह उसे किसी सभ्य घर परिवार और अच्छी हैसियत का आदमी समझ रखा था। लेकिन वहाँ वैसा कुछ भी नहीं था। इतनी देर में जो कुछ वह देख चुका था, उससे उसे लगने लगा था कि वह, बहुत ही बुरी जगह और बुरे लोगों के बीच आ फंसा है कि रामजनम बहुत बड़ा झुठ्ठा और ठग है और उसे जितनी जल्दी हो, यहाँ से भाग निकलना चाहिए। इसलिए वह रामजनम से कुछ इस तरह बतियाया था जैसे वह उसके साथ चाय पानी करके तुरंत, यहाँ से निकल जाएगा।
- बहुत अच्छा किए मेरे दोस्त, मैं तुम्हें पाकर धन्य हुआ। हमारे पास अठारह घंटे का समय है। मौसम भी आज काफी अच्छा है दोनों मिलकर इसका खूब जश्न मनाएगें ठीक है न? रामजनम उसके कंधे दबा जोर से चहका था।
रामजनम की पत्नी कांच के दो गिलास में, लाल चाय उन्हें पकड़ा गई थी। चाय गरम थी इसलिए रामजनम अपना गिलास, जमीन पर रख अपनी कुर्सी खींच उसके काफी करीब सँट कर उससे शिकायत किया था - मुद्दत बाद तुम्हें मेरा ख्याल आया, मेरे दोस्त। कहाँ थे इतने दिनों तक।
- झुठ्ठा साला, देखो कैसे बन रहा है। इसकी बात से लगता है जैसे इतने दिनों तक यह मेरी ही राह निहारता बैठा हुआ था। लेकिन उसने उसे कोई जबाब नहीं दिया था।
- तुम्हें मेरा घर ढूँढ़ने में कोई परेशानी तो नहीं हुई मेरे दोस्त।
- नहीं ... नहीं कोई परेशानी नहीं हुई। बड़ी आजिजी से उसने उसे जबाब दिया था।
रामजनम अपनी चाय खत्म करके उससे थोड़ी मोहलत लेकर अपनी कोठरी में घुस गया था और थोड़ी देर बाद, जब वह कोठरी से बाहर निकला था तो उसकी हुलिया देख उसकी आँखे फैली की फैली रह गई थी। सिर पर क्रोसिए से बुनी गोलौवा टोपी, टेरीकाट के सफेद कुर्ते के ऊपर काली जैकेट, नीचे चेकदार लुंगी और आँख में मोटा सुरमा डाल वह खाटी मुसलमान का रूप धर रखा था।
- चलो मेरे दोस्त चलते हैं, रामजनम आगे बढ़कर, जमीन पर पड़ा उसका बैग उठाया था और अपने कंधे पर टांग, दरवाजे की तरफ  बढ़ गया था। विस्मय से कुछ देर, रामजनम की पीठ पर अपनी नजरे गड़ाए बैठा रहने के बाद, यह जानने के लिए कि वह उसे कहाँ ले जाना चाहता है, अंगीठी पर रोटियां सेंकती रामजनम की पत्नी की तरफ सवालिया नजरों से देखा था। लेकिन रामजनम की पत्नी, अपने काम में कुछ इस तरह मशगूल थी, जैसे उसे, उन दोनों में से, किसी से कोई मतलब ही न हो। हारकर वह वहाँ से उठा था और रामजनम के पीछे - पीछे चल पड़ा था।
रास्ते में एक कलाली ( शराब घर ) के पास पहुँचकर, रामजनम उसे थोड़ा रूकने के लिए कहकर, कलाली की तरफ  गया था और जब वहाँ से वह लौटा था तो उसके एक हाथ में देशी शराब की दो बोतलें और दूसरे में पालीथीन की थैली में बकरे का गोश्त था। अब मजा आयेगा मेरे दोस्त, चलो चलते हैं।
- लेकिन कहाँ, तुम मुझे कहाँ ले जाना चाहते हो राम जनम? जब से वह राम जनम के साथ उसके घर से निकला था यह सोचकर खुद को जव्त किए रखा था कि रामजनम चाहे कितना झुठ्ठा और फरेबी क्यों न हो, जिस आत्मीयता से उसके साथ पेश आ रहा था, वैसे में वह उसके साथ कुछ बुरा या उल्टा - पुल्टा तो नहीं ही करेगा। लेकिन जब वह उसे चलने को कहकर आगे फुटुस की घनी झाड़ियों के बीच से गुजरती पगडंडी की तरफ  बढ़ा था तो उसे उसके इरादों पर शक हो उठा था और वह उस पर एकदम से चीख पड़ा था।
उसकी चीख पर रामजनम रूक गया था और हैरान नजरों से थोड़ी देर उसके चेहरे का मुआयना करने के बाद, मुसकुराते हुए उससे कहा था - मैं तुम्हारी परेशानी समझ गया मेरे दोस्त, तुम राम जनम को बड़ा ही लुच्चा और शातिर दिमाग आदमी समझ रहे हो। सोच रहे हो कि राम जनम मुझे जरूर किसी गढ्ढे में ढकेलने के लिए लिए जा रहा है। लेकिन सच मानो मेरे दोस्त, जैसा तुम सोच रहे हो राम जनम वैसा आदमी नहीं है। फिर भी अगर तुम्हें मेरे ऊपर भरोसा नहीं है तो अभी कोई देर नहीं हुई है, चलो मैं तुम्हें वापस स्टेशन छोड़ आता हूँ।
- रामजनम, तुमने मुझे बताया था कि तुम बैंक में बाबू हो और तुम्हारा अपना खुद का बड़ा मकान है। लेकिन हकीकत में न तो तुम्हारा अपना कोई मकान है और न ही तुम बैंक में बाबू ही हो। जैसी गंदी बस्ती और घटिया लोगों के बीच तुम रहते हो उसमें चोर उचक्कों और उठाईगीरों को छोड़ कोई भला आदमी तो नहीं ही रहता होगा। यही नहीं, जब मैं तुम्हारे घर पहुँचा था तो मैं तुम्हें एक रूप में देखा था और अब मैं तुम्हें एकदम अलग ही रूप में देख रहा हूँ। और ऊपर से तुम मुझे इतनी कुबेला में अपना घर छोड़कर फुटुस के जंगलों के बीच लिए जा रहे हो ऐसे में तुम्हीं बताओ कि तुम्हारी सब बातें, तुम्हारे प्रति, किसी के भी मन में अविश्वास और आतंक पैदा करने के लिए काफी नहीं है क्या?
- हैं, और पूरी तरह है मेरे दोस्त। लेकिन तुम मुझे एक बात बताओ कि अगर मैं उस दिन तुम्हें बता दिया होता कि मैं जाति का हाड़ी ( स्वीपर ) हूँ। हाड़ी बस्ती में रहता हूँ, और टट्टी मैला धोने का काम करता हूँ तो क्या उस दिन का हमारा ट्रेन का वह सफर, जितनी मौज मस्ती में कटा था, वह वैसा ही कटता? और आज जो तुम मेरे घर पहुँचकर, मुझे निहाल कर दिए हो। यदि तुम रामजनम की सारी असलियतों और हकीकतों से वाकिफ  होते तब भी उसके घर आते?
- रामजनम मैं तुम्हारी बात से पूरी तरह कायल हूँ। सफर को खुशगवार बनाने के लिए। उस दिन की तुम्हारी झूठ, उस समय की एक बड़ी जरूरत थी लेकिन यह जो तुम बहुरूपियों की तरह अपना वेष बदलते चलते हो यह क्या है? रामजनम से यह सवाल पूछते समय उसकी आवाज काफी तल्ख हो उठी थी।
उसकी बात सुनकर रामजनम बड़े जोर का ठहाका लगाया था -  जानता हूँ मेरे दोस्त, कि तुम मेरे वेष बदलने को लेकर काफी परेशान हो। लेकिन सच मानों, मैं अपना वेश बदलता हूं तो किसी को ठगने और धोखा देने के लिए नहीं, बल्कि ऐसा करना मेरी मजबूरी के साथ साथ एक बड़ी जरूरत भी है।
- जरूरत ...।
- हाँ जरूरत, दरअसल हुआ यह था कि मैं एक मुसलमान औरत को बैठा लिया था। मुसलमानों ने कहा कि जब तक तुम मुसलमान नहीं बन जाते, तुम उस औरत को अपने पास नहीं रख सकते। मैंने कहा ठीक है मैं मुसलमान बन जाता हूँ और मैं कलमा पढ़कर मुसलमान बन गया। रामजनम यह बात जिस तरह बिना किसी लाग लपेट के और बेलौस कहा था उसे सुनकर उसे बड़े जोर का धक्का लगा था।
लेकिन तुम्हारे पास तो पहले से ही अपनी औरत और बच्चे थे, फिर तुम्हें ऐसा करने की क्या जरूरत पड़ गई थी। कहीं तुम्हारा प्यार - व्यार वाला चक्कर तो नहीं था उससे।
- नहीं ... प्यार व्यार जैसा कोई चक्कर नहीं था उससे।
- तब ?
- हुआ यूँ था कि उस औरत का मर्द, कोलियरी में काम करता था। चाल गिरने से वह उसके नीचे दबकर मर गया। उसके एवज में उसकी औरत को मोटा मुआवजा और नौकरी मिली थी। औरत अभी पूरा पठ्ठी थी और उसे मर्द की जरूरत भी थी। उससे शादी करने से मुआवजे के उसके पैसे, मेरे हाथ में आने के साथ साथ एक कमासुत पठ्ठी मेरे कब्जे में आ गई थी बोलो मेरे लिए यह कोई घाटे का सौदा था क्या? अपनी इस चालाकी पर इतराता हुआ रामजनम, अपनी गर्दन ऐंठ, उससे पूछता - अपनी देह अकड़ा लिया था।
- और सिर्फ  इतने से फायदे के लिए तुम, अपना धर्म छोड़कर, दूसरा धर्म तक कबूल कर लिए रामजनम।
- लेकिन ऐसा करके मैंने कोई गुनाह कर दिया क्या... मेरे दोस्त?
रामजनम को उसने कोई जबाब नहीं दिया था। हैरान सा वह सिर्फ उसे हिकारत भरी नजरों से घूरता खड़ा रहा था।
फुटुस ( छोटे झाड़ीदार पौधे ) का जंगल पार कर रामजनम उसे जिस बस्ती में लेकर पहुँचा था उसमें अस्वेस्टस सीट से छाए एक एक कमरे के घरों वाली कई कतारें थीं। उन्हीं कतारों में से एक घर के पास पहुँचकर वह उसके दरवाजे की कुंडी खटखटाने के साथ आवाज भी दिया था - बेगम दरवाजा खोलो।
राम जनम के बेगम कहकर पुकारने से वह समझ गया था कि यहाँ उसकी दूसरी बीबी रहती है।
यह कालोनी भी रामजनम के पहले वाली कालोनी की तरह ही गंदी थी। जगह जगह राख के ढूहे, कूड़े कताउर के ढेर और नालियाँ, यहाँ भी वैसे ही बजबजा रही थी जैसा वह इसके पहले देखकर आया था।
थोड़े इंतजार के बाद दरवाजा खुला था तो रामजनम की बीबी के रूप में जो औरत उसकी आँखो के सामने प्रकट हुई थी, वह उसे, देखता ही रह गया था। कमसिन और बेहद खूबसूरत चेहरा, गुदाज और ठॅसी हुई देह, बड़ी बड़ी आँखें, उम्र उसकी मुश्किल से अठारह साल की रही होगी। सलवार कुर्ते में वह उसे, औरत नहीं, बल्कि कालेज में पढ़ती कोई लड़की लगी थी।
- बेगम इससे मिलो, यह है मेरा जिगरी दोस्त शिवा। बचपन में हम दोनों साथ - साथ खेले खाए हैं। आज यह बैंक में बहुत बड़ा साहेब है। लेकिन इसका बड़प्पन देखो कि इतना बड़ा आदमी बन जाने के बाद भी यह मुझे आज तक नहीं भूला। रामजनम एक ही सांस में अपनी बीबी के सामने उसकी झूठी तारीफ  में इतना लम्बा चौड़ा पुल बांध दिया था कि उसे उसका मंुह पकड़ लेने का मन हुआ था। लेकिन बोलने के लिए वह अपना मुंह खोलता, इसके पहले ही रामजनम अपनी बीबी का उससे परिचय करवाने लग गया था - और मेरे दोस्त आप हैं मेरी बेगम अजरा। आप लोगों जैसे ही रईस घर की बेटी है आप। इन्हें पाकर मेरा तो जीवन ही धन्य हो गया है। अपनी बीबी का परिचय करवाने के बाद रामजनम अपने हाथ में पकड़ी दारू की बोतल और मीट का थैला उसकी तरफ  बढ़ा दिया था। बेगम यह पकड़ो मीट और यह दारू की बोतल। आज, आप मेरे दोस्त की ऐसी खातिर करें कि यह बार - बार हमारे गरीब खाने पर दौड़ा चला आता रहे।
रामजनम के घर के बाहर जैसी भी गंदगी रही हो लेकिन भीतर उसका घर पूरी तरह रंगा पुता और साफ  था। उसके इस घर में भी वैसी ही छोटी सी एक कोठरी और बाहर वैसा ही छोटा खुला बरामदा था। यहाँ भी, बरामदे को उन लोगों ने अपनी रसोई के मसरफ  ले रखा था। बरामदे में अंगीठी में कोयला दहक रहा था और उसके पास एक मोढ़ा रखा हुआ था। उनके आने के पहले, रामजनम का इंतजार करती, उसकी बीबी, अंगीठी की आग तापती बैठी हुई थी। बाहर काफी ठंड थी लेकिन बरामदा, अंगीठी की दहकती आग से गरम था। आओ मेरे दोस्त, हम लोग चलकर भीतर बैठते है। रामजनम उसकी पीठ पर हाथ रख बड़े आग्रह से उसे अपनी कोठरी में ले आया था।
छोटी सी उसकी कोठरी, काफी साफ सुथरी और सजी हुई थी। उनके सोने के लिए एक पलंग थी जिसके बिस्तरे पर साफ  चद्दर बिछी हुई थी। रामजनम उसे विस्तरे पर बैठा, खुद उसकी बगल बैठ गया था।
थोड़ी देर में रामजनम की बीबी दो प्याली चाय एक ट्रे में रखकर कोठरी में पहुँचा आई थी। उनकी चाय खत्म होते होते वह गरम गरम आमलेट, भुने मूंगफली के दाने, गिलास और दारू की एक बोतल, उनके पास रख आई थी।
- मान गया मेरे दोस्त, तुम हो बड़े ऊँचे दर्जे के शिकारी। दारू की कुछ घूँट हलक के नीचे उतरने के बाद उसके भीतर की तमाम झिझक और संकोच गायब होकर, कई बातें, जो उसके भीतर हलचल मचा रखी थी, वे उभरकर ऊपर आ गई थी। बड़े ऊँचे दर्जे के शिकारी हो मेरे दोस्त, मुझे तुमसे बड़ी ईर्ष्या हो रही है। उसकी बात से रामजनम समझ गया था कि दारू की नशा उस पर चढ़ गई है और उसी के सुरूर में वह ऐसी बात, जिसे उसे यहाँ नहीं करनी चाहिए, करने लगा है।
- इस्सस ऽ ऽ राम जनम अपने होंठ पर हाथ रख बाहर बैठी अपनी बीबी की तरफ  इशारा करके उसे ऐसी बात यहाँ न करने के लिए मना कर दिया था।
- मेरे दोस्त, वह सब कुछ तो ठीक है लेकिन एक बात मैं तुमसे पूँछू, तुम्हे बुरा तो नहीं लगेगा? रामजनम के मना करने पर वह कुछ देर मूंगफली के दाने चबाता और दारू की घूँटें भरता चुप मारे बैठा रहने के बाद, एक बड़ा ही अहम सवाल, जो उसे राम जनम की दोनों गृहस्थियाँ देखने के बाद, बुरी तरह परेशान कर रखी थी, उसके विषय में वह उससे जानना चाहा था। पूँछू, तुम्हें बुरा तो नहीं लगेगा मेरे दोस्त?
- तुम मेरे दोस्त हो। तुम्हारी कोई भी बात मुझे बुरी नहीं लगेगी। बेझिझक होकर पूछो मेरे दोस्त। रामजनम, तुम्हें सब बतायेगा। इतनी देर में रामजनम पर भी दारू अपना असर कर चुकी थी और इसके चलते वह भी खुद पर अपना नियंत्रण खोने लग गया था।
- तुम कुछ समय पहले हिंदू थे मेरे दोस्त और अब तुम मुसलमान हो। हो न?
- एकदम हूँ मेरे दोस्त और पूरी तरह हूँ।
- इसका मतलब तुम एक ही समय में दो अलग - अलग तरह की और एक दूसरे के एकदम विपरीत जिंदगियाँ जीते हो। बोलो जीते हो ना?
- हाँ जीता हूँ।
- ऐसे में, एक बात जो मेरी समझ में नहीं आयी वह यह है कि तुम अपनी इन दोनों जिन्दगियों के साथ तालमेल कैसे बिठाते हो?
- सच कहूँ मेरे दोस्त, तो मुझे अपनी दोनों जिन्दगियों में तालमेल बिठाने की कभी जरूरत ही नहीं पड़ती। थोड़ी देर सोचने के बाद, रामजनम हॅसते हुए उसे जबाब दिया था।
- अच्छा, वह कैसे?
वह इस तरह कि जब मैं रामजनम होता हूं तो मन्दिर जाता हूँ पूजा पाठ करता हूँ, होली दशहरा और दीवाली ठीक वैसे ही मानता हूँ जैसा एक हिन्दू मनाता है और जब मैं रमजानी होता हूँ तो मस्जिद जाता हूँ नमाज पढ़ता हूँ, ईद, बकरीद मानता हूँ और वैसा ही मैं अपनी दोनों बीबियों के साथ भी निभाता हूँ।
- कमाल है ... आश्चर्य से उसकी आँखे थोड़ी देर तक फैली रही थी और फिर एक बड़ी गहरी शरारत, उसके चेहरे पर तैर आई थी। कर लेते होंगे मेरे दोस्त, जरूर कर लेते होंगे क्योंकि बनने की कला में तुम बड़े ऊँचे दर्जे के कलाकार जो ठहरें। उसकी यह कटूक्ति और उसके कहने का अंदाज काफी चुभने वाला था और वह रामजनम को चुभा भी था लेकिन अपने स्वभाव के अनुरूप राम जनम उसकी इस कटूक्ति को कोई तवज्जो नहीं दिया था और उसे हंसकर उड़ा दिया था।
इसके बाद दोनों में कोई बात नहीं हुई थी। जिसकी भी गिलास की दारू खत्म होती, दूसरा बोतल से उड़ेलकर कर उसे भर देता और इस तरह दोनों दारू की चुस्कियाँ लेते बड़ी देर तक शराब पीते बैठे रहे थे।
मीट पककर तैयार हो गया था तो रामजनम की बीबी अंगीठी के पास चटाई डाल, दोनों को खाने पर बैठा, खुद रोटियाँ सेंकने बैठ गई थी और तवे से गरम गरम रोटियाँ उतारकर उनकी थालियों में परोस परोस कर उन्हें खिलाने लग गई थी। उसने गोश्त बड़ा लजीज बनाया हुआ था और वह और रामजनम दोनों उसे बड़े आग्रह और सत्कार से ज्यादा से ज्यादा खिला देने पर जुटे हुए थे। लेकिन रामजनम की अब तक की जिन कारगुजारियों से वह रूबरू हो चुका था, उसे लेकर उसकी तरफ  से उसका मन किसी बड़े षंड़यंत्र की आशंका से घिरा हुआ था। हालांकि दिखाने के लिए वह रामजनम से बड़ा हंस हंसकर बातें कर रहा था और खाने की तारीफ  कर करके बड़ा चटखारे ले लेकर खाना भी खा रहा था लेकिन उसकी चोर नजरें रामजनम और उसकी बीबी के चेहरों और हाव भाव से लेकर उसके घर के कोने - कोने में छुपे, संभावित खतरों की टोह लेने में जुटी हुई थी। इस आदमी से मेरी, महज कुछ घंटों की मुलाकात है और वह भी चलती ट्रेन के डिब्बे में। ऐसी मुलाकाते लोग याद रखने तक की जहमत नहीं करते। सफर खत्म हुआ और वे उसे भूल जाते हैं लेकिन यह शख्स मेरे साथ ऐसा गुड़ चिउँटा हो रहा है जैसे इसकी और मेरी जन्मों की दोस्ती रही हों। और इसकी बीबी, यह साली तो उससे भी ज्यादा छँटीं हुई लगती है। इस तरह हंस हंस कर मुझे खिला रही है, जैसे मैं इसका कोई पुराना यार होऊँ। इन दोनों के मन में जरूर कोई बड़ी खोट है नहीं तो भला, किसी अनजान और अपरिचित की कोई इतनी आवभगत कभी करता है क्या?
खाना पीना खत्म होते होते तक काफी रात बीत चुकी थी। रसोई का सारा काम समेट कर अपना हाथ सेंकने के लिए, रामजनम की बीबी अंगीठी के पास आकर बैठी थी तो राम जनम ने उससे कहा था - ऐसा है बेगम कि रात काफी हो चुकी है और ठंड भी आज बहुत ज्यादा है तुम ऐसा करो कि एक गोंदरी लाकर यहीं अंगीठी के पास डाल दो।
- खट ... खट ... खट...। घर के बाहरी दरवाजे की साँकल के बजने की आवाज थी यह। आवाज कान में पड़ते ही वह घबराकर विस्तरे पर बैठ गया था। रात के इस पहर में और बजाने वाले ने जिस दबे हाथ और आहिस्ती आवाज में साँकल खटखटाया था उसे सुन डर से उसका कलेजा मुंह को आने लग गया था।
खट्ट ... खट्ट ... खट्ट इस दफा सांकल के बजने की आवाज ज्यादा वजनी थी और बजाने वाले ने सांकल बजाने के साथ सांसो के जोर से रामजनम को आवाज भी दिया था। रामजन्मा गे ...। दरवाजे की खटर खटर और पुकारने वाले की आवाज पर रामजनम तो नहीं, लेकिन उसकी बीबी उठी थी और दबे पांव कोठरी से निकलकर बाहरी दरवाजे की सिटकिनी खोल देखी थी तो बाहर उसे शंकर और राम अवतार खड़े मिले थे।
- क्या हुआ, इतनी रात में? रामजनम की औरत, उन दोनों को अच्छी तरह जानती थी। दोनों रामजनम केधौरों की लाइन में रहते थे। वे ,उसके अच्छे दोस्त थे और दोनों कोलियरी में काम भी करते थे।
- रामजन्मा नहीं है क्या? राम औतार ने उससे पूछा था।
- हैं तो ... लेकिन बात क्या है? यह जान कर कि रामजनम घर में ही है, वे दोनों बिना और रूके या उसे कुछ बताए घर के अन्दर आ गए थे और अंगीठी की धधकती आंच में अपना हाथ सेकने लग गए थे।
रामजनम गहरी नींद में था। बीबी के काफी हिलाने, झकझोरने के बाद वह उठा था तो बीबी पर गुस्सा गया था। लेकिन राम औतार और शंकर पर नजर पड़ते ही उसका गुस्सा एकदम से ठंडा पड़ गया था। आज की रात उसे मुर्दा खोदने जाना था इसी के लिए वह उन दोनों को बुलाया हुआ था लेकिन यह बात उसके खुद के दिमाग से पूरी तरह उतर ही गई थी।
- चलना नहीं है क्या? राम औतार ने उससे पूछा था तो वह, झट उठकर खड़ा हो गया था। दिन में ही रामजनम व्यापारी से मुर्दे के लिए पाँच हजार रूपए की पेशगी थाम चुका था। सुबह होने के पहले, उसे कब्र से मुर्दा निकालकर, उसके हवाले कर देना था। शर्त के हिसाब से बाकी के दस हजार उसे, काम पूरा होने के बाद मिलने को था। धंधे की बात है यह और धंधे में पैसा उतना महत्वपूर्ण नहीं होता जितना कि किसी को दी हुई बात पर कायम रहना और वादे के मुताबिक काम करके दे देना। व्यापारी को कल ही यहाँ से कूच भी कर जाना था इसलिए किसी भी हाल में, उसे यह काम आज ही निपटा देना था। अगर यह काम आज रात नहीं हो गया तो इससे न सिर्फ  उसकी बतकटी होगी बल्कि उसकी साख को भी बट्टा लगेगा। रामजनम की यही सबसे बड़ी खासियत है कि वह जितना किसी से वादा करता है उतना और ठीक वैसे ही उसे पूरा भी करता है। इसी के चलते मार्किट में उसकी अच्छी शाख है और उसकी इसी साख के चलते, उसे सब पूछते भी है वर्ना यह काम करने वाले तो यहाँ अनेकों घूम रहे हैं।
बिस्तरे पर अपना दम साधे बैठा वह, कोठरी के बाहर चलती खुसुर पुसुर पर अपने कान लगाए उन लोगों के भीतर क्या बात हो रही है उसे सुनने की कोशिश में जुटा हुआ था। लेकिन वे लोग इतने आहिस्ते और दबी जुबान मे बतिया रहे थे कि उन्हें सुन पाना मुश्किल था।
बिस्तरे पर बैठे - बैठे, इन सालो का आसान शिकार बनने से तो अच्छा कि इनसे भिड़कर अपनी जान बचाऊं सोचा था उसने। अगर इन लोगों ने मिलकर मुझे कोठरी के भीतर दबोच लिया या बाहर से सांकल चढ़ाकर कोठरी में कैद कर दिया तो गुहार लगाने पर भी कोई नहीं सुनेगा इसलिए यहाँ से भाग लेना ही अच्छा है। यही सोचकर वह बिस्तरे से उतरकर, जल्दी जल्दी अपने कपड़े पहना था और कोठरी के बाहर आकर खड़ा हो गया था।
उसे बाहर खड़ा देख, शंकर और राम औतार एकदम से सकड़ से गए थे। दोनों ने पहले तो एक दूसरे को सवालिया नजरों से देखा था फिर वे रामजनम की बीबी को देखने लग गए थे। रामजनम उस समय आंगन में एक किनारे खड़ा, गिलास के पानी से अपना मंुह धो रहा था। मुँह धोकर, जब वह पीछे मुड़ा था तो उसे बरामदे में खड़ा देख, वह भी क्षण भर के लिए असहज हो उठा था। लेकिन तुरंत ही, खुद पर काबू करके, बड़े आत्मविश्वास के साथ वह उसके पास आया था और उसके कंधे पर हाथ रख हल्की झिड़की पिलाते हुए उससे कहा था - तुम क्यों उठ गये मेरे दोस्त, जाकर आराम से सोओ। दरअसल हम लोगों को अभी और इसी समय एक बहुत ही जरूरी काम निपटाना है इसलिए हम लोग बाहर निकल रहे हैं। इसके बाद, उसकी अचानक की उपस्थिति से हैरान परेशान शंकर और राम औतार को उसने बताया था अरे,  घबराओ नहीं यह मेरा पुराना लंगोटिया है अपना बहुत ही गहरा दोस्त।
इतनी नियाई रात में और कड़ाके की इस ठंड में इन तीनों को ऐसा कौन सा जरूरी काम आन पड़ा है जो इन्हें, अभी और इसी वक्त बाहर जाने की जरूरत पड़ गई? रामजनम की तुरंत बाहर निकलने की बात सुन वह बुरी तरह घबरा उठा था और इतनी ठंड में भी उसे पसीने छूट गए थे। हीलते कांपते, वह राम जनम के पास आया था और बड़ा मिमियाते हुए उससे पूछा था - क्या मैं भी तुम्हारे साथ नहीं चल सकता राम जनम?
- अगर तुम चलना चाहो तो चल सकते हो मेरे दोस्त, लेकिन इतनी ठंड में तुम परेशान हो जाओगे।
राम अवतार अपने साथ, दो बोतल दारू की ले आया था। चारों बैठकर, बिना किसी चिखना के शराब की बोतल खाली किए थे और बाहर निकल पड़े थे। राम औतार के हाथ में एक फावड़ा और शंकर के हाथ में एक गैंता था। रामजनम छोटा सा सावेल, प्लास्टिक की बोरी, अपने एक हाथ में और दूसरे में छोटी टार्च ले रखा था। तीनों आगे आगे एक लाइन में चल रहे थे, सबसे पीछे वह था।
- हम लोग कहाँ और क्या करने जा रहें हैं? बस्ती से निकलकर चारों निचाट में पहुँचे थे तो उसने राम जनम से पूछा था। लेकिन रामजनम कुछ बताने की बजाय, इस्स की आवाज निकाल, उसे बोलने के लिए मना कर दिया था।
थोड़ी देर में चारों एक निहायत ही वीरान जगह में पहुँचे थे। रामजनम, राम औतार और शंकर को काम पर लगाकर, उसे अपने साथ लिया था और दोनो एक चबूतरनुमा जगह पर जाकर बैठ गए थे। जहाँ वे बैठे थे, उससे थोड़ी ही दूर पर राम औतार और शंकर भुकुर भुकुर कुछ खोद रहे थे लेकिन क्या खोद रहे थे, अंधेरे में, उसे कुछ भी दिखाई नहीं पड़ रहा था। जिस चबूतरे पर वह बैठा था, हाथ से टटोलकर, जगह का अंदाजा लगाया था, तो उसे लगा कि वह किसी कबर पर बैठा हुआ है और कबर का ख्याल आते ही वह डरकर बगल बैठे रामजनम से एक दम से लिपट गया था। उसे लगा था कबर के भीतर गड़ा आदमी वहाँ से निकलकर अपना कंकालनुमा पंजा, उसकी गर्दन पर रख दिया है। वह बड़े जोर से चीख पड़ता, यदि रामजनम उसे, अपनी बांह में भरकर, जोर से भींच नहीं लिया होता।
- क्या हुआ मेरे दोस्त, तुम इतना डर क्यों गये? सांस के जोर से रामजनम डांटते हुए उससे पूछा था।
- हम लोग किसी की कबर पर बैठे हुए हैं क्या?
- हाँ यह कबर ही है।
- वे लोग क्या खोद रहे हैं?
- वे लोग, कबर खोद रहे हैं लेकिन इस समय हमें कुछ बोलना नहीं है हमारी जान काफी खतरे में हैं। रामजनम की हिदायत पर एकदम से चुप्पी साध लिया था उसने।
- काम हो गया बास। कबर खोदकर, उसका मुर्दा बाहर निकाल लेने के बाद राम औतार, उसके पास आकर, बड़ा फसफुसाते हुए उसे बताया था।
- इतनी जल्दी?
उसकी बात सुन, रामजनम के मन में गहरी शंका उठ खड़ी हुई थी। इतनी जल्दी इन दोनों ने कबर खोद कैसे लिया? इत्मीनान करने के लिए वह, कबर के पास जाकर टार्च की रोशनी में मुर्दे को देखा था तो उसे सारी गड़बड़ समझ में आ गई थी। दरअसल, दिन की रोशनी में, वे लोग जिस कबर को खोदना तय किये थे, नशे में धुत्त होने की वजह से दोनों उसे न खोदकर, बगल की एक ताजा तरीन कबर, जिसमें कल ही मुर्दा दफन किया गया था, उसे खोदकर, उसका मुर्दा बाहर निकाल लिये थे।
- यह क्या कर दिया तुम दोनो ने? साबुत और ताजा मुर्दा देख रामजनम बुरी तरह झल्ला उठा था।
- हाँ बास, यह तो बहुत बड़ा भूल हो गिया। दरअसल झोंक में कुछ पता ही नहीं चला। शंकर बड़ा गिड़गिड़ाते हुए राम जनम से अफसोस प्रकट किया था।
- अच्छा छोड़ उसे, चल इसे खोदते हैं।  कल उसे देने का वादा कर लिये हैं। नहीं मिलने पर वह गुस्सा करेगा। इसके बाद वे तीनों बगल की एक काफी पुरानी कबर खोदने में जुट गये थे।
साबुत मुर्दे को कबर के भीतर, वापस दफनाने में काफी वक्त लगता और ज्यादा देर तक वहाँ रूकने में काफी जोखिम भी था, इसलिए रामजनम, पुरानी कबर का कंकाल, बोरी में भरकर अपने कंधे पर लादा था और राम औतार और शंकर साबुत मुर्दे को अपने कंधों पर लाद चल पड़े थे। थोड़ी देर चलने के बाद चारों एक छोटी पुलिया के पास पहुंच कर रूक गए थे। रामजनम कुछ बोला नहीं था। इशारे से उन दोनों को आगे बढ़ने के लिए कहकर टार्च की रोशनी फेंक उनका रास्ता दिखाने लग गया था। पुलिया के नीचे से एक जोहड़ बहता था। ताजा मुर्दे को कंधे पर लादे लादे रामऔवतार और शंकर पुलिया के नीचे गये थे और मुर्दे को पानी में उतार, दो तीन बड़े पत्थरों से उसे दबाकर रामजनम के पास वापस आ गये थे।
- ठीक से दबा दिया है न?
- हाँ दबा दिया बास।
लेकिन रामजनम को उनकी बात का भरोसा नहीं हुआ था। वह खुद जोहड़ के पास जाकर टार्च की रोशनी में पानी में दबे मुर्दे को देखा था और मुर्दा ठीक से दबाकर रखा गया है इस बात का इत्मीनान हो लेने के बाद वापस आ गया था।
शंकर और राम औतार को वहीं से विदा करके रामजनम बोरी का कंकाल अपने कंधे पर लाद चल पड़ा था। थोड़ी देर चलने के बाद फुटुस का एक छोटा जंगल पड़ा था। जंगल पार करने के बाद, एक बंगला आया था। बंगला, बड़ी एकान्त और सुनसान जगह में था लेकिन वह काफी विशाल था और उसके चारों तरफ काफी लंबी और ऊँची बाउण्ड्री थी और बाउण्ड्री पर चारों तरफ  वैपर लाइटें दगदगा रही थीं।
जैसे ही वे दोनों बंगले के गेट पर पहुँचे थे भीतर से दो अल्सेसियन कुत्ते शेरों की तरह दहाड़ते गेट की तरफ  दौड़ पड़े थे। कुत्तों के गेट पर पहुँचने के थोड़ी ही देर बाद एक आदमी हाथ में राइफल लिये गेट पर आया था। वह खुद को सिर से लेकर पाँव तक मोटे ऊनी कम्बल से ढाप रखा था लेकिन चेहरा उसका खुला हुआ था। उसका चेहरा बाघ की तरह बड़ा था और उसी की तरह खूँखार भी था।
- यह कौन है ? राम जनम के साथ, दूसरे आदमी को खड़ा देख, गुर्राती आवाज में उसने उससे पूछा था।
- यह मेरा दोस्त है हुजूर। उसके पूछने पर रामजनम बुरी तरह सिकुड़ सा गया था। अपनी सफाई में करीब करीब हकलाते हुए उसने उसे बताया था, इस बेवकूफ  को मैं अपने साथ आने से मना किया था हुजूर, लेकिन यह नहीं माना।
- हऊ ऊम ऽ ऽ ऽ रामजनम को इस तरह की गलती दोबारा नहीं करने के लिए वह उस पर गुर्राकर रूपयों की एक गड्डी उसकी तरफ उछाल वापस लौट गया था। रूपयों की गड्डी हवा में फड़फड़ाती, रामजनम के ठीक सामने आकर गिरी थी। वह दौड़कर उसे जमीन से उठा लिया था और अपने माथे से लगा बिना गिने ही अपनी भीतरी जेब में डाल बोरी का कंकाल वहीं गेट पर छोड़ अपने घर आ गया था।
रामजनम के साथ वह जिस डरावनी और हैरत अंगेज दुनिया से गुजर कर वापस लौटा था, उसे लेकर उसका दिमाग उड़ सा गया था। घर पहुँचकर रामजनम तो पहले की तरह ही बरामदे के अपने बिस्तरे पर लेट गया था और थोड़ी ही देर में खर्राटे भरने लग गया था लेकिन वह बदहवास सा अपनी आँखे फाड़े चारों तरफ  ताकता बिस्तरे पर बैठा रहा था।
सुबह पता नहीं वह और कितनी देर सोया रहता, यदि राम जनम के दरवाजे के पिटने की आवाज से उसकी नींद टूट न गई होती। दर असल हुआ यह था कि रात में वे लोग जिस आदमी की ताजी लाश कबर से खोद लाए थे उसके घर वाले सुबह जब अगरबत्ती जलाने और फूल चढ़ने के लिए कबर पर पहुंचे थे तो यह देख कर हैरान रह गए थे कि उनकी कबर न सिर्फ खुदी हुई है बल्कि उसमें दफनाई लाश भी नदारद है। और जब लोगों ने देखा कि उस कबर से सटी, एक दूसरी काफी पुरानी कबर और भी खुदी हुई है और उसका भी कंकाल नदारत है तो उन्हें यह समझते देर नहीं लगी थी कि कोई आदमी रात में कबर खोद कर उसमें दफन उनके अजीज की लाश निकाल ले गया है।
कबर में दफन आदमी यदि जिंदा रहते कहीं भाग गया होता या नदी तालाब में कूद कर अपनी जान दे दिया होता तो शायद इस घटना से उसके घर वालों के दिल को उतना आघात नहीं पहुंचता, जितना आघात उन्हें कबर के खुदने और उसमें से उनके अजीज की लाश निकाल लिए जाने से पहुंचा था। उन्हें लगा था जैसे कि खोदने वाला, कबर खोदकर, उनके अजीज की लाश नहीं उठा ले गया है बल्कि, जिस अभेद्य और स्थाई दुर्ग में वे उसे पृथ्वी के रहने तक निश्चिंत और सुरक्षित रहने के लिए पहुंचा आए थे उसे ढहाकर उसने उसे दरबदर करके हमेशा - हमेशा के लिए भटकने के लिए छोड़ दिया है। अपने अजीज की दुर्गति का यह खयाल उन्हें बुरी तरह परेशान करके रख दिया था। इसे लेकर जहाँ एक तरफ लोग गहरे सदमे में थे वही दूसरी तरफ वे बुरी तरह उत्तेजित थे और उनमें गहरा रोष था।
घर के लोग कब्ररिस्तान से लौटकर इस खौफनाक घटना की जानकारी किसी को देते, इसके पहले ही यह खबर उड़कर उनकी बस्ती में पहुँच गई थी। और इसके बाद इस तरह की तमाम खबरों के मिलने पर जैसा होता है वैसा ही सब कुछ इस खबर के बस्ती में पहुंचने के बाद भी हुआ था। खबर सुनकर पहले तो लोगों को जैसे हजार वोल्ट के करेंट का झटका सा लगा था और जो जहाँ और जिस हाल में था एक दम से सुन्न रह गया था कुछ इस तरह जैसे उनकी शरीर की सारी चेतना ही खींच ली गई हो। अपनी इस हाल से किसी तरह उबर कर जब लोग अपनी चेतना में लौटे थे तो उनके सिर पर अजीब तरह का पागलपन सवार हो गया था और वे हा हा करते अपने घरों से निकल कर जिस घर के आदमी की लाश गायब हुई थी उसके घर की तरफ  दौड़ पड़े थे। और देखते ही देखते उस घर के दरवाजे पर लोगों की भारी भीड़ जमा हो गई थी। यह एक ऐसी भीड़ थी जो पहले से ही बुरी स्तब्ध, उत्तेजित और गुस्से से भरी हुई थी। लेकिन जब वहां मौजूद कुछ शातिर दिमाग लोग इस घटना को उनके अस्तित्व और अस्मिता का सवाल बताकर, उन्हें ललकारना शुरू कर दिए थे तो फिर भीड़ अपना आपा खो बैठी थी और अररते घहरते रेल रोकने, रोड़ जाम करने और बसे तोड़ने, जलाने के लिए बस्ती से निकल कर सड़कों पर आ गई थी।
धाड़ ... धाड़ ... धाड़, राम जनम के घर के दरवाजे के पिटने की आवाज थी यह। आवाज इतनी तेज और कर्कश थी कि गहरी नींद में होने पर भी उसे लगा था जैसे कोई उसके कान के पास नगाड़ा पीट रहा है। इसे सुनकर उसकी नींद टूट गई थी और वह हड़बड़ाकर बिस्तरे पर बैठ गया था।
- अरे कुछ सुना तैने? दरवाजा भड़भड़ाकर खुला था तो कोई दौड़कर भीतर आया था और घबराई आवाज में राम जनम से पूछा था।
- क्या हुआ तू इतना घबराया क्यों है?
चारो तरफ  बहुत बड़ा हंगामा मचा हुआ है। पुलिस जगह - जगह छापा मारी करके, लोगों की धर पकड़ कर रही है, कही वह इधिर ...। राम औतार था यह जो घबराया, राम जनम को यह बुरी खबर सुना रहा था।
- बे हू ऊ ऊ दा आ ऽ ऽ कही वह आ ऽ ऽ, बस इतनी सी बात के लिए तू सबेरे - सबेरे मेरी नींद हराम करने पहुंच गया। नींद में खलल पड़ने से राम जनम, राम औतार पर बुरी तरह झल्ला उठा था। पुलिस छापा मारती है तो मारने दे इसमें इतना घबराने का क्या है?
- लेकिन चारों तरफ मचे हंगामे और पुलिस की छापा मारी की खबर सुन इतनी ठंड में भी वह पसीने - पसीने हो उठा था। इसके बाद कोठरी में उसका रूका रहना मुश्किल हो गया था और वह वहाँ से भागकर बरामदे में आकर खड़ा हो गया था। राम जनम, राम औतार को जिस बुरी तरह डाँट रहा था उसे देख कर वह भौचक था। इन लोगों ने इतना बड़ा कांड कर दिया है और इसे लेकर, सारे शहर में हंगामा मचा हुआ है और पुलिस चारों तरफ  छापामारी करके लोगों की धर पकड़ कर रही है लेकिन इस शख्स को न तो अपने किए का कोई पश्चाताप है और न ही पुलिस या और किसी की जरा सी डर ही है।
राम जनम से डांट खाकर, राम औतार वहाँ से चला गया था तो वह बड़ा डरते डरते, राम जनम की बगल आकर बैठ गया था और उसका कंधा पकड़, बड़ी घिघियानी आवाज में उससे पूछा था - राम जनम मेरे दोस्त, मैं अपने घर सुरक्षित पहुंच जाऊँगा तो?
- तुम एकदम निश्चिंत रहो मेरे दोस्त, इसमें न तो तुम्हें कुछ होगा, न ही मुझे। और न ही किसी और को। तुम एकदम सकुशल और खुशी - खुशी, अपने घर पहुंचोगे। जब तक राम जनम है तुम्हें जरा सा भी डरने की जरूरत नहीं है.. अंय।
- लेकिन राम जनम तुम यह बात, इतने दावे के साथ कैसे कह रहे हो। कहीं तुम मुझे छल तो नहीं रहे हो? बड़ा अधीर हो वह मिमियाकर,राम जनम के सामने, अपना चेहरा रोप दिया था।
इतने दावे के साथ, ऐसा मंै इसलिए कह रहा हूं मेरे दोस्त कि अगर यह बात राम जनम की होती तो पुलिस मेरे घर कब की पहुंच चुकी होती। लेकिन जिन लोगों ने इसे करवाया है न वे बड़ी ऊंची पहुंच वाले आदमी है इसलिए पुलिस या और कोई हम लोगों पर हाथ कभी नहीं डालेगा। राम जनम जितने विश्वास और निडरता के साथ उसकी पीठ थपथपाकर उससे यह बात कहा था उससे उसे बड़ी आश्वस्ति और सुकून मिला था।
नित्यक्रिया से निपटने के बाद, हाथ मुंह धोकर, जब राम जनम और वह धधकती अंगीठी के पास मूढ़े डाल, चाय पीने बैठे थे तो एक बात जो उसे लगातार मथे डाल रही थी, उसे उसने राम जनम से पूछ लिया था - राम जनम तुम लोगो ने कबर से मुर्दा उखाड़ने के बाद उसे जोहड़ के पानी में क्यों दबा दिया था?
- दर असल वह मुर्दा ताजा था। व्यापारी को सिर्फ  कंकाल की जरूरत होती है इसलिए उसे सड़ने के लिए हम लोगों ने वहां दबा दिया है। जब वह पूरी तरह सड़ जाएगा तो उसे निकाल धोकर हम लोग साफ कर लेंगे और उसका कंकाल व्यापारी को सौंप देंगे।
- व्यापारी को ओ ऽ ऽ।
- हाँ ....।
- इसका मतलब तुम लोग यह काम व्यापार की तौर पर करते हो।
-हाँ ....।
लेकिन व्यापार के लिए तो काफी कंकाल की जरूरत होती होगी। तुम लोगों को इतना कंकाल भला मिलता कहाँ से हैं यही कबर खोद कर।
- नहीं यार, कंकालों की जितनी डिमांड है अगर हम लोग उसे कबरें खोद कर पूरी करने लगें तो सारी कबरें मुर्दों से खाली हो जाएगी। दर असल अस्पतालों और सड़कों से हमें बड़ी तादात में लावारिस मुर्दे मिल जाते हैं। हम लोग सड़ने के लिए उन्हें पानी में दबा देते है। जब वे पूरी तरह सड़ जाते है तो उन्हें निकिया धोकर साफ  कर लेते है। हाँ, कभी कभार कंकालों की मांग जब बहुत बढ़ जाती है और लावारिस मुर्दों से उसे पूरी करना मुश्किल हो जाता है तो उस सूरत में हम लोग कबरें खोदकर उसे पूरा करते है।
- लेकिन राम जनम, तुम इतना घटिया और नीच काम, भला करते ही क्यो हो?
राम जनम उसकी इस बात पर बड़े जोर से हँसा था और देर तक हँसता रहा था - इस काम को तुम घटिया और नीच कैसे कहते हो मेरे दोस्त?
- यह काम घटिया नहीं है राम जनम? जैसा बेहिचक होकर और जिस दृढ़ता के साथ रामजनम उससे यह बात कहा था उसे सुनकर उसे बड़ी हैरानी हुई थी।
- कतई नहीं ...। देखो मेरे दोस्त, मेरे खयाल से घटिया और नीच वह काम होता है जिससे किसी का नुकसान होता हो या किसी का कुछ बिगड़ता हो। मेरा अपना असूल है कि मंै अगर अपने हाथ से किसी का कुछ भला नहीं कर सका तो उसका बुरा तो कतई नहीं करूँगा। किसी का बुरा करना ही मैं घटिया काम समझता हूँ।
- लेकिन तुम्हारा यह काम भी तो बुरा ही है राम जनम, किसी मुर्दे को पानी में सड़ाना और फिर उसे निकिया धो कर उसका कंकाल बेचना ... छिः।
- इसमें ऐसा बुरा क्या है मेरे दोस्त, मुझे तो इसमें कोई बुराई नहीं दिखती। और अगर, यह बुरा है भी तो वह, सिर्फ  तुम्हारे मन के भीतर है। तुम्हीं बताओ, मेरे ऐसा करने से कहाँ किसी का कोई बुरा होता है। अरे मुर्दा तो मुर्दा, वह हर हाल में मुर्दा है। मुर्दे को गाड़ दो, जला दो उसे बाहर चील कौओं के खाने के लिए छोड़ दो या सड़ाकर उसका कंकाल बेच दो, इससे कहीं किसी का, कोई नुकसान हुआ क्या?
चाय के दो तीन घूँट, हलक के नीचे उतारने के बाद ही वह मुर्दे की बाबत, राम जनम से पूछ लिया था। इसके पहले वह यह सोचकर अपने मन को तसल्ली दे लिया था कि जाने दो साले को मुझे कौन इसके घर की बगल छान्ही डालना है या इसके साथ रिश्तेदारी जोड़ना है कि उसकी इन घिनौनी कततूतों की सोच - सोच कर, हलाकान होता रहूँ। वह तो मेरे सामने ऐसे हालत पैदा हो गए थे कि मुझे इसके घर आना पड़ गया नहीं तो ऐसे अधम के घर मैं आता कभी, जो करता है करे साला, मुझे इससे क्या लेना देना। अब तो बस नाश्ता करना है मिले तो दो कौर खाकर अपने घर का रास्ता पकड़ लेना है। लेकिन जब राम जनम उसे यह बताया था कि वह मुर्दों को सड़ाने और उन्हें निकिया धोकर उसके कंकाल बेचने जैसा अधम और घिनौना काम करता है तो इसे सुनकर उसके प्रति उसका मन घृणा से भर गया था और वह जल्दी से जल्दी उसके घर से निकल भागने के लिए उतावला हो उठा था।

आर मिश्र
2284 - 4 शास्त्री नगर,
सुलतानपुर
( उ . प्र.)  228001

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