इस अंक के रचनाकार

आलेख हिन्दी साहित्य गगन के चमकदार सितारेः डॉ. पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी : स्वराज करुण जब मनुष्य की करुणा का विस्तार होता है,तभी वे सही अर्थों में मनुष्य बनता है / सीतराम गुप्ता प्रकृति और दाम्पत्य प्रेम का बिरला अनूठा प्रेमी गायक - केदारनाथ सिंह काशीनाथ सिंह की कहानी ’ गुड़िया’ का पाठ भेद यानि भुनगे का आदमी में पुर्नजन्म -संजय सिंह कहानी दीया जलता रहने देः बलविन्दर’ बालम’ प्रेम की जीतः श्यामल बिहारी महतो शिकारः अरूण कुमार झा ’ विनोद’ व्यंग्य चलो चिंता करें : रीझे यादव लघुकथा अपराध के प्रकार : मधु शुक्ला खिलौना : रविकांत सनाड्य भिक्षा : कमलेश राणा बारिस : अंजू सेठ विजय कुमार की लघुकथाएँ फायर्ड : सविता गुप्ता समीर उपाध्याय ’ समीर’ की लघुकथाएं दो लघुकथाएं :अनूप हर्बोला पालतू कौए : शशिकांत सिंह ’ शशि’ जयति जैन ’ नूतन’ की दो लघुकथाएं संतोष का सबक : ज्ञानदेव मुकेश गीत / ग़ज़ल / कविता दो छत्तीसगढ़ी गजल : डॉ. पीसीलाल यादव मोहब्बत की अपनी (गजल) महेन्द्र राठौर हार के घलो जीत जाथे (छत्तीसगढ़ी गीत) डॉ. पीसीलाल यादव चिरई खोंदरा (छत्तीसगढ़ी कविता) शशांक यादव महर - महर ममहावत (छत्तीसगढ़ी गीत) बिहारी साहू ’ सेलोकर’ दिल लगा के आपसे (गजल) : बद्रीप्रसाद वर्मा हमीद कानपुरी : दो गजलें यह घेरे कुछ अलग से हैं (गजल) आभा कुरेशिया बोझ उठते नहीं (गजल) विष्णु खरे प्रीति वसन बुनने से पहले (नवगीत) : गिरधारी सिंह गहलोत अवरोधों से हमें न डरना है (नवगीत) लाल देवेन्द्र कुमार श्रीवास्तव पंख कहां छोड़ आई लड़की (कविता) शशिकांत पाठक सुनो (कविता ) सरोज अग्रवाल खुशी को खुशी देखकर मैंने पूछा (कविता ) शिव किशोर दीप मुझ पर हावी हो जाए (गजल ) सीमा सिकंदर निःशब्द हूं मैं (कविता ) रीना तिवारी पहचान (कविता) प्रगति रावत हक के लड़ने का (गजल) राज मंगल ’राज’ कवि (कविता) डॉ. रामप्रवेश रजक आम आदमी का न रहा (नवगीत) रमेश मनोहरा भंवरे का सफर (गीत) रणवीर सिंह बलवदा मेरा प्यार (कविता) संदीप कुमार सिंह जेठ का महीना (कविता) बृजनाथ श्रीवास्तव अगर खामोश हूं (गजल) असीम आमगांवी तेरे लब यूँ (गजल) प्रो. जयराम कुर्रे रिश्ते (कविता) नीता छिब्बर आपका ये मशवरा (गजल) प्रशांत ’ अरहत’ वह है तो हम है (कविता) तुलेश्वर कुमार सेन मेरी कहानी शिक्षा ’ मेरी जिंदगी के रंग’ : गोवर्धन दास बिन्नाणी पुस्तक समीक्षा आज का एकलव्य- मानवीयता का सहज सम्प्रेषणः अजय चंद्रवंशी .

बुधवार, 25 नवंबर 2020

आलू निकाले दम

 रीझे यादव


आज प्रातः स्नान किया,फिर ध्यान लगाने का असफल प्रयास किया,तदुपरांत नास्ते में अल्प मात्रा में पोहा और डेली डाईट स्वरूप श्रीमती जी के एक दो ताने खाने के पश्चात अपने कामकाज के लिए निकला तो पीछे से मेरी मति नियंत्रक श्रीमतीजी चिल्लाई - सुनो जी!! लौटते बखत दो किलो आलू लेते आना। बच्चे दम आलू खाने की जिद कर रहे हैं। आलू की डिमांड मेरी धड़कन तेज कर देता है पर वाह! रे बच्चे! इधर महंगाई की मार और आलू के दाम देखकर मेरा दम निकले जा रहा है और इनको दम आलू खाने की पड़ी है। खैर,अपनी अर्धांगिनी को ना कहने का साहस नहीं हुआ सो उसके आदेश को शिरोधार्य करके सहमति में। मैंने गधे की तरह सिर हिलाया और अपने कार्यस्थल की ओर चल पड़ा।

कथानक को थोड़ा स्पष्ट करता चलूं कि आज नास्ते के समय मुझे दो चार बातें सिर्फ इसलिए सुननी पड़ गई कि मुझे पोहे में एक भी पीस आलू का नहीं दिखा तो मैं सवाल पूछने की गलती कर बैठा - अरे!! आज आलू नहीं डाली थी क्या पोहे में ?

मेरा इतना कहना था कि श्रीमती जी तमतमा गई। विज्ञान के परिभाषानुसार जितने तापमान पर उबाल आती है उस ताप पर सीधे उबल पड़ी और मुझे उसके वाक्य भस्मीभूत करने लगे। उनके मधुर वचन थे - हां - हां! हमारे घर में तो आलू की बोरी ला रखी है तुमने। मैं ही जानबूझकर नहीं डालती। पिछले हफ्ते मेरा भाई आया था तो दो किलो आलू छोड़ गया था। उसी से तुमने दो हफ्ते तक आलू खाने का सौभाग्य पाया था। वो तो तुम्हारी किस्मत ऐसी है कि तुमको मेरे भाई जैसा साला मिला। नहीं तो तुम आलू खाने के लिए तरस जाते।

मैंने मन ही मन अपने आप को समझाते हुए कहा - आल इज वेल! आल इज वेल! आल इज वेल! ये मंत्र मैंने बाबा रणछोड़ दास जी चांचड़वाले से सीखा है। जब भी ज्यादा बेइज्जती वाली बात होती है। इस मंत्र के प्रताप से मुझे बेइज्जती बर्दाश्त करने की ताकत मिलती है।

मैं अपनी टेलीविजन के डेली सोप के पात्र स्वरूपा दया मतलब श्रीमती को कैसे बताऊं कि उस साले ने मुझे बार.बार जेठालाल की तरह लूटा है। साला! सौ रूपए कि आलू छोड़ गया और पेट्रोल डलवाने के नाम पर दो सौ की चपत मुझे लगा गया। ऊपर से दो किलो आलू का एहसान भी लाद गया मेरे ऊपर! मुझे कुचलने के लिए!!!

खैर,घर की राम कहानी को याद करते - करते अपनी दुकान तक आया। दुकान क्या है भाई - छोटी सी चाय की टपरी है। आये दिन होने वाले लाकडाऊन ने ऐसे ही बेड़ा गर्क कर रखा है। कलमुंही कोरोना ने गरीब - गुरबे का जीना हराम कर दिया। पिछले दिनों तो वो अपना जन्मदिन भी मना गई। उसको पैदा करने वाला देश आराम से मालामाल हो गया और दूसरे देश अब तक भुगत रहे हैं। बड़े - बड़े देशों की आर्थिक स्थिति चरमरा गई,तो मेरी क्या बिसात?

आज के कठिनाई भरे दौर में मेरे जैसे आम आदमी के परिवार के लिए छोटे से टपरीनुमा दुकान से बड़ी मुश्किल से दो वक्त की रोटी का जुगाड़ हो पाता है और उस पर भी महंगाई डायन दिन - रात तांडव कर रही है सो अलग। दिन भर हैरान - परेशान रहता हूं।

 त्राहिमाम करते नेताओं के पास भी नहीं जा सकते। चुनाव के वक्त मिले डोनेशन के थैलियों ने उनके मुंह सी दिये हैं। चुनाव के समय नेता और व्यापारी मिलकर अपनी फसल बोते हैं फिर पांच साल तक काटते रहते हैं। जनता दो बोतल दारू,एक साड़ी और दो चार सौ रूपए के पीछे अपने कीमती वोट को बलिदान कर देता है।

कोरोना के कारण हाहाकार मचा है। जिधर देखो उधर मास्कधारी, एलियननुमा लोग घूमते नजर आते हैं। बाकी कारोबार की तरह मेरे चाय का कारोबार भी ठप्प पड़ते जा रहा है। लोग कोरोना के नाम से ऐसे दहशत में हैं कि कभी - कभी लगता है कि लोग चाय में दूध की जगह सैनिटाइजर डाल कर ना पीने लगें!!अपनी रोजी - रोटी की दुर्गति देखकर कभी कभी जी करता है कि सीधे चीन चला जाऊं लड़ने के लिए। पर उनकी चिंग चूं वाली भाषा मेरी समझ के बाहर है और मेरी हिंदी छत्तीसगढ़ी वो नहीं समझ पायेंगे। इसलिए दिल को समझाकर बैठा हूं।

शाम को श्रीमती के आदेशानुसार आलू खरीदकर लाया। शाम को लौटते वक्त हिम्मत करके सौ रूपए में दो किलो आलू खरीदा। घर पहुंचकर आलू का थैला श्रीमती के हाथ में थमाया और पास रखे खाट में पसर गया। दिनभर का थका हारा था झपकी आ गई और मैं जल्दी ही निद्रादेवी के आगोश में चला गया। मैं स्वप्ननगरी में विचरण करने लगा। तभी मुझे जाना पहचाना चेहरा नजर आया। मैंने उसको बड़े सम्मान से पूछा - अरे!! आप आलू जी हैं ना ? आलू ने मुझे ना पहचानने की गरज से कहा - नहीं तो। आजकल मैं छोटे लोगों के मुंह नहीं लगता। तुम्हारे थोबड़े को देखकर नहीं लगता कि मुझे खरीद पाने की तेरी औकात है। दिनभर में सौ रूपल्ली कमाने वाले आदमी से मुझे कोई मतलब नहीं। बोलके आलू खिसक गया। कभी रसोई के कोने में टोकरी में दुबके रहने वाले आलू द्वारा की गई बेइज्जती से आहत होकर मैं इधर - उधर घूम रहा था तभी पालकी पर सवार प्याज महारानी की पालकी से टकरा गया। बिफरकर बोली - अरे! ओ!! लो बजट इंसान!! इधर कहां मरने आ रहा है। मेरे घेरदार ड्रेस की एक लेयर को तू खरीद नहीं सकता और राजा की तरह घूम रहा है। मेरे जब - जब भाव बढ़े हैं। राजनीति डांवाडोल होने लगती है। बड़े बड़े दिग्गज धराशायी हो जाते हैं।अभी लोग कोरोना के कारण मेरे भाव को नजरंदाज कर रहे हैं। नहीं तो अभी तक तख्तापलट हो गया होता। प्याज महारानी की बात सुनकर मैं उसके रास्ते से हट गया और ससम्मान उनको राह देकर बाजू खड़ा हो गया।

मेरी गत देखकर टमाटर हँस- हँस के लाल हो रहा था। बैंगन अपना काला थोबड़ा लेकर मेरा मजाक उड़ा रहा था। धनिया,भिंडी तुरई ने अपने सहेलियों के साथ मिलकर मुझे स्वप्ननगरी से फेंक दिया। और मैं खाट से गिरकर चिल्ला उठा - बचाओ! बचाओ!!

मेरी आवाज सुनकर श्रीमती रसोई से दौड़े दौड़े आई। मैं पसीना - पसीना हो गया था। उसने मुझे पानी पिलाया और बताया कि आलू उबल रहे हैं। दम आलू बनेगा। आलू उबलने की बात सुनकर मेरे दम में दम आया।


टेंगनाबासा (छुरा)

Mail :erijhe999@gmail.com

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