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सोमवार, 25 नवंबर 2019

अशोक सिंह - तीन गीत


(1)

तुम आओ, न आओ, हम इंतजार करेंगे।
तुमसे ही प्यार किया है, तुमसे ही प्यार करेंगे।

तेरे कदमों पे, लुुटाया सब कुछ 
तुझे पूजा, तुझे ही गाया है।
जागती आँखों में भी सपना तेरा।
एक तू ही अपना, दूजा, न कोई मेरा।

गम दे या खुशी, सब कुछ स्वीकार करेंगे।
तुम आओ न आओ, हम इंतजार करेंगे।

होठों को अपने हम सी लेंगे।
आँसू भी गम के पी लेंगे।
पुछेगा कोई कुछ न बतायेंगे।
नाम रेत पर, लिख लिख मिटायेंगे।

मन ही मन रो लेंगे, मगर कुछ न इजहार करेंगे। 
तुम आओ न आओ, हम इंतजार करेंगे।

तुझे अपनाया तो दुश्मन हुआ जमाना
सारे शहर में सरेआम हुआ फसाना।
रिश्ते - नाते सब टूटे, अपने हुए पराये।
छोड़ गये साथ हमें अपने भी साये।

तुम मुझ पर यकीं करो न करो, हम एतवार करेंगे।
तुम आओ न आओ, हम इंतजार करेंगे।

लाख सितम कर या भूला दे।
मैं न भूलूंगा, जो चाहे शिला दे।
सितम कर या कर कोई करम।
तेरी मर्जी तू जाने जाने तेरा धरम।

वफा कर या कर बेवफाई हम अंगीकर करेंगे।
तुम आओ न आओ, हम इंतजार करेंगे।

माना हम नहीं तुम्हारे।
तोड़ ला सकता नहीं चाँद सितारे।
पर वादा है साथ न छोडूंगा कभी।
जान दे दंूगा  दिल न तोड़ूगा कभी।

डूबने लगो तो आवाज देना, खुद डूूबता तुझे पार करेंगे।
तुम आओ न आओ, हम इंतजार करेंगे।

(2)
जाने कैसी हवा चली, कैसी चली ये रीत रे।
ना तो मनके तार खनकते, ना होठों पर गीत रे।
भाग - दौड़ के इस जीवन में,
हर पल हम बेचैन रहे।
सिमट रहा आकाश आस का
प्रेम पियासे नैन रहे।
टूट रहा साँसों का सरगम, बिखर रहा संगीत रे।
जाने कैसी हवा चली, कैसी चली ये रीत रे।
इर्ष्या - द्वेष असत्य की कजरी, 
परम्पराएँ फिसल रही।
जहर भरी है गगरी - गगरी,
डगरी-डगरी लहर रही।
मुट्ठी भर छाँव मिले ग्रीष्म में, जीवन जाये बीत रे।
जाने कैसी हवा चली, कैसी चली ये रीत रे।
हाट-बाट में बेच रहा है,
मनुज अस्मिता सौ - सौ बार।
सब कुछ है बेमानी लगता,
दूल्हा डोली और कहार।
जिसके जितने हाथ हैं लम्बे, उसकी उतनी जीत रे।
जाने कैसी हवा चली, कैसी चली ये रीत रे।
धर्म,ईमान, रिश्ते - नाते
सबकी बदल रही परिभाषा।
दीप आस्था के बुझ रहे,
सवर्त्र कुंठा हताश निराशा।
है आदमी आदमी से, आज यहाँ भयभीत रे।
जाने कैसी हवा चली, कैसी चली ये रीत रे।


(3)
जब मुरझा जाये तेरे मन की मंजुल कलियाँ।
सूनी हो जाये जब तेरे जीवन की हर गलियाँ।
तब पल दो पल मुझे याद कर लेना।
हो सके तो जिन्दगी आबाद कर देना।

डूबने लगे जो कभी, जीवन की कश्ती तेरी।
लूटने लगे जो कभी सपनों की बस्ती तेरी।
तब पल दो पल मुझे याद कर लेना।
हो सके तो जिन्दगी आबाद कर देना।

गर्मी की लू बन जाये, जीवन की ठंडी साँसें।
परिन्दों सी कट जाये, गर तेरी चाहत की पाँखें।
तब पल दो पल मुझे याद कर लेना।
हो सके तो जिन्दगी आबाद कर देना।


जनमत शोध संस्थान पुराना दुमका, 
केवटपाड़ा दुमका-814101 (झारखण्ड)
मो. न.ः 9431339804, ई-ashok.dumka@gmail.com

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