इस अंक के रचनाकार

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सोमवार, 8 जून 2020

अरजनी-करजनी


संजय कुमार सिंह,प्रिंसिपल,
 
आँखों में कहीं ख़्वाब रह गया
तवील रास्तों का सफ़र
कब खत्म हुआ
साहिब!

          आप बहुत हसरत से जीना चाहते हैं, तो जीइए! कल्पना में इन्द्रधनुष टाँग कर! कौन मना करता है?बहुत से लोग तो सपने मेंं एक दुनिया खड़ी कर लेते हैं, जो उन्हें वास्तविकता के धरातल पर भरमाती हैं। लेकिन कभी-कभी जिन्दगी कुछ लोगों के साथ बड़ा क्रूर मज़ाक करती है, जिस चीज पर आपका खूब अख्तियार होता है, वही चीज आपकी पकड़ से दूर हो जाती है।आपको ताज्जुब के साथ अफसोस होता है अपनी स्थिति पर कि यह कैसे हो सकता है, पर ऐसा होता है और बार-बार होता है...उन्हौंने नींद की गोली की ओर हाथ बढ़ाया, तो उन्हें  लगा कि गोली तो वे खा चुके हैं, पर पत्ते में दस की दस गोलियाँ मौजूद थीं। इसका मतलब कि उन्हें वहम हुआ था। बचपन में उनकी याद्दाश्त कितनी तेज थी, बचपन में क्यों अभी दस -पाँच साल पहले तक उन्हें  अपनी इस क्षमता पर गर्व होता था! बचपन की एक-एक बात याद कर सकते थे वे। अरजनी से करजनी तक पूरा श्यामपुर कस्बा साथ-साथ चलता था! यही क्यों,इस अधेड़ उम्र में भी दफ्तर में लगातार काम करते हुए, उस थकान और जानलेवा ऊब के बीच वे जिन्दगी की हसीन बातों को याद कर सकते थे। सबसे मजेदार बात थी कि जब भी कोई सुंदर लड़की उनके टेबुल पर काम के लिए आती थी, तो उन्हें हायर सकेंड्री में अपने साथ पढ़ने वाली सुमि की याद आ जाती थी  और वे  यह सोच कर कुंठा से भर जाते थे कि अगर समने वाली लड़की उनके इस भाव को पकड़ ले, तो उन्हें कितनी ग्लानि होगी!
        ...उस दिन समंदर किनारे से गुजरते हुए उन जोड़ों को देख कर उन्हें काॅलेज की लड़की लिली की याद हो आयी थी, और लगा था कि समंदर की उफनती लहरों का नमकीन झाग उनके अन्दर उतर आया हो! लिली थी ही ऐसी लड़की!! समंदर किनारे नाचती उत्ताल लहरों पर वह टोमी के साथ कभी--कभी देर शाम तक  गिटार  बजाती  थी...उस सम्मोहन में स्तंभित होनेे की अपनी कहानी थी।
          उन्हें जब घर पहुँचकर खाँसी हुई, तो चन्द्रकांता ने कहा," दफ्तर में तुमने फिर आइसक्रीम खाया होगा ?"
"नहीं तो..."वेअकचकाए  ,"थोड़ा लहरों में भीग गया.."
" तुम्हें इन पुरानी आदतों से परहेज करना चाहिए! तुम्हारा स्वास्थ्य अब वैसा नहीं रहा... तुम्हें तुरंत निमोनिया हो जाएगा।"
"तुम ठीक कहती हो।" उन्हौंने तुरंत हामी भरी," मुझे उधर नहीं जाना चाहिए था।,लहरें कितना भी खीचें, मुझे बाँकी लोगों जैसा व्यवहार क्यों करना चाहिए?,क्या सचमुच मैं बूढ़ा नहीं हो गया हूँ?पर टोमी को समझाना मुश्किल है... वह कभी-कभी दफ्तर आ जाता है...झक्की है ... लिली की मौत ने उसे.. उसने आज शाम को खूब गिटार बजाया...."
" इस मसखरेपन को भूल कर ,गर्म पानी पीओ!" चन्द्रकांता ने बिगड़ कर कहा," और उम्र का खयाल करो, डॅयविटीज, हाइपर टेंशन और नींद के मरीज हो तुम। दुनिया को नहीं घर-परिवार की कुर्बानियों को चुनो..."
" हाँ चन्द्रकांता ! " उन्हौंने कुछ सोच कर कहा,"  मुझसे बार-बार ऐसी गलती क्यों होती है। मैं क्यों लापरवाह हो जाता हूँ कि दुनिया की सबसे हसीन औरत मेरी बीबी है कि मेरे बच्चे अब बड़े हो गए हैं...कि मुझे संभल कर रहना चाहिए ...कि  मुझे इतना बीमार नहीं होना चाहिए.. यह सब कैसे हो जाता है ?।इतने रोग कहाँ से आ गए?मुझे लगता है मैं भूलने भी लगा हूँ। एक दिन आल्मारी की चाभी दफ्तर में छोड़ कर काफी तनाव में रहा मैं... तुम्हें बताया भी नहीं। तुम को तनाव देने से फायदा?"
"इतना सोचो मत!" वह सहज भाव से बोली," ऐसा होता है।"
"तुम ठीक कहती हो।"  विशू बाबू ने कहा," इधर से मैं कभी-कभी अपना और अपने गाँव का नाम भूल जाता हूँ...  दिमाग पर दबाव डालो,तो चीजेें याद आती हैैं..."
"उम्र होने पर ऐसा होता है " पत्नी ने कहा," बस तस्कीन रखो और मीठा खाने से बचो! चाय भी कम लो! आइसक्रीम कभी मत खाओ। परहेज से रहो।"
" तुम ठीक कहती हो आइसक्रीम भी कोई खाने की चीज है!" उन्हौंने ने हँसकर कहा।
" पर खाते तो हो "
" कहाँ..?."वे बोले, "अब कहाँ खाता हूँ?इस्नोफीलिया बढ़ जाता है.. खाँसी-जुकाम!"
" केतन कह रहा था रिषू की  शादी के रिसेप्शन में तुम चाटखारे लेकर आइसक्रीम खा रहे थे।"वह हँसी।
" वह तो कभी-कभी..." 
" नहीं ,एकदम नहीं।"पत्नी ने सख्त ताकीद की," हम लोग तुम से कितना प्यार करते हैं..."
विशू बाबू चुप हो गए।सचमुच उनकी पत्नी उनका बहुत खयाल रखती है, पर जब इसका बार-बार इजहार करती है, तो उन्हें हँसी आती है, वे हँसते ,हैं हँसना चाहते हैं, पर बहुत से लोग तो उनके दफ्तर में हँसना भी भूलते जा रहे हैं। एक दम सख्त! चेहरा तंग!चेहरे पर चेहरा लगाए।सचमुच इस दुनिया की चाल-ढाल बदलती जा रही है...
...
         सोचो तो, वे भी क्या दिन थे!स्कूल में टिफिन की घंटी बजती, बस वे और सुमि बाहर आ जाते। मूँगफली और आइसक्रीम खाए बगैर उनकी बातें नहीं बनतीं।स्कूल किनारे पार्क था, वे घंटी बजने तक वहाँ बठे रहते अरजनी-करजनी खेलते हुए।सुमि कहती एक था अरजनी और एक थी करजनी! दोनों में बडा प्रेम! करजनी कहती -तू मुझे भूलेगा तो नहीं? अरजनी कहता सात जनम तक नहीं! फिर दोनों खूब हँसते। सुमि कहती -अगर भूल गय तो?
           तो तो मुझे... अरे सात जनम में भी नहीं भूल सकता अपनी करजनी को...
         उन्हें सब याद है, ...संभवत: आज भी वो बता सकते हैं या बताने की कोशिश कर सकते हैं कि मूँग फली बेचने वाले का नाम भोलू था। आसक्रीम बेचने वाला सीटू, बगल की चाय दुकान गणेशी की थी ।बाजार में सबसे अच्छी मिठाई की दुकान गिलासी साह की थी। किराना की नामी दुकान अछमल्ल की... दर्जी रहमान,तो नाई कारू ठाकुर ।मगर अब?एक दिन स्कूल के प्रिंसिपल साहब का नाम ही वे भूल गए । काफी देर तक भूले रहे, जब  मोहन चाय लेकर  आया,तो उसके नाम लेने से भक से  याद आया मोहन बाबू!
          मोहन बाबू नामी प्रिंसिपल थे उस जमाने के! कठोर प्रशासक!किसी ने शिकायत कर दी। स्कूल का एक लड़का ,लड़की के साथ पाॅर्क में घूमता है आइसक्रीम लेकर... बस क्या था, वे दोनों पकड़े गए। उनके स्कूली प्रेम का अंत हो गया। सुमि को तो खैर क्लाॅस रूम भेज दिया गया, पर उनकी पूरी धुनाई हुई।
" और घूमेगा  ?
" नहीं।"
"आइसक्रीम खाएगा?"
" नहीं।"
            कान पकड़ कर उठक-बैठक कराय गया। बाद के दिनों तक उन्हें हँसी आती रही।शिकायत घर भी गयी। उस समय कस्बाई माहौल में इस तरह के प्रेम की इजाजत नहीं थी ।इनका होना जितना आकस्मिक होता, टूटना उतना ही स्वाभाविक! इसका तब उतना मलाल भी नहीं होता। बात आयी-गयी हो जाती... बहुत बाद में जैसा उन्हें याद आता  है, एक बार नौकरी होने पर शहर शिफ्ट होने के बाद जब वे  चन्द्रकांता को लाने गये थे श्यामपुर, तो अपने पति शेखर के साथ सुमि से भेंट हुई थी उनकी , उसने उसका खूब मजाक बनाय था," शेखर यह विशू है। स्कूल में हम प्रेम करते थे...आइसक्रीम तो मैं खिलाती थी , पर बेचारे को बहुत मार पड़ी... प्रिंसिपल के रहते उस जमाने में प्रेम?" तीनों देर  तक हँसते रहे उन किस्सों को याद कर.... और आज?... पड़ोस के राय जी की लड़की ने प्रो. मंडल जी के लड़के से भाग कर विवाह कर लिया।राय जी नााराज होकर रह गए।चन्द्रकांता तो उस दिन से रूमी और केतन को लेकर भी डरती है, अब जैसी हवा चल रही है ...मुश्किल से जात-इज्जत बचे...पर उन्हें हँसी आती है क्या श्यामपुर कस्बे की हवा वहीं ठहरी रहेगी?बदलने दो भाई! इतनी हाय-तौबा न करो कि जमाने की आँखों की रौशनी चली जाए। कितनी सुंदर है यह दुनिया!
          उन्होंने उठकर खिड़की का पल्ला सरकाया, ठंढी हवा के बीच हल्की धूप! दफ्तर आओ ,तो दम मारने की फुर्सत नहीं।दस बार साहब बुलाएँगे, लाोग परेशान करेंगे, लो वह लड़की फिर आ गयी... आज एक पैरवीकार लेकर...अरे भाई तुम्हारे पेपर्स कम्प्लीट नहीं हैंं, तो कैसे पास करवा दूँ ?"
           " विशू बाबू!"लड़की के साथ आयी अधेड़ महिला ने बिना औपचारिक अभिवादन के कहा," आप मेरी नतिनी रश्मि को क्यों परेशान रहे हैं?क्या बिगाड़ा है इसने आपका?अाप बाबू लोग अपना दिल कहाँ भूल जाते हैं?"
"मैं किसी को परेशान नहीं करता।" वे  झल्ला कर बोले। हवा में कँप-कँपी बढ़ी,  तो उन्हौंने खिड़की बन्द कर दी,"काम हो,तो ठीक और न हो तो सीधे इल्जाम ... जो मुँह में आएगा, लोग बोलेंगे।यही इस वक्त का मिजाज है, मुझे गुस्सा आता है मैडम!बहुत गुस्सा।यह कौन सा तरीका हुआ बात करने का?"
" देखिए इस लड़की के नाना ब्रेन हम्रेज से मर गए, पिछले साल रोड एक्सीडेंट में इसके पिता मर गए... मैं इसकी नानी हूँ, अब यहीं रहती हूँ, इसे अगर लोन के पैसे मिल गए ,तो यह आत्म-निर्भर हो सकती  है। यह कितना जरूरी है इसके लिए, आपको समझना चाहिए... खाक कल्याण विभाग है यह।"
"अरे मैडम ! इसके पेपर्स..." विशू बाबू ने सिर उठाकर कहा, तो बक रह गए, अधेड़ स्त्री उन्हें दुख की मारी लगी , जैसे सर्दी की मार  से मौसम बेरौनक हो जाता है, वह बेहद उदास लगी..वे अटक से गए।
"आप कहना क्या चाहतेे हैं ?" वह दुखी होकर बोली," इसका काम नहीं होगा? इस दुखी और परेशान लड़की को  आप अपने पैरों पर खड़ा होने में मदद नहीं करेंगे?"
"मैडम मेरे पास दुख की दवा नहीं है, मैं खुद बीमार आदमी हूँ।आज की बात आज भूल जाता हूँ। इसे कहिए कल आने... मैं अपना काम कर दूँगा ...आगे राम जानें... आपकी बातों से घबराहट में मैं फिर चाभी भूल गया..."
" चाभी तो सामने है..."
"ओह! धन्यवाद! " वे  बोले," ऐसी-वैसी बातों से मैं और कनफ्यूज्ड हो जाता हूँ ।"
" कैसी बातों से?" अधेड़ स्त्री ने मुस्कूरा कर कहा।
छोड़िए !" उन्हौंने परेशान होकर कहा ," और कुछ कहना है,  आपको?"
"उस साल मुझे यह उम्मीद नहीं थी कि ऐसा होगा।" अधेड़ महिला ने कहा," अगर यह सब नहीं होता,तो मैं यहाँ क्यों होती..."
" मैडम यह दफ्तर है,रेडियो स्टेशन नहीं। यहाँ, काम की बात कीजिए।" उन्हौंने कहा," माना वक्त ने आपके साथ ठीक नहीं किया, पर इसमें मेरा या इस आॅफिस का क्या कुसूर है?।"
" इसमें कुसूर की बात नही है।" महिला बोली," मुकद्दर की बात है।आप कहाँ से से कहाँ पहुँच जाते हैं। आपको फिर कोई पहचानता तक नहीं... आदमी कितना जलील महसूस करता होगा।"
"अब  इसमें कोई क्या करेगा?"
" आप से एक बात पुछूँ?"
" पूछिए आप फुर्सत में हैं।" उन्हौंने व्यंग से कहा।
" माँ बच्चे को दूध क्यों पिलाती है?मास्टर बच्चे को क्यों पढ़ाते हैं?, पेड़ क्यों फलते हैं ?हवा क्यों बहती है?हर चीज का मतलब केवल आपसे नहीं होता और आप से होता भी है ,...क्या जवाब है आपके पास?"
           बड़ा बाबू  कुछ सोच कर कुर्सी से उठे और बोले,"चलिए मैं आपको बाहर छोड़ देता हूँ। दफ्तर इस तरह की बातचीत के लिए सही जगह नहीं है, अब शहर में कौन प्रभावित होता है इन बातों से...  आपको यह सब क्यों बोलना है?आप ठीक कह रही हैं, पर करीबी रिश्तों की भी पहचान नहीं रही इस दुनिया मेंं...पर कोई क्या कर सकता है..."
" वह तो मैं भी जानती हूँ!" वह  उदास होकर बोली," मगर आदमी शहर केे किस पत्थर से अपना दुख कहे, आप ही बताइए?"
" क्या कहा जाए!" वे बोले," आपकी बातें भावुक और उदास करती हैं, पर शहर और कस्बे में अंतर है, वहाँ समय है, संवेदना है और रिश्ते हैं... यहाँ सब विस्मरण की गर्त्त मेंं डूबे हुए हैं, जैसे वक्त की बर्फ मे सब फ्रीज्ड हो गए हों, बर्फ अगर पिघलती भी है, तो सिर्फ पानी नजर आता है... लहू भी पानी! मुझे इसलिए दफ्तर में ऐसी बातें पसंद नहीं, आदमी रिश्तों से भटक रहा.. फिर किसी अनजाने को कौन सुनता है? आप बुरा मानेंगी ,पर यह बेवकूफी है..  आप समझती हैं कि इन बातों का असर होता है, पर बाद में लोग हँसते हैं..."
"कोई बात नहीं!" अधेड़ महिला ने कहा ,"उन्हें किसी तरह हँसने का मौका तो मिलता है वर्ना पत्थर के सिल ही तो बने रहते हैं सब!"
" नहीं मैडम!" बड़ा बाबू ने कहा,"मतलब  यह है कि शहरों में आदमी की दुनिया बेगानी हो गयी है..."
"आप सही कह रहे हैं,पर कहींं कुछ नहीं है.. क्या शहर और क्या छोटे कस्बे ." वह बुुदबुदायी," हर जगह ऐसा ही है... जिसका दुख है,उसी का भोग! आदमी की परछाइयाँ रह गयी हैं...पर..."
तीनों बात करते-करते  बाहर आ गए। तीन का गजर पड़ा। सामने चाय-बिस्किट और आइसक्रीम वालों की दुकानें थीं। उन्हौंने कहा," लड़की कल आ जाएगी, अब मैं चाय पीयूँगा और वापस काम पर लौट जाऊँगा। सेक्सन का इन्चार्ज हूँ ,बहुत लोड रहता है।"
"क्या आप अाइसक्रीम नहीं खाएँगे?" अधेड़ महिला ने अचानक कहा," मुझे आइसक्रीम बहुत पसंद है ..."
" इस ठण्ड  में..?." वे अकबकाए, " मुझे सर्दी लग जाती है, फिर दफ्तर के लोग कहेंगे मैं ठंढ में आइसक्रीम खाने के बहाने निकला था..."
" अरे छोड़िए भी यह बच्चों वाली बात.." रश्मि नानी की बात पर हँस रही थी, नानी कह रही थी," आदमी को अपनी पसंद की चीज खानी चाहिए। बोलिए क्यों नहीं खानी चाहिए?"
           रवि भी उसकी जिद्द पर इसी तरह अाइसक्रीम खाने से कतराता है, पर उसे खाना पड़ता है, आइसक्रीम का अपना मज़ा है क्या ठंढा, क्या गरम... उसे नानी इस मामले दुनिया की सबसे बिंदास औरत लगती थी।अंतहीन दुखों के बीच भी उसकी जीवंतता अभी तक मरी नहीं थी। सचमुच नाना खुशनसीब रहे होंगे...
         दोनों बुजुर्ग अभी तक असमंजस में थे। दोनों के बीच अजीब मज़ाक चल रहा था। इस बीच नानी आइसक्रीम ले आयी और बढ़ाती हुई बोली,"लीजिए,आप भी क्या सोचिएगा। इस मामले में मैं सचमुच पागल हूँ। मुझमें थोड़ा-थोड़ा बचपना है।आइसक्रीम तो छिप-छिपा कर मैं खा ही लेती हूँ..."
          झिझकते हुए उन्‍होंने हाथ बढ़ाया," सुमि...?" जैसे कोई याद वक्त के कुहासे को चीर कर धूप बन कौंधी हो,उन्हें इतना आश्चर्य हुआ कि उनके हाथ से आइसक्रीम फिसल कर गिर गया। उनके होंठ काँप रहे थे।अजीब इत्तफाक था यह भी! उन्हें फिर खुद से कोफ़्त हुई। आज फिर उनकी स्मृति ने उन्हें देर तक दगा दिया था। वे हैरान से खड़े थे। उनके भीतर का अपराध-बोध धीरे-धीरे पिघल रहा था ।सुमि दूसरी बार आइसक्रीम लाकर उसी तरह  हँस रही थी। रश्मि की मुस्कूराहट पर सुकून के साथ एक आश्चर्य पसर रहा था!हवा में कोई चीज फड़फड़ा रही थी।

पता 
आर.डी.एस काॅलेज
सालमारी, कटिहार।
रचनात्मक उपलब्धियाँ-
हंस, कथादेश, वागर्थ,बया, अहा जिन्दगी, नवनीत, नया,कथाबिंब साहित्यनामा, आजकल, वर्त्तमान साहित्य, पाखी, साखी, कहन कला, किताब, दैनिक हिन्दुस्तान, प्रभात खबर आदि पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ

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