इस अंक के रचनाकार

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सोमवार, 29 नवंबर 2021

दरपन कस मनखे

मुकेश साहू

जब तक ले दरपन नई देखही,
मनखे के दिन नई बितत हे।
कतको बुता रिही संगी,
एक बेर तो दरपन देखत हे।
        इही सेती दरपन ला घलो,
        अपन ऊपर गुमान हे।
        मनखे ओला देखें बिना,
        एक दिन नई बितात हे।
फेर ओला कोन बताही,
मनखे अपने आप ल देखत हे।
अउ फोकटे फोकट दरपन हा,
अपन खुबसूरती के दुहाई देवत हे।
        जैसे दरपन तइसे मनखे,
        दरपन आघु ले चकचक ले।
        अउ पाछु ले खराब हे।
        तइसने मनखे मन घलो हे,
        आघु ले तो बने दिखथे।
फेर अंतस भीतरी मा,
कतका जहर भराये हे।
ना कोनो जाने, ना कोनो पहिचाने,
दरपन अउ मनखे में।
        कई चीज समान हे,
        जइसे दरपन अगर टुट गे।
        ता मनखे के काम नई आय,
        अउ मनखे के परान छुट गे।
ता दरपन के काम नई आय।
भला मरे मनखे ला दरपन देखाथे का
दरपन के टुटे लेए आवाज बाहिर आथे।
अउ मनखे के परान छुटे ले
        आंसु बाहिर आथे।
        इही सेती तो कहत हव,
        दरपन कस मनखे ।।

तेंदूभाठा, गंडई
जिला - राजनांदगांव (छत्तीसगढ़ )

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