इस अंक के रचनाकार

आलेख दान देने का पर्व छेरछेरा / सुशील भोले भारत में लोक साहित्य का उद्भव और विकास / डॉ.सुशील शर्मा राज धरम यहै ’सूर’ जो प्रजा न जाहिं सताए / सीताराम गुप्ता स्वामी विवेकानंद और राष्ट्रवाद / मधुकर वनमाली मड़वा महल शिव मंदिर भोरमदेव / अजय चन्द्रवंशी शोघ लेख भक्ति में लालसा का लिंग निर्धारण, पश्चिमी ज्ञान मीमांसा और मीरा / माधवा हाड़ा कहानी इक्कीस पोस्ट / डॉ. संजीत कुमार जिन्‍दगी क्‍या है / बलवीन्‍दर ' बालम ' लघुकथा स्टार्ट अप / विनोद प्रसाद सबक / श्रीमतीदुर्गेश दुबे मदद / रीतुगुलाटी ऋतंभरा बिल्ली / सुनिता मिश्रा सूत्र / सुरेश वाहने छत्तीसगढ़ी व्यंग्य झन्नाटा तुँहर द्वार / महेन्द्र बघेल गीत / गजल/ कविता खुशियों का संसार बना लें (बाल कविता) ओंकार सिंह ’ ओंकार’ बेबसी को दर्द की स्याही में / गजल/ प्रिया सिन्हा ’ संदल’ जड़ से मिटाओ/गीत/ अशोक प्रियबंधु, सहरा में जब भी ... / गजल/ स्वरुप , जब - जब हमनें दीप जलाये / गीत / कमल सक्सेना कवि एवं गीतकार आशा की उजियारी / गीत / जनार्दन द्विवेदी बगुला यदि सन्यासी हो तो समझो /गजल/ नज्¸म सुभाष कितना कुछ कह रहा है .../ गजल / पारुल चौधरी अपने - अपने ढंग से ही सब जीते हैं /नवगीत /जगदीश खेतान आदमियत यदि नहीं तो .../कविता/ राघवेन्द्र नारायण मिले थे यक - ब - यक/ गजल / किसन स्वरुप अनदेखे जख्¸म/ गजल / गोपेश दशोरा छन्द युग आएगा/ गीत/ डॉ. पवन कुमार पाण्डे प्यारी बिटिया / गीत/ नीता अवस्थी इश्क में मुमकिन तो है ...गजल/ तान्या रक्तिम अधरों के पंकज उर / गीत/ संतोष कुमार श्रीवास हे वीणा वादिनी माँ / गीत /स्वामी अरुण अरुणोदय प्रेरणा/ कविता/ नरेश अग्रवाल, बसन्त फिर से .../ नवगीत / डॉ सीमा विजयवर्गीय नवीन माथुर पंचोली की रचनाएँ तोड़ती रहती हर रोज/ कविता/ कविता चौहान कितना सूना है जीवन / कविता/ उषा राठौर उम्मीदों की झड़ी से लब दब गया किसान / कविता/ सतीश चन्द्र श्रीवास्तव परेश दबे ’साहिब’ की ग़ज़लें पाँव में छाले हैं ... / कविता/ यशपाल भल्ला बुरे हैं भले हैं ... कविता/ एल एन कोष्टी पीली पीली सरसों फूली/ नवगीत /हरेन्द्र चंचल वशिष्ट तुम/ नवगीत जिंदगी क्या थी .../ नरेन्द्र सिंह दीपक लाल देवेन्द्र कुमार श्रीवास्तव की कविताएँ केशव शरण की कविताएं मोह - गँधी गीत बन/गीत/ कृष्ण मोहन प्रसाद ’मोहन’, चाहता वो हमें इस दिल में .../ गीत/ प्रदीप कश्यप आत्ममंथन / गीत / दिनेश्वर दयाल मुस्कुराया बहुत / गीत/ किशोर छिपेश्वर ’ सागर’ इजहार / गजल /मधु’ मधुलिका’ मदारी और बंदर काका / बाल गीत / कमलेश चन्द्राकर मन का भटका कविता राजेश देशप्रेमी आया जाया करो / कविता / ऋषि कुमार पुस्तक समीक्षा संदेशो इतना कहियो जाय :कहानी संग्रह .

रविवार, 20 फ़रवरी 2022

झन्नाटा तुँहर द्वार

महेन्द्र बघेल

      बड़े होय चाहे छोटे, अमीर होय चाहे गरीब,मालिक होय चाहे नौकर,लमगोड़वा होय चाहे बठवा, सियान होय चाहे जवान,गोरा होय चाहे सावरा सँउक तो सँउक हरे जी। अंतस के सँउक ल भला कोन ह मार सकथे। सँउक ले बढ़के अउ का हे ये दुनिया म। समय के संगे - संग सँउक के वेराइटी हर घलव अपडेट होवत (बदलत) रहिथे।
        पहिली मनखे अपन जरवत के मुताबिक जिनिस ल बउरे अब सँउक के हिसाब ले चीज - बस ल बउरथें। नवा जमाना हे त सँउक ह घलव हाईटेक होगे हे। इही सँउक बर चिंतन करत देश के चिंतक मन ह सत्ता के विकेंद्रीकरण अउ उदारीकरण के नीति ला देश के हित में बताथें। ठंडा दिमाग म जब ये बात ल सोचबे त लगथे, सही म येकर प्रत्यक्ष प्रमाण सरकार के आबकारी नीति हर आय।
         बच्चा ले लेके बम्फर तक अलग - अलग ब्रांड मा झन्नाटा अउ पाउच - पानी आकर्षक वेरायटी मा गाँव - गली, मोहल्ला मा सहज अउ सुलभ ढंग ले उपलब्ध हो जथे। नान्हे रहेन तब सुनन येहा पहिली कस्बा अउ शहर म मिले, एक कनी बाढ़ेंन तब पता चलिस ये बड़का गाव (जादा आबादी वाला गांव) मिलथे, आजकल गांव - गांव म मिलथे। अघोषित रूप म ग्राम पंचायत,गांव प्रमुख अउ उर्जावान झन्नाटा बेचइया (कोचिया) के बीच मा लेन - देन अउ जोहार -भेंट जइसन एक ठसलग गठबंधन तैयार होथे। फेर भीतर - भीतर होय सेंटिंग। सहमति के बाद आबकारी विभाग के आदरणीय अधिकारी कर्मचारी मन के परसादे अलग - अलग पाउच, डब्बा अउ शीशी मा जब्बर गुणवत्ता वाले झन्नाटा ला आम उपभोक्ता बर घर बैठे जुगाड़ करवा देथें। मनखे के सँउक ल पूरा करे बर जब सरकारे ह अपन कनिहा कस लेथे तब गांव - गांव म गली - गली म झन्नाटा ह उपलब्ध होइ जथे।
        मने गांव अउ पंचायत के सक्रियता ले सरकार के हर भावी योजना हर समाज के आखरी मनखे तक पहुंच बना पाथे। तब हम कहि सकथन कि शासन प्रशासन के जुम्मेदार पद मा बइठे नीति बनइया मन आम उपभोक्ता तक पीये - खाय के सामग्री ला अमराय बर ’ झन्नाटा तुँहर द्वार’ जइसे राजस्व जुगाड़ू योजना अउ पंचायती राज के सपना ला साकार करत हें।
         गांव - गांव के कतरो हमर दीदी बहिनी मन येकर विरोध करिन, कमांडर बनके,टोपी पहिरे लउठी उबावत अउ सिरसिरी पारत खूब धमकी चमकी लगईन। धर - पकड़ ल देखके कोचिया मन के सुकुड़¸दुम होय लगिस। थोरिक दिन बर दुकान - पानी बंद होगे।
         फेर उपभोक्ता समाज म येकर जबरदस्त साइड इफेक्ट आना शुरू होगे,अक्खा मंदहा मन तो हफर -हफर के हाय - हाय करत कइसनो करके जीना सीखगे। फरक पड़िस उनकर घर के ओ लइका मन ल जेन बिहनिया च ले शीशी के भरोसा डबल रोटी बिसाय। आज वोमन एक ठन शीशी गतर बर मोहताज होगे, गोसइन मन दू -फर साग अउ सुरवा बर तरसगें। का ये दरद के अनुभो कोई मनखे समाज ल हे, आखिर यहू मन तो सामाजिक प्राणी हरे का ? इनकर मौलिक अधिकार के रक्षा भला कोन ह करही।
        फेर कहे गेहे जेकर कोई नइ रहय ओकर उपर वाले होथे। समय अइसे पल्टी खाइस कि उपर वाले मन इनकर उद्धार करे बर कैबिनेट म पहुंचगे। फेर का पूछना हे, शिक्षित बेरोजगार मन के चिंता करत ओ समय के सरकार हा एक ठन कल्याणकारी योजना जनता जनार्दन मन बर लागू कर दिस। अउ नवा बजट -साल मा एक अप्रैल ले सब्बो प्राभेट ठेकादारी ला बंद करवा के उच्च गुणवत्ता के चौबीस कैरेट वाले सरकारी झन्नाटा दुकान खोल दिन। बड़े - बड़े बस्ती के चौरस्ता मा नवा - नवा बिल्डिंग बनाय गीस।
         सार्वजनिक वितरण प्रणाली सही कर्मचारी राखे बर नौकरी के विज्ञापन निकाल दिस। देखते - देखत फारम भरे बर बेरोजगार मन के भीड़ उम्हियागे। सबले ज्यादा नंबर पवइय्या बेरोजगार साथी मन के चयन घलव होगे। अउ शुरू होगे सरकारी झन्नाटा दुकान।
         दुनिया मा अपन आदर्श वादी पहिचान बनाय खातिर सरकार हर भट्ठी के सुचारू संचालन बर पढ़े लिखे होनहार कर्मचारी मन के भर्ती करिस,जेकर ले मंदहा मन ला सही डिग्री वाले झन्नाटा मिल सके। फेर हरेली, पोरा, देवारी, होली, मेला - मड़ई, सगई, बिहाव, छट्ठी,पिकनिक,जनमदिन, जइसन कार्यक्रम के समय मा मिलावट वाले मंद (जहरीला दारु) बेचाय के खबर ला सुनके सरकार बेचैन हो जथें।
         आबकारी मंत्री के नींद उड़ जथे। ओ रात दिन इही चिंता मा बुड़े रहिथे कि हमर प्रदेश के गउ कस जनता मन ला तिहार बार मा कइसे ओरिजनल झन्नाटा के सुविधा देवा पाबो।
         मनखे समाज मा अपन खास पहिचान रखने वाला येकर उपयोग करइया कका - भइया मन जब सरकारी आईटम (झन्नाटा)ला सबले पहिली चिखिन तब ओकर ओरिजनल सवाद अउ झन्नाहट ला पाके बड़ खुशी मनाइन।
         फेर छन्नू ला नवा मटेरियल के सवाद हा थोरको भी पसंद नइ अइस अउ अपन मन के बात ला मन्नू कर कहिस। कस भाई हमला अतिक दिन होगे हे येला बउरत फेर आज ले अइसन नी लगे रहिस,कहुं डुप्लीकेट माल ला तो नी दे देहे।
        मन्नू कहिस - हत कँहिके बइहा,अइसन बात नोहे। जब बिक्कट दिन ले डुप्लीकेट चीज - बस ला बउरत रहिबे नए तब वोहा डिट्टो ओरिजनल कस अनुभो होथे। अउ कहुं हुरहा ओरिजनल ले पाला पड़ जथे तब सवाद अउ हाजमा दूनो के खराब होय के डर ह सतात रहिथे। संग मा डुप्लीकेट के भोरहा घलव हो जथे भाई,का करबे।
        नवा वेवस्था मा जब ओरिजनल झन्नाटा के शोर - खबर हा हर मंदहा भाई मन तक पहुचिस तब सरकार के खूब वाहवाही होइस। खुशी मनावत सबे मन एक - एक दूदी पैग उपराहा पीके सरकार के प्रति आभार व्यक्त करिन,रंगझाझर खुशी मनाय के चक्कर मा कई हितग्राही मन कोमा में घलव पहुंचगे। कई झन नाली मा झपावत हाड़ा - गोड़ा टोरके अपन समर्पण भाव ला सरकार तक घलव पहुचाइन।
सरकारी आइटम के प्रति लोगन मन के बइहा - भूतहा कस मया - दुलार पाके सरकार हर मने मन बड़ खुशी मनाइस। अउ येकर भरोसा कई ठन जन कल्याणकारी योजना बनाय बर सोचिस।
        गजब के झनझनाहट ला देखत तीज - तिहार, बर -बिहाव, नेंग - जोग मा येकर डिमांड बाढ़गे, उही साल नचइया मन होली तिहार म चिखला मता - मता के, घोलंड - घोलंड के झूम - झूम के नाचिन।
        आजकल देखब म आथे फलदान (सगई) के बूता ल निपटाय के पाछू ओ सगा - सील जेन मन झन्नाटा के उपभोक्ता माने जाथे। (चालू भाषा म मंदहा टाइप के सगा) उनकर मन के बीच भारी वेवस्था के दौर शुरू हो जथे। मुंधिहार होते साट येमन तुरते खसक जथें, घरवाले मन खाना खवाय बर घेरी - बेरी चिचियात रहि जथे फेर येमन अइसे कल्टी मारथे कि घंटों इनकर गम नइ मिले। येमन जब आथें ते चुपर - चुपराके हालत - डोलत आथें। येमन जब पंगत म बइठथे त इनकर नाज - नखरा शुरू हो जथे। बरा अउ डार, पापड़ अउ दे,सलाद लान,भात ठंडा होगे हे। गरम - गरम लान। अरे रकम - रकम के बरतिया फरमाइश ले जीव हलाकान हो जथे। बस येमन खाना कम घोरना जादा करत रहिथें। ले देके खाहीं - पीहीं त हाथ - गोड़ ल लोम देथे अउ उही मेर पसर जथें। सकुशल घर वापसी ल ध्यान म रखत घरवाले मन इन ला थक - हार के चेचकारत,खींचत - खांचत मोटर गाड़ी म जोरके,धन्य मनाथे।
        मनखे समाज म यहूं बूता ह आजकल अपन जबरदस्त जगा बनावत हे। घरवाले मन कतका सात्विक हे, तात्विक हे, आध्यात्मिक हे। येहा कोई मायने नइ रखे। जतका नेवतार सगा होथे ओमन अपन मनमर्जी के मालिक होथें। काकरो चेहरा म थोरे लिखाय रहिथे अंतस के इच्छा ह जेला टप ले पढ़े जा सके। कुल मिलाके पंगत के आखरी दौर म अइसन पीयाक सगा मनके सबो भेद ह फरिहर होइ जथे ...।
सगई (फलदान)के गोठ ल कतिक लमियाबे, दूसर नेंग - जोग के बेर एकर सुरता नइ आय का ? बिहाव म तो घलव अइसने च ढंग ले चित्रहार देखे सुने बर मिलथे।
         मायन नचइया मन (मेन नाच) सरकारी आइटम के ओरिजिनाल्टी अउ झन्नाहट के अइसे दिवाना रहिथे कि इनकर मन बर हर हाल म वेवस्था करना पड़थे। नइते फुलहा फूफा सही रिसा जथे।
         मोटर ले उतरते साट बरतिया मन अपन अपन ले जुगाड़ मा लग जाथे। सबले पहिली पान ठेला मा जाके झन्नाटा बेचइया के नाम पता,मोबाइल नंबर, गली नंबर माँग लेथें। फेर इतरावत,मटमटावत बरतिया पावर के इस्तेमाल करत पव्वा - खव्वा के वेवस्था कर पाथें। रूचि अउ खपत ला ध्यान मा रखत मयारू पियाक मन ला देशी अउ विदेशी नाम के दू गुरूप मा रखे जा सकथे।
        बरतिया सगा मन के बारे मा जतका गोठियाबे कम हे,फेर कहना तो पड़थेच। झन्नाटा के टोंटा मा उतरते उनकर हाव - भाव ह बदल जथे। जइसे - जइसे उनकर हाथ - गोड़ अउ तरवा म झुनझुनी दउड़ना शुरू होथे बस वइसने च उही रफ्तार मा खीसा ले सुहापी निकल जथे। तुरते ताहीं सुहापी हर बीन बन जथे अऊ नागिन धुन मा जम्मो बरतिया मन अपन- अपन तन - मन ला डोलावत भुइयाँ मा घोंडइया मार - मार के ओरिजनल बरतिया के धरम निभाथें। जइसने च झुनझुनाहट के असर उतरथे। तुरते ताही रिचार्ज करे बर फेर झन्नाटा के शरणागत हो जथें। दूल्हा बाबू ला बरतिया मन डहर ले येकर ले बढ़के मितान श्रद्धांजलि भला का हो सकथे। मटमटहा बरतिया मन के बाते झन पूछ। आगू - आगू मा पुच - पुच कूदत मटमटावत, तेरा मन डोले मेरा तन डोले के धुन मा मड़वा मा चढ़ेच ल धरथें। नाचत - कूदत जइसने च बरतिया मन मड़वा मेर पहुचथे अउ दूल्हिन के संगी सहेली मन के दर्शन होथे,फेर तो नागिन डांस पूरा सबाब मा पहुंच जथे।
ये चाल - चरित ले का छ्ट्ठी - बरही ह बाचे हे कथस। अरे येमा तो जोश - खरोश ह दू गज अउ बाढ़ जथे।
          रात कुन कोनो हुरहा बम फटाका फूटिस तहान तँय समझ जा,उँकर घर के पबरित अंगना मा अवइया छेंठवा दिन मा छट्ठी मनाना तय हे। तहाँ देखले सुत उठके बिहान दिन छट्ठी खातिर बेवस्था बर एक ठन लिस्ट बनना शुरू हो जथे, जेमा तीली,सोंठ, गुड़, मिच्चर - मिठई, चाउर - दार, बरी - मुनगा, भाजी - पाला,पतरी - दोना,पोंगा - समियाना संग बहुआयामी डिस्पोजल गिलास हर लिखाय रहिथे। लिस्ट के आखिरी लाईन मा कुछ कीमती समान के नाम हर नइ लिखाय रहय फेर मीत - मितान अउ सगा - सुजान मन के विशेष रूचि के मुताबिक वो समान ला हर हाल मा बिसाय के जुगाड़ करना च पड़थे।
         घरवाले ले जादा सखा - सुजान अउ मीत - मितान मन छट्ठी हा कब आही कहिके दिन गिनत रहिथे। येमन पाहती च ले ददा अउ बबा बने के सेती फोन मा उसर - पुसर के बधाई अउ शुभकामना पठोवत रहिथें। घेरी - बेरी वेवस्था करे बर नोखियावत रहिथें।
         नवा लइका के आय ले भला कते ददा - बबा अउ कका - फूफा ला खुशी नइ होत होही। छेठवा दिन के आवत - आवत इही बबा जात मनके मुहुं मन घलव पंछाना शुरू हो जथे। उपर ले कोन्हो मन बेवस्था करे बर नोखिया दिस तब तो अउ का पूछना हे। सुर -सुराँट हर पूछी उठाके दौड़े बर धरथे। अइसन दिन ला परोसी मन घलव ठउँका तुकत रहिथे। कब छट्ठी होय त कब जुगाड़ होय। तभे तो परोसी आशाराम ह अपन मन म आशा पाले आज छ्ट्ठी वाले घर मा बिहिनिया च ले टेंक देहे। अंतस मा जुगाड़ के आशा मा चुलुक ला फिजोवत अपन मुखार बिंद ले तारीफ के बीजा छिचत हे।
         आशा राम - बड़ सुग्घर मुहुर्त मा राजकुमार हर तोर दुवारी मा अवतरे हे भैया। लइका के मुहुं कान ह तो बापे सही हे फेर माथा के लकीर अउ आँखी के तेज ह डिट्टो तोरे च सही हावे, बड़का भैया।
एती नाती के संग मा अपनो तारीफ ला सुनके दयालु राम के मन ह गदगद होवत हे।
तारीफ ल सुनके कते मनखे के चोला म मया ह नइ पलपलात होही भला।
         तभे तो तुरते ताही दयालु राम के बक्का फूटिस - का करबे आशा भाई ये तो सब उपर वाले के किरपा आय गा। फेर तोर गोठ ह सोला आना सच हावै छोटे। आशा राम ह समझगे ओकर फेंके निशाना ह सही जगा म टिपाय हे। अपन बात ला फेर लमावत कहिस - का भैया तहूं ह अतिक खुशियाली के बेरा मा थूके - थूक म बरा चुरोवत हस। घर मा नाती आय हे तभो हाथ - पांव सकेलत हस।
          देखते देखत अंतस मा पलपलात चुलुक अउ परोसी धरम के बीच गठजोड़ होगे। येला तो होना च रहिस। दयालु डहर ले बियारी के जुगाड़ के घोषणा,मुखारी करे के बेरा म होगे। असवासन पाके आशा ह धन्य मनइस कि आज ओकर आस ह खच्चित पूरा होही। उही कर छट्ठी साँवर बनावत नऊ ठाकुर ह दूनो झन के गोठबात ल कान टेड़ के सुनत रहिस अउ मौका पाते साट वहूं ह अपनो नाम ल लिस्ट म जुड़वा डरिस।
         बेर बुड़ती के टेम म कोंटा - कांटी डहर बबा (दादा) अपन सँगवारी संग अउ ददा,कका,ममा अउ फूफूा मन अपन दल संग चखना,डिस्पोजल गिलास अउ झन्नाटा के संग छट्ठी तिहार के आयोजन ल सफल बनाय म लग जाथें।
        इहाँ तक तो सब बने रहिस,फेर सभासद मन जस - जस झन्नाटा ल चुपरत गिनए तस - तस अपन - अपन मुहुं ल अनसम्हार फरकावत गिन।
        ओती घर म बहिनी -बेटी,दाई - दीदी अउ रमायण वाले मन सोहर गीत गावत हे त येती डिस्पोजल मैन मन ह फोहर -फोहर गरदा उड़ावत हें। नवा अध्याय के बोहनी इहे ले होइस जे रोशेरोश म तेरे - मेरे धमतरी तक पहुंच बनाइस अउ धक्का मुक्की ले बुक्की - बुक्की ले पटकिक - पटका, बोजिक - बोजा या ये कहन कि मुड़ी, कान,माड़ी,कोहनी के छोलई, फूटई तक पहुंच बना के पूर्णाहुति ल प्राप्त करिस।
          बेरा - कुबेरा म मंदहा मन के रूचि ल देखत हमर तो इही कहना हे कि अइसन मन ला बी. पी. एल. म शामिल करे बर सगई,बिहाव अउ छट्ठी वाले घर के बारे म शासन ल खास ध्यान देना चाही। अउ चाउर वितरण सही सगा - सोदर के हिसाब ले पउवा,अद्धी, बाटल अउ मुरकू - मिच्चर खउवा के शासकीय अनुदान के वेवस्था करना चाही। अउ जेन सगा मन रूचि नइ ले (सात्विक) उनला ए. पी. एल. केटेगिरी म मानके उकर बर फ्रूटी - माजा अउ बिस्कुट - पीपरमेंट आबंटित करे के प्रावधान होना चाही। मने काकरो मुहुं ल कोई काबर टुकुर - टुकुर देखत रहय। मने सबला मिले बरोबर न्याय, जनता पीये जनता खाय।
           येकर गुनगान करत अनुभवी मन बताथे कि येला बउरे ले कोंदा ह घलव पड़पड़ - पड़पड़ बोलना शुरू कर देथे। जोजवा मनखे म हिम्मत आ जथे। खोरवा हर दउंड़ना शुरू कर देथे। अपन घनघोर अनुभो ले बड़ आत्म विश्वास ले ओ कहिथे कि येकर परसादे कई झन कलाकार मन राष्ट्रीय स्तर म अपन नाम बुलंद करे म सुफल हो सकत हें। अउ कई झन मन अलग - अलग मंच म झंडा फहराके श्री - श्री नाम के पुरस्कार घलव पा सकत हें। त अइसन राष्ट्रीय महत्व के चीज ल कई झन नइ माने। ये सब उनकर संकुचित सोच ल बताथे। बल्कि अइसन मनखे मन के दिल ल तो बड़े होना चाही,अतका बड़े कि झन्नाटा हमा जाय। देख हमर सरकार के दिल ह कतका बड़े हे। शासन प्रशासन डहर ले एक घाँव मा सोला ठन खरीदी - बिक्री करे के उदारवादी नीति हर गली - गली मा पहुँच बनाके कल्याणकारी योजना के नवा ईबारत लिखत हे। तेकरे सेती तो बुधियार समाजशास्त्री विश्लेषक मन कहिथें - ये मानव समाज बर अभिशाप आय। अरथशास्त्री मन कहिथें ये समाज के विकास के पर्याय आय।
         जेन भी माननीय मन सत्ता म बइठे रहिथे। ओमन ल समाजशास्त्र के जगा अर्थशास्त्र के सुवाद ह जादा मीठ लगथे। त हमर असन सादा माथा वाले निपट कामन मैन मन बस इही कहि
          सकथन कि एती - ओती, चारो - कोती जब कागजी विकास के गुंगवा उड़त हे तब तो सत्ता सरकार हर उही विकास के फोसवा बाना म ढिठाही के धजा ल फहराबे करही। अउ जनता ल भरमाय बर आश्वासन के हवा ल अंदर - बाहर खींचत अनुलोम - विलोम करबे करही। भला खार - खाय जनता जनार्दन मन शीर्षासन करत रहँय।

डोंगरगांव

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