इस अंक के रचनाकार

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सोमवार, 20 अप्रैल 2020

गुरु घासीदास के सिद्धाँत, उपदेश एवं निर्देश आज केवल एक समाज तक सीमित नहीं

शोधार्थी .  मनीष कुमार कुर्रे

 शोधसारः- संत गुरु घासीदास और उनका समाज सुधार सभी संतों के समान प्रखर रहा है। जिस तरह संत कबीरदास, गुरू नानक देव, संत रैदास, धर्मदास आदि ने समाज में व्याप्त विषमता, रूढ़िवादी परम्परा का खण्डन किया, उसी तरह बाबा घासीदास ने छत्तीसगढ़ में सामाजिक चेतना जागृत करने का बागडोर सम्भाला। गुरु घासीदास का जन्म छत्तीसगढ़ में उस समय हुआ था, जब समाज विभिन्न जाति, धर्म, समुदाय में बिखर चुकी थी। समाज में मानव के साथ जातिगत भेदभाव, छुआछूत, ऊँच - नीच की भावना के साथ ही अंधविश्वास, अमीरी - गरीबी, रूढ़ीवादी परम्पराएँ, अशिक्षा, अपने - अपने धर्मों की श्रेष्ठता तथा कर्मकाण्डों का प्रकोप समाज को पूरी तरह अपने शिकंजे में जकड़े हुए था। संत गुरु घासीदास ने बाल्यावस्था से ही इन सभी कुरीतियों को देखा और अनुभव किया। वे उसी समय से चिन्तन करने लगे की समाज में इतनी असमानता, क्यों है....? इन सभी कुरीतियों और रूढ़िवादी मान्यताओं ने बाबा गुरु घासीदास के अन्तर्मन को झकझोर कर रख दिया था। इन्हीं सभी बातों से गुरु घासीदास ने एक पंथ चलाया जो सत्य, अहिंसा, समता, समन्वय, एकता, मानवता, भाईचारा आदि पर आधारित है, जिसे आज सतनाम पंथ के नाम से जाना जाता है। यह पंथ केवल सतनामी समाज ही नहीं अपितु संपूर्ण मानवता के लिए है, जिसमें मानव - मानव को एक समान माना गया है। ‘’ मनखे - मनखे ल मान, सगा भाई समान।’’ यह आपसी भाईचारे को स्पष्ट करता है। बाबा गुरु घासीदास एक ऐसे महापुरुष थे जिन्होंने सत्य, अहिंसा, मानवता, समरसता, समन्वय, एकता, त्याग, सेवा, प्रेम, करुणा आदि के परम सत्य से लोगों को साक्षात्कार कराया और समाज सुधारक रूप में उभर कर सामने आए।
माँ धरती के अंचरा म, आय रिहिस हे चीर परकास।
संदेस ‘’सतनाम’’ के दे के, कहिलाइस हे गुरु घासीदास।।

मुख्य शब्दः- सत्य, अहिंसा सतनाम, समानता ,एकता, समन्वय, सामाजिकता, मानवता।
शोधपत्र का उद्देश्यः- 1. गुरु घासीदास के सामाजिक सुधार संबंधित जीवन दर्शन को जानेंगे।
                     2. गुरु घासीदास के सामाजिक सुधार के विभिन्न क्षेत्रों का अध्ययन करेंगे।
                     3. गुरु घासीदास के सामाजिक सुधार की वर्तमान प्रासंगिकता पर प्रकाश डालेंगे।
विषय प्रवेशः- भारतवर्ष अनेक संतों एवं महात्माओं की जन्मस्थली एवं कर्मस्थली रही है। ऐसे ही एक महान संत छत्तीसगढ़ में भी अवतरित हुए, जिनका नाम था संत गुरु घासीदास। सामाजिक समरसता और समाज सुधारक रूप में बाबा गुरु घासीदास सबसे अग्रणी रहे हैं। गुरु घासीदास ने समाज में व्याप्त बुराइयों को दूर करने का बीड़ा उठाया था। गुरु घासीदास स्त्री समानता के प्रबल समर्थक थे, इसलिए इन्हें छत्तीसगढ़ में स्ति्रयों के प्रथम उद्धारक के रूप में भी जाने जाते हैं। वे विधवा विवाह के पक्षधर थे। जाति व्यवस्था को समाज की सबसे बड़ी बाधा के रूप में देखते थे और जातिगत भेदभाव मिटाने का संदेश जन-जन को पहुँचाया। समाज में अमीरी -गरीबी के भेदभाव की खाई को पाटने का भरसक प्रयास गुरु घासीदास ने किया और निःसहाय लोगों का उत्थान भी किया। समाज में व्याप्त कुरीतियों एवं रूढ़ीवादी मान्यताओं का बचपन से ही विरोध किया। समाज में सामाजिक, साँस्कृतिक, धार्मिक, आर्थिक एकता छिन्न - भिन्न हो गई थी। लोग एक - दूसरे में द्वेष और प्रतिस्पर्धा का भाव देखने लगे थे। परिणाम स्वरूप समाज में जाति, वर्ग, सम्प्रदाय, लिंग, अमीरी - गरीबी, ऊँच - नीच, स्वार्थ, हिंसा, काम, क्रोध, मोह का वर्चस्व स्थापित हो गया था। इतने विपरीत परिस्थितियों में बाबा घासीदास ने ‘‘सत्य’’ नाम का मंत्र देकर लोगों में मानवता, एकता, समता, अहिंसा, करुणा, प्रेम, समन्वय, त्याग, समरसता आदि को जागृत कर सद् मार्ग दिखाया। गुरु घासीदास बाल्यावस्था से ही संत स्वभाव के चिंतनशील, सत्य व सरल भाषा एवं सत्य खोजी थे। उनका हृदय मानवतावादी गुणों से परिपूर्ण था। समाज में व्याप्त विषमता के कारण बचपन से ही गुरु घासीदास एकांतवास में रहने लगे और सत्य की खोज में चिन्तन - मनन करते रहे। इस विषम परिस्थिति में समाज भी एक ऐसे महापुरुष को पुकार रही थी जो इस संकट की घड़ी से उन्हें बाहर निकाल सके। गुरु घासीदास ऐसे ही महापुरुष थे।
          अब हम गुरु घासीदास के समाज सुधार क्षेत्र का चर्चा करेंगे जिसमें गुरू घासीदास के सिद्धाँतों, उपदेशों एवं उनके विचारों का समन्वय देखने को मिलता है, जो इस प्रकार हैं -
(1) नारी सम्मान के प्रबल समर्थकः- गुरु घासीदास स्त्री-पुरुष को समान मानते थे। ‘’यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमंते तत्र देवता’’ को चरितार्थ करने वाले गुरु घासीदास वास्तव में नारी सम्मान और समानता के प्रबल समर्थक थे। गुरु घासीदास ने नारी को बहुत ऊँचा स्थान दिया। नारी के विभिन्न रूप माँ, बहन, बेटी और पत्नी के रूप में वर्णन किया। उन्होंने नारी को सम्पूर्ण सृष्टि के रचयिता माना। गुरु घासीदास के  तत्कालीन समय में सती प्रथा, पर्दा प्रथा, दहेज प्रथा तथा तलाक की प्रथा विद्यमान थी। जिसे गुरु घासीदास ने अपने आत्मिक बल से रोक लगाई। स्ति्रयों को पुरुषों के समान अधिकार दिए, उन्होंने स्त्री शिक्षा को बढ़ावा दिया साथ ही विधवा विवाह भी कराया। गुरु घासीदास का मानना था की पत्नी की मृत्यु हो जाने पर अगर पति पुनः विवाह कर सकता है तो एक विधवा स्त्री अपनी जीवन क्यों विधवा होकर व्यतीत करें उसे भी पुरुष के समान ही जीवन जीने का पूर्ण अधिकार है। उन्होंने कहा की नारी केवल भोग की वस्तु नहीं है अपितु संपूर्ण संसार को रचने वाली है। पंथी गीतों में नारी सम्मान स्पष्ट होता है -
नारी हवे देवी, नारी हवे जननी अउ नारी हे महान।
नारी बिना नर हे अधूरा, जानत हे सकल जहान।।

           गुरु घासीदास ने तुलसीदास के इस कथन - ‘’ ढोल, गवांर, शूद्र, पशु, नारी, सकल ताड़ना के अधिकारी’’  का जोरदार खण्डन किया और कहा कि नारी सृजन है, धन्य है, माता है, नारी बिना संसार अधूरा है। प्रेम, करुणा, त्याग की शक्ति और प्रेरणा का स्त्रोत है।
नारी ल कहिथे लोगन, नारी नरख के खान।
इही नारी ले नर उपजे हे, धु्रव, प्रहलाद सामान।।

(2) जाति प्रथा का खण्डन या मानव - मानव समानताः- संत गुरु घासीदास कहते थे ‘‘मनखे - मनखे ल मान, सगा भाई समान’’। अर्थात सभी मानव एक - दूसरे के भाई के समान है। मानव प्रकृति की श्रेष्ठ रचना है और मानव भेद प्रकृति के विरुद्ध है। मनुवादी वर्ण व्यवस्था तथा मानव समाज अमानवीयता के दौर से गुजर रहा था, जिसमें तथाकथित शूद्र समाज आज के पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति समुदाय इसकी चपेट में आ गया था। यही अमानवीय भेदभाव प्रथा को जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए गुरु घासीदास ने समतामूलक समाज की स्थापना की। गुरु घासीदास ने संस्कृति और सभ्यता के रक्षा के लिए जाति विहीन समाज की व्यवस्था दी। जिसमें न कोई छोटा, न कोई बड़ा, न कोई ऊँच है, न कोई नीच, न कोई छूत और न कोई अछूत और कहा -
मानुष की एक जाति है, एक नाम सतनाम।
एक गुरु, एक धर्म है, अउ अधार सतनाम।।
जाति तोड़ो, समाज जोड़ो, जाँत-पात का नाता तोड़ो।
कहती है मानवता, मानव-मानव से रिश्ता जोड़ो।।

          बाबा घासीदास ने सभी के दुख को सामान माना है चाहे वह पशु हो या मानव और कहा है-
मनखे - मनखे एक हे अउ पीरा सबके एक।
मनखे ल मनखे जानिस उही मनखे हे नेक।।

          स्पष्ट है कि गुरु घासीदास ने जाति, धर्म, समाज, वर्ण, रंग आदि किसी भी प्रकार से मानव भेद को अस्वीकार किया।
(3) मूर्ति पूजा का खण्डनः- बाबा गुरु घासीदास ने ईश्वर को निर्गुण और निराकार माना है। उन्होंने ईश्वर के कोई साकार रंग - रूप को स्वीकार नहीं किया है। गुरु बाबा ने कहा है कि सभी मानव का ईश्वर या भगवान एक है जिसका नाम ‘‘सतनाम’’ है। सत्य ही ईश्वर है, ईश्वर ही सत्य है, सत्य ही मानव का आभूषण है। भूमि, गगन, वायु, अग्नि, नीर यह पंचतत्व सृष्टि के सृजनकर्ता है। श्री राम, श्री कृष्ण, गौतम बुद्ध, महावीर जैन, ईसा मसीह, मोहम्मद पैगम्बर, कबीरदास, रैदास, गुरु नानक देव, उधोदास, जगजीवन दास, गुरु घासीदास इन सभी के देह (शरीर) पंचतत्व से सृजित हुए थे। ये सभी सत्य धारक व सत्य व्यवहारक थे। अर्थात यह ईश्वर तुल्य माने जाते हैं।
गुरु घासीदास ने सत्य को ही ईश्वर माना है और कहा है -
सत्य से धरती खड़े, सत्य से आकाश।
सत्य से सृष्टि उपजे, कह गए घासीदास।।

बाबा गुरु घासीदास ने मूर्ति पूजा का विरोध किया और कहा है कि ईश्वर जिसका कोई रंग - रूप, आकार नहीं है वह भला एक मूरत में कैसे समा सकता है -
सतनाम सत्पुरूष के नइये कोनो आकार।
मूरत के आकार मा कहां समाही निराकार।।

गुरू घासीदास ने मूर्ति पूजा का खण्डन करते हुए कहा -
मंदिरवा मा का करेला जाबो।
अपन ही घट के देव ल मनाबो।। मंदिरवा मा...
पथरा के देवता हालय न डोलय न बोलय जी।
काहे के प्रीत लगाबो।। मंदिरवा मा...

(4) बलि प्रथा या जीव हत्या का विरोधः- गुरु घासीदास का मानना था कि संसार के सभी प्राणियों में समान जीव (आत्मा) है। ‘‘सब्बो जीव के आत्मा एकचे आय।’’ चाहे वह मनुष्य हो, पशु - पक्षी हो या फिर पानी के अंदर, बाहर रहने वाले जीव जन्तु हो या छोटी सी चींटी हो या विशालकाय हाथी, चाहे जंगल में हो या पहाड़ पर सभी में समान जीवात्मा है और सभी को सामान्य जीवन जीने का पूर्ण अधिकार है। उन्होंने बलि प्रथा और पशु हत्या का प्रबल विरोध किया। वह पूर्ण अहिंसावादी थे। वे कहते थे सभी प्राणी, पशु - पक्षी को स्वतंत्रता पूर्वक जीने का अधिकार है। गुरु घासीदास कहते थे की बलि के नाम पर मूक प्राणी, जो कमजोर हैं जैसे - मुर्गी, बकरा, सूअर आदि की ही बली क्यों दिया जाता है..? बाघ, भालू या चीता का बलि क्यों नहीं दिया जाता। अर्थात कमजोर को ही बलि देना स्वार्थ सिद्धी का प्रमाण है। बाबा घासीदास आगे कहते हैं कि -
देवी - देवता के आड़ ले, स्वारत बर करथे अपन मनमानी।
दया नई आवै बलि चढ़ावै, अउ चढ़ावै गंगा के पानी।।

         सभी जीवों को सतनाम का अंश बताते हुए गुरू घासीदास कहते हैं कि -
सबे परानी या जीव - आत्मा, आय पुरूष के अंश।
अनप भाई ल बलि चढ़ाये, पाप लगाये अंग।।

(5) मृत्यु भोज का खण्डनः- प्राचीन प्रथा यह थी कि दिवंगत व्यक्ति के उत्तराधिकारी के पालन, शिक्षा, विवाह एवं विकास के लिए जितना धन आवश्यक हो उतना ही रख कर शेष लोक कल्याण के लिए स्वर्गीय की आत्मशांति एवं सद्गति के लिए दान करते थे। मृतक के प्रति यह श्रद्धा ही कालान्तर में श्राद्ध कहलाया। पूर्वकाल में मृतक भोज का आधार लोक कल्याण की भावना थी किन्तु इसके बाद का जो समय आया वह अंधकार और अज्ञान का जमाना था। लोभी एवं लालची लोगों ने श्राद्ध के नाम पर दावतें उड़ानें शुरू कर दी। चाहे व्यक्ति सक्षम हो या ना हो। लालची पंडित चीजे मृतक को दिलाने का झाँसा देकर अन्न, वस्त्र, पात्र, पलंग, गाय, मकान, आभूषण आदि स्वयं की स्वार्थसिद्धी हेतु लूटते थे। आज मृतक भोज सामाजिक प्रतिष्ठा का विषय बन गया है, भले ही व्यक्ति कितना ही गरीब क्यों ना हो, सामाजिक नियम के कारण वह  श्राद्ध करता है। जिससे उस पर आर्थिक दबाव और अधिक बढ़ जाता है। इस कुप्रथा का बहुत बुरा परिणाम परिवार के लोगों को भोगना पड़ता है। घर के एक व्यक्ति का मृत्यु हो गई, उसकी चिकित्सा, अंतिम संस्कार आदि में धन खर्च हुआ और अंत में मृत्यु भोज का भारी दबाव सिर पर आ गया। यह किसी भी परिवार को विपत्ति में डालने वाली स्थिति है।
गुरु घासीदास इस प्रथा का विरोध करते हुए कहते हैं -
मरनी होगे जेखर, सब कुछ ओखर गंवाय।
दुःख मा संग दे ला छोड़के, मरनी भात कलेवा खाय।।
ये हा अंधेर जमाना आय....
रोवैय बेटी, बेटा रोवैय, नारि तड़पे जाय
दाई, ददा, भाई, बहिनी रोवैय, करलइ देखी न जाय।।
ये हा अंधेर जमाना आय....
पण्डा लुटय, पुजारी लुटय, भाट घलो लूट खाय।
अपन ह तो तरय नहीं, मरे ला बैतरनी नहकाय।।
ये हा अंधेर जमाना आय....
जीयत मा कोनो नई खवाये, मरे मा ओला खवाय।
अपन कमाई के धन ला, दिये काबर लुटवाय।।
ये हा अंधेर जमाना आय....
खेत बेचाये, घर बेचाये, चीज बेचाये जाय।
समरत हा बोझा ला सइही, बाकी जीयत मर जाय।।
ये हा अंधेर जमाना आय....
रीति - नीति अइसे बनाय, लूटे अउ लुटवाय।
मेकरा कस जाला बनाके, फँसे अउ फँसाय।।
ये हा अंधेर जमाना आय....
मरे हा भूत,परेत नई बनैय, देवंव तंहुला बताय।
लुट खवइया पण्डा मन ला, न देहू अउ देवाय।
ये हा अंधेर जमाना आय....
(6) माँस भक्षण व नशा पान का विरोधः-
गुरु घासीदास माँस भक्षण को अमानुषिक प्रवृत्ति मानते थे। पूर्व काल में पूजा अर्चना के नाम पर देवी के लिए बकरा, मुर्गा यहाँ तक कि मनुष्य की भी बलि देने की प्रथा थी। जिसका बाबा ने तर्क सम्मत विरोध किया और कहते हैं कि बलि के नाम पर मूक प्राणी को ही बलि दिया जाता था। यह केवल स्वार्थ पूर्ति के लिए ही है। सादा जीवन जीने के लिए बाबा ने लोगों में जागृति लाई।

माँस - माँस सब्बो एक आय, कुकरी, हिरन, गाय।
जे मानव आँखि देखे खावत हे, ते हा नरक ही जाय।।

5. मादक पदार्थ को त्यागने के लिए गुरु घासीदास ने बताया की वह केवल शारीरिक ही नहीं, मानसिक दुर्बलता का भी मुख्य कारण है। शराब, तंबाकू, गांजा, चोंगी आदि का सेवन सतनाम पंथ में निषिद्ध है। सतमार्ग में माँस भक्षण और मद्यपान सबसे बड़ा अवरोध है। जिसे दूर करने का प्रयास गुरु घासीदास जी ने किया और कहते हैं -
माँस - मदिरा के सेवन, मति ला देवय भरमाय।
सत के मारग ले, संतन ला देवय भटकाय।।

(7) बाल एवं बहु विवाह प्रथा का विरोधः- विवाह एक आत्मसमर्पण, उत्सर्ग तथा आस्था परिपम् करने की, घर में रहकर की जाने वाली योग साधना है। हमारा दाम्पत्य भी इसी स्तर पर होना चाहिए। किन्तु लोग विवाह के उच्च आदर्श को भूल जाते हैं और अपनी पत्नी के होते हुए भी अन्य विवाह कर लेते हैं। लोग अपनी पत्नी से पतिव्रत धर्म का पालन करने की अपेक्षा करते हैं किन्तु वह स्वयं अपनी पत्नीव्रत धर्म का पालन नहीं करते हैं। इससे आपसी अविश्वास, आशंका, रोष, घृणा और निराशा उत्पन्न हो जाता है। इसका प्रभाव संतान पर भी पड़ता है जो मन और बुद्धि को कमजोर बनाता है। एक से अधिक विवाह दाम्पत्य जीवन में बाधक है।
रूप, रंग एवं धन की ओर आकर्षित होकर लोग बाल विवाह करते हैं। यह अमानवीय कृत्य है। कम उम्र में वह हर दृष्टि से अयोग्य व कमजोर होता है, अतः बाल विवाह नहीं करना चाहिए।
जइसने आशा तैं अपन नारि से करथस।
तइसने करम तहूँ हा कर
कल्याण हो जाही तोर जीवन भर।।

(8) अहिंसा व जीवों पर दयाः- गुरु घासीदास जीवों के प्रति दया व प्रेम की भावना रखते थे। अहिंसा को परम धर्म स्वीकार थे। उन्होंने प्रेम करना ही मानव जीवन का सबसे बड़ा महत्वपूर्ण कार्य बतलाया। अहिंसा द्वारा सभी कार्य करने को कहा। कुछ समाज में अहिंसा का बोलबाला था, जिसे उन्होंने दूर किया और समाज को अहिंसा रूपी मंत्र का महत्व बतलाया। जीव - जन्तुओं की कम होती संख्या से वे चिंतित थे और कहते थे ‘‘सब एक ईश्वर के हिस्से हैं।’’ अतः जीवों पर दया करना ही सर्वोत्तम आचरण है।
सब्बो परानी मा हवै आतमा, सबके तन मा समाय।
तोला पीरा होथे जतका, ओतके ओखरो आय।।

समाज सुधारक रूप में गुरू घासीदास की प्रासंगिकता -
           गुरु घासीदास के समाज सुधारक रूप आज भी समाजोपयोगी है। गुरु घासीदास के समाज सुधार का आधार उनका सिद्धाँत एवं जीवन दर्शन है। जिसका प्रभाव जन सामान्य पर बहुत गहरा पड़ा। उन्होंने बलि प्रथा को बंद करवाया, जाँति - पाति के भेदभाव का विरोध किया। वास्तव में उनके उपदेशों एवं सिद्धाँतों का समन्वय ही समाज सुधारक का रूप धारण करती है। नारी सम्मान, जाति प्रथा का खण्डन, मूर्ति पूजा का खण्डन, मृत्यु भोज का विरोध आदि कुरीतियों को समाज से दूर करने का प्रयास गुरु घासीदास ने जीवन भर किया और वह उसमें सफल भी हुए। सत्य, अहिंसा, धर्म, मानवता, सदाचार, समानता, करुणा, प्रेम के मार्ग पर चलने के लिए जन - जन को सतनाम का संदेश दिया।
           गुरु घासीदास अन्याय तथा बुराइयों के विरुद्ध संघर्ष करने तथा सामाजिक रूप से पिछड़े लोगों के जीवन में सम्मान की भावना जागृत करने की दृष्टि से क्रांतिकारी उपदेशों, निर्देशों, और सिद्धाँतों को हमेशा याद किया जाएगा। यदि हम उनके उपदेशों, सिद्धाँतों एवं निर्देशों का अंश मात्र भी अनुसरण करते हैं, तो अनेक आर्थिक, सामाजिक, साँस्कृतिक और आध्यात्मिक समस्याओं का समाधान स्वमेव हो जाएगा। इन अर्थों में गुरु घासीदास और उनका समाज सुधारक रूप आज भी प्रासंगिक है।
सिद्धाँतों एवं उपदेशों का समन्वय कुछ इस प्रकार है -
मूर्ति पूजा मत करो। जाँति - पाति के भेदभाव में मत पड़ो। सभी को सामान समझो।
हिंसा मत करो, नशा सेवन से दूर रहो। माँसाहार ग्रहण मत करो। जुआ नहीं खेलो।
अपना हृदय पवित्र रखो। मन में घृणा भाव मत रखो। अच्छी बात सोचो और समझो।
सतनाम को मानो। अपने पराए की भावना मन में मत लाओ। सभी के प्रति हृदय में सामान भाव हो।
संयमित रहो। काम, क्रोध, लोग, मोह, माया, द्वेष इन सभी से दूर रहो।
बाह्य आडम्बर, अंधविश्वास एवं रूढ़िवाद के चक्कर में मत पड़ो।
असमानता को दूर करो। समानता एवं स्वाभिमान का बोध सभी को हो।

निष्कर्ष :-
        अंततः हम कह सकते हैं कि गुरु घासीदास के सिद्धाँत, उपदेश एवं निर्देश आज केवल एक समाज तक सीमित नहीं रहा अपितु उनकी सोच मानवता के लिए, लोक कल्याण के लिए, समुचित संसार के कल्याण के लिए है। गुरु घासीदास, कबीरदास की तरह ही एक प्रखर व्यक्तित्व और चिंतनशील, तर्कशील संत थे, जिन्होंने समाज में हो रहे आडम्बरों, अंधविश्वासों, कर्मकाण्डों या कहा जा सकता है सामाजिक बुराइयों.... जिसमें जाँति - पाति संबंधित विषमता भी शामिल है, का उन्होंने विरोध किया। उनकी सोच वास्तव में समाज को एक नई दिशा प्रदान की है, जिसे आज हम प्रत्यक्ष देख पा रहे हैं। गुरु घासीदास ने नारी को सम्मान देकर अविस्मरणीय कार्य किया और धार्मिक क्षेत्रों में भी नारी की भूमिका का वर्णन किया। इसीलिए गुरु घासीदास को छत्तीसगढ़ में नारी के प्रथम उद्धारक के रूप में भी जाने जाते हैं। जाँति-पाति, भेदभाव के बंधन को तोड़ कर गुरु घासीदास ने मानव को मानव से जोड़ा। तत्कालीन कुरीतियों में दहेज प्रथा, बहु विवाह, बाल विवाह, सती प्रथा को बंद करवाया ।
          सत्य के मार्ग में चलने के लिए गुरु घासीदास ने सदाचार, सात्विक आहार, प्रेम, करुणा, समानता, समरसता, मानवता, अहिंसा को श्रेष्ठ माना। इस दृष्टि से बाबा गुरु घासीदास और उनके समाज सुधारक रूप आज भी प्रासंगिक जान पड़ते हैं।
संदर्भः -
(1) गुरु घासीदास संघर्ष, समन्वय और सिद्धांत, डॉ0 हीरालाल शुक्ल, सिद्ध बुक्स, नई दिल्ली, 2015, पृष्ठ- 214, 215
(2) मानवता के प्रतीक गुरु घासीदास (गुरु घासीदास के आदेश, उपदेश एवं निर्देश पर आधारित)  धनाराम  ढ़िन्ढ़े, सत्य दर्शन संस्थान, भिलाई नगर, पृष्ठ - 19, 21, 22
(3) सतनाम संदेश, मासिक पत्रिका, अंक -12, वर्ष - 2, दिसंबर 2015, छत्तीसगढ़ प्रगतिशील सतनामी समाज, रायपुर, पृष्ठ - 26, 27
(4) मानवता के प्रतीक गुरु घासीदास (गुरु घासीदास के आदेश, उपदेश एवं निर्देश पर आधारित)  धनाराम ढ़िन्ढ़े, सत्य दर्शन संस्थान, भिलाई नगर, पृष्ठ - 18
(5) सतनाम संदेश, मासिक पत्रिका, अंक - 12, वर्ष - 2, दिसंबर 2015, छत्तीसगढ़ प्रगतिशील सतनामी समाज, रायपुर, पृष्ठ - 8
(6) मानवता के प्रतीक गुरु घासीदास (गुरु घासीदास के आदेश, उपदेश एवं निर्देश पर आधारित)  धनाराम ढ़िन्ढ़े, सत्य दर्शन संस्थान, भिलाई नगर, पृष्ठ - 26,37,38,39
(7) ........................................वही पृष्ठ............................................  41, 42
(8) तपश्चर्या एवं आत्म चिंतन गुरु घासीदास, डॉ0 बलदेव/जय प्रकाश मानस/रामसरण टंडन, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, 2015, पृष्ठ -  161, 162
(9) सत्य ध्वज, पत्रिका, 18 दिसंबर जयंती विशेषांक, 1996, अंक - 24, वर्ष - 7, शिक्षा एवं साहित्य विभाग, गुरु घासीदास सेवा समिति, भिलाई नगर, पृष्ठ -  36
(10) सत्य ध्वज, पत्रिका, 18 दिसंबर जयंती विशेषांक, 1995, अंक - 20, वर्ष - 6, शिक्षा एवं साहित्य विभाग, गुरु घासीदास सेवा समिति, भिलाई नगर, पृष्ठ - 43
(11) मानवता के प्रतीक गुरु घासीदास (गुरु घासीदास के आदेश, उपदेश एवं निर्देश पर आधारित)  धनाराम ढ़िन्ढ़े, सत्य दर्शन संस्थान, भिलाई नगर, पृष्ठ - 24
(12) ......................................वही पृष्ठ...............................................  34
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हिन्दी विभाग, शास0 दिग्विजय महा0 राजनान्दगाँव, छत्तीसगढ़,
पता - मेरेगाँव, अं0 चौकी, जिला -राजनांदगाँव, मो.नं.-9669226959,
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