इस अंक के रचनाकार

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सोमवार, 10 जनवरी 2022

करनफूल

                                           
चन्द्रहास साहू
मो 8120578897


          रात के तीन बजे ले आगर होगे हावय। लगभग चार बजत होही। सुकवा घला टँगागे हे। सुरुज नरायेन दिन मा अंगरा कुढ़ोये ला धर लेहे। ..फेर चन्दा के जुड़पन ले  बाचे हावय पहाती हा....। एक चददर के जाड़ । खार मा हुँआ - हुँआ कोलिहा  के नरियाई अऊ बड़वा कुकुर के संग पारा के दु चार ठन आने कुकुर मन के भुकई अतका ला छोड़ देन तब तो ....ये बेरा गाँव सुन्ना होना चाही फेर......गाँव गदबदावत हे ...।
       खेखर्रा डोकरा के खोखड़ी घला बाढ़गे हावय । लइकोरी के लइका बिटोवत हे। गाय बछरू कोठा ले निकल के जंगल कोती रेंगत हावय । घाटी घुम्मर टेपरा सरगम के तान देवत हे। चिथत बछरू मेंछरावत हावय । यहु ला छोड़ देन तब गाँव सुन्ना होना चाही फेर...  गाँव गदबदावत हे ...।
        दुनो हाथ चलत हावय उत्ता धुर्रा । बुता होवत हावय लकर - धकर। बियारी के पिसान पीसत हे , जाता गुर्रावत हावय घरर - घरर । दुरिहा  गाँव ले मील के आरो आथे खटपीट- खटपीट । कोनो दतोंन मुखारी कर लिस । कोनो तुमड़ी म पेज पसिया ला धर लिस । कोनो तो लुका के महुआ रस ला चिपड़ी मा पी डारिस सुडुक़ - सुडुक अऊ फुसुर - फुसुर। यहु ला छोड़ देन तब गाँव सुन्ना होना चाही फेर ...गाँव गदबदावत हे....।
"जावव न रे ! जोजन कर डारेव ।"
डोकरी गुर्राइस जाता चलावत। बहुरिया लइका ला थपट के सुता दिस । रेंगे लागिस । सिरतोन अब गाँव गदबदावत हे....।
       मुड़ी म पागा , सलूखा, नानकुन पटकू खांध मा टंगिया माखुर के चिपटी खैरी दांत फेर मुचकइ सुघ्घर ...। गाँव के बुढ़वा जवान छोकरा के इही बरन आवय। माड़ी ले लुगरा पहिरे गोदना वाली। सिकल मनमोहनी, सांवर रंग पाछु मा खोपा पारे । खोचनी डारे बुढ़गी मोटियारी छोकरी के बरन आवय सुघ्घर ... अब्बड़ सुघ्घर । कोनो छोकरा - छोकरी मन जींस टी शर्ट पहिन  ले हावय तौन अलग आवय... ।
पढंता आवय।
      बांस के डलिया - टुकनी ,बड़का मँझोलन नान्हे , कपड़ा चुंगडी के झोला । नान्हे बड़का मँझोलन  मुड़ी म बोहोये , खांध म  अरोवय तब कोनो हा पॉलीथिन धरे ...पढंता आवय।
गाँव गदबदावत हे...।
       मइनखे के रेला निकले लागिस पारा - पारा ले । पहिली घर निकलते साठ जंगल मिल जावय । जंगल के बीच मा घर राहय फेर अब कोस भर दुरिहा जाए ला लागथे। जंगल अऊ आबादी  के बीच जइसे युद्ध होवत हे, जंग छिड़े हावय। एक - एक सिपाही मरत हे अऊ भुंइया चातर होवत जात हे। आबादी के हाथ मा टंगिया बसुला आरी कुदारी जम्मो हावय अऊ जंगल करा .....?  ओहा तो  निहत्था आए। प्रकृति आवय कोनो ला नइ मारे । सब ला जीवन देथे । दाना पानी देथे...मरत ला घला अमरित देथे। तभो ले पाछू घुचत हावय आबादी के डर ले...। आज कतका सिमटगे ..? कतका सकेलागे जंगल हा ... ओला सब जानथे । सोनारिन के  परिवार घला जानथे ...।

      मइनखे के रेला ले छइयां निकलिस अऊ पिपरही के तीर आगे। कांटा- खूंटी, झाड़ी - झंखड़ के बीच मा मीठा पानी के कुआँ हावय। ठाकुर कुआँ।  अब ओ छइयां हा मोटियारी कमेलिन टुकनी वाली बनगे रिहिस।...सोनारिन बनगे रिहिस। दूसरइया छइयां कुआँ के जगत में ठाढ़े होगे अऊ लोहा बाल्टी ला  फेकिस तब जलरंग करिस । जोर के  आरो आइस अऊ पड़की परेवना फुर्र के उड़ागे। सोनारिन डर्रागे ।
"ये री काय होली ?" (अरे का होगे ?)
ही: ही: खी: खी:  खुलखुल - खुलखुल हासे लागिस । सोनारिन लजागे अऊ वहु हासे लागिस अब। कभू तो डर्राये नही फेर... आज..। अब सुखिया कलेसरी बुधिया के संग सोनारिन घला हासे लागिस।
"चलो जाव रे ! माई पीला लेकी लेका महुआ बिनुक जाव ।"
सोनारिन किहिस अऊ जम्मो दल महुआरी मा अमरगे। बारवी पढ़इया ले आंगनबाड़ी जवइया लइका मन घला हावय।
     सिरतोन सोना तो आय ये महुआ हा । दु पइसा मिले के साधन के संग मया परेम भाई चारा ला  घला पोठ करथे।
 एके ठौर म बीस तीस रुख हावय । बुधिया अऊ सोनारिन एक रुख ला पोटार लिस। आने मन आने रुख ला। सोनारिन के लइका घला हावय सोनारिन के संग। लकर - लकर बीने बर हाथ चलथे वइसना मुहु घला चलथे । सुख अऊ उछाह मा खोसखिस - खोसखिस हास लेथे तब दुख मा गोहार पारके रो घला डारथे इही महुआ के छइयां मा।
         एसो महुआ के फूल जादा नइ आय हावय । पीछू दरी घला नइ आये रिहिस । ईटा भट्टा वाला ठेकेदार कस यहु महुआ ठग दिस। दु ढाई बच्छर पाछू सोनारिन बुधिया लतेलु सब कमाये रिहिस ईटा भट्टा मा। आज ले रोजी नइ मिले हावय। तकादा करबे तब ले काली आथो दीदी बहिनी कहिथे अऊ नइ आवय।इही सुनत तीन देवारी नाहकगे फेर पइसा नइ मिलिस।
"हाव दीदी ! मोरो बारह सौ ले आगर पइसा हावय। अभिन ले नइ मिलिस । टार गरीब मन ला दान होगे । दाई  दंतेसरी के गोड़ म चड़ा देयेव कहिके बिसरा दे हव बहिनी।"
सोनारिन किहिस बुधिया के गोठ सुनके।
"ओ रोगहा, बईमान ला कतका कहिबे ओ..? कतका पुरही...? ओखरो लइका लोग मन लुलवाही ...। तरसही एक - एक पइसा बर...।"
"झन सराप दीदी बुधिया ! ठेकेदार के नियत म खोट हावय तब ओखर लइका लोग के का दोष..? वहु मन दुधे खाय दुधे अचोय ओ !" सोनारिन किहिस।
"कइसे डरपोकनी होगे हस आरुग..? अपन हक बर घला नइ जोम सकस...?"
"जानथो दीदी फेर सब्बे जगा हक जताना सही नइ राहय। हो सकथे ठेकेदार घला करजा मा बोजाये होही..? ओखरो संग कोनो हा बेमानी कर दिस होही..? कतको झन मन चमकटठा घर बना लेथे अऊ नीव के ईटा के पइसा ला नइ दे सके..?  बड़का मइनखे करा बड़का मजबूरी रहिथे दीदी। नान - नान गोठ मा जोमबे ते नइ बने बुधिया दीदी।''
सोनारिन समझाये लागिस । बुधिया के छाती के रगरगी माड़गे अब।
"जादा कूदे खेलतो में नी रहा महुआ बिनुक मन लगावा। "  (खेल कूद जादा झन करो महुआ घला बिनो ।)
खेलत लइका मन ला बरजिस सोनारिन हा।
      सब अपन धुन म हावय । बबा जात मोटियारी बुढ़गी जवनहा सब मगन हावय। रिलो शैला मांदरी गीत गावत हावय तब कोनो छोर ले करमा ददरिया अऊ सुआ के आरो आथे। लइका मन के रोवई गवई हांसी ठिठोली घला हावय । कुकुर कोलिहा जँगली सुअर गाय बछरू के आरो  सरगम के तान देवत हावय...।
सिरतोन जंगल गदबदावत  हे...।
      "चिरई - चिरगुन जिनावर के आरो हा सरगम के तान नोहे । ओखर मन के कलपना आवय ,करलई आवय, रोवई आवय। रात दिन रोवत रहिथे येमन ! कभू अपन खाना पानी बर तब कभू अपन खोन्दरा बर।
कोनो हमर डेरउठी मा बइठ जाही ते असमन लागथे। कब जाही..? कब भागही..? आनी बानी के उदिम करथन भगाये बर , टरकाये बर...। अइसे लागथे जइसे अपन जीवन जीये के शैली मा खलल होगे हावय । मइनखे के बइठे ले अतका विचलित हो जाथन ..। भलुक हमरे जात आए ...मइनखे जात...। मइनखे मइनखे एक बरोबर .....?
अपनेच जात ला देख नइ सईहारन अऊ हमहा जँगल के माई कुरिया ला पोटार लेहन। पहार के मुड़ी ला नवा दे हन, जँगल के छाती म आगी ढील दे हन । नदिया- नरवा पटागे.... का बाचीस....? जम्मो कोती सुसके के आरो ...नदी -पहार, जँगल -झाड़ी, तरिया- नरवा,  नदिया -कछार अऊ जँगली जानवर ....सबके सुसकना आवय ....सरगम के तान नोहे..? फेर मइनखे के डिंगई  ओखर स्वार्थीपन कब सिराही..?''         
         सोनारिन जम्मो ला गुनत - गुनत टुकनी ला भर डारिस। बुधिया के बड़का डलिया हा अधियागे। गाय बछरू छुटल महुआ ला खाए लागिस। दु चार बेरा खेदारे घला रिहिस फेर अब नइ खेदारे ।
अब आने रुख मा जाए लागिस जम्मो कोई।
"कितरो बिन लास लेका लेकी मन।"
"इतरो कम बिन लास।"
"आले इया पेज पानी पीया।"
      लइका मन के टुकनी झोला ला देखे लागिस सोनारिन अऊ बुधिया हा। बड़का लइका ला बरजिस अऊ नानकुन छे बच्छर के बेटा ला दुलारे लागिस।  पानी पेज पियाइस।
"अतकी ला बीने हावव रे ! जावव अऊ बिनो। एसो कमती फूल आये हावय चेत लगाके बीनो झटकुन उरक घला जाही।"
      बुधिया लइका ला किहिस अपन।
"देख दाई ! कोनो जिनिस कमती होही अऊ ओखर मांग जादा रही तब ओ जिनिस के कीमत बाड़ जाही । इही हा अर्थशास्त्र के नियम आए । अऊ महुआ के माँग कभू कम नइ होवय भलुक बाढ़ते जाही । मंदहा मन ला का चाही ...महुआ पानी। संसो ...झन कर दाई । पचास किलो के रकम लेबो अऊ तीस किलो देबो। एखर ले हमर मेहनत घला बाचीस अऊ टेम घला। लइका मन अपन ज्ञान बघारिस गुना भाग करके। छे सात झन लइका मन इही गोठ मा डिस्कशन घला होवत  हे । ओहो... बड़ा गम्भीर मेटर हावय भैया...।
"चौमासा मा भोंभरा जरही,जड़काला मा पसीना चुचवाही अऊ गरमी मा करा पानी छरही तब का होही..?''
"जतकी ला देवत हावय  धरती मइया हा ओतकी ला झोंक बुधिया !"
सोनारिन किहिस बुधिया के गोठ सुनके।
       सोनारिन के दुलरुवा घला कहा कमती रही ..? टुकनी के बिनाय महुआ ला बगरावत हावय अऊ फेर बिनत हावय, सकेलत हावय। छे बच्छर के लइका के फूल कस मुचकासी देख के सोनारिन के गुस्सा फुर्र हो जाथे। संगवारी मन बर मनु आवय लइका हा । आँगन बाड़ी के दीदी जी बर मानव आवय अऊ सोनारिन बर तो करनफूल आवय। लइका ला पोटार लिस काबा भर अऊ कोरा मा पा लिस।
      पिवरी चन्दा लुकाये ला जावत हावय। अऊ सादा पोनी कस  उड़ावत बादर कोती ले लाली गोला दिखे लागिस। जय सुरुज नरायेन दुनो हाथ ज़ोर के पायलगी करिस सोनारिन हा।
      गाँव के  आबादी कमती रिहिस तब एक - एक ठन रुख ला पोगराय रिहिस। एक - एक मइनखे बर पन्दरा बीस महुआ रुख आवत रिहिस बटवारा मा । फेर अब तो कमती होये लागिस । कमती अतका कि झगरा लड़ई होये लागिस । सम्पति विवाद के लफ़ड़ा होंगे अब। एक दिन तो गजब होगे महुआ के झगरा मा सुंता बाई के मर्डर होगे। गाँव भर देखो - देखो होगे। पुलिस आइस अऊ राम लाल ला धर के लेगगे।
जेल मा आज ले सुसकत हावय।
     चतुर राम गाँव के बड़का सियान आवय। गाँव के जम्मो सियान मन गुनिस अऊ किहिस
"गाँव मा आबादी बाढ़त हावय अऊ रुख कमती । झगरा लड़ई के कारण होगे हे। बेरा के संग बदले ला परही । परिवर्तन संसार के नियम आवय । अऊ ... आज ले हम नवा नियम बनावत हन । "
सियान चतुरराम किहिस । एक कोलिहा नरियाइस अऊ सब हुआँ - हुआँ । गॉव के बइठका मा सब सुंता होगे। अब्बड़ दिन मा सुंता ले बइठका होइस। बड़का दाऊ अनाकानी करिस फेर मानगे। पलटू राम घला गाँव के माई मुड़ी आवय । चतुरराम के गोठ मा मोहर लगाइस अऊ किहिस
" महुआ के रुख हमर संस्कृति के देव आवय। अऊ देवता के का बटवारा ? जइसे गाँव के जम्मो देवी देवता गाँव भर के आवय वइसने जम्मो रुख जम्मो मइनखे के । जौन अगुवाइस तौन हा बिनिस , जौन अगुवाइस तौन हा टोरिस ।          
       अब जँगल जाए के होड़ लगे हावय । न रात लागे न बिकाल। जँगल म घला का के डर मइनखे के बसेरा होगे  तब....?  चितवा बघवा हुन्डरा भलवा .... कही नइ दिखे अब । कभु - कभु जँगली सूरा अऊ कोलिहा दिख जाथे। वहु मन मइनखे ले अपन जान बचावत फिरत रहिथे।
रधिया रमेसरी कलेसरी मन घला अब आने रुख मा जावत हावय।
"दीदी तोर करनफूल नइ दिखे बेच भांज डारे हस का.. ?''
बुधिया पूछिस सोनारिन के कान ला  सुन्ना देखत ।
"का बताओ दीदी मोर दुख ला....?''
         सोनारिन दुनो कान मा चाक्कर दमदम ले छतरी कस करनफूल खिंनवा पहिरे रिहिस ससरार आइस तब। दाई के चिन्हा आवय येहा । अब्बड़ मया रिहिस करनफूल बर। माइके के बड़वा कुकुर बर घात मया रहिथे तब तो ये साक्षात सोना आवय । ... अऊ सोना मा करनफूल ।.. अब्बड़ महँगा कीमती बहुमुल्य ।
  गहना जेवर कतको महँगी राहय फेर गोसाइया के उछाह ले सस्ता होथे।
         गोसाइया हा लकड़ी बीने बर जंगल गेये रिहिस अऊ लकड़ी चोर कहिके धांध दिस। आधा - आधा रात के जँगल सफाचट होवत हे । जँगल अपसर ला खाना पुरती करना हावय...। अब्बड़ कछेरी अदालत चलिस। वन संपदा संरक्षण एक्ट लगे रिहिस। नइ छुटिस झटकुन ...अऊ छुटिस तब करनफूल के बलि ले डारे रिहिस। सोनारिन के दाई के चिन्हा.... चिटिक दाग नइ लगे रिहिस । रगरग ले दिखत रिहिस पीयर - पीयर बीस बाइस बच्छर पाछु घला.... फेर अब सब लुटागे ।
" सोनारिन तेहां मोर बर अपन प्राण प्रिय जिनिस ला बेच देस। खेत ला बेच के घला मोला छोड़ा सकत रेहेस फेर तोर करनफूल ला बेचेस.....। जांगर टोर मिहनत करहुँ अऊ तोर बर नवाँ करनफूल बिसाहू । "
       आँखी के कोर के आंसू ला पोछीस अऊ किरिया खाइस गोसाइया हा।
     आज ले जांगर टोर मिहनत करत हावय गोसाइया हा फेर करनफूल नइ बिसा सकिस । फेर....सोनारिन ला  तो जइसे सिरतोन करनफूल मिलगे। दु नोनी के पाछु  एक बेटा के जनम आइस अऊ करनफूल के साध पूरा होगे।
सोनारिन आँखी के कोर के दु टिपका आँसू ला पोछिस अछरा मा।
       जादा झिल झांखड़ के तीर के बड़का रुख मा जाए लागिस दुनो कोई । लइका घला कनिहा मा हावय। जवनहा मन साइकिल मा तब कोनो जवनहा फटफटी मा महुआ ला गाँव कोती डोहारत हावय । कोनो तो जलाऊ लकड़ी के नाव मा जियत लकड़ी ला काटत हावय।
        लोहा अयस्क निकालत गॉव के सियार म ठाढ़े पांच सात किमी के पहार ला लील डारिस कारखाना हा। अब बड़का पहार मा दते हावय । बुलडोजर क्रेन डम्फर ट्रक अऊ भारी मशीन के खड़खिड़ - खड़खिड़ आरो आवत हावय। पन्दरा बीस किमी के लम्बा पहार तीन जिला ला जोड़थे अऊ सीमा बनके अड़े हावय।
"मरले मोचो आया   !" ( ये दाई ! मेहां मरगेव ओ !)
"मय मरले माई! मोको बचाऊ री" (बचा दाई !)
लइका चिचयाये लागिस।
"तुके काय होली बाबू ...?" (तोला का होगे बाबू!)
सोनारिन अकचकागे
"तुके काय होली बाबू ...?
"मोचो आँइख  चो पुतरी तुई आस।"(मोर आंखी के पुतरी तेहा हरस )
"मोचो करनफूल  तुई आस।"(मोर करनफूल तेहा हरस)
"तुके काय होली बाबू ....?" मोचो पिला ..!( तोला का होगे मोर पिला ! )
      तीन चार सौ मीटर ले दुरिहा बड़का - बड़का सरई रुख के तरी मा लइका तड़पत रिहिस। देव ठउर के रुख आय। कभू रोये दउड़े कभू हाथ गोड़ ला पटके... झटकारे अंग - अंग ला। फेर ओहा तो चारो मुड़ा ले धन्धागे हावय चक्रव्यूह कस । अभिमन्यु तड़पत हावय। भागे के उदिम करत हे... गोहार पारत गिंगियावत हे...। जी भर के सामरथ करिस दउड़े के फेर अब गिरगे भुइँया मा । धुर्रा मा घोण्डे लागिस। हाथ गोड़ ला पटकिस खुरचीस पीरा ले बियाकुल
     "बचा ले दाई ! बचा ले ददा....! लइका के गोहार कमती सुनाइस अब अऊ भर्र - भर्र ...भिनभिन - भिनभिन के आरो जादा आये लागिस। मंदरस माछी लइका के काया मा बईठ के चाबत हे। अपन डंक ला गाड़ियावत हावय । बीख खीला के बीख ले अधमरहा होवत हे लइका हा ।
      जम्मो सरई रुख मा मंदरस माछी के छत्ता बड़का - बड़का। अतका बड़का - बड़का छत्ता बाप जनम नइ देखे रिहिस सोनारिन हा। हजारो नही ..लाखो नही .. करोड़ो नही.. अरबो ले घला जादा माछी । भवंरी बनके भनभिन - भनभिन  उड़ावत हावय।
अब मइनखे के बस के नइ हावय येहाँ।
"मोके बचावव  दंतेसिरी माई...!"
" अमचो लेका चो बचावव....."
      सोनारिन के आँखी ले लहु बोहावय लागिस । करेजा फाट गे लइका के करलई ला देख के। थरथरासी लागिस। हाथ गोड़ सुन्ना परे ला धरिस। सिकल मा पसीना चुचवाये लागिस । पोलखा भिंजगे। कतको एक्सीडेंट देखे हावय क्षत - विक्षत लाश घला देखे हावय फेर अइसन दृश्य कभू नइ देखे हावय । अब्बड़ बिकराल हावय। धरती दाई फाट जा अऊ मेहाँ समा जावव । सोनारिन तरमराइस फेर ...कहाँ फटही धरती हा ..। सोनारिन आवय कोनो सीता नोहे।
"दंतेसरी दाई लइका ला झन तड़पा । बचा ले। ओ दाई...! मोर भैरी दाई ! तोर शरण मा आये हावव।"
"तुचो शरण मे इले से।"
      मइनखे के बस ले बाहिर टंगिया बसूला बंदूक भाला कुछु काम नइ आवय। अतका बिकराल कि हवा पानी आगी बूगी कहि मा नइ माने । आज लइका के प्राण ले के रही ये मंदरस माछी हा।
तैतीस कोटि देवी देवता ला सुमिरन कर डारिस सोनारिन हा। एक - एक गोड़ मा  बल फभिस । लुगरा ला ओढ़ के अऊ खांध म अरझे  टंगिया ला धरके आगू बाढ़हिस।  
"मोर लइका ला छोड़ दे दाई ! लइका के दुख तड़पना नइ देखे जावत हे। ओखर रोना तड़पना खुरचना बीख के झार ले अगिया बेताल होवत हावय लइका हा । छोड़ दे।"
"पीला चो दुख देखुक नी सके...।"
".....अऊ नही ते मार दे...। "
"न आले मारून देस।"
" एके बेरा मा लेग जा....।"
" एकेच हर नेने"
सोनारिन के करेजा फाटगे...।
"आबादी अऊ जँगल के लड़ई म मोर लइका ला सेनापति समझ के लेग जा। मोचो  मानव....., मोचो मनु .....,मोचो करनफूल ला अतका झन तड़पा....। सुन दाई ... सुन भैरी दाई.... सोनारिन गोड़ ला उसालिस ..अऊ पट्ट ले गिरगे।
लइका अभिन घला अब्बड़ तड़पत हावय छटपटावत हावय खुरचत हावय........।
      महुआ रुख कोती ले धनुष के छूटे बीख भरे तीर आइस अऊ लइका के छाती मा गड़गे। लइका अधमरहा तो आगू ले होगे रिहिस । अब.....सबरदिन बर कलेचुप होगे।
       महुआ रुख तरी ले सुसके के आरो आइस । आंखी ले आंसू नही लहू बोहावत हावय,.... बाप के आंखी आवय । फेर धुंधला आंखी में दिखे लागिस लइका ला पावत पोटरत।.....बासी खवावत...पेज पियावत अऊ अब जड़ होगे न आंखी ले आँसू बोहाइस न लहू ।....गोहार पारिस..। भूकम्प आ जाही धरती मा।  अगास मा  सुराख हो जाही...। धनुष टुटके कुटका - कुटका होगे । घिन आये लागिस आज इही धनुष टंगिया बर ।
".....मोला छिमा कर दे सोनारिन एक बेरा अऊ गवां डारेव तोर करनफूल ला ।....लुटा डारेव तोर करनफूल ला । मोर मानव ...! मोर मनु ...! मोर करनफूल......!''
सोनारिन के गोसाइया अऊ मानव के ददा आवय तरमरावत हाबे..। रोवत हाबे..। बफलत हाबे..।
 एक बेरा अऊ धरती फाटे के पुरती गोहार आइस  रोये के अब । मोर...... करनफूल....मोचो करनफूल......।
 
 
द्वारा राजेश चौरसिया
आमातालाब रोड श्रद्धा नगर धमतरी (छ ग )
मो  8120578897

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