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गुरुवार, 21 नवंबर 2019

वहां तो बिजली नहीं है ...

डॉ .विकास कुमार

     सुनीता देवी को काफी चिंता हो रही थी। बल्कि आजकल तो रातों में नींद भी नहीं आ रही थी। ..... और आती भी कैसे, बेटी की जिन्दगी का सवाल जो था। माँ है, तो बेटी के भविष्य की चिन्ता करनी ही होगी।
     लड़का हाई - स्कूल का मास्टर है, पढ़ा - लिखा है, खानदानी है, गुणवान है, हैंडसम भी है, परिवार अच्छा है, लोग अच्छे हैं, एन. एच. हंडरेड पर घर भी है - घर से निकलो और सड़क पर पहुँच  जाओ। एन. एच. हंडरेड पर तो हर जगह के लिए गाडियाँ चलती हैं ..... और लड़के का घर तो यहाँ से बहुत मुश्किल से एक घंटे की ही दूरी पर है। ..... फिर खेती - बाड़ी, जमीन जायदाद की भी कोई कमी नहीं है। इसके बावजूद भी सुनीता देवी को चिंता सताये जा रही थी। क्योंकि उस गाँव में बिजली ही नहीं है ..... और जिस गाँव में आज बिजली नहीं है, तो समझो वहाँ कुछ भी नहीं है। विकास की मुख्य - धारा से बिल्कुल ही अलग, बेखबर, पिछड़ा हुआ। सांझ होते ही जैसे अंधकार पूरे गाँव को  लील जाता है, एकदम सन्नाटा .....।
     उसकी बेटी विजया, दीया और लालटेन बत्ती में कभी रही ही नहीं है। फिर वह इन सब का हाल भी नहीं जानती कि दीया और लालटेन जलते भी कैसे हैं। फिर अंधकार में वह कैसे रह पायेगी। जीते जी तो उसका गला घोंट देने के बराबर हुआ न यह सब। वह तो सीरियल, फैशन शो और फिल्म की भी शौकीन है। वहाँ तो उसे यह सब कहाँ नसीब हो पायेगा।  वहाँ तो बिजली है ही नहीं, तो टीवी क्या खाक् चलेगा,और टीवी नहीं चलेगा तो उसकी बेटी साथिया, जोधा - अकबर, बालवधु, सावधान इंडिया आदि सीरियल कैसे देख पायेगी। वह यहाँ हर रोज देखती है, रोज उससे और भाभी से चर्चा भी करती है कि आज फलां सीरियल में ऐसे हुआ और वैसे हुआ, पूरी बात कल के एपीसोड में पता चलेगा। पता नहीं, वहाँ कोई होगी भी फुरसत में, यह सब सुनने के लिए?
     फिर गर्मियों के दिनों मे वह कूलर और ए.सी. की ठंढ में रहती है और जाड़े के दिनों में हीटर की गर्मी में। वहाँ तो बिजली है ही नहीं तो फिर ए.सी., कूलर, हीटर या फिर पंखा , कैसे चलेंगे। हमारी विजया बेटी तो फूल का टुस्सा है। इन सब के बिना वहाँ वह कैसे रह पायेगी। हाथ से पंखा झलते - झलते तो उसके हाथों में फोड़े हो जायेंगे, फिर दर्द भी तो उठेगा। कहीं ऐसा न हो कि गर्मियों के दिनों में पेड़ के नीचे दिन बिताने पड़ें।
     यहाँ तो मसाला पीसने के लिए मिक्सर है, चावल पीसने के लिए ग्राइंडर है। वहाँ तो बिजली ही नहीं है तो ये मिक्सर ग्राइंडर कहाँ से चलेंगे। अब सिलौट - लोढ़ा का जमाना थोड़े ही न रह गया है, अब तो मिक्सी का जमाना है। कहीं सिलौट - लौढ़ा के चक्कर में वह अपना हाथ न पीस ले। फिर ताकत भी तो कम नहीं लगती है, थक - हार जायेगी मेरी बेटी।
     हमारे यहाँ तो फ्रिज है। गर्मियों के दिनों में ठण्डा पानी जब चाहो, तो झट इसमें से बोतल निकाल लो और प्यास बुझा लो, या फिर ठण्डा पेय पदार्थ ही पीने की इच्छा हुई तो ठण्डा - ठण्डा निकाल कर पी लो। वहाँ तो यह सब होगा ही नहीं। चलो फ्रिज दहेज में दे भी देते हैं, मगर वहाँ तो बिजली ही नहीं है - चलेगी कैसे, केरोसिन तेल से? यहाँ फ्रिज में सब्जी कभी भी बासी नहीं होती है, वहाँ तो एक ही दिन में सब्जी मरूआ जाती होगी।
     यहाँ तो परिवार भी छोटा है। खुद सुनीता देवी, पति, बेटा बहू और फिर यह एकलौती बेटी विजया ही। विजया की ससुराल जाने के बाद तो परिवार और भी छोटा हो जायेगा। सुनते हैं, वहाँ लड़का का संयुक्त परिवार है। लड़के के तीन चाचा, अपने बीबी - बच्चों समेत साथ ही रहते हैं। विजया जायेगी भी तो सबसे छोटी बनकर। खाना बनाने की जिम्मेवारी तो इसी पर होगी न। सुनते हैं वहाँ लकड़ी के चूल्हे जलते हैं। यहाँ तो विजया लकड़ी को हाथ से छूई भी नहीं है, फिर कैसे जलायेगी लकड़ी का चूल्हा। फूंक मारते - मारते तो इसके प्राण ही कहीं न निकल ...।
     - घत्, कैसी - कैसी अशुभ बातें मन में आ जाती हैं। अगर वहाँ बिजली होती तो वह हीटर या फिर इंडक्शन चूल्हे पर खाना बना लेती। और फिर यह सब तो हम दहेज में दे ही देते। मगर वहाँ तो बिजली ही नहीं है। सुनते हैं वहाँ गैस सिलिन्डर भी नहीं जलता। आखिर कैसे जीवन जीते होंगे लोग, बिना बिजली के।
     यहाँ तो पानी भरने के लिए मोटर लगा हुआ है। केवल बटन दबाने भर की देर है, पानी शीघ्र ही ऊपर आ जाता है। फिर चाहे, जितनी इच्छा हो, पानी का उपयोग कर सकती है। यहाँ विजया एक घंटा लगाती है, नहाने में, ..... और पानी की मशीन तब तक चलती ही रहती है। फिर कड़ाके की ठण्ड के लिए बाथरूम में गीजर भी तो लगा है - बिजली का बटन ऑन होते ही क्षणभर में ही गर्म पानी आने लगता है। वहाँ तो उसे यह भी नसीब नहीं हो पायेगा। चलो, एकाध दिन कोई पानी कुएँ से भर भी देगा, मगर रोज - रोज तो नहीं न। फिर तो थक - हार कर उसे ही पानी भरना होगा। एकदम से पनभरनी बन जाना होगा उसे। उतना बड़ा परिवार है, बर्तन भी कम गंदे नहीं होते होंगे। फिर वह उसे धोएगी कैसे? यहाँ तो टंकी लगी हुई है। नल को ऐंठों तो पानी हरहराकर नीचे आ जाता है। फिर जी भर, जितना पानी से चाहो, खंगाल लो। वहाँ तो वह बरतन धोते - धोते कहीं बिला ही जायेगी। हे भगवान! तू भी कैसा निर्दयी है, जो चुपचाप देख रहा है दुखियारी माँ की विवशता को।
     यहाँ तो वाशिंग मशीन है। कपड़े धोने का भी कोई टेंशन नहीं है। केवल बिजली रहनी चाहिए। फिर कपड़ा रोज पहनो और रोज धोओ। जितनी मर्जी, उतना बार धोओ और कपड़े सुखाने का टेंशन भी नहीं, मशीन से तो अपने आप ही सुख जाता है। वहाँ तो, ...अरे बाप रे बाप। ...उसका तो गिंजन ही हो जायेगा। पहले कुएँ से पानी निकालो फिर कपड़े मे साबुन लगाओ, हाथ से पचहत्तर बार रगड़ो, फिर चार पानी से खंगालो। बाप रे बाप, इतना सारा काम कैसे कर पायेगी वह .....। काम करते - करते कहीं मेरी बेटी परलोक न ... घत्, कैसी - कैसी अशुभ बाते मन में आ जाती हैं। पर क्या करें, ऐसा तो होगा ही न! वहाँ तो बिजली हीं नहीं है ..... और बिजली नहीं होने से कोई खाना कम बनेगा? बर्तन कम गंदे होंगे? या कपड़े ही कम मैले होंगे, ऐसी बात तो नहीं होगी न?
      यहाँ एक ही कपड़े को चार बार प्रेस मारती है विजया। बिना प्रेस किये तो उसके शरीर में कपड़ा चढ़ता ही नहीं है। यहाँ बिजली का आयरन है, वहाँ तो यह भी नहीं चलेगा। फिर वह कपड़े भी कैसे पहन पायेगी बिना आयरन के? आग - डालने वाला या फिर गर्म करने वाला आयरन कितना रिस्की होता है? ..... थोड़ी सी असावधानी हुई तो कपड़ा ही जल जायेगा, फिर हाथ के भी जलने की संभावना है। हे भगवान! कैसा गाँव है, जहाँ बिजली ही नहीं है। कैसे गुजर - बसर करते होंगे लोग वहाँ, बिना बिजली के ...। वहाँ विजया कैसे जी पायेगी। वह तो जीते जी मर ही जायेगी।... फिर वही अशुभ - अशुभ बातें।
     पर क्या करे वह। वह तो माँ है। उसे बेटी के हित में सोचने का हक है। वह जिस तरह से अपने लाड़ - दुलार से पाल - पोस कर जवान की है, तो उसके बारे में सोचना भी जायज है। और फिर बेटी की चिंता माँ नहीं करेगी तो कौन करेगा। सब कुछ जानकर भी बेटी को नरक में डाल देने के बराबर होगा न। ... न ... नहीं, कुछ भी हो, लड़का लाख गुणवान हो, ...लेकिन वहाँ शादी नहीं करेगी वह, विजया की। ...अब चाहे कुछ भी हो जाय। वह अपने पति और बेटे की बात नहीं मानेगी। ...मगर वह भी एक औरत ही हैं, उसकी बात को कोई चलने दे तब न। ...उसे तो अपने पति और बेटे पर जोरों से गुस्सा आ रहा था। आनन - फानन मे वे शादी के लिए ‘हाँ’ जो कह आये थे। कह रहे थे, ‘लड़का बड़ होशियार है, पढ़ा - लिखा हैं, नेता जैसी बातें करता है। पैसा भी अच्छा - खासा कमा लेता है। वह तो अभी भले ही मास्टरी की नौकरी कर रहा है, पर एस. पी. और डी. सी. की तैयारी कर रहा है। ... भविष्य में किस्मत साथ देगा तो वह एस. पी. या डी. सी. भी बन जायेगा। ... और अगर न भी बनें, तो यही मास्टरी क्या कम है। ...फिर खानदानी भी तो है। जमीन - जायदाद की कोई कमी भी तो नहीं है।’
‘सब कुछ तो ठीक हैं, लेकिन वहाँ बिजली तो नहीं है न?’ सुनीता देवी ने अपने पति से प्रतिवाद किया था।
‘अरे भाई ...। तुम एक ही रट क्यों लगाये हुई हो। ...सब कुछ बिजली ही है क्या?’ थोड़ा झिड़कते हुए बोले थे रामदयाल बाबू।
     इस पर तो वह मन हीं मन कुढ़ सी गयी थी। मर्द जात क्या जाने औरत का दर्द। .. बिना बिजली के जीवन तो वैसा ही है, जैसे बिना पानी के मछली। ...उसकी बेटी तो मछली की भांति तड़प कर रह जायेगी, ‘तो क्या करें, बेटी को नरक में ढकेल दें, वह थोड़ा गुस्साते हुए बोली थी।
     पत्नी की इस बात पर तो रामदयाल बाबू अंदर ही अंदर खिसिया गये थे। एक तो ढंग का लड़का कहीं नहीं मिलता हैं। चार साल से लड़के की ही तलाश कर रहे थे। जहाँ बिजली भी थी, वहाँ कोई ढंग का लड़का पसंद नहीं आया। कोई नसेड़ी है, तो कोई जुआरी। कोई हैंडसम मिला भी तो वह बेरोजगार है। कोई नौकरी वाला तो वह घमण्ड से फूला हुआ है, उसका डिमांड ही बड़ा है। किसी का चाल - चलन ही ठीक नहीं है। कोई खानदानी मिला, तो बाप के ही भरोसे है। ... बहुत दिनों के बाद अब जाकर कोई ढंग का लड़का हाथ लगा है। फिर डिमांड भी कुछ खास नहीं, बस सिर्फ  शादी खर्च। वह उसे हाथ से जाने नहीं देना चाहते थे। लड़के को लड़की भी पसंद है। ... इसीलिए तो आनन - फानन में सब कुछ कर रहे थे। ऐसे में वे पत्नी की बात मानना उचित नहीं समझ रहे थे। सो, यह कहते हुए घर से बाहर चले गये थे, ‘फालतू बकवास करने की जरूरत नहीं है। ... तुमसे ज्यादा मुझे फिक्र है, अपनी बेटी की ...। ज्यादा दिमाग मत चलाओ और चुपचाप जो कहते है सो सुनो और करो।’
... मगर सुनीता देवी का दिल नहीं मान रहा था। वह बेटी की स्थिति बेहतर तरीके से जानती थी। फूल है उसकी बेटी। थोड़ा - सा भी कष्ट नहीं बर्दास्त कर पायेगी, ...और मुरझा जायेगी। ... बेटी का जरा - सा भी कष्ट नहीं चाह रही थी। उसकी हार्दिक इच्छा थी कि उसकी बेटी जहाँ जाय, आराम से रहे। दुनिया की हर सुख - सुविधा हो। ... और हर सुख - सुविधा तो बिजली से ही संभव है।
     अचानक उसके दिमाग में एक खुराफात सूझी।...लड़के को तो लड़की पसंद है ही। यदि पसंद है, तो वह किसी भी हद तक शादी करने को राजी हो ही जायेगा। फिर क्यों न लड़के से ही पूछ लिया जाय कि यदि वह उसकी बेटी को हजारीबाग शहर में रखेगा तो उसकी बिजली वाली समस्या का समाधान तो स्वतः ही हो जायेगा। उसके मायूस चेहरे पर अचानक मुस्कुराहट की आभा झलक आयी थी। उसने आनन - फानन में लड़के के मोबाइल पर रिंग कर दिया था।
-’ हेलो ...।’ लड़के की आवाज थी।
-’ जी... मैं आपकी होने वाली सासु माँ  बोल रही हूँ, बेटा।’ मुस्कुराते हुए बोली थी सुनीता देवी।
-’हाँ, प्रणाम माँ जी। ... कहिये, कैसे याद किये?’
- ’ जब से आप मेरी बेटी को देखकर गये हैं, तब से हम सदा ही आपको याद करते रहते हैं, ... बस आज फोन कर रहे हैं।’
- ‘जी, माँ जी! कोई आज्ञा!’
-’ हाँ...वो...वो...एक बात पूछनी थी, आप बुरा तो नहीं मानियेगा न?’
- ’ अरे नहीं! ... बुरा क्यों मानूँगा। ...पूछिये, जो पूछना है?’
-’ बेटा! ...मेरी बेटी थोड़ी जिद्दी है? ...एक बात बार - बार पूछने के लिए कह रही थी?’
-’ निःसंकोच बोलिये माँ जी।... क्या पूछने के लिए कह रही थी।’
-’ बेटा! ... बोल रही थी कि आपके गाँव में बिजली नहीं है न...।’
- ’ हाँ ... वो तो मैंने पहले ही कहा था और पापा जी भी देख कर गये थे।... फिर वही तो ’हाँ’ कर के गये हैं। ...अगर, आप सबकी इच्छा नहीं है तो फिर रहने दीजिए।’
-’ नहीं - नहीं, बेटा! ऐसी बात नहीं है। ...वह तो बस इतना ही बोल रही थी कि गाँव में बिजली नहीं है तो क्या हुआ, हजारीबाग शहर में तो बिजली है न। ... हम लोग वहीं रहेंगे।’ सुनीता देवी ने आखिर अपनी हार्दिक इच्छा प्रकट कर ही दी थी।
- ’माफ  कीजिएगा माँ जी। ...हम तो हजारीबाग में नहीं रहने वाले हैं। हजारीबाग में मेरा है ही क्या? ...हमारे गाँव में भले ही बिजली नहीं है, लेकिन उससे भी बढ़कर अनेक सारी कीमती चीजें हैं। ...मेरी माँ है, मेरे पिताजी हैं, मेरे भाई हैं, मेरा घर है, मेरा हंसता - खेलता परिवार है, मेरी जमीन है, और इन सब से बढ़कर, मेरी पहचान मेरे गाँव से ही है। और मैं अपनी अयोध्या को छोड़कर लंका में बसने वाला नहीं हूँ। आपकी बेटी यदि मेरे साथ, मेरे परिवार के साथ गाँव में नहीं ही रहना चाहती, तो देख लीजिए कोई और लड़का ।’.. इतना कहते हुए उसने फोन डिस्कनेक्ट कर दिया था।
     सुनीता देवी फोन को कान में सटाये मन - ही - मन मुस्कुरा रही थी। उसकी हार्दिक इच्छा की पूर्ति जो हो गयी थी। सांप भी मर गया और लाठी भी बची रही। पर एक अभिनय अभी भी बाकी था, जिसके लिए भी वह कमर कस चुकी थी। सो, पति रामदयाल के गृह आगमन के साथ ही सुनीता देवी बिना किसी कौमा, फुलस्टॉप के उबल पड़ी थी -’ लड़के को फोन करके हमने साफ  कह दिया है कि अगर मेरी बेटी से विवाह करना चाहता है तो गाँव को छोड़कर शहर में रहना होगा। बिना बिजली के मेरी बेटी एक मिनट भी वहाँ नहीं रह सकती। पर वह तो गाँव - प्रेमी निकला। कहता है गाँव से ही हमारी पहचान है। घर - परिवार को छोड़कर हम शहर में नहीं रह सकते।
     हमने भी कह दिया - ‘तो ठीक है। हम भी अपनी बेटी का विवाह तुमसे नहीं कर सकते।’
     पत्नी की इन कार गुजारियों से रामदयाल बाबू को बहुत जोरों से अघात पहुँचा था। पर कर भी क्या सकते थे वे, बस विस्मित नेत्रों से सुनीता देवी को देखते रह गये थे।
ग्राम - अमगावाँ, डाकघर - शिला, प्रखण्ड - सिमरिया,
जिला- चतरा, (झारखण्ड) 825401
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