इस अंक के रचनाकार

आलेख दान देने का पर्व छेरछेरा / सुशील भोले भारत में लोक साहित्य का उद्भव और विकास / डॉ.सुशील शर्मा राज धरम यहै ’सूर’ जो प्रजा न जाहिं सताए / सीताराम गुप्ता स्वामी विवेकानंद और राष्ट्रवाद / मधुकर वनमाली मड़वा महल शिव मंदिर भोरमदेव / अजय चन्द्रवंशी शोघ लेख भक्ति में लालसा का लिंग निर्धारण, पश्चिमी ज्ञान मीमांसा और मीरा / माधवा हाड़ा कहानी इक्कीस पोस्ट / डॉ. संजीत कुमार जिन्‍दगी क्‍या है / बलवीन्‍दर ' बालम ' लघुकथा स्टार्ट अप / विनोद प्रसाद सबक / श्रीमतीदुर्गेश दुबे मदद / रीतुगुलाटी ऋतंभरा बिल्ली / सुनिता मिश्रा सूत्र / सुरेश वाहने छत्तीसगढ़ी व्यंग्य झन्नाटा तुँहर द्वार / महेन्द्र बघेल गीत / गजल/ कविता खुशियों का संसार बना लें (बाल कविता) ओंकार सिंह ’ ओंकार’ बेबसी को दर्द की स्याही में / गजल/ प्रिया सिन्हा ’ संदल’ जड़ से मिटाओ/गीत/ अशोक प्रियबंधु, सहरा में जब भी ... / गजल/ स्वरुप , जब - जब हमनें दीप जलाये / गीत / कमल सक्सेना कवि एवं गीतकार आशा की उजियारी / गीत / जनार्दन द्विवेदी बगुला यदि सन्यासी हो तो समझो /गजल/ नज्¸म सुभाष कितना कुछ कह रहा है .../ गजल / पारुल चौधरी अपने - अपने ढंग से ही सब जीते हैं /नवगीत /जगदीश खेतान आदमियत यदि नहीं तो .../कविता/ राघवेन्द्र नारायण मिले थे यक - ब - यक/ गजल / किसन स्वरुप अनदेखे जख्¸म/ गजल / गोपेश दशोरा छन्द युग आएगा/ गीत/ डॉ. पवन कुमार पाण्डे प्यारी बिटिया / गीत/ नीता अवस्थी इश्क में मुमकिन तो है ...गजल/ तान्या रक्तिम अधरों के पंकज उर / गीत/ संतोष कुमार श्रीवास हे वीणा वादिनी माँ / गीत /स्वामी अरुण अरुणोदय प्रेरणा/ कविता/ नरेश अग्रवाल, बसन्त फिर से .../ नवगीत / डॉ सीमा विजयवर्गीय नवीन माथुर पंचोली की रचनाएँ तोड़ती रहती हर रोज/ कविता/ कविता चौहान कितना सूना है जीवन / कविता/ उषा राठौर उम्मीदों की झड़ी से लब दब गया किसान / कविता/ सतीश चन्द्र श्रीवास्तव परेश दबे ’साहिब’ की ग़ज़लें पाँव में छाले हैं ... / कविता/ यशपाल भल्ला बुरे हैं भले हैं ... कविता/ एल एन कोष्टी पीली पीली सरसों फूली/ नवगीत /हरेन्द्र चंचल वशिष्ट तुम/ नवगीत जिंदगी क्या थी .../ नरेन्द्र सिंह दीपक लाल देवेन्द्र कुमार श्रीवास्तव की कविताएँ केशव शरण की कविताएं मोह - गँधी गीत बन/गीत/ कृष्ण मोहन प्रसाद ’मोहन’, चाहता वो हमें इस दिल में .../ गीत/ प्रदीप कश्यप आत्ममंथन / गीत / दिनेश्वर दयाल मुस्कुराया बहुत / गीत/ किशोर छिपेश्वर ’ सागर’ इजहार / गजल /मधु’ मधुलिका’ मदारी और बंदर काका / बाल गीत / कमलेश चन्द्राकर मन का भटका कविता राजेश देशप्रेमी आया जाया करो / कविता / ऋषि कुमार पुस्तक समीक्षा संदेशो इतना कहियो जाय :कहानी संग्रह .

गुरुवार, 4 जून 2020

रेणु लोक-जीवन का अद्भुत चितेरा

           
संजय कुमार सिंह
 
 
            काल-बोध की दृष्टि से रेणु प्रेमचंद के बाद दूसरे सबसे महत्वपूर्ण  कथाकार हैं। प्रेमचंद का समय जहाँ आजादी के पहले का है, वहीं रेणु का साहित्य आजादी के बाद उत्कर्ष पर आता है। आजादी की पूर्व-पीठिका से बाद तक फैला-पसरा उनका यह रचनात्मक संसार अपने समय-समाज का आईना है। अपने समय-समाज के यथार्थ को कथा-रस की जिस चासनी में ढाल कर उन्हौंने प्रस्तुत किया, वह अपूर्व है, लेकिन उनके साहित्य की तरफ लोगों का ध्यान देर से गया।हिन्दी आलोचना की यह चूक उतनी ही अपूर्व  थी,जितना कि उनका लेखन अपूर्व था। ,नई कहानी आंदोलन में उनका कोई विशेष  ज़िक्र नहीं मिलता। ग्रामीण जीवन और विशेष कर शहरी मध्यवर्ग के सामाजिक जीवन के अंतर्विरोधों को रचने-कहने वाले वहाँ दूसरे कथाकार हैं। इनमें भैरव गुप्त, शेखर जोशी, शिव प्रसाद सिंह, मार्कण्डेय,निर्मल वर्मा, राजेन्द्र यादव, मोहन राकेश, कमलेश्वर, धर्मवीर भारती, मन्नू भंडारी, उषा प्रियंवदा, मेहरुन्निसा परवेज आदि का नाम लिया जा सकता है। 
           कहना महीं होगा कि रेणु का साहित्य परिधि से केन्द्र की ओर उन्मुख होता है,उसका अतिक्रमण करता है।नई कहानी के आलोचकों के पास यहाँ बगलें झाँकने के अलावे कोई जवाब नहीं है। उन्हौंने दिल्ली-पटना में रहकर  यह भूल की है। असाधारण भूल है यह, जो खुद आलोचना के उत्तरदायित्व और विवेक पर प्रश्न-चिह्न खड़ा कर उसके निर्णय के आधार और अधिकार को चुनौती देती है। इतना ही नहीं  यह चूक हिन्दी कथा-आलोचना को पुनर्पाठ के लिए विवश भी करती है। इसलिए भी कि भारतीय लोक-जीवन का पूरा यथार्थ रेणु के कथा-साहित्य का उपजीव्य है।सामाजिक, राजनीतिक , सांस्कृतिक और आर्थिक स्तर पर तलछट के जीवन का चित्रण रेणु ने जिस आत्म-राग के साथ किया है, वह समग्रता में अन्यत्र दुर्लभ है। रेणु के इस समग्र रचनात्क संसार के उत्स में वह आप्त-लोक है, जो अपने तमाम अंतर्विरोधों के बीच उम्मीद की बाट जोहता है।धरती का यह हिस्सा किसी यूटोपिया का नहीं बल्कि जीवन का सच है।मैला आँचल, परती परिकथा, दीर्घतपा, जुलूस सब धरती पर जी रहे लोगों के सुख-दुख की वास्तविक दुनिया का सर्जनात्म प्रकल्प है। मुक्तिबोध के अनुसार जीवन के अनुभव की साधना के बिना  कला की साधना संभव नहीं है। रेणु के कथा-साहित्य को इन्हीं कसौटियों पर कसा जाना चहिए। जीवन और कला का परिपाक उनमें अपने चरम उत्कर्ष पर है। डा.नामवर सिंह का कथन है," नए भाव-सत्य के अनुसार कहानी का रूप बदलता अवश्य है, लेकिन इतना नहीं बदलता कि कहानी ही नहीं रह जाए। कहानी का रूप कहानी के भीतर ही बदला जा सकता है।" पेज न.21 कहानी, नयी कहानी। इस परिभाषा की व्याख्या रेणु की कहानी 'कहानी का सुपात्र  में है, जो न सिर्फ उसकी पठनीयता को अनिवार्य तरजीह देती है बल्कि उसके जातीय -शिल्प और कहन के रस को भी विपथन से बचाती है। इन सब के बावजूद रेणु कहानी आलोचना में हाशिये छूट जाते हैं,ठीक उसी तरह, जिस तरह उदारीकरण,भूमंडलीकरण और बाजारवाद के इस समारोही दौर  में हम यह भूल जाते हैं कि इस बहुलतावादी सामाजिक संरचना वाले देश का कोई इकहरा सच सम्पूर्ण समाज का सच नहीं हो सकता। हमें अपने समय-समाज के सच को सूचना-तकनीक के इन्द्रजाल से बाहर आकर देखना होगा। उस राजकीय केन्द्र का अतिक्रमण कर जब हम परिधि की ओर चलेंगे, तभी भारत का वह पूँजीवादी विकास के असमान लक्ष्यों और दूरियों  को रेखांकित कर पाएँगे। प्रेमचंद ने तब 'लमही' और   रेणु ने बाद में "मेरीगंज' के माध्यम से किया, जिससे राजकीय सत्ता और उसकी वर्चस्वशाली आलोचना का आसन डोल गया। भूख, अशिक्षा गरीबी, अन्याय, दमन-शोषण  और इनके मूल मे छिपे जटिल और संश्लिष्ट सामाजिक अंतर्विरोधों और संघर्षों का दस्तावेज है इनका साहित्य। मैला आँचल हो या परति :परिकथा भू-समस्याओं के संदर्भों को उनका कथा-रस कहीं से विचलित नहीं करता।
           'ऋणजल धनजल की भूमिका में  निर्मल वर्मा कहते हैं," रेणु का महत्व उनकी आँचलिकता में नहीं, आँचलिकता के अतिक्रमण में निहित है। बिहार के एक छोटे भूखण्ड की हथेली पर उन्हौंने समूचे उत्तरी भारत के किसान की नियति-रेखा को उजागर किया था। यह रेखा किसान की किस्मत और इतिहास के हस्तक्षेप से गूँथी हुई थी, जहाँ गाँधी जी का सत्याग्रह आंदोलन, सोशलिस्ट पार्टी के आदर्श, किसान सभाओं की मीटिंगें अलग-अलग धागों से रेणु का संसार बुनती हैं। सैकड़ों पात्र आते-,जाते है---उनकी गति, उनका ठहराव, उनकी ऊहापोह और आत्म-संघर्ष एक पूरी इमेज हम पर अंकित कर जाता है।...पूर्णिया के परदे पर उसकी पीठिका में हम भारतीय ग्रामवासी और इतिहास के बीच  मुठभेड़ और टकराव की गड़गड़ाहट सुनते हैं।एक ऐसा क्षण आता है जब पात्र और पीठिका में कोई अंतर नहीं रहता---दोनों एक-दूसरे में इतना गुंथ जाते हैं कि मनुष्य, धरती और इतिहास के बीच सीमाएँ धुल-सी जाती हैं किन्तु आपसी मुठभेड़ से जो बिजली चमकती है, बिहार के अवसन्न, धूल भरे आकाश में जो चिंगारी कौंधती है, रेणु ने कैमरे की आँखों से उसे अपनी जीवंत फड़फड़ाती तात्कालिकता में पकड़ने की कोशिश की थी।"पेज न.18-19 समग्र मानवीय दृष्टि।ऋणजल, धनजल।"मैला आँचल " के बारे में एक आलोचक कहते हैं।ग्रामीण अंचल की ध्वनियों और धूसर लैंडस्केप्स से सम्पन्न यह उपन्यास हिंदी कथा-जगत में पिछले कई दशकों से एक क्लासिक रचना के रूप में स्थापित है."
            वस्तुत:रेणु का साहित्य परिधि का साहित्य है, जो अपनी सामाजिक-राजनीतिक गतिकी में केन्द्र का अतिक्रमण करता है। उनका साहित्य राजकीय आलोचना की स्थापना और केन्द्रीय-सत्ता के लिए चुनौती की तरह है।इस सच से कोई इनकार नहीं कर सकता कि रेणु का समय-समाज मुख्यधारा की उपेक्षा के कारण पिछड़ा, अशिक्षित और आर्थिक रूप से असुरक्षित है। मगर जीवन विहीन नहीं बल्कि उसकी जीवंत उपस्थित के साथ विचार, स्वप्न और कल्पना से अभिभूत! गोबर, मिट्टी धान-दूब अक्षत और चंदन की रंगोली बनकर। यह सांस्कृतिक कौतूहल और कलरव उनके साहित्य की ताकत भी है और जीवन की विसंगति-विडम्बना को व्यापक मानवीय संदर्भ में नहीं समझ पाने के कारण बहुतों के लिए कमजोरी भी। मगर यह कहना यहाँ जरूरी लगता है कि साहित्य समाज का होता है, उस समाज का, जो अपने घोर आमनवीकरण के बीच भी एक जीवित समाज का सच होता है।उस जीवित समाज का,जिसे एक आउट साइडर इसलिए नहीं समझता कि वह उस जातीय जीवन की वास्तविक रूप में भी कल्पना नहीं कप सकता। कल्पना में वह उसके अवधान का हिस्सा नहीं हो सकता,कि उसने न देखा और जिया-भोगा ही। मगर एक बार उसकी हरकत दुनिया को चौंका देती है, उस घोंघे की तरह जो अचानक सोए-सोए हमारी विचार और संवेदना में रेंगने लगता है, आकार लेने लगता है।
            समाज शास्त्रीय जीवन-मूल्यों के वैविध्य को जानने-समझने वाले लोग जानते हैं कि हर समाज और उसके जातीय जीवन की अपनी आत्म-शक्तियाँ और जिजीविषाएँ होती हैं।कोई समय-समाज पिछड़ा हो सकता है मगर जड़ नहीं।मनुष्य की दुनिया कैसी भी हो, उसमें जीवन की अनोखी गंध होती है। विचार, संवेदना स्वप्न कल्पना और स्मृति की ऊष्मा से रची-बसी उसकी दुनिया फिर भी परम महत्तर और मानवीय होती है।मनुष्य का यही होना रेणु साहित्य का उत्स है। उदाहरण के लिए अगर मार्खेज के उपन्यास 'एकान्त के सौ वर्ष' को अगर मात्र जिज्ञासा, कौतूहल और मनोरंजन के लिए पढ़ा जाए, तो यह कभी समझ में नहीं आएगा कि यह एक सभ्यता के विकास का इतिहास है, जो धर्म और कानून के आरोपित हस्तक्षेप से अपनी मूल-संरचना से विचलित होता है। इसलिए उस ऐतिहासिक-सामाजिक प्रक्रिया को समझे बिना आंचलिकता को एक लोक-शैली मान कर रेणु के साहित्य का मूल्यांकन आलोचना के ज्ञानात्मक-संवेदन का परिसीमन ही कहा जाएगा।रेणु के यहाँ जो सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश है, वह सृजित होकर भी उस जीवन का वास्तविक यथार्थ है।
             इस सच्चाई को  पाठकीय अवधान में लिए बगैर बहुत से आलोचक यह  आरोप लगाते हैं कि रेणु ने गरीबी रगात्मक भाव-बोध से आह्लादित होकर गरीबी को गर्वोन्नत बनाकर प्रस्तुत किया है,इसलिए उनके पात्र और चरित्र दुख में  भी अपने संघर्ष से अतिक्रमण करने के बजाए भावुक विकल्प की तलाश करते हैं। गीत गाते हैं, कथा कहते हैं। सांस्कृतिक क्रिया-व्यापार का प्रदर्शन करते हैं, पर यह उस जातीय जीवन का शिल्प है,जिसमें जयदेव, विद्यापति से लेकर मृदंगिया तक यह परम्परा जनमन में ध्वनिय होती है। इस समाज की मनोरचना के लिरिकल होने के इतिहास के पीछे जो भी कारण रहे हों, पर इनका उच्छेद करके उनकी रचनाओं को देखना वैसा ही होगा, जैसे मोकोन्दो और मेरीगंज की वास्तविक समस्या सेे कट कर हम जिज्ञासा , कौतूहल और सामाजिक कर्मकाण्डों में ही उलझ कर रह जाएँ जबकि इन कृतियों का मर्म इन संदर्भों से भिन्न रचना-सृजन के उस आयोजन में होता है, जहाँ यथार्थ इनका अतिक्रमण कर रहा होता है।
            वस्तुत: किसी समय-समाज के वास्तविक यथार्थ को कहानी में हम  उसे उसके जातीय परिवेश से काट कर कैसे उपस्थित कर सकते हैं? संस्कृति श्रमशील लोगों की ही होती है।जतसार, प्राती, संझा बटगमनी,गोचारण,गीत-कवित्त, स्वांग लोक-नाट्य से लेकर सरहुल, पोंगल ,नवान्न,सब मनुष्य के भौतिक जीवन-जगत का प्रसादन है। लोक-कला के सभी आसंगों, हस्तशिल्प, हथकरघा, खेल खिलौनों से  लेकर विकास के अनंत सोपानों का सृजन इन्हीं समेकित सामाजिक क्रिया-व्यापारों का हिसा है। ठेस का सिरचन और मृदंगिया जैसे अनेकों कलाकार इस लोक-जनपद की विभूति हैं।कहानी में इनके ढाँचे का उत्सेध कर ही हम उसके मर्म तक पहुंच सकते हैं। तीसरी कसम, रसप्रिया, संवदिया, लालपान की बेगम, पंचलैट जैसी कहानियों को  हमें उस समय-समाज के रूट में जाकर देखना होगा। अँधेरे से बाहर निकलने की बेचैनी अगर 'पंचलैट" का मर्म है, तो दुख, पीड़ा और  परेशानी का अतिक्रमण 'लालपान की बेगम का'। आर्थिक आधार सुरक्षित होने पर  न सिर्फ जीवन में बल्कि सभ्यता के इतिहास में इस उत्सा ह को समझा जा सकता है। यह रेणु की उत्सव-धर्मिता नहीं, उस समय-समाज की मानवीय आकांक्षा है, जिसका अंतरण सांस्कृतिक स्तर पर उल्लास में होता है। यह खुशी जीवन को जीने की मूल उत्प्रेरणा से उद्भूत होकर उसे जीवंत करती है।गाँव में भजन-कीर्त्तन,सब खेल-तमाशे और नाटक-वाटक  के आयोजन प्राय: ठंढा में होते हैं।  साहित्यिक आयोजन भी!राजा सल्हेस, भैया दूज, रानी बासमती विदापत, सीत-बसंत,नैना-जोगिन  आल्हा-उदल,सुंदरवन के फूल, महुआ घटवारिन, देसिया विदेसिया, निरमोहिया आदि न जाने इसके कितने रंग हैं, जिन पर आगे चलकर भव्य सभ्यता  की नींव पड़ती  जिनसे सांस्कृतिक पृष्ठभूमि का निर्माण होता है।बचपन में गाँव में जब ठंढ से भीगती रात में गीतों की आवाज सुनाई पड़ती, तो मैं माँ से पूछता," माँ ठंढा में इतना नाच-रास क्यों?"
माँ कहती,"बेटा!अगहन राजा-परजा सब के लिए सुख का महीना।धान की फसल की खुशी में!पेट भरे तो सुख ! भगवान-भगवत्ती सब खुश ! भजन-कीर्त्तन से लेकर नाच -रास का यही उख्खम समय... मेरी दादी गाती थी-
बासमती बासमती खोल$किवाड़
सातो भैय्या लागल दुआर...
            उसे बिना आग के खाना बनाने कहा गया, पत्थ के दाने को चावल की तरह सिझाने कह गया और उसने सिझा दिया... हम उछल पड़ते।लोक-संस्कृति के इस आत्म-राग को समझे बगैर रेणु की दुनिया को समझना मुश्किल है।
            ऐसा नहीं है कि रेणु अपने समय-समाज की राजनीतिक विडम्बनाओं को नहीं समझ रह थे, जिसे प्रेमचंद ने उनसे पहले समझ लिया था। आजादी के बाद आधुनिक समय-समाज में रागात्मक परिवेश के विखणडन का दर्द रसप्रिया और तीसरी कसम में देखा जा सकता है। सक्रिय सामाजिक औराजनीतिक  आंदोलनों से जुड़े रेणु ने कम से कम प्रेमचंद के उपन्यासों को नहीं पढ़ा होगा। होरी, हल्कू और सूरदास से परिचित नहीं होगा। यह नहीं कहा जा सकता, पर उनके रचनात्मक  अवधान में दृष्टि-बिन्दु का यह तनाव मार्खेज की तरह अपने समय-समाज के जीवन-बोध से उपस्थित है, पर जिस आधुनिक समय-समाज की आगत विडम्बनाओं का उल्लेख प्रेमचंद के उपन्यासों और कहानियों का भविष्य-कथन बनता है।
            वह रेणु में कम ट्रैजिक नहीं। तीसरी कसम का प्रेम जमींदार के दबाव से कम बाजैर के दबाव से ज्यादा विघटित होता है। यह अमूर्त्त संत्रास ही मर्म है इस कहानी का। यह बाजार ही है, जो हर पल अस्वाभाविक, अविश्वसनीय और हस्यास्पद बना रहा है  हिरामन गाड़ीमान के प्रेम को। कोई उदात्त-भाव कोई स्वर्गीय अवबोध उसे इस कठिन समय में नहीं बचा सकता। इन संभावनाओं का संकेत  स्टेशन पर भी होता है और गेट कीपर के आश्चर्य मे भी। इससे अधिक अवमाना तो उस प्रसंग में भी नहीं है, जब उसे जमींदार साहब के आगमन पर हीराबाई के तम्बू से निकलने पर होता है, वह विश्वास तो बाद में हीरा बाई के मनुहार से अर्जित हो जाता है, पर जब बाजार खलनायक बनकर आता है तो सिवाय कसम खाने के उसके पास कोई विकल्प ही नहीं रहता। कहानी का नाटकीय शिल्प भी इसे नैसर्गिक नही लगता। इसी कारण प्रेम की कोई स्वायत्त सत्ता नहीं रह जाती। मुझे 'रसप्रिया 'ट्रैजेडी अधिक विश्वसनीय और मार्मिक लगती है।
             आकस्मिक नहीं कि बाजार के हस्तक्षेप को अगर मूल विडम्बना मान लें, तब तीसरी कसम एक मार्मिक कहानी बनती है। प्रेम लाभ-हानि के गणित नहीं जानता, जबकि बाजार की सत्ता-संरचना का मूल उत्स लाभ-हानि का फंडा होता है। इसलिए  रेणु की बहुत सारी कहानियाँ राजनीतिक दृष्टिकोण से मूल्यांकन की अपेक्षा रखती हैं-क्योंकि उनके सक्रिय राजनीतिक  जीव का रूपांतरण साहित्य मैं हुआ है।'आत्मसाक्षी' का  गणपत और मैला आँचल का बावन दास हो या अन्य वे राजनीतिक कुचक्र से उद्भेदित होते हैं।मूल्यों और आस्थाओं का यह विखणडन अंतत:अस्तित्व और अस्मिता का भी विखण्डन बन जाता है उपन्यास में,जो मारक है, त्रासद है। इस दृष्टि से रेणु की कहानी "जलवा " 'अगिनखोर' और 'पार्टी का भूत'जैसी विशिष्ट कहानियों का मूल्यांकन ज्यादा अपेक्षित है। जलवा में देश की साझी विरासत का स्वातंत्रयोत्तर भारत में सांप्रदायिक विख्णडन  मौजूदा राजनीति की मूल्य-भ्रंशता की ओर संकेत करता है, जो उन उदात्त मूल्यों की दुखद परिणति है। बेनीपुरी की कहानी सुभान खाँ की हार्दिकता का विश्व-कोश भी आज अपना हृदय हार गया है। इस अगिनखोर समय को कैसे समझाया जाए। पार्टी का भूत' में मनुष्य की अस्मिता का विखण्डन हिप्पोक्रेशी और अवसरवाद के जिस ब्लैकहोल में होता है, वह काबिले गौर है। काॅमरेड पी. राय, काॅमरेड प्रफुल्ल राय से लेकर मिस्टर राय  एक ही आदमी के कई नाम हैं। यह आदमी का आदमी आज की राजनीति का बहुआयामी गूगल वाला चेहरा है,जो सर्वव्यापी है।पार्टी का भूत' कहानी के इस नायक का खेल आज की राजनीति की  जन्म-पत्री खोलता हुआ प्रतीत होता है।
             इस संदर्भ में रेणु स्वयं आत्म-दीप्त तल्खियों के साथ कहते हैं," मेरे साधारण पाठक, मेरी स्पष्टवादिता, और सपाटबयानी से सदा संतुष्ट हुए हैं और साहित्य के राजदार पंडित कथाकार आलोचकों ने हमेशा नाराज होकर एक जीवन दर्शनहीन अपदार्थ--- अप्रतिबद्ध---व्यर्थ रोमांटिक प्राणी प्रमानित किया है।इसके बावजूद कभी मुझसे यह नहीं बोला गया कि कहानियों में मैं अपने आप को ही ढूँढ़ता फिरता हूँ।अपने आप को अर्थात आदमी को।"
            सचमुच कहानीकार के लिए इतिहास,स्थान और काल महत्तर घटक होते हैं। इसी त्रिकोण के विलोम पर वह अपनी सर्जनात्मक कला से भविष्य को साधता है ताकि उसकी रचना उन प्रतिबिम्बों को आत्मसात कर अपनी उपादेयता सिद्ध कर सके। लेखक एक काल में रहकर दूसरे काल काअतिक्रमण करता है।यही उसकी रचना की आत्मा का अवशिष्ट अंश है, जिसे किसी भी समय पाया जा सकता है। साहित्य और जीवन में साहित्य और जीवन की तरह। इतिहास, स्मृति और मिथ  मे, इतिहास, स्मृति और मिथ की तरह। यह साहित्य- कला का कमाल है।


प्रिंसिपल आर.डी.एस.काॅलेज
सालमारी, कटिहार!
9431867283

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