इस अंक के रचनाकार

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शुक्रवार, 23 अगस्त 2019

अम्‍बो अब शांत है

अम्बो आज बहुत उदास है। लगातार रोने से आँखें धुली धुली है। बिल्कुल उस आसमान की तरह जहाँ बादल बरस जाने के बाद एक साफ सुथरी उदासी छाई रहती है। किसी ने उसे बुलाने या चुप कराने की हिम्मत नहीं की। आखिर सुखजीत से रहा नहीं गया। वह धीरे से दादी के पास गया - दादी माँ! सुबह से तुमने कुछ नहीं खाया। अब बस करो,कुछ खा लो।
अम्बो का जैसे रोका बाँध फिर से टूट गया। इस बार रोने के साथ - साथ उसने गरियाना भी शुरू कर दिया - वे सुरजन सिहा,तेरा कुछ न रहे। तूने मेरे भोले बच्चे को बहका लिया। तेरे बच्चों को भोगना नसीब न हो। तेरे कीड़े पड़े। तुझे नरक में भी जगह न मिले। अब वे सुखजीत को मुखातिब हुई - वे सुखजीते! तुझ रब अक्ल दे। तूने ये क्या कर डाला। तेरे जैसा कपूत किसी के घर न पैदा हो। अरे, तूने कुल की नाक कटवा दी रे। कोई अपनी इज्जत यूं नीलाम करता है जैसी तूने कर दी। अरे, तूने एक बार भी नहीं सोचा कैसे तेरे बाबे ने मिट्टी के साथ मिट्टी हो के ये क्यारे खरीदे थे। कैसे वह और तेरा बाप सारा - सारा दिन मिट्टी के साथ मिट्टी हुए रहते थे। किस तरह आधी - आधी रात उठ के खेत में पानी लगाने जाते। तू क्या जाने जब खेत में कुली - कुली गन्दल तोड़ने जाते तो गेहूं की लहराती फसल कितना सुकून देती थी,जब झोली में तोड़ा हुआ सरसों का साग लेकर मैं घर लौटती थी। न तो कैसे गर्व महसूस होता था, और फिर जब साग तैयार होता था न तो सारे मौहल्ले में उसकी खुशबू फैल जाती थी। अम्बो की आँखे चूल्हे पर चढ़े साग की तस्वीर में खो गयी थी। वे अपने ही ध्यान में बोले जा रही थी - सरों का साग ऐसा बनता,ऐसा बनता कि सारा टब्बर उँगलियाँ चाट - चाट खाता। साथ होती घर की मक्की की रोटियां,गरम - गरम साग पर मक्खन का पेड़ा डाल खेतों की मूलियों के साथ बाप बेटा खाने बैठते तो घर को भाग लग जाते। फिर सीरी और कामे रोटियां छकते। वह रौनकें कहाँ से लाएगा रे सुखजीते, तूने ये कैसा अनर्थ कर डाला रे। मैं तेरे बाप को तेरे बाबे को सुरगों में कैसे मुंह दिखाउंगी रे?
बेबे का बड़बड़ाना जारी था। थाली में पड़ी रोटियां लकड़ी हो गयी थी और दाल पानी। पर उसे चुप न होना था, न हुई। उसी तरह आँखों पर दुपट्टे का पल्ला रखे रोती रही,गरियाती रही। सुखजीत का मन किया एकहे अम्बो तेरा सर दुखने लगेगा। पर उसने वहां से हटने में ही भलाई समझी और वहाँ से हट कर नीम के दरख्त के नीचे बिछी खाट पर जा बैठा। रोटी खाने का उसका मन भी नहीं हुआ।
उसे याद आया दो साल पहले का वह दिन जब उसके बाबा का स्वर्गवास हुआ था। यहीं इसी आंगन में सारा गाँव इकट्ठा हुआ था। सारे बड़े बूढ़े यहीं बैठे थे। धीरे - धीरे दूर नजदीक के रिश्तेदार भी आने शुरू हुए थे। सब मरने वाले की किस्मत सराह रहे थे। पोते पड़पोते वाला होकर  दुनिया छोड़ी। हंसता खेलता परिवार देख कर गया। कर्मों वाला था भाई, जनाजा पूरी शान से निकलना चाहिए। सुखजीत ने मौके की नजाकत को देखते हुए बीज खरीदने के लिए रखे साठ  हजार रूपये अपने रिश्ते के भाई के हाथ रख दिए थे। अर्थी उठाने की तैयारी जोर शोर से शुरू हुई थी। अर्थी पर कीमती दुशाला डाला गया। गुब्बारे और झंडियां लगा कर विमान सजाया गया। घंटे और घड़ियाल की ध्वनि के साथ अर्थी उठी। सारे रास्ते फूल,पतासे और सिक्के लुटाये गए और लूटे गए। चन्दन की पांच लकड़ियाँ चिता में डाली गई। देसी घी की आहुति दी गई। सभी रिश्तेदार चाय बिस्कुट पी कर तारीफ करते घर गए।
जब रात में थोड़ी शान्ति हुई तो सुखजीत को बताया गया कि आज के आयोजन में पचास हजार  से ऊपर खर्च हो गए हैं। उसने सोचा - चलो, सब खुश हो गए, इतना ही बहुत है। अम्बो काफी संतुष्ट दिखाई दे रही थी।
पर असली मुसीबत अगले दिन से शुरू हुई। अभी दसवां और सतारवा बाकी था। अभी हरिद्वार अस्थि विसर्जन के लिए भी जाना बाकी था। वह सर पकड़ कर बैठ गया था।
घर की औरतें परम्परा के साथ कोई समझौता करने को तैयार नहीं थी। दसवें पर सारे रिश्तेदार आयेंगे इसलिए टेंट तो जरुरी है। तीन सब्जियां तो बनेंगी ही। हलवा और खीर भी बनेगी। लड्डू और जलेब भी पकेंगे। खानदान की लड़कियों की लिस्ट बनी। परिवार की कुल  बीस लडकियाँ हैं। उन सब को सूट तो देने ही पड़ेंगे, साथ में एक - एक लोटा भी फिर किलो लड्डू जलेब भी देने होंगे। रिश्तेदारों की लिस्ट दो हजार हो रही थी। सुखजीत का हर विरोध यह कह कर टोक दिया जाता। बाबा ने रोज - रोज मरना है क्या? एक ही बार तो खर्च करना है, बेचारा सारी जिन्दगी इस घर के लिए ही तो खटता रहा है। अब कंजूसी करोगे।
सुखजीत का मन किया चीख कर कहे - अब ब्याज समेत कमाई वापिस करनी पड़ेगी क्या? पर वह जानता है उसके विरोध की बात नक्कारखाने में तूती बन कर रह जायेगी। उसने धीरे से कहा था - चाचा, इतना पैसा आएगा कहाँ से? जवाब दिया था सुन्दर ने - ले भाई! दूकान तेरी,मैं तेरा बड़ा भाई,तू चिंता क्यों करता है जो चाहिए, जितना चाहिए दूकान पे पर्ची भेज दीजो सामान पहुँच जाएगा। सरपंच ने बिना कहे ही दो लाख रूपये घर भेज दिए थे।
दसवां शान से निपट गया था। दूर - दूर के रिश्तेदार आये थे। उसके दरिया दिली की तारीफ़ कर के मृत आत्मा की शान्ति की प्रार्थना करते हुए उन्होंने पेट भर लड्डू जलेबी खाई थी। वह हाथ बांधे खड़ा रहा था। दसवें के बाद वह,उसका बेटा और उसका मामा तीनों हरिद्वार अस्थि विसर्जन भी कर आये थे। वहां पंडों ने अलग क्रिया कर्म करवा  कर मोटी दक्षिणा वसूल की थी।
सत्रहवीं पर सत्रह ब्राह्मणों को भोज खिलाया गया। वस्त्र बर्तन बिस्तर के साथ दक्षिणा दी गई। इस सब में सुखजीत तन - मन से थक कर चूर हो गया था। पर फिर भी एक तसल्ली थी कि सब संतुष्ट हो कर गए थे और सब से बढ़ कर अम्बो संतुष्ट थी।
अगले दिन वह खेत के लिए निकला तो रस्ते में सुन्दर मिल गया-  और भाई तू ठीक है।
- जी।
- ऐसा है भाई, लौटती बार जरा दूकान पर हो कर जाना, एक बार हिसाब देख लेना। पेसों की कोई जल्दी नहीं। जब होंगे तब दे देना पर हिसाब तो बाई माँ बेटी का भी होता है। भाई - भाई का भी।
- जी आ जाऊँगा।
- पक्का आ जाना।
शाम को वह सुन्दर की दुकान पर गया था। सुन्दर ने उसकी, उसकी बीबी की,हलवाई की सारी पर्चियां निकाल के उसके सामने रख दी थी और साथ ही  हिसाब की बही भी। कुल सवा लाख का बिल था।  उसकी आँखों के सामने अँधेरा छा गया था। दिन में तारे नजर आने लगे थे। जैसे - तैसे वह घर पहुंचा। उसकी बीबी ने देखते ही कारण बिना कहे जान लिया था - पानी का गिलास उसके हाथ में पकड़ा अन्दर गयी। कुछ देर बाद लौटी तो उसके हाथ में गुलाबी रुमाल की एक छोटी सी पोटली थी। पोटली उसने हाथ में रख दी। सुखजीत ने सवालिया निगाहों से उसको देखा।
- जी आपको मेरी कसम। दो चार गहने हैं। बेच के जिसका देना है दे दो।
- पर तेरे पास तो यही एक चूड़ियाँ हैं और यही एक चेन।
- कानों की बालियाँ मैंने रख ली है,और सगाई वाली अंगूठी भी।  वही रोज पहनना होता है। बाकी तो सन्दूक में ही धरे रहते हैं। दे दो कर्जा उतर जाएगा। अगली फसल पर बनवा देना।
उसका मन अपनी पत्नी के प्रति आभार से भर गया। कैसे उसकी हर तकलीफ बिना कहे जान लेती है। हर तकलीफ में चट्टान की तरह से उसके साथ खड़ी रहती है। गिरने से पहले ही हाथ थाम  कर सम्भाल लेती है। उसे अपनी बीबी पर बहुत प्यार आया। मन तो चाहा कि गहने लेने से मना कर दे पर मजबूरी है। सुन्दर के बारे में मशहूर है कि बकाया पैसों पर मोटा ब्याज लगता है। उसने रुमाल कस कर पकड़ लिया।
सुबह दिन निकलते ही वह चन्दन सुनार की दुकान में गया।
चंदन अभी दुकान खोल कर धूप बत्ती कर ही रहा था। सुखजीत को देख के भी अनदेखा करते हुए उसने लक्ष्मी की मूर्ति को नमस्कार करते हुए उनका धन्यवाद किया और पलट कर सुखजीत का स्वागत किया - आ भाई सुखजीत! कैसे आना हुआ?
सुखजीत ने  रुमाल उसके सामने खोल दिया - भाई ये ...।
- अरे ये तो भाबी की वही चूड़ियाँ है न जो तेरा बापू शादी में बनवा कर ले गया था।
- हाँ भाई, ये वही हैं। तू तो जानता है, पिछले दिनों काफी खर्चा हो गया। हाथ बहुत तंग चल रहा है।
- एक बार फिर सोच ले?
सोच लिया यार, सारी रात सोच - सोच के ही काटी है। तू बता कितने के हुए।
चंदन ने चूड़ियाँ और चेन दोनों बैलेंस पर रखे। अपनी छोटी डायरी में कुछ हिसाब लगाया और डायरी सुखजीत के आगे रख दी। सुखजीत ने देखा कुल सात तोले के गहनों थे पर चन्दन के हिसाब में वे साढ़े पांच तोले रह गए थे। उसमें भी टाँके की काट लगाईं गयी थी और पांच तोले सोने की कीमत पचीस हजार के हिसाब से एक लाख पचीस हजार बन गया था। उसने जानना चाहा - पर ये तो दो साल पहले  ही बनवाये थे तब दो लाख के बने थे, तूने ही बनाए थे। तेरी भाभी ने तो एक बार ही पहने हैं। उसकी आवाज में बेचारगी उतर आई थी।
- मैंने तो पहले ही कहा था- अच्छे से सोच ले। अभी भी नहीं देना चाहता तो उठा इन्हें। सुबह - सुबह मेरा मुहूर्त मत खराब कर।
- मैंने तो ...।
उसकी बात चन्दन ने बीच में ही काट दी - मैं समझता हूँ यार पर क्या करें। सोने की कीमत हर रोज बदलती है। सरकार तय करती है सोने के भाव। उपर से गलाने में कितनी मेहनत लगती है, आधा तो खोट  ही निकल जाएगा। तू फिक्र न कर। तेरा हक नहीं मारूंगा।
सुखजीत अभी भी असमंजस में था। सौदा हाथ से जाता देख चन्दन ने चारा डाला - चल तू अपना पुराना ग्राहक है, तू एक हजार और ले ले। जाएगा तो मेरे पल्ले से ही।
और सुखजीत एक लाख छब्बीस हजार में दो लाख के जेवर बेच आया था। उसने चन्दन के सारे पैसे चुका दिए थे पर अभी खेत के बीज खरीदने बाकी थे और सरपंच के दो लाख भी। जैसे - तैसे उसने बीज का जुगाड़ कर गेहूं बोया था। खेत में दिन रात एक किया। फसल पक कर तैयार होने तक एक बोझ सा उसके उपर सवार था। इस पूरे साल उन्होंने कोई कपड़ा नहीं खरीदा। कोई त्यौहार नहीं मनाया। कोई पकवान नहीं पका। फसल बेच कर उसने दो लाख इकट्ठे किये थे। सोचा - इसमें से एक लाख सरपंच को देकर उनका शुक्रिया करेगा जिन्होंने बिना मांगे इतने बुरे वक्त में उसका साथ दिया। घर न जा कर वह सीधा सरपंच के घर गया। सरपंच साहब अपने आंगन में ही कुर्सियां बिछाए बैठे थे। उसे देखते ही एक मुस्कुराहट उनके चेहरे को घेरती नजर आई।
- आ सुखजीत।
- जी। उसने आगे बढ़ कर सरपंच के पैर छुए और जेब से निकाल कर एक लाख सरपंच के आगे रख दिए।
सरपंच ने बिना गिने अपने मुनीम को आवाज लगाई। एक मिनट में ही बही की किताब लेकर मुनीम हाजिर हो गया। ले भाई ये सुखजीत आज एक साल बाद एक लाख जमा करने आया है। जमा कर ले और इसे हिसाब भी समझा दे।
सुखजीत ने नोट मुनीम को पकड़ा दिए। जी अभी तो  इतने ही है। बाकी का एक लाख भी जल्दी देने की कोशिश करूंगा। वह करीब - करीब दोहरा ही हो गया था।
सरपंच एक खचरी सी हंसी हंसा - देख सुखजीत तू घर का बन्दा है। हमने तो बिना लिखा पढ़ी के नोटों का बंडल तुझे दे दिया। पूरा एक साल तुझे पूछा भी नहीं कि कब वापिस करेगा।
- जी आपकी मेहरबानी।
- अब गगन को पैसे जमा करवा दे।  मुझे तो थोड़ा काम है। चाय पी कर जाना। सरपंच बाहर चला गया।
गगन ने  अपनी कापी में  सुखजीत का एक लाख  रुपया जमा कर के उसके साइन के लिए बढ़ाया तो सुखजीत देख कर हैरान रह गया। उसके खाते का दो लाख बढ़ कर साढ़े तीन लाख हो गया था। एक लाख जमा होने के बाद भी अभी ढाई लाख बाकी बचा रह गया था।
घर आके वह सारी रात सो ही नहीं पाया। ब्याज पर ब्याज बढ़ने से तो उसके खुद के बिकने की नौबत आ जायेगे। आखिर उसे यही उपाय  समझ आया कि खेत बेच कर सारा कर्जा चुका दिया जाए। उसने छ लाख में खेत बेच दिया और सारा कर्ज चुका दिया। बाकी बचे पैसों से उसने चार चूड़ियाँ खरीदी। आज वह चैन की नींद सोयेगा।
पर अम्बो, उसको कैसे समझाये कि उसके अंधविश्वासों और दिखावे के चक्कर में ही खेत बिके हैं। कि यहाँ गाँव में अमीरों का एक मक्कड़ जाल है जिससे बचना छोटे किसानों के लिए मुश्किल है कि मेहनत मजदूरी कोई अपराध नहीं है। कि कर्जा चाहे किसी का भी हो तुरंत उतर जाना चाहिए।
वह सिर्फ सोचता है। कभी कुछ कह नहीं पाता क्योंकि वह जानता है - कुछ बातों का कोई मतलब नहीं होता, कुछ बातों को न कहना ही अच्छा होता है।
वह संतुष्ट होकर अपनी चारपाई की ओर  बढ़ गया। सुबह उसे काम की तलाश में जल्दी निकलना है। नई  शुरुआत करनी है। अम्बो शांत हो गई है।  इस समय निश्छल बच्चे के समान सो रही है। सुखजीत की आँखें भी धीरे - धीरे मुंदने लगी हैं।
       मेल :goswamisneh@gmail.com

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