इस अंक के रचनाकार

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सोमवार, 29 नवंबर 2021

वास्तविक विजेता वही है जो दैवी लक्ष्यों को भी समझे

 सीताराम गुप्ता
लॉरेंस लेम्यूक्स:
     हम सबके कुछ सपने होते हैं जिन्हें साकार करने के लिए हम कोई कसर नहीं रख छोड़ते। पहले हम अपना लक्ष्य निर्धारित करते हैं और उसे पाने के लिए जी-जान से जुट जाते हैं। हम जैसे-जैसे अपने लक्ष्य को पाने के लिए आगे बढ़ते हैं हमारे प्रयास और अधिक तेज़ हो जाते हैं। लक्ष्य के अत्यधिक निकट पहुंचने पर हमें अपने लक्ष्य के अतिरिक्त और कुछ भी दिखलाई नहीं पड़ता। यह स्वाभाविक ही है। सफलता का मूल मंत्र भी यही है। ओलंपिक खेलों को ही लीजिए। दशकों तक कठिन परिश्रम करने के बाद ही कोई खिलाड़ी पदक हासिल करने के लिए आगे आ पाता है। वर्ष 1988 में सियोल में आयोजित ओलंपिक मुकाबलों में नौकायन की एकल प्रतिस्पर्धा में भाग लेने के लिए कनाडा के लॉरेंस लेम्यूक्स एक दशक से भी अधिक समय से कठोर प्रशिक्षण ले रहे थे और निरंतर कठिन अभ्यास कर रहे थे।
     आखिर वो घड़ी आ पहुँची जब लॉरेंस लेम्यूक्स का सपना साकार होने में थोड़ा सा ही समय शेष रह गया था। लॉरेंस लेम्यूक्स के गोल्ड मेडल जीतने की प्रबल संभावना थी लेकिन जैसे ही प्रतिस्पर्धा प्रारंभ हुई मौसम ने अचानक रंग बदलना शुरू कर दिया। तेज़ हवाएँ चलने लगीं और उनके कारण शांत समुद्र में ऊँची-ऊँची लहरें उठने लगीं। ऐसे में कोई भी हतोत्साहित हो सकता था लेकिन लॉरेंस लेम्यूक्स ने हार नहीं मानी और ऊँची-ऊँची लहरों के बीच निरंतर अपने लक्ष्य की ओर बढने लगे। अत्यंत चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों के बावजूद लॉरेंस लेम्यूक्स ने शुरुआती बढ़त हासिल कर ली। उनका गोल्ड मेडल लगभग निश्चित हो गया था। लेकिन ये क्या? विषम परिस्थितियों के कारण उनसे एक चूक हो गई।
     ऊँची-ऊँची लहरों के कारण दिशा बतलाने वाले संकेतों को देखना असंभव हो गया और लॉरेंस लेम्यूक्स एक संकेत चूक कर आगे बढ़ गए। लॉरेंस लेम्यूक्स को आगे बढ़ने से पहले उस चूके हुए संकेत तक आने के लिए विवश होना पड़ा और वहाँ से पुनः रेस शुरू करनी पड़ी। इस सबमें समय की कितनी बर्बादी हुई होगी और इसके कारण पदक हासिल करने के नज़दीक पहुँचना कितना मुश्किल हो गया होगा अनुमान लगाना असंभव नहीं। इस चूक और अन्य कठिनाइयों के बावजूद लॉरेंस लेम्यूक्स शानदार प्रदर्शन करते हुए दूसरे स्थान तक जा पहुँचे। उन्हें रजत पदक मिलने की पूरी संभावना नज़र आ रही थी और वे तेज़ी से अपने लक्ष्य की ओर बढ़ रहे थे। उनका उत्साह देखने लायक था।
     जब लॉरेंस लेम्यूक्स तेज़ी से अपनी नाव चलाते हुए सही दिशा में आगे बढ़ रहे थे तो उन्होंने देखा कि बीच समुद्र में सिंगापुर के नाविकों की एक नाव उलटी पड़ी है। एक आदमी जो बुरी तरह से घायल हो गया था पलटी हुई नाव की पैंदी को किसी तरह से जकड़े हुए पड़ा था। नाव से कुछ ही दूरी पर एक अन्य व्यक्ति बहता हुआ जा रहा था। समुद्र की स्थिति अब और भी विकराल हो चुकी थी। लॉरेंस लेम्यूक्स एक अत्यंत अनुभवी नाविक थे। उन्होंने अनुमान लगाया कि सुरक्षा नौका अथवा बचाव दल के आने तक ये बहता हुआ व्यक्ति बहते-बहते दूर चला जाएगा और उलटी हुई नाव के ऊपर पड़ा व्यक्ति भी जल्दी ही समुद्र की विशाल लहरों से टकराकर नीचे गिर पड़ेगा और बहने लगेगा। स्थिति ऐसी थी कि तत्क्षण सहायता न मिलने पर दोनों का ही बच पाना असंभव प्रतीत हो रहा था।
लॉरेंस लेम्यूक्स के सामने दो विकल्प थे। पहला विकल्प तो ये था कि लॉरेंस लेम्यूक्स इस दुर्घटनाग्रस्त नाव के चालकों को नज़रंदाज़ करके अपना पूरा ध्यान केवल अपने लक्ष्य को पाने के लिए अपनी नौका और रेस पर केंद्रित करते जिसके लिए उसने वर्षों तक कड़ा परिश्रम किया था। यह स्वाभाविक भी था और इसमें असंख्य संभावनाएँ और आर्थिक हित भी निहित थे। लेम्यूक्स के समक्ष दूसरा विकल्प था दुर्घटनाग्रस्त नाव के चालकों की मदद करना। उसे याद आया कि समुद्र में उतरने वाले हर व्यक्ति का महत्त्वपूर्ण कर्तव्य है सबसे पहले संकटग्रस्त व्यक्तियों का जीवन बचाना। यद्यपि उसका मुख्य लक्ष्य किसी भी क़ीमत पर प्रतिस्पर्धा जीतना था जिसके लिए उसने दिन-रात कठोर अभ्यास किया था और जिसके लिए उसके देशवासी उत्सुकतापूर्वक उसके विजयी होने की प्रतीक्षा कर रहे थे लेकिन लॉरेंस लेम्यूक्स ने बिना किसी हिचकिचाहट के फ़ौरन अपनी नाव उस दिशा में मोड़ दी जिधर उलटी हुई दुर्घटनाग्रस्त नाव समुद्र की विकराल लहरों में हिचकोले खा रही थी।
     लेम्यूक्स ने बिना देर किए दोनों नाविकों को एक एक करके अपनी नाव में खींच लिया और तब तक वहीं इंतज़ार किया जब तक कि कोरिया की नौसेना आकर उन्हें सुरक्षित निकाल नहीं ले गई। इसके बाद लॉरेंस लेम्यूक्स ने पुनः अपनी रेस शुरू की लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। मेडल उनके हाथ से फिसल चुका था। लॉरेंस लेम्यूक्स इस प्रतिस्पर्धा में बाईसवें स्थान पर आए। इसमें संदेह नहीं कि यदि वो अपने मूल लक्ष्य से विचलित नहीं होते तो निश्चित रूप से पदक हासिल करते। लॉरेंस लेम्यूक्स ने अपने जीवन की एकमात्र महान उपलब्धि को अपने हाथ से यूँ ही क्यों फिसल जाने दिया? इसका सीधा सा उत्तर है लॉरेंस लेम्यूक्स के जीवन मूल्य। लॉरेंस लेम्यूक्स के जीवन मूल्य इस तथ्य पर निर्भर नहीं थे कि विजेता होने के लिए ओलंपिक मेडल प्राप्त करना ही एकमात्र विकल्प है। लॉरेंस लेम्यूक्स ने अपने जीवन में भौतिक उपलब्धियों की बजाय उदात्त जीवन मूल्यों को महत्त्व दिया। यह जीवन मूल्य था हर हाल में दूसरों की मदद अथवा करुणा का भाव।
     अपने करुणा के उदात्त भाव की वजह से लॉरेंस लेम्यूक्स दो व्यक्तियों को मृत्यु के मुख में जाते देख व्यथित हो उठे। इस व्यथा ने लेम्यूक्स को उनकी मदद करने की प्रेरणा दी और उनकी मदद से वे जीवित बच सके। लॉरेंस लेम्यूक्स के जीवन में व्याप्त उदात्त जीवन मूल्यों के कारण उसकी प्राथमिकता बदल गई। लॉरेंस लेम्यूक्स को मेडल जीतने की बजाय किसी की जान बचाना अधिक महत्त्वपूर्ण लगा। उसने यही किया भी। लोग ऐसी स्थिति में प्रायः द्वंद्व में फँस जाते हैं और सही निर्णय नहीं ले पाते। अनिर्णय की स्थिति में कई बार दोनों ही स्थितियाँ बेकाबू हो जाती हैं अथवा हाथ से निकल जाती हैं लेकिन लॉरेंस लेम्यूक्स ने ऐसा नहीं होने दिया। लॉरेंस लेम्यूक्स ने तत्क्षण निर्णय लेकर उसे क्रियान्वित कर डाला।
     ओलंपिक के इतिहास में असंख्य लोगों ने मेडल हासिल किए हैं। कई खिलाड़ियों ने तो कई सालों तक लगातार कई-कई मेडल भी हासिल किए हैं। कई मेडल विजेता अपने अच्छे प्रदर्शन और अपनी अन्य विशिष्टताओं के कारण चर्चित भी कम नहीं हुए लेकिन मेडल न मिलने पर भी जो सम्मान लॉरेंस लेम्यूक्स को मिला वह अद्वितीय है। लॉरेंस लेम्यूक्स को प्रतिस्पर्धा में तो कोई पदक नहीं मिल सका लेकिन अंतर्राष्ट्रीय ओलंपिक कमेटी द्वारा लॉरेंस लेम्यूक्स को उनके साहस, आत्म-त्याग और खेल भावना के लिए पियरे द कूबर्तिन पदक प्रदान किया। बाद में ये पूछने पर कि क्या ओलंपिक मेडल खोने पर उन्हें कभी अफसोस भी हुआ तो लॉरेंस लेम्यूक्स ने कहा कि यदि उनके जीवन में दोबारा ऐसी स्थिति आती है तो वे हर हाल में उसे दोहराना पसंद करेंगे।
     हमारे जीवन में दो तरह के लक्ष्य होते हैं। एक वे लक्ष्य होते हैं जिन्हें हम स्वयं निर्धारित करते हैं और दूसरे वे लक्ष्य होते हैं जिन्हें दैवी इच्छा कह सकते हैं। दोनों का ही जीवन में महत्त्पूर्ण स्थान होता है। हमारे जीवन में भौतिक लक्ष्य भी हों और उन्हें पाने के लिए सदैव प्रयासरत रहें लेकिन जीवन में जो दैवी लक्ष्य होते हैं उनकी ओर ध्यान देना भी अनिवार्य है। दोनों की ओर ध्यान देकर ही हम जीवन में संतुलन स्थापित कर वास्तविक विजेता बन सकते हैं। सच किसी का जीवन बचाने से अच्छा दैवी लक्ष्य हो ही नहीं सकता। लॉरेंस लेम्यूक्स की करुणा की भावना व वास्तविक मदद ने उसे अपने देश के लोगों के दिलों का ही नहीं दुनिया के लोगों के दिलों का सम्राट बना दिया।



ए.डी.-106-सी, पीतमपुरा,
दिल्ली-110034
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