इस अंक के रचनाकार

इस अंक के रचनाकार आलेख : साहित्य में पर्यावरण चेतना : मोरे औदुंबर बबनराव,बहुजन अवधारणाः वर्तमान और भविष्य : प्रमोद रंजन,अंग्रेजी ने हमसे क्या छीना : अशोक व्यास,छत्तीसगढ़ के कृषि संस्कृति का पर्व : हरेली : हेमलाल सहारे,हरदासीपुर दक्षिणेश्वरी महाकाली : अंकुुर सिंह एवं निखिल सिंह, कहानी : सी.एच.बी. इंटरव्यू / वाढेकर रामेश्वर महादेव,बेहतर : मधुसूदन शर्मा,शीर्षक में कुछ नहीं रखा : राय नगीना मौर्य, छत्तीसगढ़ी कहानी : डूबकी कड़ही : टीकेश्वर सिन्हा ’ गब्दीवाला’,नउकरी वाली बहू : प्रिया देवांगन’ प्रियू’, लघुकथा : निर्णय : टीकेश्वर सिन्हा ’ गब्दीवाला’,कार ट्रेनर : नेतराम भारती, बाल कहानी : बादल और बच्चे : टीकेश्वर सिन्हा ’ गब्दीवाला’, गीत / ग़ज़ल / कविता : आफताब से मोहब्बत होगा (गजल) व्ही. व्ही. रमणा,भूल कर खुद को (गजल ) श्वेता गर्ग,जला कर ख्वाबों को (गजल ) प्रियंका सिंह, रिश्ते ऐसे ढल गए (गजल) : बलबिंदर बादल,दो ग़ज़लें : कृष्ण सुकुमार,बस भी कर ऐ जिन्दगी (गजल ) संदीप कुमार ’ बेपरवाह’, प्यार के मोती सजा कर (गजल) : महेन्द्र राठौर ,केशव शरण की कविताएं, राखी का त्यौहार (गीत) : नीरव,लाल देवेन्द्र कुमार श्रीवास्तव की नवगीत,अंकुर की रचनाएं ,ओ शिल्पी (कविता ) डॉ. अनिल कुमार परिहार,दिखाई दिये (गजल ) कृष्ण कांत बडोनी, कैलाश मनहर की ग़ज़लें,दो कविताएं : राजकुमार मसखरे,मंगलमाया (आधार छंद ) राजेन्द्र रायपुरी,उतर कर आसमान से (कविता) सरल कुमार वर्मा,दो ग़ज़लें : डॉ. मृदुल शर्मा, मैं और मेरी तन्हाई (गजल ) राखी देब,दो छत्तीसगढ़ी गीत : डॉ. पीसी लाल यादव,गम तो साथ ही है (गजल) : नीतू दाधिच व्यास, लुप्त होने लगी (गीत) : कमल सक्सेना,श्वेत पत्र (कविता ) बाज,.

शनिवार, 29 अक्तूबर 2022

शीर्षक में कुछ नहीं रखा

राम नगीना मौर्य

‘‘देखिये! लिखा तो अब तक बहुतों ने है, बेशक...लिख भी रहे हैं, और सभी के लेखन में कुछ - न - कुछ छोटे - बड़े संदेश होते ही हैं। कहीं प्रत्यक्ष, तो कहीं परोक्ष रूप में। बस्स...उन्हें पकड़ना अर्थात् समय रहते जानने - समझने की दरकार होती है। लेकिन मैं चाहता हूं कि ऐसी कहानी लिखी जाय, जो नौजवानों की हालिया समस्याओं का गहनता से पड़ताल करे। इस पावन धरा - धाम पर उनके समक्ष आने वाली दैनन्दिन की चुनौतियों को दुनिया के सामने मजबूती से रखते, उनका सम्यक् समाधान प्रस्तुत करे। ताकि आने वाले समय में अव्वल तो उन्हें मुश्किलों का सामना करना ही न पड़े, और खुदा ना ख्वास्ता मुश्किलें आ भी गयीं, तो वे उनका मुकाबला करने से पीछे न हटें। बोले तो...हँसते - हँसते, उनका डटकर सामना करें।’’
‘‘तो दिक्कत क्या है ? ’’
‘‘ एक्‍चुवॅली, मैंने इन्हीं सब मुद्दों के मद्देनजर, इन्हीं मुश्किलातों से टकराती - मुठभेंड़ करती हुई एक ठो दिलफरेब कहानी लिखी है, परन्तु कोई सटीक, बोले तो लल्लन - टॉप शीर्षक नहीं जम रहा, जो एक झटके में ही पाठकों के दिलोदिमाग में घर कर जाये। काफी पहले लिखा था। बीच - बीच में कुछ पात्र, घटनाएं, प्रसंग आदि घटते - बढ़ते भी रहे, लेकिन काट - छांट ज्यादा हो जाने, कथ्य, भाषा, शीर्षक, विषयवस्तु, प्रस्तुतिकरण आदि से जुड़ी कतिपय दुविधाओं, अयाचित बाधाओं आदि के कारण कहीं प्रकाशनार्थ भेज नहीं पाया। अब आप ही कुछ मार्गदर्शन करें।’’ पदारथ जी और  लोलारक बाबू वर्षों पुराने दोस्त है। एक ही कॉलोनी में रहते हैं। मॉर्निंग - वॉक के लिए रोजाना साथ निकलते हैं। आज मॉर्निंग - वॉक से लौटने के बाद पदारथ जी के दीवानखाने में आराम करने के तईं हमेंशा की तरह जब उनकी बैठकी हुई, तो चाय की चुस्कियांॅ लेते हुए पदारथ जी ने लोलारक बाबू के सामने अपनी यह गुरू - गम्भीर समस्या रखी।
- ‘‘देखिये! आप तो बखूबी वाकिफ  होंगे। अमूमन लेखक को अपने लेखन के दौरान एक तरह से सम्पादक, पाठक, समीक्षक, आलोचक आदि की भी भूमिका निभानी ही होती है। ऐसे में वो देश - काल - स्थिति - परिस्थिति अनुसार, गाहे - बगाहे अपनी रचनाओं में काट - छांट, अदलाव भी करता रहता है। साहित्यजगत में कथ्य, भाषा, शीर्षक, विषयवस्तु, प्रस्तुतिकरण आदि को लेकर आजकल खेमेबाजी, गुटबाजी, भावनाएं आहत होने का भी प्रचलन खूब है। कभी - कभी तो गुटों, खेमों, गढ़ों और मठों में बहिष्कार, स्वीकरण आदि का टंटा, लफड़ा आदि भी अलग से झेलना पड़ सकता है। मैं तो कहूंगा कि आप किसी लल्लन - टॉप शीर्षक आदि के चक्कर में मत पड़िये। मेरा मानना है कि एक लेखक को अपनी कहानियों के शीर्षक खुद ही चुनने चाहिये। कहानी आप लिखें, और शीर्षक कोई दूसरा चुने, बात कुछ हजम नहीं हुई। सुना होगा आपने भी कि फलाने ... नये - नवेले लेखक ने बड़ी मेहनत से अपना पहला उपन्यास लिखा, और शीर्षक चुनने के लिए शहर के चिलाने...स्वनामधन्य किसी बड़े उपन्यासकार के पास पहुंच गये। उन ‘तथाकथित बड़े वाले’ ने बड़ा सा नाम सुझाया, और नये नवेले ने उनके ही सुझावानुसार नाम से अपना वह उपन्यास प्रकाशित भी करवाया। लेकिन वो नये - नवेले साहब उस शीर्षक से कभी संतुष्ट नहीं हुए। कालान्तर में, शहर में आयोजित होने वाले इस या उस गोष्ठियों, सेमिनारों आदि में कभी वक्ता, तो कभी मुख्य या विशिष्ट अतिथि के रूप में शामिल होने पर या कभी इस या उस पत्रिका आदि में गाहे - बगाहे छपने वाले अपने साक्षात्कारों में इसे उन्होंने तहेदिल से स्वीकारा भी। लब्बोलुबाब...उपयुक्त शीर्षक चयन न कर पाने की पीड़ा मन में लिये वे ताजिन्दगी पछताते, खुद को कोसते रहे।’’
- ‘‘काहे...? थोड़ा तफसील से खुलासा कीजिए।’’
- ‘‘नये - नवेले को हमेशा ही यह लगा कि तत्समय के ज्वलंत और गुरू - गम्भीर विषय पर लाजवाब लेखन के वाबजूद उनके साथ न्याय नहीं हुआ, तो उसका एकमात्र कारण वह शीर्षक ही रहा। उस शीर्षक में कोई अपील, कोई आकर्षण नहीं था। लोगों ने उस उपन्यास को गम्भीरता से नहीं लिया, जबकि उसके कण्टेंट्स लाजवाब, जोरदार थे। भाषा - शैली, कथ्य में मौलिकता कूट - कूट कर भरी हुई थी। कुछ लोग तो यह भी कहते हैं कि ‘बड़का’ लेखक लोगों ने रणनीति के तहत नये नवेले के साथ ‘खेल’ कर दिया था। बहरहाल...आपका शुभेच्छु हूं , तो सही राय - मश्विरा देना अपना फर्ज समझता हूं। बाकी, मानना - न - मानना आप पर निर्भर करता है। मेरी मानिये तो...आप भी अपने लेखन से न्याय कीजिये, और अपनी कहानी का शीर्षक - फीर्षक किसी और से पूछने के बजाय स्वयं ही चुनिय ‘‘काहे...? थोड़ा तफसील से खुलासा कीजिए।’’
- ‘‘नये - नवेले को हमेशा ही यह लगा कि तत्समय के ज्वलंत और गुरू - गम्भीर विषय पर लाजवाब लेखन के वाबजूद उनके साथ न्याय नहीं हुआ, तो उसका एकमात्र कारण वह शीर्षक ही रहा। उस शीर्षक में कोई अपील, कोई आकर्षण नहीं था। लोगों ने उस उपन्यास को गम्भीरता से नहीं लिया, जबकि उसके कण्टेंट्स लाजवाब, जोरदार थे। भाषा - शैली, कथ्य में मौलिकता कूट - कूट कर भरी हुई थी। कुछ लोग तो यह भी कहते हैं कि ‘बड़का’ लेखक लोगों ने रणनीति के तहत नये नवेले के साथ ‘खेल’ कर दिया था। बहरे।’’
- ‘‘हाँ, वो तो ठीक है। शीर्षक पर अंतिम मुहर तो मेरी ही होगी। तो भी, फिर भी, चूंकि आप मेरे दोस्त हैं, ऐसे में कुछ खास - खास पहलुओं पर आपसे महत्वपूर्ण सुझाव की उम्मीद तो कर ही सकता हूँ? एक्‍चवॅली, मेरी रचना में नौजवानों के द्वारा, नौजवानों के लिए, नौजवानों को, उनके उज्ज्वल भविष्य को देखते हुए कुछ मूलभूत संदेश देने का अभिनव प्रयास किया गया है।’’
- ‘‘अब दोस्ती का हवाला देते आप इतना कह रहे हैं तो...कुछ - न - कुछ सोचता हूं...। अगर आज की पीढ़ी को ध्यान में रखकर लिख रहे हैं तो ‘नौजवानों के लिए आशा की किरण’ कैसा रहेगा?’’
- ‘‘ठीक तो है, मैंने भी कुछ ऐसा ही सोचा था। लेकिन इस शीर्षक में पूरी बात नहीं आ रही है। अधूरेपन का सा अहसास हो रहा है। ऐसा लग रहा है, जैसे यह किसी बल, बुद्धिवर्द्धक - औषधि का प्रचार कैप्शन हो ? जबकि मेरी कहानी में तो बच्चों, बुजुर्गों यहाँ तक कि महिलाओं को भी प्रेरित करने, आगे बढ़ने के लिए अनगिनत संदेश छुपे हैं। इसमें उन्हें भी पग - पग पर आशा की किरण दिखेगी। मेरी रचना हर वर्ग का प्रतिनिधित्व करती है। मैं चाहता हूं कि जब लोग इसे पढ़ें, तो तमाम लोक - लुभावनी बातों से मोहाविष्ट हो इधर - उधर भटकने के बजाय,सीधे मुद्दे की बात करना सीख जायें। अपना भला - बुरा खुद समझ सकें। विघ्नसंतोषियों के भुलावे में आकर, दिग्भ्रमित न हों। बोले तो...उन्हें गारण्टीशुदा समाधान मिले।’’
- ‘‘तब तो आपकी कहानी में ही इसका शीर्षक छुपा बैठा है...‘गारण्टीशुदा समाधान’...कैसा रहेगा ? वैसे भी, कहानी में कितनी भी लन्तरानियांॅ बतियाइये, उसे किसी खास मुद्दे के इर्द-गिर्द ही चक्कर काटते रहना चाहिए। बोले तो...मूलभूत संदेश बिन्दु से विचलन या भटकाव किसी भी कहानी को कमजोर करते हैं। यदि कहानी में ‘फिल इन द ब्लैंक’ या विस्तार देने के लिए थोड़े - बहुत भटकाव की जरूरत हो, तो भी, फिर भी...दाल में नमक बराबर ही होना चाहिए। अर्थात् बीच - बीच में थोड़ी - बहुत छूट ली जा सकती है। लेकिन, शुरूआत और मध्य की तरह अन्ततः किसी भी कहानी का उपसंहार तो होता ही है। परन्तु यह कहां, कैसे और किस रूप में होगा? कहानी का सारा दारोमदार इन्हीं कुछ मूलभूत अवयवों आदि पर निर्भर होता है। इसी से शीर्षक की सार्थकता सिद्ध होती है, और लेखक की भाव - प्रवणता, उसका विवेक, उसकी परिपम्ता भी। कहा भी जाता है कि कहानी का अंत ऐसा होना चाहिए कि लोगबाग अश - अश कर बैठें। पढ़ने वाला कुछ समय के लिए ट्रांस की स्थिति में चला जाय। कहानी के पात्र, घटनाएं वर्षों न सही, एकाध महीनें तक तो पाठकों के दिलो - दिमाग में हाण्ट करते ही रहें। कहानी का हैंगओवर मुश्किल से उतरे। पढ़ते ही पाठक के मन में अनेकानेक चुभते - तीखे सवाल उठने लगे। यथास्थिति के बजाय, वो अपने मन में उठते उन अनुत्तरित सवालों के जवाब पाने, अपने आसपास को बदलने के लिए बेचैन हो उठे। वो कहानी गली - चौराहों, नुक्कड़ों आदि पर चर्चा - विमर्श का ज्वलंत मुद्दा बन जाये, या...कभी - कभी रचनाकारों के बीच ईर्ष्या का कारण भी। लोगबाग फोटो प्रतियांॅ, पीडीएफ  प्रतियांॅ मांगने को लालायित हो जायें। एक - दूसरे को पढ़वाने में खुद को गौरवान्वित महसूस करें। मोटा - मोटी कहंूॅ तो तहलका मच जाये। अतीत में ऐसे तमाम उदाहरण मौजूद हैं। वैसे...‘सुलगते सवाल, धधकते जवाब’ शीर्षक कैसा रहेगा?’’
- ‘‘यार! आप तो तिल का ताड़ बनाये दे रहे हो। मेरी कहानी किसी तरह के सवाल - जवाब पर आधारित नहीं है, और न किसी चैनल पर प्रसारित होने वाले गरमा - गरम बहसा - बहसी टाइप ‘न्यूज - ऑइटम’ या कोई ‘चैट-शो’ है। मैं कोई सेलिब्रिटी थोड़े न हूं ? एक मामूली से महकमें में अदना सा बाबू ही तो हूं । मुझे कौन और क्यों घास डालेगा? आप समझे नहीं। वैसे भी ‘सुलगते - धधकते’ जैसी शब्दावलियां मेरी रचना सामग्री के मजमून में सटीक भी नहीं बैठतीं। मैं तो अत्यन्त कोमल विचार वाला, अपनी बातें कोमलतापूर्वक रखने वाला एक अदना सा लेखक हूं ।’’
- ‘‘सुना होगा आपने भी कि शीर्षक छोटा हो, कैची - स्लोगन टाइप आकर्षक हो, अद्वितीय हो, और सबसे बढ़कर, पग - पग पर कहानी का पूर्णतया प्रतिनिधित्व करता हो। ‘मिलें या लिखें’ यह शीर्षक कैसा रहेगा ?  छोटा है और आकर्षक भी। ‘स्माल इज ब्यूटीफुल’ किताब का नाम तो सुना ही होगा?’’
- ‘‘ हां , आप कह तो ठीक रहे हैं, लेकिन ध्यान दीजिए तो इससे ऐसा रिफ्लेक्ट हो रहा है, मानो मैंने कोई ‘कौंसिलिंग - सेण्टर’ खोल रखा हो, जिसमें मिलने वालों से उनके बारे में पूर्ण विवरण, जवाबी लिफाफे के साथ भेजने की चिरौरी, कुछ इस तरह कर रहा होऊॅ, जैसे मेरे पास जीवन - रहस्य से जुड़ी, गूढ़ विद्याएं सिखाने का कोई सौ - फीसद फुलफ्रूफ...हिट फार्मूला छुपा है,और मुझसे मिलते ही लोगों के वारे - न्यारे हो जायेंगे। मैं यह नहीं चाहता कि लोगबाग मेरी कहानी पढ़कर, मुझे कोई ‘पहुंचा हुआ’ श्रीमान परामर्शदाता या अपना ‘सो-कॉल्ड थिंकटैंक’ समझते, दिनों - रात फोन - फान करते, अपनी समस्याओं का समाधान पूछते, मेरा जी - हलकान करते फिरें। आखिर, मेरी कोई ‘पर्सनल-लाइफ ’ है कि नहीं ? मेरे दो छोटे - छोटे बच्चे, एक सांवली - सलोनी, गृहकार्य दक्ष, दरमियाना कद बीवी, साथ ही कार्यस्थल के रोज - रोज के तनाव भी तो हैं। तिस पर मेरे जीवन के भी कुछ लक्ष्य, उद्देश्य और अरमान भी हैं।’’
- ‘‘आपने अच्छा याद दिलाया...‘जाग उठे अरमान’...यह शीर्षक कैसा रहेगा? इसमें पाठकों को निश्चय ही हर्फ- दर - हर्फ, पन्ना - दर - पन्ना, आगे जानने की उत्कण्ठा बनी रहेगी। और जैसा कि आप कह चुके हैं, कहानी के अंत में आपने मूलभूत समस्याओं का गारण्टीशुदा इलाज भी बताने का प्रयास किया है।’’
- ‘‘यार, आप समझ नहीं रहे हो। मेरे लिखने का उद्देश्य किसी मूलभूत समस्या का गारण्टीशुदा इलाज - फिलाज बताना नहीं है, और न कुछ सिद्ध करने की कवायद ही है। मैंने तो कुछ ऐसा लिखा है कि मॉगने के बजाय, लोगबाग किताब खरीदकर पढ़ें। वो अपने संग्रह में, अपनी व्यक्तिगत लायब्रेरी में ऐसी किताब खरीदकर रखें, और गाहे - बगाहे उस किताब की धूल झाड़ते, उन्हें दुहराते - तिहराते पढ़ें...लोगों को पढ़ाएं भी। अपने जीवन में खुशियों की बहार लाने वास्ते कुछ वैसा ही बनने, वैसे ही गुर सीखने का प्रयास करें। मुश्किलों के आगे हथियार न डालें। एकदम बुलडोजर इरादे के साथ आगे बढ़ें।’’
- ‘‘घर बैठे सिर्फ एक हफ्ते में बुलडोजर बनाना सीखें और लाखों कमायें’ या ‘बुलडोजर के आगे - पीछे’ ये शीर्षक कैसे रहेंगे?’’
- ‘‘यार लोलारक, आप भी गजब करते हो। लगता है आप मेरे लेखन को सीरियसली नहीं, बल्कि हल्के में ले रहे हो। गहराई में नहीं उतर पा रहे हो। मेरे भावनाओं की कद्र नहीं कर पा रहे हो। मैं कहानी लिख चुका हूं। उसमें शुद्ध साहित्यिक नजरिये से अपनी बात रखना-कहना चाहता हूं । यह कोई विज्ञान या तकनीक के विकास से सम्बन्धित निबन्ध या लेख नहीं है। मेरी कहानी में हर उम्र, तबके के लोगों के साथ संवाद स्थापित करने का सार्थक और जीवन्त प्रयास किया गया है। साथ ही हमारा मकसद तो...पाठकों को प्रेरित करने और लोगों के हल्के-फुल्के मनोरंजन से है। इसे स्वान्तःसुखाय भी कह सकते हैं। मेरे लेखन का उद्देश्य भी यही रहा कि जो भी पढ़े, आगे बढ़ने के लिए स्वयं तो प्रेरित हो ही, बीस-पच्चीस और लोगों को प्रेरणा टाइप कुछ देता फिरे। बोले तो...सामने वाले को बदतर से बेहतर स्थिति, प्राप्त करने में अभूतपूर्व सहायता मिले। शीर्षक तो इस कदर ‘एवरग्रीन’ होना चाहिए कि हर कालखण्ड में मौजूं लगे। एक ही बैठकी में पढ़ने की उत्कंठा जगाये। पढ़ते ही पाठकों के मन में कुछ बनने, शून्य से शिखर तक पहुंचने, कुछ कर गुजरने की इच्छा बलवती हो उठे।’’
- ‘‘शून्य से शिखर तक’ यह शीर्षक कैसा रहेगा?’’
- ‘‘है तो ठीक, परन्तु इससे ऐसा भान हो रहा है, मानो हमारा लेखन, पाठकों को कोई ऐसा ‘बिजनेस-आइडिया’ बताने वाला हो, जिसे पढ़ने के बाद वे रातों-रात अरबपति हो जायेंगे। जबकि आज के समय में पढ़ने वालों का किस कदर टोटा है, आपसे छुपा नहीं है। हम तो चाहते हैं कि पढ़ने वाला लस्टम-पस्टम, खालीपन, अकेलेपन से जूझने के बजाय, अललबछेड़ा, चरैवेति-चरैवेति टाइप या अल्लटप्पू-सा बना रहे। ट्वेण्टी फोर इन्टू सेवेन ऑवर व्यस्त रहे, मस्त रहे।’’
- ‘‘फिर तो...‘लस्टम-पस्टम-त्रस्तम से व्यस्तम-मस्तम’ ही ठीक रहेगा।’’
- ‘‘शीर्षक तो ठीक है, लेकिन देखने में बड़ा है, जो कि रचनावी दुनिया के लिए अमूमन मायने भी रखता है। फिर...जरूरी तो नहीं कि हर पाठक खुद को व्यस्त या मस्त रखने वास्ते ही पढ़ता - लिखता हो। कुछ ऐसे भी होते हैं, जिनकी आजीविका ही पढ़ने - लिखने से चलती है। फिर, मेरे लेखन का उद्देश्य यह भी है कि पढ़ने वाला सिर्फ पढ़ने के लिए ही न पढ़े, बल्कि बीच-बीच में अपनी माली हालत सुधारने वास्ते भी प्रेरित हो। कम-अज-कम उसके पास एक ठो चौड़ी सी कार, बंगला, रिहायशी प्लॉट भले न सही, थोड़ी जमीन तो हो ही, ताकि उसे कोई ‘बेचारा’ टाइप ‘ट्रीट’ न करे।’’
- ‘‘फिर तो, ‘कंगाली से जंजाली भली’ शीर्षक ही ठीक रहेगा। वैसे भी आज के जमाने में दैनन्दिन के टिटिम्में, भौतिक वस्तुएं आदि जुटाना किसी जंजाल से कम है क्या? देखा जाय तो, आज के गलाकाट प्रतिस्पर्धा वाले तुमुल कोलाहल से दौर में जहां हर कोई अपने से आगे वाले को रौंदकर, कुचलकर सरपट आगे निकलना चाहता हो, तो ऐसे में जरूरी यह भी है कि हमारा तरीका पारदर्शी, ईमानदारी वाला हो। यही वक्त की मांग भी है। दुनिया कुछ भी करे - कहे, आखिर किसी को तो शुरूआत करनी होगी न...? अन्यथा कुछ भी हासिल कर लेने की कोई सीमा नहीं है। यह तो आप भी जानते होंगे...खाली हाथ आये हैं, खाली हाथ ही जाना है। आखिर, कहीं तो इन्सान को सुकून के दो पल मिलने चाहिए कि नहीं ? आपने महसूस किया होगा, कभी - कभी जीत से ज्यादा हार भली लगती है। पाने से ज्यादा खोने में सुकून मिलता है। वैसे यह ‘खोया - पाया’ शीर्षक कैसा रहेगा?’’
- ‘‘भला यह भी कोई शीर्षक हुआ? यह तो किसी व्यक्ति या वस्तु के गुमशुदा होने पर पत्रों, अखबारों में दिये गये विज्ञापन के शीर्षक सरीखा लग रहा है। शीर्षक तो कुछ साहित्यिक ‘टॅच’ वाला ही होना चाहिए।
- ‘‘फिर तो आप ऐसा कीजिए, अपनी सुविधा देखकर और जिसमें आप सहज महसूस करते हों, कोई भी भला सा शीर्षक रख लीजिए। वैसे भी शीर्षक से कौन बड़ा भारी फरक पड़ने वाला है? असल तो कंटेण्ट होता है। भाषा-शैली होती है। अभिधा-व्यंजना-लक्षणा होते हैं। शीर्षक को तो आप जैसों ने ही तोप इशू बना रखा है। सुना होगा आपने भी...कितनी ही कहानियांॅ, उपन्यास आदि चर्चित, पुरस्कृत जरूर हो जाते हैं, लेकिन...अपठनीय भी रह जाते हैं। नेपोलियन ने तो कहा भी था कि ‘नाम में क्या रखा है?’’
- ‘‘लेकिन सर जी, ये बात तो नेपोलियन ने नहीं, शेक्सपियर ने कही थी।’’
- ‘‘की फरक पैंदा ए...? थे तो दोनों ही विदेशी नस्ल के न...? हें-हें-हें।’’
- ‘‘वैसे...कुछ भी कहिये, आपकी प्रत्युत्पन्नमतित्वता तो किसी को भी हैरान कर देने वाली है। इधर मैंने समस्या दरपेश की, उधर आप तड़ से शीर्षक रूपी समाधान लेकर हाजिर हो गये। आपका यह अतियथार्थवादी दृष्टिकोण सचमुच काबिलेतारीफ है।’’
- ‘‘आजकल लोग लिख ज्यादा रहे हैं, पढ़ कम रहे हैं। लगभग रोज ही कोई-न-कोई किताब लांच हो रही हैं। इधर बीच कंटेण्ट्स से लबरेज ढ़ेरों रचनाएं आयी हैं। लेकिन सुधी पाठकों को उस सीमा तक चमत्कृत, सम्मोहित नहीं कर पाईं, जैसी कि उम्मीद का जा रही थीं। बोले तो...नाम बड़े और दर्शन छोटे। वैसे मेरा सुझाव है कि आप लिखने से पहले कुछ पढ़िये, और ढंग का पढ़िये। साथ ही कम-अज-कम...दो-ढाई सौ शब्द रोज लिखने की प्रैक्टिस भी। क्या पता आपको उन्हीं में से कोई धड़ाम-धकेल शीर्षक मिल जाये? आजकल तो रचनात्मक लेखने के लिए क्लॉसेज भी चलने लगी हैं। ‘लेखक बने सिर्फ नब्बे घण्टों में, या ‘राइटर्स इन ट्वेण्टी डेज’ टाइप कै्रशकोर्स चलने लगे हैं। ढेरों ‘एप’ भी आ गये हैं। डाउनलोड कीजिए। आगे बढ़िये। मिन्टों का काम सेकेण्डों में निबटाइये।’’
- ‘‘ये बातें तो आपने मार्के की कही।’’
- ‘‘आपको लग रहा होगा...शीर्षक ऐसा होना चाहिए कि पढ़ने वाला ‘यूरेका-यूरेका’ या ‘मिल गया समाधान’ टाइप कुछ ऐसा ही कहते चिल्ला उठे। लेकिन मत भूलिए कि ये नाम काफी प्रचलित हैं। शीर्षक तो कुछ ऐसा होना चाहिए कि पढ़कर, सुनकर नव-नवोन्मेषकता का सा अभास हो। यह अलग बात है कि इस कोशिश में कुछ रचनाकारों के दिलोदिमाग में भदेसपन इस कदर तारी हो गया है कि उन्हें पता ही नहीं कि पीठ पीछे उनकी किस तरह भद्द पिट रही है? आप तो जानते ही हैं, आजकल कुछ नया रचने, हटकर लिखने की कोशिश में सभी मुब्तिला हैं। लेकिन वो कहावत है न? ‘जो मारे सो मीर।’’
- ‘‘आपने तो मेरे दिलोदिमाग, दिव्यचक्षु ही खोल दिये?’’
-  ‘‘सुना है, इस शीर्षक-फीर्षक के चक्कर में आप बैतलवा - गुरू के पास भी गये थे? और शीर्षक बताने के बदले, आपके दफ्तर में लायसेंस बनवाने का उसका जो काम महीनों से अटका पड़ा है, उसे बनवाने के लिए वो आप पर अनधिकृत दबाव भी बनाने लगा, तो आपने नियम-कानून का हवाला देते, किसी तरह उससे पीछा छुड़ाया था?’’
- ‘‘अरे! तो क्या आपको इसकी भी खबर है? फिर तो आप उड़ती चिड़िया के पर गिनने वाले भी ठहरे?’’
- ‘‘देखिये! हम चश्मा जरूर लगाते हैं, लेकिन इसी से अपने शुभेच्छुगणों का सिंहावलोकन करते हैं, तो विहंगावलोकन भी करते रहते हैं। ऐसे समय में जब बिना स्वार्थ के कोई किसी को एक कप चाह भी नहीं पिलाता, आप मुफ्त के चक्कर में पड़ गये। आइंस्टीन की कही बात तो याद होगी न!...‘अक्सर आप उन्हीं चीजों की सबसे ज्यादा कीमत चुकाते हैं, जो आपको मुफ्त में मिल रही होती है।’ एल्गोरिद्म समझिये। लेखन के भी कुछ एटीकेट्स हैं। बड़े फलक पर सोचिये। शीर्षक या लेखन का भी अपना एस्थेटिक-सेंस है, जो आते-आते आता है। थोड़ा समय लगेगा। सो इधर-उधर मुँह मारना बन्द कीजिये। अपने बुद्धि-विवेक पर विश्वास कीजिये। इससे संतुष्ट रहेंगे, आत्मविश्वास भी आयेगा। शीर्षक में क्या रखा है? असल हैं कंटेण्ट, भाषा - शैली, कथ्य, विषयवस्तु और प्रस्तुतीकरण आदि समझे कि नहीं समझे...? अच्छा, अब मैं निकलूंगा । घर जाने से पहले दूध और सब्जियां भी खरीदनी हैं। देर हो जाने पर पत्नी कहीं नाराज न हो जाये। वैसे भी आप हमारी मित्र - मंडली के ‘थिंकटैंक’ सरीखे रहे हैं, कोई-न-कोई उपयुक्त शीर्षक ढूंढ ही लेंगे।’’ कहते लोलारक बाबू, तनिक आह्लादित कि इस लिख्खाड़ ससुरे से पीछा छूटा। अपने कमर और घुटने के दर्द से कराहते, पदारथ जी के दीवानखाने से बाहर निकले। जाहिर है, अब वे पदारथ जी को शीर्षक तलाशने का कोई सम्यक समाधान देने के बजाय...‘मैं इधर जाऊं या उधर जाऊं , बड़ी मुश्किल में हूं मैं किधर जाऊं । टाइप सिचुवेशन में, बोले तो...धर्म-संकट में छोड़ते, बाजार की तरफ खरामां-खरामां आगे बढ़ चुके थे।
     देखते हैं...पदारथ जी, अपने दिलोदिमाग में चल रहे, उपयुक्त शीर्षक तलाशने रूपी कवायद के इस झंझावात से जूझते, कब प्रकृतिस्थ होते हैं? अपनी कहानी के शीर्षक पर चल रहे मत-वैभिन्य पर मंथन करते, कब मतैक्य हो पाते हैं? वैसे भी...शीर्षक में कुछ नही रखा? असल तो हैं कंटेण्ट, भाषा-शैली, कथ्य, विषयवस्तु और प्रस्तुतीकरण आदि। क्या पता...पदारथ जी, अपने दोस्त लोलारक बाबू का इशारा समझ गये हों...? फिलहाल...उम्मीद पर तो दुनिया कायम है।

5/348, विराज खण्ड, गोमती नगर
लखनऊ - 226010, उत्तर प्रदेश
मोबा. नं.-9450648701

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