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सोमवार, 14 मार्च 2022

सामाजिक क्रांति के अग्रदूत : राजर्षि शाहू



वाढेकर रामेश्वर महादेव
महाराज और वर्तमान भारत 
       महाराष्ट्र में प्रतिगामी विचारधारा प्रचलित थी, इसे इतिहास साक्षी है। पुराने विचार पीछे छोड़कर नए विचार आत्मसाथ करके महाराष्ट्र पुरोगामी विचारधारा के तरफ़ बढ़ा। इन विचार के जनक फुले,शाहू,आंबेडकर हैं। महाराष्ट्र के विचार परिवर्तित करने में उनका योगदान रहा। वे अब तक उपेक्षित रहे। उनका कार्य,कृतित्व देखकर समझ में आता है कि वे सामाजिक क्रांति के महामेरू थे । समाज परिवर्तन के लिए राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक आदि क्रांति की आवश्यकता होती है लेकिन इन सभी क्रांति का उगाम स्थान सामाजिक क्रांति है। सामाजिक क्रांति के बीना राजनीतिक, आर्थिक क्रांति असंभव है । सामाजिक क्रांति न होने से समाज में जातिभेद, असमानता, अंधश्रद्धा,अज्ञान आदि बढ़ता है।
       हर देश में सामाजिक क्रांति हुई, सिर्फ़ स्वरूप परिस्थिति के अनुसार अलग-अलग।भारत में उच-निचता का स्वरूप था। व्यक्ति किस जाति में जन्मा इससे उसकी श्रेष्ठता सिद्ध होती थी। जातिभेद प्रचलित था। कुत्ते को छूना अपशकुन समझा नही जाता लेकिन महार, मांग, चमार जाति के व्यक्ति को छूना अपशकुन समझा जाता था। अंतरजातीय विवाह करना शाप था । तत्कालीन समस्या के विरुद्ध महापुरुष ने आवाज उठाया । सनातनी विचारधारा का निषेध किया। सामाजिक क्रांति भारत में कई बार हुई ओर आज भी हो रही है। भारत का इतिहास देखा जाए तो विषमता के विरुद्ध का संघर्ष है। सनातनी ब्राह्मण वर्ग को जन्म से प्राप्त होने वाले हक्क के विरुद्ध का संघर्ष है।भारत का सामाजिक इतिहास देखने के बाद विश्वमित्र और वशिष्ठ का संघर्ष दिखाई देता है। विश्वमित्र ज्ञान से, बल से वशिष्ठ के बराबर का। विश्वमित्र क्षत्रिय है लेकिन उन्हें ज़िन्दगी भर सनातनी ब्राह्मण के जन्म से प्राप्त हक्क के विरुद्ध लढ़ना पढ़ा। विश्वमित्र समान हक्क के लिए संघर्ष करनेवाला पहला भारतीय । समाज में हिन्दू धर्म के सनातनी विचारधारा के व्यक्तियों ने विषमता निर्माण की। बहुजन समाज का शोषण किया। अस्पृश्यता बढ़ी। इन समस्या से मुक्ति मिले इसलिए तथागत गौतम बुद्ध ने मानवतावादी धर्म का निर्माण किया । न्याय ,स्वतंत्रता , समता बंधुता, धर्मनिरपेक्षता तत्व शूद्रातिशूद्र को समझ में आए। तथागत गौतम बुद्ध तत्कालीन समय के सामाजिक क्रांतिकारक बने। तथागत गौतम बुद्ध के बाद महात्मा फुले क्रांतिकारक के रूप में सामने आए। उन्होंने जातिभेद को जड़ से । मिटाने की कोशिश की। शूद्रातिशूद्र को सामाजिक न्याय दिया। युरोप में कार्ल मार्क्स 'कॅपिटल' ग्रंथ लिख रहे थे, उन ग्रंथ के विचार तत्कालीन समय महात्मा फुले बात रहे थे। महात्मा फुले के आर्थिक, सामाजिक विचार और कार्ल मार्क्स ने बताए विचार में कोई अंतर नही । इसी से महात्मा फुले के विचार का महत्व समझ में आता है।
       महात्मा फुले के विचार का वारसा राजर्षि शाहू महाराज, डॉ बाबासाहेब आंबेडकर ने आगे बढ़ाया। सामाजिक न्याय क्या होता है यह कार्य से उन्होंने बताने की कोशिश की। राजर्षि शाहू महाराज ने समाज में स्थित जाति, उपजाति के शोषण पर प्रहार किया। सिर्फ़ उच्च जाति, निम्न जाति में भेद नही थे तो जाति के उपजाति में भेद थे। विषमता थी। तत्कालीन समस्या पर राजर्षि शाहू महाराज ने उपाय निकाले। इन कार्य के कारण उन्हें महाराष्ट्र का तथागत गौतम बुद्ध कहाना भी उचित होगा। उन्होंने जातिभेद, अस्पृश्यता, अंतरजातीय विवाह, मिलकियत, विधवा पुनर्विवाह, तलाक, देवदासी आदि के माध्यम से सामाजिक विचार समाज के लिए कितने महत्वपूर्ण है इन्हें बताने की कोशिश की। उनके सामाजिक विचार पर हम संक्षिप्त में प्रकाश डालेंगे।

जातिभेद
       जातिभेद भारत को लगा शाप है, कलंक भी...। इसका कारण अज्ञान। अज्ञान के कारणवश शूद्रातिशूद्र को हक्क , अधिकार समझ में नही आए। राजर्षि शाहू महाराज ने शिक्षा की व्यवस्था की। छात्रावास का निर्माण भी। कालांतर से बहुजन समाज प्रभाव में आने लगा। महार, मांग, चमार जाति के लोगों को शूद्र माना जाता था । उन लोगों के साथ राजर्षि शाहू महाराज भोजन करते थे। दरबार में शूद्रातिशूद्र व्यक्ति को काम करने का अवसर दिया। खुद की बेटी 'अक्काबाई' के विवाह में शूद्र समझे जानेवाले व्यक्ति के हाथ में तलवार देकर घोड़ों पर बिठाया। उन्हें प्रोत्साहन दिया। खुद की गाड़ी पर 'यलाप्पा बाळा नाईक' नामक महार जाति के व्यक्ति को ड्राइवर रखा। अस्पृश्य व्यक्ति के गुणों को सामने लाने की कोशिश की । पिछड़ी जाति के व्यक्ति को सरकारी, खाजगी क्षेत्र में नियुक्त किया । वे विदेश से भ्रमण करके आए थे, वहा की समाज रचना देखी थी।समझ ली थी। भारत की समाज व्यवस्था वैसे क्यों नही है? यह विचार उन्हें सताते थे। जातिभेद के कारणवश भारत की प्रगति नही हुई। समाज में एकता भी नही.. इन परिस्थिति को बदलने के लिए राजर्षि शाहू महाराज अंतिम समय तक कार्य करते रहे। जातिभेद के संदर्भ में राजर्षि शाहू महाराज कहते है- "भारत में जिस तरह का जातिभेद है, वैसा जातिभेद इस दुनिया के किसी अन्य ग्रह पर मिलेगा या नही इस संबंध में मुझे संदेह है। भारत को जो गुलामी हजारों सालों से भोगनी पड़ी उसका प्रधान कारण यही जातिभेद है।"1 जातिभेद नष्ट हो, इसलिए राजर्षि शाहू महाराज निरंतर कार्य करते रहे। इसी कारण आनेवाले समय में परिवर्तन होता गया। वर्तमान भारत में जातिभेद बढ़ रहा है धर्म,भाषा, प्रांत के नाम पर। दंगे फसाद हो रहे है। समाज में विषमता फैल रही है । आतंकवादी संघटना निर्माण हो रही है।भाईचारा खत्म हो रहा है। देश को विदेशी से नही देश के कुछ व्यक्तियों से खतरा निर्माण हो रहा है। राजनेता खुद के स्वार्थ के लिए जाति , धर्म में झगड़े निर्माण करते हैं। चुनाव के नाम पर तानाशाही निर्माण कर रहे हैं ।जाति, धर्म में एकता निर्माण नही होने देते। इन समस्या को जड़ से खत्म करना है तो शाहू विचार को अलंकृत करना होगा...

अस्पृश्यता
       प्राचीन समय से समाज में वर्ण व्यवस्था अस्तित्व में थी । बहुजन समाज को शिक्षा का अधिकार नही था, सिर्फ़ ब्राह्मण को था। इन कारणवश बहुजन समाज ब्राह्मण का, उनके विचारों का गुलाम बना । आज भी है... अज्ञान के कारण समाज में जातिभेद, अस्पृश्यता बड़ी। समाज में विषमता निर्माण हुई। अस्पृश्यता पालन की वजह से शूद्रातिशूद्र समझे जानेवाले लोगों को जानवरों से भी बत्तर ज़िंदगी बितानी पड़ती थी। भारत कई संस्थान में विभाजित था, एकता नही थी। कई राजा भोगविलासी थे । समाज में अस्पृश्यता बढ़ रही थी। उच्च जाति के लोग निम्न जाति के तरफ़ हिन नज़रियों से देखते थे । समस्या से शूद्रातिशूद्र की मुक्तता हो इसलिए शिक्षा की व्यवस्था की । प्रबोधन किया । अस्पृश्यता के कारणवश प्रशासन में शूद्रातिशूद्र को प्रतिनिधित्व न के बराबर... कानून बनाकर उन्हें प्रतिनिधित्व दिया । समाज में जाति के आधार पर प्रतिष्ठा थी कर्म पर नही। शूद्रातिशूद्र पराक्रमी हो तो भी उन्हें मान, सम्मान नही मिलता। जाति प्रबल बनती जा रही थी , अस्पृश्यता बढ़ रही थी । इस कारणवश रोटी बंदी,बेटी बंदी , व्यवसाय बंदी आदि परंपरा को राजर्षि शाहू महाराज ने तोड़ा।
       तत्कालीन समाज में सनातनी ब्राह्मण अस्पृश्यता पालन करते थे । शूद्रातिशूद्र को सार्वजनिक स्थानों,धर्मशाला,अस्पताल, स्कूलों, सरकारी ऑफिस आदि में प्रवेश नही था। मंदिर में प्रवेश नही था क्योंकि वे अछूत थे,शूद्र थे। उनके साथ जानवरों जैसा बर्ताव होता था। उन्हें नीच समझा जाता था। शूद्रातिशूद्र को सरकारी ऑफिस में लिया भी तो सनातनी ब्राह्मण उन्हें परेशान करते थे। इन समस्या पर हल निकालने के लिए राजर्षि शाहू महाराज ने कई कानून बनाए, सिर्फ़ बनाए नही उसका अमल किया।बहुजन समाज को न्याय दिया। छुआछूत के संदर्भ में राजर्षि शाहू महाराज ने 1919 में कानून बनाया जो निम्न तरह से है- "सभी सार्वजनिक इमारतों, धर्मशालाओं, अस्पतालों, अन्य सार्वजनिक रहने के स्थानों, स्कूलों,नदियों- तालाबों, सरकारी सरायघर आदि स्थानों पर छुआछूत का व्यवहार अमल में नही लाया जाएगा। जैसे क्रिश्चन सरकारी भवनों एवं सार्वजनिक स्थानों में अमेरिकन मिशन के डॉ. व्हेल एवं डॉ. वाॅनलेस सभी को एक समान समझते हैं तथा सभी के साथ समानता का व्यवहार करते है ठीक उसी प्रकार समानता का व्यवहार अछूतो के साथ भी किया जाएगा। ऐसी घटनाओं को रोकने की जिम्मेदारी गांव के अधिकारी की होगी। यदि ऐसी छुआछूत की घटनाए होती है तो उसकी जवाबदेही गांव के अधिकारियों की होगी और उन्हें ऐसी घटनाओं के लिए जिम्मेदार माना जाएगा ।"2 राजर्षि शाहू महाराज ने कानून बनाकर ,उसका अमल करके अस्पृश्यता नष्ट करने की कोशिश की। वर्तमान भारत में अस्पृश्यता नष्ट हुई लेकिन पूरी तरह से नही । मंदिर में प्रवेश मिला, सामाजिक न्याय की जीत हुई। लेकिन सनातनी ब्राह्मण महार , मांग, चमार जाति के लोगों के हाथों का बनाया खाना उनके घर जाकर नही खाते। यह अस्पृश्यता पालन नही है तो क्या है? अस्पृश्यता पालना कानूनन गुनाह है लेकिन तब भी समाज के सनातनी ब्राह्मण के विचार में, आचार में। अस्पृश्यता है। इन‌ परिस्थिति में। बदलाव करना है तो फुले, शाहू, आंबेडकर के विचार को समझकर आत्मसाथ करना होगा..

वतन खालसा
      प्राचीन काल से प्रचलित कई मिलकियत थे, कुछ अच्छे कुछ बुरे । बुरे मिलकियत के माध्यम से पिछड़े जाति का शोषण होता था। तत्कालीन समय कुलकर्णी, पाटिल, महार वतन प्रचलित थे। इन्ही के साथ हाजरी पद्धत, वेठवरळा पद्धत भी। इन के माध्यम से शूद्रातिशूद्र का शोषण होता था। हाजरी पध्दत के नाम पर कई काम मुफ्त में करने पड़ते थे। काम के लिए ना नही कह सकते थे। उनका निरंतर शोषण होता था। परिवार में किसी व्यक्ति की मृत्यु हो, तब भी काम पर जाना पड़ता था। पति की तबियत खराब हो तो उसकी जगह पत्नी को जाना पड़ता था। परिस्थिति का फायदा उच्च वर्ग के लोग उठाते थे । स्त्री का शारीरिक और मानसिक शोषण करते थे । इन समस्या के कारण समझकर राजर्षि शाहू महाराज ने महार, मांग व्यक्ति की हाजरी पद्धत कानून बनाकर बंद की। उन्हें गुलामी से मुक्ति दी। नई ज़िंदगी दी। उन्हें उनके हक्क दिए।
       कुलकर्णी मिलकियत के माध्यम से सनातनी ब्राह्मण शूद्रातिशूद्र का शोषण करते थे मानसिक और शारीरिक। महार, मांग,चमार जाति पर अत्याचार करते थे। राजर्षि शाहू महाराज ने कानून बनाकर 'कुलकर्णी वतन' 1918 में खारिज किया। कुलकर्णी वतन की जगह 'पटवारी' पद का निर्माण किया। इन पद पर बहुजन समाज के व्यक्तिओं की नियुक्ति की। बहुजन समाज को सामाजिक न्याय दिया। कुलकर्णी मिलकियत के संदर्भ में राजर्षि शाहू महाराज कहते है- "ग्राम पंचायत स्थापन करने में कुलकर्णी दिक्कत था। लोग अज्ञानी होंगे तब कुलकर्णी मिलकियत की आवश्यकता थी, लेकिन आज उसकी आवश्यकता नही है। अगर कुलकर्णी मिलकियत रखकर ग्राम पंचायत स्थापना की तो सभी सत्ता कुलकर्णी मिलकियत एवं उनके जातभाई के तरफ़ जाएगी और इसी कारण बहुजनों की हानी हो जाएगी।" 3 राजर्षि शाहू महाराज ने कानून बनाकर बहुजन समाज की गुलामी से मुक्तता की। वर्तमान भारत में मिलकियत तो नही लेकिन सनातनी विचार के लोग हैं। सनातनी ब्राह्मण वर्तमान में बहुजन वर्ग का धार्मिक, विचार के माध्यम से मानसिक,आर्थिक शोषण करते हैं। मुहूर्त, शांति, ग्रह प्रवेश, जन्म, मृत्यु आदि के माध्यम से शोषण करते हैं। इन धार्मिक विचार से मुक्तता चाहिए तो फुले ,शाहू, आंबेडकर के सामाजिक विचार पर चिंतन करने की जरूरत है। समाज जागृति की भी। तब बदलाव संभव है अन्यथा नही...।

अंर्तजातीय विवाह
       प्राचीन युग से समाज में वर्ण व्यवस्था अस्तित्व में थी। इस वजह समाज में जातिभेद,उच-निचता प्रचलित थी।अंतरजातीय विवाह को मान्यता नही थी। वर्तमान में न के बराबर... जातिभेद कम हो इसलिए राजर्षि शाहू महाराज ने अंतरजातीय विवाह को प्रोत्साहन दिया । कानून बनाए। समाज में अंतरजातीय विवाह से समानता निर्माण होगी ऐसी धारणा शाहू महाराज की बनी थी ।उन्होंने कार्य की शुरुआत खुद से की। राजर्षि शाहू महाराज ने अपने भाई 'काकासाहब' की बेटी 'चंद्रप्रभा' का विवाह इंदौर के 'युवराज यशवंत राव' होळकर से किया। समाज उच्च वर्ग का अनुकरण करता है इसलिए उन्होंने प्रयत्न किए। उनका आदर्श सामने रखकर तत्कालीन समय पच्चीस मराठा- धनगर विवाह हुए। इस तरह से समाज परिवर्तन का कार्य वे करते रहे। अंतरजातीय विवाह के संदर्भ में राजर्षि शाहू महाराज कहते है-"जो स्त्री अठराह वर्षो की आयु पुरी करती है उसे विवाह के लिए पिता या पालनकर्ता की सहमति की आवश्यकता नही है। स्त्री को जीवनसाथी चुनने का स्वातंत्र्य है ।"4 वर्तमान भारत में अंतरजातीय विवाह करना गुनाह समझा जाता है कानून होकर भी। कोई व्यक्ति अंतरजातीय विवाह करता है तो समाज उसे स्विकाराता नही। परिवार भी... समाज में सम्मान नही मिलता। समाज में समता के बजाय विषमता फैलती है। संविधान में अंतरजातीय विवाह के लिए मान्यता है लेकिन समाज में नही। इन स्थिति को बदलना है तो सनातनी लोगों की मानसिकता बदलनी होगी तब परिवर्तन संभव संभव है अन्यथा न के बराबर...

विधवा विवाह
       बालविवाह प्रथा प्राचीन थी। बाल विवाह के वजह से विधवा समस्या शाप बनकर उभरी। तत्कालीन समय विधवा विवाह नही होते थे। कोई कोशिश करे तो समाज मान्यता नही देता था । धर्म शास्त्रों के अनुसार विधवा स्त्री को विवाह का अधिकार नही था। समाज विधवा स्त्री का कई माध्यम से शोषण करता था। वह परिवार में सुरक्षित नही थी, समाज की बात तो बहुत दूर। उनकी ज़िंदगी नरक से बत्तर थी। इन समस्या पर राजर्षि शाहू महाराज ने प्रहार किए। इन प्रथा के विरुद्ध में 'विधवा पुनर्विवाह कानून' 1917 में बनाया। स्त्री को सनातनी विचार से मुक्त किया । राजर्षि शाहू महाराज विधवा विवाह के संदर्भ में कहते है-" जब पुरुष पत्नी के मरने पर दूसरी शादी कर लेता है तो फिर औरत को भी विधवा होने पर भी पुनः विवाह का अधिकार होना चाहिए।"5 इन कार्य से उनकी नारी के प्रति आस्था क्या थी समझ में आता है। वर्तमान भारत में विधवा की दयनीय स्थिति है ।आज भी वह दूसरा विवाह करने के लिए डरती है। इच्छा होकर भी। उन्हें अकेली को ज़िंदगी जीनी पड़ती है। समाज के कई लोग विधवा की तरफ़ हिन दृष्टि से देखते हैं। उसके माता, पिता गुज़र जाने के बाद उसका भाई भी उसे सहारा नही देता । वह सिर्फ़ प्रेम मांगती है पैसा नही, वह भी उसे नही मिलता। वह खुद के बच्चे का सहारा लेकर जीती है । इन परिस्थिति में परिवर्तन होना जरूरी है । इसलिए वर्तमान में राजर्षि शाहू महाराज के विचारों की सख्त जरूरत है।

देवदासी प्रथा
       प्राचीन काल में लड़की का विवाह ईश्वर से करने की बुरी पद्धत अस्तित्व में थी। इस प्रथा के कुछ अंश वर्तमान में दिखाई देते है। समाज में इन प्रथा की वजह से जोगिणि, मुरळी, देवदासी, भावीण आदि प्रकार का वर्ग अस्तित्व में आया। उन स्री को मां, बाप घर में नही रखते थे ओर न उसे किसी प्रकार का उत्तराधिकारी माना जाता। स्री वर्ग के लिए देवदासी प्रथा महाशाप थी। स्त्री का जीना मुश्किल हो गया था। समस्या से स्त्री की मुक्ति हो इसलिए राजर्षि शाहू महाराज ने ' देवदासी प्रतिबंध कानून' 1920 में बनाया । स्त्री को धार्मिक गुलामी से मुक्त किया। स्त्री को उनके हक्क दिए। देवदासी प्रथा के संदर्भ में राजर्षि शाहू महाराज कहते है-" पाप के आश्रय यानी मंदिरों में देवदासी के मिलने वाले देवस्थान के अधिकार ही बंद करो। जब आश्रय ही जला दिया तो देवदासी कोई होगा क्यों?"6 राजर्षि शाहू महाराज ने कानून बनाकर उन्हें माता, पिता के संपत्ति में हक्क दिया । उन्हें न्याय देने की कोशिश की। वर्तमान भारत में ईश्वर के नाम पर लड़की को छोड़ा जाता है लेकिन कम मात्रा में। मंदिर के कुछ पुजारी उनका शोषण करते हैं।वह किसी को बता भी नही पाती। इन नीच पद्धति को जड़ से समाप्त करना है तो राजर्षि शाहू महाराज के सामाजिक विचार को समझना होगा। उसे आत्मसाथ भी करना होगा, तब आने वाले समय में क्रांति जरूर होगी।

तलाक
       बाल विवाह के वजह से तलाक समस्या तत्कालीन समय उभर कर सामने आयी। लड़की की उम्र कम होने से उनकी सोच कम थी । उनके विचार पति की विचार से नही मिलते। इस कारणवश वाद-विवाद होते थे। इसी से तलाक समस्या का निर्माण हुआ । तलाक दिए स्त्री से दूसरा व्यक्ति शादी नही करता था। पुरुष की शादी होती थी । लेकिन स्री का जीवन संघर्ष से भरा रहता था। उन्हें समाज से झगड़ना पड़ता था। वह समाज की शिकार होती थी । इन समस्या पर हल निकले इसलिए राजर्षि शाहू महाराज ने 'विवाह विच्छेद कानून' 1919 में बनाया । इसके माध्यम से तलाक दिए स्त्री का संरक्षण,बच्चों की शिक्षा व्यवस्था हुई। स्त्री को मदद मिली । इसी के साथ स्री को वारिस हक्क बहाल किया। उन्हें पति, मां, बाप के संपत्ति में हिस्सा मिला। उन्हें जीने की नई दिशा मिली। वर्तमान भारत में तलाक समस्या भीषण समस्या के रूप में सामने आ रही है। तलाक से सिर्फ़ स्री का जीवन बर्बाद नही होता बल्कि उनके बच्चों की ज़िंदगी बिखर जाती है । न्यायालय में तलाक एवं वारिसा हक्क के कई मामले दर्ज़ है। हर स्री को न्याय नही मिलता। मिलती है सिर्फ़ तारीख पे तारीख । उनकी पूरी ज़िंदगी गुज़र जाती है लेकिन उसे न्याय नही मिलता, यह वर्तमान वास्तव। इन स्थिति को बदलना है तो शाहू कालीन क्ष न्याय व्यवस्था को‌ समझना होगा। उनके विचार को भी... निष्कर्ष रूप में इतना ही कहना चाहता हूं कि फुले, शाहू , अंबेडकर ने सामाजिक न्याय के लिए जीवन के अंत तक कार्य किए। समाज में बदलाव लाया। लेकिन वर्तमान में सामाजिक न्याय के कई प्रश्न उभर रहे है। उसे समझ कर उसका हल निकालने की कोशिश करनी चाहिए। जो कार्य अधूरा दिख रहा है उसे पूरा करने की कोशिश करे । उनके विचार को निरंतर आत्मसाथ करे। उनके विचार जीवित रखे‌। महापुरुष के सपनो का भारत निर्माण हो, तब उनके आत्मा को शांति मिलेगी। शोध आलेख लिखने का उद्देश्य भी सफल होगा...।

संदर्भ सूची

1. विनय कुमार वासनिक- शाहूजी महाराज के ऐतिहासिक भाषण,पृ.101
2.विजयकुमार त्रिशरण- छत्रपति शाहूजी महाराज सामाजिक लोकतंत्र के भीमस्तम्भ, पृ.17
3.धनंजय कीर- राजर्षी शाहू छत्रपती,पृ.376
4.पदमा पाटिल- (अनुवादक), जयसिंगराव पवार (मूल लेखक)- राजर्षि शाहू छत्रपति एक समाजक्रांतिकारक राजा,पृ.124
5.श्यामसुंदर सिंह - छत्रपति शाहूजी महाराज संघर्ष और इतिहास,पृ.277
6.संजीव- प्रत्यंचा,पृ.140

संक्षिप्त परिचय
इमेल: rvadhekar@gmail.com
पता:  हिंदी विभाग,डाॅ.बाबासाहेब आंबेडकर मराठवाडा विश्वविद्यालय,औरंगाबाद- (महाराष्ट्र-431004)
लेखन: चरित्रहीन कहानी, विवरण पत्रिका में प्रकाशित)भाषा,विवरण, शोध दिशा,अक्षर वार्ता,गंगनाचल,युवा हिन्दुस्तानी ज़बान, साहित्य यात्रा आदि पत्रिकाओं में लेख तथा संगोष्ठियों में प्रपत्र प्रस्तुति।
संप्रति: शोध कार्य में अध्ययनरत।
मो.9022561824

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