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मंगलवार, 26 नवंबर 2019

श्रीरामकथा के अल्पज्ञात दुर्लभ प्रसंगः भरतजी ही श्रीराम का प्रतिबिम्ब है

डॉ. नरेन्द्र कुमार मेहता

     भारत की विभिन्न भाषाओं में रचित प्रायः सभी श्रीरामकथाओं में भरतजी, श्रीरामजी के प्रतिबिम्ब के रूप में परिलक्षित होते हैं। जो श्रीराम हैं, वही भरतजी हैं। इस तरह श्रीराम एवं भरतजी एक ही हैं। हम श्रीरामकथाओं में भिन्न नहीं कर सकते हैं यथा -
भरतहि जानि राम परिछाहीं।।
श्रीरामचरित मानस अयो.कां. 266 - 3
     मानस में वर्णित श्रीरामकथा में श्रीराम के एवं भरतजी के चरित्र की मार्मिक कथाएँ पत्थर को भी पिघलानेवाली हैं। श्रीराम के वनगमन हो जाने तथा महाराज दशरथजी के परलोक गमन के पश्चात् भरत और शत्रुघ्न के ननिहाल से लौटने के उपरान्त ही भरतजी के चरित्र की विशेषताओं की झलक मानस में यत्र - तत्र - सर्वत्र अपनी अमिट छाप छोड़ती चली जाती है। भरत श्रीराम को महल में न देखकर अत्यन्त ही दुःखी हो जाते हैं। माता कैकेयी भरत को प्रसन्न करने के लिये सारी कथा सुना देती हैं। तब भरत दुःखी होकर उससे कहते हैं 

बर माँगत मन भइ न पीरा। गरि न जीह मुंह परेउ न कीरा।।
श्रीरामचरितमानस अयो.कां. 162 -2
     - माँ, महाराज दशरथजी से दो वर माँगते हुए तुझे पीड़ा नहीं हुई। प्रथम वर में राज्य माँगते हुए तेरी जिह्वा गल क्यों नहीं गई तथा दूसरे वर में श्रीराम को वनवास माँगते हुए तेरे मुंह में कीड़े नहीं पड़ गये।
भरतजी ने मात्र इतना ही नहीं उससे भी अधिक माता कैकेयी को जो कुछ कहा वह श्रीरामचरित मानस में गूढ़ गम्भीर - चिन्तन - मनन करने का विषय है।
हंसबंसु दशरथु जनकु, राम लखन से भाइ।
जननी तूँ जननी भई, बिधि सन कछु न बसाइ।।
श्रीरामचरितमानस अयो.दो.161
     भरत जी माता कैकेयी से कहते हैं मुझे सूर्यवंश, दशरथजी जैसे पिता और श्रीराम - लक्ष्मण जैसे भाई मिले, किन्तु हे जननी। मुझे जन्म देने वाली माता तू हुई। क्या किया जाय विधाता के आगे किसी का कुछ भी वश नहीं चलता है।
     इस दोहे को वाल्मीकि रामायण के अयोध्याकाण्ड में सर्ग 35 के सन्दर्भ में देखा जाए तो ऐसा भी संकेत एवं भावार्थ हो सकता है। भरत अपनी माता कैकेयी से कहते हैं कि हे माँ तू अपनी माता ’ नानी’ के समान हो गई तथा जैसी तेरी माता माता न होकर कुमाता थी, तू ऐसी ही हो गई। इस कुमाता के प्रसंग को वाल्मीकि रामायण में श्रीराम के वनगमन के प्रसंग में मंत्री सुमंत्र एवं कैकेयी के बीच एक अन्तर्कथा के माध्यम से किया गया है-
आभिजात्यं हि ते मन्ये यथा मातुस्तथैव च।
न हि निम्बात् स्रवेत क्षौद्रं लोके निगदितं वचः।।
अयोध्याकाण्ड सर्ग 35 - 17
     श्रीराम के वनगमन के समय मंत्री सुमन्त्रजी कैकेयी से कहते हैं कि हे कैकेयी! मैं समझता हूँ कि तुम्हारी माता का अपने कुल ’ वंश’ के अनुरूप जैसा स्वभाव था, वैसा ही तुम्हारा भी है। लोक में जानने वाली यह कहावत सत्य ही है कि नीम से मधु ’ शहद’ नहीं टपकता है। सुमन्त्रजी दशरथजी के मात्र मंत्री ही नहीं वरन् दशरथजी के मित्र सखा - सारथी एवं परिवार के सदस्य थे। जिन्हें राजा के महल में कहीं भी आने जाने का विशेषाधिकार था। इस तथ्य को यहाँ एक कथा प्रसंग द्वारा इस रामायण में स्पष्ट देखा जा सकता है। श्रीराम के वनगमन के पूर्व सुमन्त्रजी ने कैकेयी को इस दुष्कृत्य हेतु फटकार लगाई तथा उसकी माता के इस कथा के माध्यम से चरित्र का वर्णन किया है -
तव मातुरसद्ग्राहं विद्म पूर्वं यथा श्रुतम्।
पितुस्ते वरद कश्चित् ददौ वरमनुत्तमम्।।
वा.रा.अयो. सर्ग 35 - 18
     तुम्हारी माता के दुराग्रह की बात भी हम जानते हैं। उनके बारे में पहले जैसा कहा सुना गया है, वह बताया गया है। एक समय किसी साधु ने तुम्हारे पिता को एक श्रेष्ठ वर दिया था- 
सर्वभूतरुतं तस्मात् संजज्ञे वसुधाधिपः
तेन तिर्यग्गतानां च भूतानां विदितं वचः।।
वा.रा.अयो. सर्ग 35 - 18
     उस वर के प्रभाव से कैकेय नरेश समस्त प्राणियों की बोली समझने लगे। तिर्यक योनि में पड़े हुए प्राणियों की बातें भी उनको समझ में आ जाती थी। एक समय की बात है कि -
पितुस्ते विदितो भावः सः तत्र बहुधाहसत्।।
वा.रा.अयो.सर्ग 35 - 19
     एक दिन कैकेय नरेश शैय्या पर लेटे थे। उसी समय जृम्भ नामक पक्षी की आवाज उनके कानों में पड़ी। उसकी बोली का अभिप्राय वे समझ गए, अतः वे कई बार हँसने लगे।
     उसी शय्या पर तुम्हारी माँ भी सोयी थी। वह यह समझ बैठी कि राजा उसकी हँसी उड़ा रहे हैं। अतः क्रोधित होकर गले में मौत की फाँसी लगाने की इच्छा रखती हुई बोली - हे सौम्य! नरेश्वर! तुम्हारे हँसने का क्या कारण है? यह मैं जानना चाहती हूँ। तब राजा ने कहा देवी! यदि मैं हँसने का कारण तुम्हें बता दूँगा तो उसी क्षण मेरी मृत्यु हो जाएगी। इस बात को सुनने के बाद तुम्हारी माता ने राजा से कहा कि तुम जीओ या मरो मुझे तो हँसने का कारण बताना ही होगा, ताकि भविष्य में तुम मेरी हँसी मजाक नहीं कर सकोगे।
     इतना सुनकर राजा उस वर देने वाले साधु के पास गए तथा पत्नी की सारी बात बताई। तब उस वर देने वाले साधु ने राजा से कहा कि महाराज! रानी मरे या घर ’ महल’ से निकल जाए तुम कदापि यह बात उसे न बताना। यह सुनकर राजा ने क्या किया था, वह इस प्रकार है :
स तच्छ्त्वा वचस्तस्य प्रसन्नमनसो नृपः।
मातरं ते निरस्याशु विजहार कुबेरवत्।।
वा.रा.अयो. सर्ग 35 - 26
     प्रसन्न चित्तवाले उस साधु का यह वचन सुनकर कैकेय नरेश ने तुम्हारी माता को तुरन्त घर से निकाल दिया और स्वयं कुबेर के समान विहार करने लगे।
     सुमन्त्रजी ने कैकेयी से कहा कि हे कैकेयी। तुम भी तुम्हारी माता के मार्ग पर चलकर महाराज दशरथजी से अनुचित दुराग्रह कर रही हो। यह लोकोक्ति आज भी प्रत्यक्ष मुझे सोलह आने सत्य लग रही है कि पुत्र पिता के समान होते हैं तथा पुत्री माता के समान होती है। कैकेयी इतना सब कुछ सुनने के पश्चात् भी टस से मस नहीं हुई।
     यह कथा प्रसंग कैकेयी तथा सुमन्त्र के मध्य हुआ था। संभवतः भरतजी को इस प्रसंग के बारे में किसी से जानकारी मिली होगी। अतः उन्होंने अपनी माता कैकेयी की तुलना उनकी नानी से कर के कहा कि ’ जननी तु जननी भई’ 
     भरतजी ने इस प्रसंग को यहाँ विराम न देकर माता को कलंक न लगे अतः इस चैपाई के अन्त में यह कह दिया कि  बिधि सन कछु न बसाई।। अर्थात् हे माता तुम क्या कर सकती हो विधि के विधान के समक्ष किसी का क्या वश चलता है? हे माता जो हो गया तो हो गया अब तुम कुछ भी नहीं कर सकती हो। इस बात से भरत में श्रीराम के समान क्षमाशीलता का समान गुण प्रकट होता है।
     भरतजी के चरित्र में श्रीराम के शील, संयम, दया, करुणा, क्षमा आदि सद्गुणों का भण्डार था। भरतजी के क्षमाशीलता का एक उदाहरण मानस में उस समय प्राप्त होता है जब शत्रुघ्नजी को ज्ञात होता है कि मन्थरा ने कैकेयी के कान भरकर श्रीराम को वनवास दिलाया तो उन्होंने मन्थरा की कूबड़ पर लात मार गिराया। वह मुँह के बल गिर पड़ी तथा मुँह से रक्त बहने लगा एवं शत्रुघ्नजी उसका झोंटा पकड़कर घसीटने लगे। उस समय भरतजी ने उसे क्षमा कर शत्रुघ्नजी के हाथों से छुड़ा दिया।
सुनि रिपुहन लखि नरव सिख खोटी। लगे घसीटन घरि घरि झोंटी।
भरत दयानिधि दीन्हि छड़ाई। कौसल्या पहिं गे दोउ भाई।
श्रीरामचरितमानस अयो. 161- 4
     दयानिधि भरतजी ने मंथरा को शत्रुघ्न जी से छुड़ा दिया और दोनों भाई तुरन्त माता कौशल्या जी के पास गए। भरतजी के चरित्र में क्षमाशीलता और दया कूट -कूट कर भरी थी।
भरतजी के चरित्र की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि श्रीरामजी भी उनका मन में सदा स्मरण करते हैं यथा -
यह बड़ि बात भरत कइ नाहीं। सुमिरत जिनहि रामु मन माहीं।।
श्रीरामचरितमानस अयो. 217 - 2
     भरतजी के लिए यह कोई बड़ी बात नहीं है जिन्हें श्रीराम स्वयं अपने मन में स्मरण करते हैं।
श्रीराम का भरतजी के प्रति कितना प्रेम था? यह यहाँ स्पष्ट हो जाता है.
भरत सरिस को राम सनेही। जगु जप राम रामु जप जेहीं।।
श्रीरामच. अयो. 218 - 4
     सारा जगत श्रीराम को जपता है, वे श्रीरामजी जिनको जपते हैं। उन भरतजी के समान श्रीरामचन्द्रजी का प्रेमी कौन होगा।
     अंत में यह चौपाई भरतजी के चरित्र की प्रशंसा में जनकजी ने भी अपनी प्रियतमरानी सुनयनाजी को चित्रकूट में श्रीराम एवं भरतजी के भेंट के समय कही गई। उसमें भरतजी के चरित्र के बारे में इससे ज्यादा कुछ भी कहना सूर्य को दीपक दिखाना है।
अगम सबहि बरनत बरबरनीं। जिमि जलहीन मीन गयुधरनी।।
श्रीरामच.मा. अयो. 289 - 1
     हे श्रेष्ठ वर्णवाली ’ सुनयना’! भरतजी की महिमा का वर्णन करना सभी के लिए वैसे ही अगम है जैसे जलरहित पृथ्वी पर मछली का चलना। हे रानी। सुनो, भरतजी की अपरिमित महिमा को एकमात्र श्रीरामचन्द्रजी ही जानते हैं। किन्तु वे भी उसका वर्णन नहीं कर सकते।
     कुछ प्रसंगों में भरतजी श्रीरामजी से बढ़कर तो नहीं पर श्रीराम के समकक्ष उनके पद चिन्हों का अनुकरण करते हुए प्रतीत होते हैं। उन्होंने अयोध्यापुरी का चकाचौंध भरा राजकीय वैभव का त्यागकर वानप्रस्थ सा जीवन यापन किया। श्रीरामजी तो अपने पिताजी दशरथ और माँ कैकयी की आज्ञा से चौदह वर्ष वन के लिए प्रस्थान करते हैं किन्तु भरत को तो राज्याभिषेक की आज्ञा माता कैकयी देती है फिर भी वे उसे अस्वीकार कर राजधानी अयोध्या से दूर नंदिग्राम में निवास कर अपने कर्त्तव्य का निर्वहन कुशलतापूर्वक कर राजकीय कार्यों का संचालन कर अपनी प्रजा को कष्ट नहीं होने देते हैं। उन्होंने अपने ज्येष्ठ भ्राता के वियोग में राजसी ठाटबाट को तिलांजलि दे दी थी। महाकवि तुलसीदासजी लिखते हैं -
तेहिं पुरबसत भरत बिनु रागा, चंचरीक जिमि चंपक बागा।
श्रीरामचरित मानस अयोध्या 324 / 4
     भरतजी अयोध्यापुरी के भोग विलास को त्याग कर सिर पर जटाजूट और मुनियों के समान वल्कल धारण कर भूमि को खोदकर उसके अंदर कुश की आसनी बिछाई तथा भोजन वल्कल, बर्तन, व्रत - नियम सभी ऋषियों के समान कठिन धर्म का आचरण करते हैं। उनके इस चरित्र से नंदिग्राम में भरत को ऐसा त्याग करते देख प्रकृति में भौंरा भी चंपा के बाग में चंपा के फूल को कामदेव के सिंहासन के समान समझकर कभी भी नहीं बैठता है।
     जब हनुमानजी संजीवनीवटी की खोज के लिए आकाश मार्ग से निकलते हैं और भरतजी उन्हें आक्रमण कर नीचे उतार देते हैं और जब वास्तविकता ज्ञात होती है तो वे अत्यधिक पश्चाताप करते हैं,और श्रीराम जब अयोध्या लौटते हैं तो वे उनसे आँख उठाकर चर्चा करने में सकुचाते हैं। महाकवि तुलसीदासजी कहते हैं -
जौं करनी समुझै प्रभु मोरी। नहिं निस्तार कलप सत कोरी।।
श्रीरामचरितमानस उत्तरकाण्ड दोहा 1(क) 3
     श्रीराम के वनवास के लौटने का एक दिन शेष रह गया तब भरतजी मन में सोचते हैं कि श्रीराम मेरी करनी पर ध्यान दें तो सौ करोड़ कल्पों तक भी उसका निस्तार अर्थात् छुटकारा नहीं हो सकता है। प्रभु तो सदा सेवक को अवगुण होने पर भी क्षमा कर देते हैं। यहाँ हमें भरतजी के स्वभाव का अपराध बोध परिलक्षित होता है। धन्य है भरतजी और उनका चरित्र आज की पीढ़ी के लिए एक अनुकरणीय विशेषता लिए हुए हैं। पारिवारिक वैमनस्य और विभाजन से यदि हमें बचना है तो भरत - चरित्र हमारा उचित मार्गदर्शन कर सकता है।
सन्दर्भ ग्रन्थ.
1. श्रीरामचरितमानस ( गोस्वामी तुलसीदासकृत )
2. श्रीमद्वाल्मीकी रामायण ( महर्षि वाल्मीकि )
3. श्रीरामकथा एवं श्रीहनुमानकथा के अल्पज्ञात दुर्लभ प्रसंग
ले. नरेन्द्रकुमार मेहता ’ मानसश्री’


’ मानसश्री मानस शिरोमणि विद्यावाचस्पति एवं विद्यासागर’
सीनि. एमआईजी -103, व्यास नगर,
ऋषिनगर विस्तार, उज्जैन (म.प्र.)पिनकोड. 456 010

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